अपनी बातः बचपन एक उम्र या फिर मनःस्थिति

क्या है बचपन …मासूम और बेफिक्र, जब हर बच्चा पूरी कायनात का शहंशाह या मलिका, माँ की आँख का तारा होता है… दुख दर्द और अभाव को जो महसूस ही न होने दे और हो भी तो माँ की एक प्यार भरी फूँक से ही सारा दुख दर्द गायब हो जाए -क्या वही बचपन और इसकी यादें नहीं…बात बात पर कट्टी फिर मिठ्ठी, पलपल रूठना-मनाना, माँ की गोदी और बाबा का कंधा और नानी दादी की कहानियाँ…परियाँ और आग फूंकते अजगर कितने सच्चे झूठे खिलौने जुटा लेता है यह भी। और फिर इसी नाजुक सी नींव पर इमारत खड़ी होती है क्रूर और कठिन यथार्थ से भरे जीवन की । तब आदमी खुदको बहलाने और फुसलाने को ताउम्र बचपना न करे तो कैसे जी पाए सोचने की ही बात है यह भी तो!…

बचपन की बात करते ही उल्लास और अल्हड़पन का ध्यान आता है। मुस्कान और ललक से भरे एक हंसते- खेलते बालक की फूलों सी खिलती और बेफिक्र तस्बीर आँखों के आगे आती है। माँ के आंचल में चैन से सोया बालक…जहाँ कोई भय नहीं, चिंता नहीं। पर यही गुण हमें युवा व वृद्ध में भी तो मिलते हैं जब वह खुश होते हैं या प्यार में होते हैं-तो क्या बचपन प्यार और खुशी का पर्याय है? शेक्सपियर ने भी तो कहीं लिख था कि आदमी तीन ही जगह बच्चों की तरह व्यवहार करता है -माँ के आगे, प्रेयसी के आगे और शीशे के आगे। सही भी तो है तीनों ही जगह वह खुदको भूल सकता है…बिना किसी बनावट के जी सकता है। उसे पता है कि यहाँ प्रतिकार या तिरस्कार नहीं सिर्फ प्यार ही प्यार मिलेगा। न तो उसे तौला और परखा ही जाएगा और ना ही उसकी किसी अन्य के साथ तुलना ही होगी। तो क्या बचपन पूर्ण सुरक्षा है….सहज सहानुभूति और परवाह की चिंताहीन खुशियों भरी दैवीय स्थिति या उम्र है? फिर इसे यह क्या बचपना है -कहकर प्रताड़ित और तिरस्कृत क्यों किया जाता है !

बचपन , जवानी बुढ़ापा कालचक्र है, एक शारीरिक अवस्था है जिससे क्मशः सभी को गुजरना पड़ता है पर क्या यह एक मनःस्थिति भी नहीं, जो जिन्दगी और जीने का अन्दाज तक बदल देती या सकती है। सहज को सहज ही स्वीकारता है और बदलती जिन्दगी की विषमताएँ आदमी को सहज नहीं रहने देतीं। परिस्थितियों का बड़ा हाथ है हमारी दुनिया और जिन्दगी में। कई ऐसे हैं जो बुजुर्गों की तरह ही जीते हैं अपना बचपन। इनके जीवन में बचपन कभी आता ही नहीं, बचपन में भी नहीं। एक बालमजदूर की दिनचर्या , उसका रहन-सहन और जीने का अन्दाज एक वैभव में पले संपन्न बालक और युवा या वृद्ध से फर्क होगा ही और सदा रहेगा भी। संस्कृति और संस्कारों का भी बड़ा हाथ है। पूर्वीय और पाश्चात्य संस्कृति का यह फर्क बचपन से मृत्यु तक हर कदम पर देखा जा सकता है। कहीं तीस पर आदमी अधबूढ़ा हो जाता है तो कहीं ‘यंग फोर्टी’ कहलाता है।

उम्र कहें या अन्दाज , इसी बचपन पर केन्द्रित है हमारा यह अंक, उम्मीद है आपको हमारा यह बचपना पसंद आएगा।

लेखनी का अगला अंक हमने नीड़ या घरौंदे पर रखा है। इंसान या फिर पशु-पक्षी सभी बनाते हैं इसे और प्यार भी बहुत करते हैं इससे। रचना भेजने की समय सीमा 25 मार्च है। तो फिर देर किस बात की , कलम उठाएँ और लिख बैठें अपने अनुभव और महत्वाकांक्षाएँ ….सपने ,,,अपने-अपने घरौंदे या घोंसले के बारे में। हमें इंतजार रहेगा।

शैल अग्रवाल