गीत और ग़ज़लः सलिल सरोज, अजय अलौकिक


मेरे दिल में नहीं तो ना सही
मेरी निगाहों में तो रहा कर

अगर मुस्कान की सूरत नहीं
तो आँसू ही बनके बहा कर

जरूरी नहीं हर राज़ कहना
कभी कुछ यूँ भी कहा कर

दवा नहीं मर्ज हर ज़ख़्म की
कुछ देर तो दर्द भी सहा कर

गर चाहता है मैं भी तुझे चाहूँ
तो बच्चों सा ही मुझे चाहा कर

सलिल सरोज
B 302 तीसरी मंजिल
सिग्नेचर व्यू अपार्टमेंट
मुखर्जी नगर
नई दिल्ली-110009
Mail:salilmumtaz@gmail.com

जिंदगी की किताब
कभी सवाल सी लगती है कभी जवाब सी
कभी अनकही कोई कहानी लगती है कभी पढ़ी हुई किताब सी
कभी अधुरा सा ख्वाब लगती है कभी पूर्णमासी के चाँद सी
कभी हाथ से फिसलती रेत लगती है कभी मुठ्ठी में समायी मंजिल सी
कभी पहाड़ सा बोझ लगती है कभी हवा की तरह हलकी फुलकी सी
कभी तिनके के मानिंद उड़ने लगती है कभी अविचल दरख़्त सी
कभी वृद्धाश्रम के बुज़ुर्ग का दुःख लगती है कभी पार्क में बच्चे की हंसी सी
कभी सुनामी का कोलाहल लगती है कभी कोयल की आवाज़ सी
कभी बदरंग लगती है कभी रंगों से सरोबार इन्द्रधनुष सी
कभी दरकती चट्टान लगती है कभी शीतल गंगा सी
घिसटती, सरकती, दौड़ती, भागती, उछलती, संभलती, महकती, चहकती
ये जो ज़िन्दगी है साहब बड़ी लाज़वाब सी लगती

लेखक : डॉ. अजय शर्मा
प्रचलित नाम : अजय ~अलौकिक’
शिक्षा : बी ई, एम् टेक, पी एच डी (इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग )
जन्म तिथि : 24 जून 1976
पद : सहायक आचार्य, राजकीय अभियांत्रिकी महाविद्यालय, झालावाड, राजस्थान, भारत
मोबाइल : 09413943189
ajay.2n15@gmail.com
ajay_2406@yahoo.com