विमर्षः धुंध में-शैल अग्रवाल


जाड़ों की सुबह और छह बजे का समय… दांत किटकिटाती ठंड में गुड़गांव से अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड़्डे की तरफ कार दौड़ी चली जा रही थी। आसपास बिखरी गहरी और घटाघोप धुंध को चीरती, दौड़ती-भागती सैकड़ों कारें भयभीत करने वाली सरसराहट के साथ दाँये-बाँये दोनों तरफ से ही निकल जातीं। जल्दी तो थी, परन्तु कभी ड्राइवर को धीरे कार चलाने को आगाह करती तो कभी संभलकर। अचानक सारी मानसिक व्यग्रता को दुगना करता, सड़क पर पड़ा एक कटे हाथ का पंजा दिखलाई देता है।… विस्मित और भयभीत आँखें सबकुछ साफ-साफ देखने की केशिश करती हैं। जैसे ही कार थोड़े और पास पहुँची… पाँचों मुड़ी उंगलियाँ पंजे सहित सामने छिली पड़ी हुई थीं और ऐसे मुड़ी, मानो कुछ समय पहले ही किसी वाहन का हैंडल पकड़े हुए थीं, पर अब सफेद क्षत-विक्षत मांसपेशियों के जाल में जकड़ी और शरीर से छिटककर दूर, सफेद रबर के खिलौने सी बेजान। ऊपर की चमड़ी पूरी तरह से छिल चुकी थी। थोड़े और आगे दूसरा ढेर दिखलाई दिया, शायद पेट से निकली आंतों का; दृश्य किसी डरावनी फिल्म-सा अविश्वनीय हो गया।

जानवर तो ऐसे पड़े देखे थे, परन्तु सड़क पर मानव अवयवों का यूँ उपेक्षित पड़े दिखना…, मन गहरे अवसाद से भर गया…पता नहीं कौन था वह…पता नहीं घर वालों को पता भी है या नहीं! क्षोभ से विकृत मन और मुख को विंग मिरर में देख ड्राइवर अनायास ही कहता है …’ आप उधर मत देखो, आंखें बंद कर लो…यह तो यहाँ रोज की ही बात है। सुबह जब आदमी घर से निकलता है तो पता नहीं रहता कि शाम को घर वापस पहुँचेगा भी या नहीं।’ एक युवा के मुंह से निकली हुई वे बातें पूरी मानवता का, विकसित सभ्यता का मखौल-सा करती प्रतीत हुईं और बेचैन मन दार्शनिक बना विचारों की गूढ़ कन्दराओं में जा छुपा…।

जिस ‘मैं‘ को कभी देखा नहीं, जो ‘मैं‘ निश्चय ही एकदिन अपनी कहलानेवाली हर चीज को यूँ छोड़कर चला जाता है…या जबर्दस्ती उठा लिया जाता है; कितने आश्चर्य की बात है उसी मैं की सेवा करते, बातें करते, सोचते-बिचारते पूरी उम्र निकल जाती है ; शायद ऐसी ही किसी मनःस्थिति में शेक्सपियर ने कहा था कि ‘चांद तारों से आगे भी जहाँ और हैं’… कहने वाले तो यहाँ तक कह गए कि जागती आंखों से देखा-सुना यह संसार मात्र एक स्वप्न है और जो वास्तविक है, जगने या स्वप्न टूटने के बाद ही शुरु होता है। दूसरी तरफ विपक्ष में ऐसे भी हैं जिन्होंने इस मान्यता को खंडित करते हुए कहा है कि जो है, यहीं है, इसके आगे-पीछे कुछ भी नहीं! …’

विचारों की गहराती उलझनें अक्सर ही सोचने को मजबूर कर देती हैं कि क्या ये ज्ञानी-विज्ञानी वाकई में कुछ ऐसा जानते है, अनुभव कर चुके हैं, जिसे हम-आप कभी जान या समझ ही नहीं पाए या फिर सिर्फ बातें करने को, तर्क करने को अटकलें लगाते रहते हैं वे ! आम आदमी को तो पूरी भ्रमित करने वाली हैं ये बातें… खिड़की से बाहर दिखती घनी उस धुंध की तरह जो दस-दस फुट लम्बे पेड़ों तक को अपनी चादर में छुपा ले जाती है। वैसे भी तो अक्सर ही आँखें बहुत कुछ देखकर भी देख नहीं पाती या देखना तक नहीं चाहतीं…कभी भय से घबराकर तो कभी उपेक्षा या अवहेलना में, विशेषकर दूसरों का दुख-दर्द …!

बेचैन करती चुप्पी के साथ गाड़ी की रफ्तार तेज करके वह झट आगे बढ़ आया था। सोचती हूँ,- कार को तो वहाँ से जल्द-से जल्द हटा ले गया , और पल भर में ही सब कुछ वैसे ही पड़ा पीछे छूट भी गया; पर क्या आज भी दृश्य पीछे छूट पाया..? क्या यही इलाज है इन परिस्थितियों से निपटने का..’.पलायन’ …क्या बस यही एक तरीका शेष रह गया है हमारे पास! …

सोच की भंवरों में कितना भी डूब लें सच्चाई तो यह है कि न तो आम आदमी के पास इतना वक्त रहता है न ही इतना साहस कि दूसरों की सोचे, कानून और व्यवस्था से उलझ पाए, हाँ इतना जानना अवश्य जरूरी है कि जहां कहीं भी अति या अन्यथा अतिक्रमण और अन्याय … स्वार्थ होगा, वहीं धुंध ( देखने-सोचने-समझने की अस्पष्ट प्रक्रिया ) होगी। … भले ही मौसम की धुंध हो या लालच और कुरीतियों की। दुर्व्यवहार और अनाचारों की हो या दीन-दुनिया को भुलवा देने वाला कोई खुद हमारा अपना पाला भ्रम हो। या फिर सब कुछ और धुंधला कर देने वाली प्यार की दीवानगी , या फिर नफरत या निराशा की ही धुंध हो !

धुंध, जो रहस्य है, चित्र है, भ्रान्ति है, इस घटाघोप कुहासे की वजहें तो कई हो सकती हैं परन्तु परिणाम सदा एक ही रहता हैः धुंधला और अस्पष्ट- समझ और सोच की पकड़ से दूर और पूर्णतः भ्रामक… दृष्टि से सब कुछ लपेटे और छुपाए…एक बेचैन और लाचार करता कोहराम। देखना चाहें तो भी दिखे नहीं, और दिखे भी तो स्वप्न-सा धुंधला…अस्पष्ट और अनचीन्हा…समझ और पहुंच से परे…जैसे अवचेतन मन में तैरती यादें; अधबनी बेरंग तस्बीरें… स्मृति और विस्मृति की तरंगों पर बेमतलब ही डूबती-उतराती।

चीजों को देखने, अनुभव करने, समझने की क्रिया भी तो व्यक्तिगत ही होती है। ज्ञानी को जहां यह धुंध परदे के पीछे छिपी अनिश्चितता या रहस्य लगती है, जिसे वह सुलझाना चाहता है, तो प्रेमीयुगल को बेहद रोमांटिक। उमड़ते बादलों को देख प्रियतमा के साथ बैठा प्रेमी मेघ-मल्हार गाता है तो विरही नीर बहाता है। मानव स्वभाव की तरह ही समझ या अनुभूति भी तो कई-कई रूप और आयाम लेती रहती है…लेती आई है और आँखों के आगे भांति-भांति के प्रश्नचिंह लगाती चलती है; जैसे क्या यह धुंध बाहर दृश्य में है या फिर खुद देखने वाली आंखों में… इनकी ठीक से न देख पाने की असमर्थता में? फिर इस कोहरे को लौकिक-पारलौकिक भांति-भांति के रहस्यों के अतिरिक्त अज्ञान और माया से भी तो जोड़ा जाता रहा है। तो क्या अंधेरे को चीरती मनःस्थिति या ज्ञान ही वह रोशनी है जिससे मंडित होकर हम चीजों को उनके वास्तविक और विविध रंगों में देख पाते हैं…देख सकते हैं। पर ऐसी दृष्टि के लिए भी तो एक पारदर्शी मन की जरूरत होती है, जबकि मानव मूल्यों के प्रति पूर्ण तिरस्कार और दूसरों के अहसासों के प्रति पूर्णतः अवहेलना और उपेक्षा निश्चय ही आज हमें और-और संवेदना हीन और अकेला ही करते जा रहे हैं ।

प्रकृति और मन की यह आंख-मिचौली और फिर इनके आपसी उलझाव और अपरिहार्य सामंजस्य का खेल तो सृष्टि के शुरुवात से ही चला आ रहा है। प्रकृति की विविधता को…उदारता को, इसके कोप को, मानव विविध रूपों में सहता और समझता है; कभी डूबकर तो कभी उनसे डरकर। पूजा से लेकर पर्व और पर्यटन तक जाने किस-किस रूप में अभिव्यक्त किया है उसने खुद को, कभी आभार स्वरूप तो कभी मात्र प्रसन्न करने के लिए … गहनतम रूप तक में रोशनी की एक लकीर, एक रास्ता-सा ढूँढते हुए ।

क्या है यह धुंधः अंतर्मन(चेतन, अवचेतन) की जटिलता…इसके अनचीन्हे, अधूरे और जटिल स्वप्न, या फिर उनसे निकल पाने की व्यग्र और बेचैन ललक व तड़पड़ाहट …मात्र एक मौसम ही नहीं धुंध आज के शब्दकोष में अवचेतन मन का भी पर्याय बनती जा रही है। इसके आते ही अपराध और कुत्सित व्यवहारों में वृद्धि हो जाती है। वह जमाना और था जब मन या इन्द्रियों पर नियंत्रण की बातें होती थीं, हमारे ऋषि-मुनि इच्छाओं की तुलना एक ऐसी अग्नि से करते थे जिसमें जितनी कामना की आहुति दो उतनी ही तीव्र होकर धू-धू करेगी। आज तो लगता है मानव ने अपने जीवन की बागडोर ही इसे सौंप दी है। शोध-पर शोध हो चुके हैं और बहुत कुछ लिखा-पढ़ा जा चुका है अवचेतन मन पर। फ्रायड और यंग के अनुसार तो यह ‘इड’ या आंतरिक मन ही सबकुछ है, इसीके सहारे मानव जीवन पूर्णतः संचालित होता है और यही उसकी सफलता, असफलता..रुचि और व्यवहार आदि की क्लिष्ट गाथा लिखता है। यही उसके सारे आंतरिक.स्पष्ट-अस्पष्ट रहस्य और विकारों का ठिकाना भी है और उनसे छुटकारा पाने का यंत्र भी। तो क्या यही मन में छुपा राम और रावण दोनों ही है। सोने की लंका है…दम तोड़ते दशरथ हैं…कैकयी और मंथरा हैं… दानव व महादानव ही नहीं, निर्बल परन्तु चतुर वानर सेना भी है… राम के दूरदर्शी, सक्षम पर समर्पित नायक हनुमान हैं…सहगामी और सहधर्मी, कर्तव्यपरायण लक्ष्मण और सीता हैं? जब सब कुछ हमारे अपने अंदर ही है तो कहीं-न-कहीं नियंत्रण भी तो हमारे अपने अंदर ही होना चाहिए। फिर क्यों यह मन सदैव ही अश्वमेध यज्ञ रचाता रहता है और अपनी शर्तों पर जीने व जीतने में ही सुखी रह पाता है, हार और अपनों से हारने के सुख को समझना ही नहीं चाहता, क्यों संयम और धैर्य आज के तेज गति वाले जीवन और मन दोनों से ही छूटते और टूटते जा रहे हैं!

सब जान-बूझकर भी क्यों होने देते हैं हम इतने राक्षसी और क्रूर अत्याचार खुद पर भी और अपने आसपास पर भी? क्यों नहीं मार सकते मन के अंदर बैठे रावण को…? माना कि कवियों ने कहा है कि वियोगी होगा पहला कवि, आह से निकला होगा गान, और मानव-मन नित नई कविता- कहानी और गीत रचता रहता है…तस्बीरें बना-बनाकर अमर कर देना चाहता है अपने हताश-निराश सभी तरह के मनोभावों को, परन्तु सच्चाई यह है कि मनुष्य स्वभावतः ही सरवाइवर और योद्धा है। कलि और प्रलय की कल्पना के पहले वह बृह्मा और विष्णु को रच लेता है …नोहा की नाव बना लेता है क्योंकि विषम से विषम परिस्थिति में भी जीतना और जीना ही चाहता है। हजार तकलीफों और विषमताओं के बाद भी इतना निराशावादी नहीं वह कि बस दुख-दर्द और भटकन को ही आजीवन सीने से लगाए रहे, और एक नशे की सी हालत में जीता रहे, अपने गम गलत करता हुआ।…दुरूह जंगल हो या अगम्य पर्वत; धरातल पर ही नहीं सागर की अभेद्य गहराइयों से भी उसने जीवन विष के साथ आनंद का अमृत कलश ढूँढा हैः और उसीका संकल्प और स्थापन दोनों ही करता आया है वह जीवन में… धरोहर की तरह निराशा और कुंठा को संभाल कर रखना नहीं चाहा कभी उसने।

सत्यं शिवं और सुन्दरम् की तरफ ले जाने वाली कला और कलाकार क्या दोनों ही आज भटक चुके हैं, या यह भी हमारी हताश आंखों की धुंध मात्र है…कला का एक प्रचलन मात्र है? माना कि धुंध का संबंध अवचेतन मन की यादें और ग्रन्थियों के साथ-साथ चेतन मन के भ्रम और भ्रान्ति…छलावा आदि से भी है…अवसाद से है, परन्तु गहरी-से गहरी धुंध में भी तो पता रहता है..(.आस रहती ही है) कि पीछे सूरज भी है, जो मौका मिलते ही निकल आएगा और सब पुनः साफ नजर आने लगेगा। धुँध हो या चटक धूपः सोच न सिर्फ व्यक्ति की निर्मात्री और अधिधात्री है; चरित्र , आचरण खुद राग-रंग, सफलता-असफलता आदि की सहज सहचरी भी।

शैल अग्रवाल
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