कहानी समकालीनः छुट्टी-सुशांत सुप्रिय

कई घंटे जागने के बाद रात जैसे थककर सो गई थी । खिड़की के बाहर पूर्वी क्षितिज पर उजाले का शिशु उछल-कूद करने लगा था । खिड़की में से सुबह की ताज़ा हवा के झोंके अंदर आ रहे थे ।
मेरी आँख आज जल्दी खुल गई थी ।
मैंने बगल में देखा ।
सुमी बिस्तर पर अलसायी पड़ी थी ।
बगल में पाँच साल का बेटा पुलक भी चैन की नींद सो रहा था ।
मैंने घड़ी पर निगाह डाली ।
सुबह के साढ़े-पाँच बज रहे थे ।
मुझे थोड़ी हैरानी हुई । हर रोज़ तो सुमी इस समय तक खुद ही उठ जाती थी ।
सुमी को हिला कर मैंने प्यार से कहा , ” जान , उठोगी नहीं क्या ? पुलक को स्कूल भेजना है । देर हो रही है । ”
सुमी शायद कोई मीठा सपना देख रही थी । वह नींद में ही कुनमुनाई , फिर अपनी अलसायी आँखें खोलते हुए उसने मुस्कुरा कर कहा , ” आज मैं कोई काम नहीं करूँगी । ”
मैं चिंतित हुआ — ” क्यों ? क्या तबीयत ठीक नहीं तुम्हारी ? ”
” नहीं-नहीं , मैं बिल्कुल ठीक हूँ , ” सुमी ने उनींदी आँखों से कहा ।
” तो फिर ऐसी क्या बात हो गई कि आज तुम … ”
” बस , ऐसे ही । आज मैं कोई काम नहीं करूँगी , ” सुमी नींद और जागने की सीमा-रेखा पर पड़ी बोली और फिर उसने दूसरी ओर करवट ले ली ।
मुझे ग़ुस्सा आ गया । सुबह नौ बजे मेरी एक ज़रूरी मीटिंग थी । गुस्से में मैं सुमी से कुछ उल्टा-सीधा कहने ही वाला था कि अचानक स्मृति के मंच से कोई झीना पर्दा जैसे सरसराकर उठ गया मुझे अपने बचपन की एक घटना साफ़-साफ़ याद आ गई । ऐसा लगा , जैसे वह कल की बात हो । और मैं संयत हो गया । मुस्कुराकर मैंने पुलक को उठाया । उसे एक गिलास पानी पिलाया ताकि उसे खुल कर ‘ पोटी ‘ आ जाए । रोज़ यह काम उसकी मम्मी करती थी । फिर मैंने बेटे को ब्रश करवाया और उसे बाथरूम में नहलाने ले गया ।
” पापा , आज मम्मी क्यों नहीं उठी है ? … आप मम्मी को जगाओ न । ”
बेटे ने कहा ।
” बेटा , आज मम्मी को सोने दो , ” मैं बोला । ” आज अपने राजा बेटा को पापा तैयार करके स्कूल भेजेंगे । ” यह सुनकर बेटा खुश हो गया ।
बेटे को नहला कर मैंने उसे स्कूल-ड्रेस पहनाई , फिर मैं दूध गरम करके कटोरी में ले आया । उसमें कॉर्न-फ़्लेक्स डाले और बेटे को खिलाने लगा ।
” पापा , आज मुझे बहुत अच्छा लग रहा है । येऽऽऽ ! आज मुझे मेरे पापा तैयार करके स्कूल भेज रहे हैं , ” पुलक ने चहक कर कहा ।
फिर मैं रसोई में गया और बेटे के टिफ़िन के लिए मैंने फटाफट पनीर-टमाटर के सैंडविच बना कर पैक कर दिए ।
बेटे को स्कूल-बस पर चढ़ा कर जब मैं वापस लौटा , तो सुमी जाग गयी थी पर अभी भी बिस्तर पर अलसायी-सी पड़ी थी ।
” क्या हाल है मेरी जान का ? ” मैंने मुस्कुराकर पूछा ।
” आज मैं कोई काम नहीं करूँगी , ” सुमी ने अँगड़ाई ले कर कहा ।
” ठीक है , जान । मैंने पुलक को तैयार करके स्कूल भेज दिया है । तुम्हारे लिए चाय बना दूँ ? नाश्ते में क्या लोगी ? ब्रेड-ऑमलेट चलेगा ? ” मैंने पूछा ।
सुमी ने सुखद आश्चर्य से मेरी ओर देखा , जैसे उसे यक़ीन ही नहीं हो रहा हो ।
” तुमने यह सब बनाना कब सीखा ? ”
” बहुत साल हॉस्टल में रहा हूँ … और भी बहुत कुछ बना सकता हूँ । ” मैंने उसे बताया ।
” अच्छा , एक बात बताओ । मेरे यह कहने पर कि ‘ आज मैं कोई काम नहीं करूँगी ‘ , तुम नाराज़ क्यों नहीं हुए । मुझे तो लगा था कि तुम मुझ पर चिल्लाओगे , ” सुमी बोली ।
” जान , मैं तुम्हें एक घटना सुनाता हूँ जो मेरे बचपन में मेरे घर में घटी
थी । यह वाक़या सुनकर तुम खुद सब कुछ समझ जाओगी , ” मैंने कहा ।
” बात तब की है जब मैं पाँच-छह साल का था , ” मैंने कहना शुरू किया , ” एक सुबह पिताजी उठे तो उन्होंने पाया कि मेरी माँ अभी भी उनके बगल में सो रही थीं । मैं भी माँ से चिपक कर सो रहा था । पिताजी को हैरानी हुई । रोज़ तो माँ सबसे पहले उठकर स्नान कर लेती थीं , फिर चबूतरे पर उगी तुलसी पर जल चढ़ाती थीं । उगते सूर्य को जल का अर्घ्य देकर पूजा करने के बाद वे पिताजी के लिए चाय बना कर लाती थीं , और तब स्कूल जाने के लिए वे मुझे उठाती थीं । लेकिन उस दिन सूरज निकले हुए भी बहुत देर हो चुकी थी । माँ अब भी बिस्तर पर सोई पड़ी थीं । पिताजी को चिंता हुई । उन्होंने माँ को जगा कर पूछा कि क्या उनकी तबीयत ठीक नहीं थी । जब पिताजी माँ को जगा रहे थे , तब मेरी नींद भी टूट गई ।
” माँ ने कहा कि उनकी तबीयत तो ठीक थी , पर उस दिन वे कोई काम नहीं करेंगी । यह सुनकर पिताजी की हैरानी की सीमा नहीं रही । उन्होंने माँ से इसका कारण जानना चाहा । तब माँ बोलीं — ” आज मेरी छुट्टी है । ” यह सुनकर पिताजी को ग़ुस्सा आ गया । वे बोले — ” इसका क्या मतलब है ? ” उस दिन माँ ने जो कहा , वे सारी बातें मुझे आज भी याद हैं । माँ बोलीं — ” आप हफ़्ते में छह दिन ऑफ़िस जाते हैं । उसके बाद एक दिन आपकी भी छुट्टी होती है । बेटा हफ़्ते में पाँच दिन स्कूल जाता है । उसके बाद दो दिन उसकी भी छुट्टी होती है । पर मैं तो हफ़्ते में सातों दिन , महीने में तीस-इकतीस दिन , साल में तीन सौ पैंसठ दिन लगातार काम करती रहती हूँ । मुझे भी तो कभी घर के काम-काज से छुट्टी चाहिए । ” यह सुनकर पिताजी हँस कर बोले , ” तुम कोई नौकरी थोड़े ही करती हो । तुम तो ‘ हाउस-वाइफ़ ‘ हो । तुम्हारी कैसी छुट्टी ? ” तब माँ ने दृढ़ता से कहा — ” यह घर ही मेरा ऑफ़िस है । इस घर के काम-काज करना ही मेरी नौकरी है । मैं अगर ‘ हाउस -वाइफ़ ‘ हूँ तो क्या मेरा दिल कभी आराम करने को नहीं कर सकता ? क्या मैं कभी नहीं थक सकती ? क्या मुझे कभी हर दिन के काम-काज से छुट्टी नहीं मिल
सकती ? ” पिताजी अवाक् रह गए । उन्होंने ऐसी दलील पहले कभी नहीं सुनी
होगी । पर माँ की बात में दम था । माँ भी इन्सान थी । हालाँकि मैं तब केवल पाँच-छह साल का ही था , पर मुझे अपनी माँ की बात सुनकर उनसे सहानुभूति हुई । उस दिन पिताजी ने माँ को समझाने-बुझाने की बहुत कोशिश की , पर माँ टस से मस नहीं हुईं — पिताजी के नाराज़ हो जाने के बाद भी ” — कहकर मैं मुस्कुराया ।
मैंने कहीं पढ़ा था — बुद्धिमान लोग अपने अनुभवों से सीखते हैं । जो अधिक बुद्धिमान होते हैं , वे दूसरों के अनुभवों से सीखते हैं ।
यह सारी घटना सुनकर सुमी ने बिस्तर से उठकर मुझे चूम लिया और मैं रसोई में हम दोनों के लिए चाय-नाश्ता बनाने के लिए चल पड़ा ।


सुशांत सुप्रिय
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ग़ाज़ियाबाद – 201014
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