व्यंग्य कहानीः डेजी की कमर्शियल आत्मकथाःअशोक गौतम


कई दिनों से रात को मुझे उनकी ओर की परेशानियों के चलते एक तो पहले ही नींद नहीं आ रही थी और अब ऊपर से जब विदेसी अपरिचित नस्ल से कुत्ते की स्त्रीलिंग या पुलिंग आत्मा आकर मेरी बचीखुची नींद खराब कर बेले कबेले जगा बस एक ही रट लगाती – मेरी आत्मकथा लिख हे दो टके के लेखक और लेखन से जन्म जन्म को मुक्ति पा।
कई रातों तक इधर मैं उस आत्मा के आग्रह अथवा दुराग्रह को मैं इग्नोर करता रहा तो उधर वह मुझ परेशान को और भी परेशान करती रही । बीच बीच में उसकी बात न मानने पर प्यार से काटने की भी धमकी दे देती , आज के दोस्तों की तरह। पहली बार तब पता चला था कि कुछ स्वाभाविक चीजें जीव के जीते जी तो उसमें बनी ही रहती हैं पर जीव के मरने के बाद भी उसमें ज्यों की त्यों बनी रहती हैं।
मैं पसोपेश में, लिखूं और वह भी एक कुत्तेजात की आत्मकथा? देश में दूसरी चीजें लिखने को खत्म हो र्गइं क्या? क्या दिन आ गए साहब आज आदमियों तो आदमियों, कुत्तों के आगे भी हम जैसों को हाथ जोड़ने पड़ रहे हैं?
आखिर जब मैं उस आत्मा से बुरी तंग आ गया तो एक आधी रात सपने में मैंने उसके आगे पीछे दोनों हाथ जोड़े कहा ,‘ हे सर्वव्यापी जाति से अज्ञात मरे कुत्ते की आदरणीय आत्मा! आत्मकथा लिखने का इच्छुक जीव अपनी आत्मकथा खुद अपने हाथों से अपनी हजारों बातें छिपा कर लिखता रहा है। हां! तेरी कोई डायरी डुयरी कहीं हो तो उसके आधार पर तेरी कुछ जीवनी जुवनी लिखनी हो तो मैं उसे लिखने का साहस जरूर कर सकता हूं। कारण, मैं आदमी की खाल ओढ़े कुत्तों के बीच बहुत रहा हूं जो कहीं भी टुकड़ा दिखते ही सारे आदर्श, मान सम्मान छोड़ यों भागते हैं कि मत ही पूछो तो ही भला , न पूछने पर मेरी भी नाक बची रहे और जिनके पास नाक है ही नहीं, उनकी भी,’ पर उस कुत्ते की आत्मा वैसे ही अपनी आत्मकथा लिखवाने पर ही अड़ी रही ज्यों कोई नेता अपनी आत्मकथा लिखवाने को किसी गरीब लेखक के सामने तना रहता है। अंततः उसने मेरे जुड़े हाथ पकड़ निवेदन किया,‘हे हिंदी साहित्य के अनाम लिखारी! क्या तुम नहीं चाहते कि लीक से हटकर कुछ अभिनव लिख हिट हो जाओ? हमेशा संपादकों द्वारा दुत्कारे जाने वाले के पीछे जो संपादक पूंछ हिलाते घूमें तो?? मैं अपनी आत्मकथा तुमसे लिखवा नामी प्रकाशन से छपवा तुम्हें बीस प्रतिशत रायल्टी न दिलवाऊं तो…. मुझ पर विश्वास नहीं तो हलफनामा बना लेते हैं।’
‘ अब तुम जैसों पर ही तो विष्वास बचा है हे कुत्ते की आत्मा! शेष तो सबके विश्वास डगमगा चुके हैं,’ और मैं रायल्टी के चक्कर में फंस उसकी आत्मकथा लिखने को तैयार हो गया। असल में लेखक अपने लेखन के कारण उतनी जल्दी नहीं मरता ,जितनी जल्दी वह रायल्टी के मोह में पड़ कर मरता है।
तब सपने में ही हम दोनों के बीच एक गुपचुप समझौता हुआ और मेरे भीतर उसकी आत्मा ने मुस्कुराते हुए जब प्रवेश किया तो जाकर पता चला कि यार, ये आत्मा तो कुतिया की है। मेरे पूछने पर उसने अपना नाम डेजी बताया और यह भी बताया कि कभी उसके पुरखे जर्मन से आए थे। पर अब वह मिक्स डीएनए की है। कब आए थे, उसे पता नहीं। अब वह भारतीय संस्कृति की यों हो गई है कि…. वैसे तो अब भारतीय संस्कृति के मेरूदंड भी नहीं।
अब जब एग्रीमेंट कर लिया तो क्या कुत्ता, क्या सूअर! अपने अजीजों की तरह अपना चरित्र आज जहां टुकड़ा दिखा, वहीं लार टपकाना है। आदर्शवादी हो मैं मैं करते शरीफों को डराना है।
मित्रो! वैसे मैं खुद की भी कई दिनों आत्मकथा लिखने की सोच रहा था। पर यह सोच कर चुप रहा कि जब मेरे पास मेरी आत्मा ही नहीं तो उसकी कथा क्या लिखूं?
पिछले हफ्ते मैंने दुस्साहस कर अपनी उर्फ डेजी की आत्मकथा लिखने को ढीली कमर कसी एक उम्मीद लिए कि व्यंग्य लिखने से तो बंदा अमर होता नहीं लगता, तो क्यों न कुत्ती पुण्यात्मा को अपने में प्रवेश करा इसकी आत्मकथा लिख कर ही कुछ अमरता हासिल कर ली जाए।
असल में अब अपनी बोले तो डेजी की आत्मकथा को लेकर कुछ लिखना शुरू करने से पहले तक मैं जो भी अपनी नजरों तक में लिखता रहा हूं , बकवास ही लिखता रहा हूं। सो अबके ये भी सोचा कि क्यों न इस बार कुछ नया तथ्यों पर आधारित लिखा जाए?कल्पना और यथार्थ का कॉकटेल। अतः डेजी की आत्मकथा लिखने से पहले मैंने जर्मन जाति के कुत्तों की जातियों, प्रजातियों पर शोध करने वाले प्रबुद्ध इतिहासकारों से बात करने की सोची। और इसे उसकी किस्मत कहिए या मेरी, मुझे उसी तरह के अव्वल दर्जे के कुत्तों के इतिहास पर काम करने वाले इतिहासकार मिल गए जिस तरह से रिश्वत पर रिसर्च करने वाले आसानी से मिल जाते हैं।
पर दुखद,कोई भी डेजी के पुरखों के बारे में दम के साथ न कह सका कि डेजी के पुरखे देश में पहले पहल कब आए थे? कह सके तो बस इतना ही कि जब अंग्रेजों का आगमन शिमला में हुआ था ,तो सरकारी कागजों में यह लिखा मिलता है कि डेजी के पुरखों जैसे वहां उनके साथ यहां देखे गए थे । तब देशी कुत्तों ने उनके साथ दो दो हाथ करने की रिज पर सोची भी थी। पर अंग्रेजों द्वारा अपने कुत्तों की भारतीयों से कड़ी सुरक्षा के चलते यह संभव न हो सका था। उसके बाद धीरे धीरे जैसे जैसे अंग्रेज शिमला से आगे फैलते गए, वैसे वैसे उनके साथ डेजी के पुरखे भी।

शिमला से दूर एक गांव है बराड़ी । मैं पैदा तो शिमला में हुई पर उसी गांव के एक मझोले घर में मेरा बचपन और जवानी मजे से बीते।
बराड़ी में रामदेई अपने आठ फेल बेटे, काकू के साथ रहती थी। जैसे उसके डंगर वैसा उसका बेटा। मतलब, वह बड़ा आवारा टाइप का लड़का था। सब उसे काकू के बदले गया मुआ ही कहते थे। हट्टा कट्टा होने के बाद भी खेतों में जाने को उसका कतई मन न करता। सारा दिन गांव में बस धींगामुश्ती।
रामदेई की दो बीघा जमीन सड़क किनारे थी। पंचायत प्रधान की आंख प्रधान होने से पहले ही उस जमीन पर गड़ी थी। जब वह मिल मिलाकर, खिला पिला कर प्रधान हुआ तो रामदेई ने उस जमीन में से चार बिस्वा जमीन इस वादे के साथ प्रधान को दी कि वह एमएलए से बात कर उसके लड़के को सरकारी नौकरी में लगवा दे। वादा खिलाफी उस वक्त कम ही होती थी। सो इधर रामदेई का आवारा काकू सचिवालय में चपरासी के पद पर लगा तो उधर रामदेई ने प्रधान के नाम चार बिस्वा जगह की।
सचिवालय में चपरासी के पद पर लगने के साल बाद ही वह अपने को किसी विभाग के सचिव से कम न समझता। पूरे गांव में उसका दखल देखने लायक था। अब वह गए मुए से काकूजी हो गया था। जब वह शिमला से गांव आता तो गांव के आसपास के उससे अपने बच्चों को शिमला में नौकरी लगवाने की बात करते तो उस वक्त वह चपरासी न होकर किसी विभाग का डायरेक्टर तक हो जाता।
काकू को सचिवालय में लगे छह महीने हो गए तो उसे ब्याह के लिए रिश्ते पर रिश्ते आने लगे।
और फिर लेने देने की बात के बीच उसका विवाह पास के ही जाने माने ठाकुर की बेटी राधा से हो गया। ठाकुर अपनी बेटी को उस घर में दे निहाल हुआ।
घर में बहू ने आ दस दिन बाद ही विवाह से पहले घर के सारे काम करने का वादा तोड़ते गाय ही क्या, घर का छोटा मोटा काम करने तक से सास को साफ मना कर दिया तो बूढ़ी सास के गले में अंगूठा सा कुछ दबा। बहू ने साफ किया कि आठ पास है। है कोई बहू पूरे गांव में आठ पास? उसने गाय का गोबर उठाने को थोड़े ही आठ की थी। दर्जा तीसरा हुआ तो क्या हुआ! गांधीजी भी तो तीसरे दर्जे में सवार होते थे। उसने सास से ये भी कहा कि उसका पति सरकारी नौकर है, और वह भी सचिवालय में। सचिवालय के नौकर की बीवी घर में गोबर उठाए तो लोग उसके पति के बारे में क्या कहेंगे?वह अपने पति की इज्जत को बट्टा नहीं लगने देगी। इसके लिए उसे कोई जो चाहे सो कहे।
….. और एक दिन राधा की सास ने बहू से तंग आकर चार किलो सुबह, चार किलो शाम को दूध देने वाली गाय रात को अंधेरे में गांव के चार लड़कों से गांव से चार मील दूर गाय के पांव पर मथा टेक माफी मांगने के बाद छुड़वा दी।
अब घर में खाने और हगने के सिवाय तीसरा कोई काम न बचा था। बहू सारा दिन टांगें पसार कर धूप में बैठी रहती तो सांस खों खों करती, धूप में फटे बोरे पर गठरी बनी बेतरतीब पड़ी रहती ।
आगे विधि का विधान देखिये साहब! भली चंगी नौकरी वाले काकू ने शिमला में जब अपने पड़ोस में कुत्तों का बिजनेस करने वाले को देखा तो उसका मन भी कुत्तों का बिजनेस करने को मचलने लगा। उसे लगा कि अब घर में पशुओं का तो कोई काम है नहीं, तो क्यों न घर घरवाली को बिजी रखने के लिए मुझ विदेसी ले जाए। उसका मन भी लगा रहेगा और चार पैसों की इनकम भी हो जाएगी।
….और उसने शहर वालों की तरह मेरे द्वारा फलने फूलने वाला बिजनेस करने का फाइनल डिसीजन लिया। जब जब मालिक के घर मैं सूया करूंगी तो वह शहर आकर मेरे बच्चे बेच दिया करेगा। जैसे ही मालिक बिजनेस की और गहराई में गया तो उसे कुत्तों के बच्चों के बिजनेस में आदमियों के बच्चों से अधिक कमाई के स्कोप दिखा। उसने आव देखा न ताव और शहर के संभ्रांत से मुझ विदेशी बच्ची को घंटा भर मोलभाव के बाद पांच बीस में खरीद लिया। नए मालिक ने मुझे गोद लेते ही मेरे पेट को परखा, उसे लगा मेरे पेट में कम से कम आठ तो आएंगे ही। एक एक पिल्ले की कीमत आदमी के बच्चे से अधिक। भगवान ने सब ठीक किया तो हर साल आठ दस सौ, वह भी ईमानदारी के।
शनिवार को जब मालिक घर आया तो अबके अपने साथ बैग के बदले मुझे अपनी बगल में शान से दबा लाया।
…..और मैं चूं चूं करती शिमला से गांव आ गई। घर आते ही जब उसने अपनी घरवाली को मेरी कीमत बताई तो वह बौराई। इत्ते में तो आराम से तीन बकरियां आ जातीं। पर जब उसने गुणा भाग कर मुझसे होने वाले फायदे के बारे में बताया तो राधा ने दांतों तले उंगली दबा ली। राधा को तब पहली बार पता चला कि कुत्तों के बिजनेस में गाय भैंसें पालने से अधिक इनकम हो सकती है।
काकू मुझे दूध पिलाने के लिए शिमला से आते हुए अपने साथ दूध पिलाने की कंपनी की पांच रूपए वाली बोतल ले आया था। ये दूसरी बात है कि घर में उसकी अपनी दो महीने की बेटी को दूध पिलाने के लिए उसकी घरवाली गांव की दुकान से सबसे सस्ता निप्पल लेती रही है, जब जब उसकी बेटी खाली दूध की बोतल का निप्पल काटती। सारी रात काकू की बीवी सपने में मुझे सूते देखती रही और मेरे बच्चे शान से बेचती रही, शिमला के मालरोड़ पर। राधा ने सपने में देखा कि मेरे बच्चे आठ तो उनको खरीदने वाले साठ। दूसरी ओर सड़क के किनारे आदमी का बच्चा रोता हुआ। तो रोता रहे। आज का दौर मेरा दौर है। जिसके घर मैं नहीं, वह घर घर नहीं।

सुबह उठते ही काकू ने पंडित जी को नरेशी के हाथ संदेसा भिजवाया कि पंडितजी को कहना उन्हें काकू ने बुलाया है। जितनी जल्दी आ सकें , उसके घर आ लें। एक शुभ काम आन पड़ा है। किसीका नामकरण करना है। नरेशी तब पंडित के घर दूध देने जा रहा था। जब आधे घंटे बाद नरेशी पंडितजी के घर पहुंचा तो उसने पंडिताइन को दूध देने के बाद रोज की तरह पंडिताइन से मजाक करते पूछा,‘ पंडितजी यजमानों को ठगने निकल गए हैं या…..’
‘ नहीं, जाने को तैयार हो रहे हैं। कोई काम है?अभी बुलाती हूं उन्हें, ’ थोड़ी देर बाद माथे पर तिलक पोतते, उलझा जनेऊ सुलझाते पंडितजी बाहर आए। आते ही उन्होंने नरेशी से पूछा,‘ क्या बात है नरेशी?’
‘ महाराज पंडजी, काकू ने बुलाया है अभी?’
‘ऐसा क्या काम है?’ उन्होंने धोती ठीक करते पूछा।
‘ कह रहा था ,किसीका नामकरण करना है।’
‘किसका? छह महीने पहले ही तो उसकेे….’
‘नहीं, घर में शहर से विदेशी नस्ल की कुतिया लाया है। शायद उसका नाम रखना होगा।’
अपने देश के कुत्ते मर गए क्या जो अब विदेशी कुत्ते पालने पड़ रहे हैं गांव में भी ? पंडितजी ने अपने आप से कहने के बाद पंडिताइन से पूछा,‘ घर में क्या क्या खत्म है?’
‘ क्यों?’
‘काकू के घर जा रहा हूं। जो दालें खत्म हों बता दे। कुतिया की ग्रह शांति के नाम पर उन उन दालों की उससे गठड़ियां दान करवा दूंगा।’
पंडिताइन से दालों की लिस्ट ले पंडितजी ने अपना झोला उठाया और काकू के घर की ओर चार चार कदमों का एक एक कदम करते हो लिए।

आधे घंटे बाद पंडितजी काकू के घर राम राम करते पहुंचे तो वह उनका बेसब्री से बीड़ी से बीड़ी सुलगाता इंतजार कर रहा था। पंडितजी के आते ही उसने पंडितजी से कहा,‘ पंडित जी! इसका नामकरण करना है। जंतरी तो लाए हो न?’
‘ लाया हूं। जंतरी के बिना पंडित पंडित नहीं होता यजमान! जंतरी हर पंडित का हथियार होता है। उसे वह देखनी आए या न, ’ कह पंडितजी मन ही मन हंसे और सबील पर बैठ झोले से जंतरी निकाल उसे खोलते उससे पूछा,‘ किसका नामकरण करना है?
‘इसका! शहर से आई है ये। पूरे सौ में,’ पंडितजी की आवाज सुन तब उसकी बीवी मुझे गोद में लिए पुचकारते हुए बाहर आई। उसकी अपनी बेटी भीतर रो रही थी बिस्तर में। लगा ज्यों उसने बिस्तर गंदा कर दिया हो। मैंने उसका रोना सुन मेरा मन भर आया। पर मैं कर तो कुछ नहीं सकती थी, सो चुप रही, अपने मालिक की बीवी की गोद में सिमटी हुई ,नए वातावरण, नए बंदों को समझने की कोशिश करती। पंडितजी यह सब देख हैरान!सारा नजारा देख तब मैंने मन ही मन अपने से कहा, ‘हाय रे पंडिताई, कैसे दिन आ गए। अब इस धर्मभीरू समाज में मुझ जैसों के नमाकरण को भी पंडित?’ पर वे मन मसोसते चुप रहे। उन्हें क्या! धंधे में बने रहने के लिए किसीका भी नामकरण करवा ले यजमान। धंधे में क्या कुत्ता, तो क्या गीदड़। धंधे में क्या गधे के बच्चे का यज्ञोपवीत संस्कार तो क्या आदमी के बच्चे का। जहां चार पैसे ज्यादा बन जाए व्यवसाय में तो वही जीव और यजमान श्रेष्ठ रहा है।
‘ इसका नाम भी रखवाना था और इसकी कुंडली भी बनवानी है पंडितजी। देखना तो इसके ग्रह कैसे हैं? बड़ी होकर क्या बनेगी?’
‘कब जन्मी है ये? कोई बार, तारीख, समय??’
‘सो तो पक्का नहीं। पर जिसकी गोद से लाया हूं, उसके हिसाब से तो आज दस दिन की हुई।’
काकू के मुंह से मेरा जन्म सुन पंडितजी ने उंगलियों पर कुछ गिनना शुरू किया,‘ मतलब उस दिन सोमवार था। मतलब सारा दिन लग्न कुंभ! कुंभ राशि में पैदा हुआ जातक बहुत महान होता है। कुत्ता होने के बाद भी उसमें मानवीय गुण कूट कूट कर भरे होते हैं। टुकड़ों के लिए हर अफसर की परिक्रमा करता रहता है।’
‘तो कुंभ लग्न मानकर इसकी कुंडली बना दो। अब इसका कुंभ लग्न के आधार पर नाम क्या होगा पंडितजी?’
‘तो ह से या व से जो मन करे रख दो। पर हां, लग्न राशि का नाम अपने तक ही रखना। वरना जातक को बुरे लोगों की नजर लगते देर नहीं लगती,’ पंडितजी ने एक गोपनीय बात काकू को बताई तो वह गद्गद् हुआ। धन्य हो पंडितजी! उसका कितना हित चाहते हैं? पंडित हो तो ऐसा, वरना बिन पंडित ही ठीक।
‘ तो इसका दूसरा नाम डेजी रख देते हैं,’ काकू की पत्नी ने मुझे पुचकारते हुए सलाह दी।
‘बिमला क्यों नहीं?’ पंडितजी न भारतीय संस्कृति के कमाऊ उपासक होने के चलते पूछा तो काकू ने कहा,‘ पंडितजी असल में ये भले ही मिक्स हो गई हो पर वास्तव में है तो विदेसी ही। अंग्रेजों के जो हम गांव के नाम रख दें तो उन बेचारों को कैसा लगेगा? समझा करो न! बेचारी को इंडियन नाम से बुलाने पर पता नहीं ये समझ भी पाएगी या नहीं कि इसे बुलाया जा रहा है या किसी गंवार को।’
‘पर अब तो ये हमारी बिरादरी, कल्चर की होने जा रही है। सो इसे हमारे रीति रिवाज समझने ही होंगे। हमारी बोली समझनी ही होगी। वरना…’ पंडितजी ने सौ टके की बात कही पर काकू को वह राख के मोल से भी कम की लगी।
‘धीरे धीरे सब समझ जाएगी पंडितजी! तो इसका नाम रखते हैं डेजी!’ कह उसने अपनी पत्नी की ओर देखा तो वह मंद मंद मुस्कुराई।’
पंडितजी के पुरखों की तरह पंडितजी को भी कभी अपने यजमानों से कभी कोई शिकायत रही। जिस तरह यजमान खुश, उस ओर मोड़ दिया धर्म। उनका मानना है कि श्रेष्ठ धर्म वही जो जीव को कुछ भी करने की छूट दे। धर्म के नाम पर उनको लूट दे। पंडित जी ने अपने झोले से शंख निकाला और काकू से कहा,‘ काकू! ये शंख पकड़ और इसके बीच में से लक्ष्मी के कान में तीन बार देजी देजी देजी बोल दे।’
‘ देजी नहीं पंडितजी डेजी,’ काकू की पत्नी ने पंडितजी की गलती सुधारते कहा।
काकूजी ने अपनी बीवी की गोद में शांत डरी मुझे लिया और मेरे कान में शंख से तीन बार डेजी डेजी डेजी कहा तो मैं डरी। असल में उस वक्त मेरे कान में गुदगुदी सी हुई थी। पर मेरा मालिक मेरे कान में शंख घुसा कर ही रहा। और मेरा नामकरण संस्कार पूरा हुआ। घर में शिमला के नत्थू हलवाई से लाए मोती चूर के लड्डू बंटे तो काकू की मां ने दो लिए।
पंडितजी ने मेरे ग्रहों की शांति के नाम पर अपने उदर की शांति हेतु ली चार दालों की किलो किलो की गठरियां बांधी , कांधे पर धरी और अपने घर को मुझे गालियां देते आगे हो लिए।
सोमवार को मालिक बोले तो मेरा धर्म का बाप मुझे अपनी बीवी की गोद में छोड़ मेरा एक एक काम उसे दस बार दस बार समझा शिमला चला आया अपनी ड्यूटी पर। अपनी बीवी को तो अपनी बीवी को, अपनी मां को भी उसने समझाते कहा,‘ मां देख, मैं तेरे भरोसे अपने कलेजे के टुकड़े को छोड़ कर जा रहा हूं। इसके साथ कैसे रहना है , इसके साथ कैसे बातें करनी हैं, समझ गई न?’ तब मां ने उससे कहा था,‘ डर मत बेटा! मैंने तुझे भी तो नौ महीने पेट में पाला है। बच्चे को कैसे पाला जाता है ,मुझे सब आता है। तू चिंता मत कर,’ तब पहली बार काकू को अपनी मां पर प्यार आया था।
….और मैं एक मां के द्वारा अपनी बेटी के बराबर तिरस्कृत होने के बाद भी शान से हर रोज दो इंच बढ़ती रही। मेरे लिए बाजार से हर तीसरे दिन बकरे का मीट आने लगा। सुबह शाम दोनों वक्त दूध। सुबह उठकर मालिक की बीवी पोती को दादी के पास छोड़ मुझे गोद में लिए बाहर सैर करवाने ले जाती तो खुली हवा , खुला वातारवण देख मन मोर हो बैठता।
देखते देखते मैं गांव की सबसे प्यारी दुलारी बन गई। मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि यह देश आजाद हो जाने के बाद भी हमारा ही गुलाम रहेगा।
मैं हरदम बिस्तर पर तो बुढ़िया जमीन पर बिस्तर लगाए। मुझे तब बुढ़िया पर दया भी आती। पर मैं चुप रहती। अब तक मुझे पता चल चुका था कि समाज में दया करनी नहीं, केवल दिखानी चाहिए।
इतना सब होने के बाद भी पर रहती मैं डरी हुई सी ही। कारण, औरों के देश में आदमी तो आदमी, कुत्ता भी चूहा हो जाता है। पर मेरे घरवालों ने मेरे इस डर को मेरी शरीफी से जोड़ा तो मुझे और भी प्रसन्नता हुई।
मालिक की घरवाली पहले मुझे खिलाती, फिर अपने आप खाती और बचा हुआ सास को देती। मालिक की घरवाली पहले मुझे शैंपू से नहलाती, फिर बचा शैंपू अपने बालों में लगाती। उसके बाद पानी बचता तो बेटी को नहलाती। बुढ़िया को नहाने को तो बहुधा ठंडा ही पानी मिलता। मैं खुश! आजाद देश में भी विदेसियों का इतना सम्मान! हाय रे इंडिया!
मेरे अनिंद्य सौंदर्य को देख गांव की गलियों में सारा दिन पड़े रहने वाले शोहदे बस इसी ताक में रहते कि उन्हें मौका मिले तो वे मुझसे अपने इश्क का इजहार करें। यह देख मेरा सौंदर्य और भी निखर जाता, बिन नहाए पेस्ट किए बिना ही। तब मन करता राधा से कह अपने नाखूनों में उससे उसका नेल पालिश लगवाऊं। उससे बिंदी ले अपने माथे पर लगाऊं। उससे … पर बेचारों की मुराद पूरी न हो सकी तो न हो सकी। कारण, जब भी मैं घर से बाहर निकलती तो राधा अपने हाथ में उनके लिए चार फुट का बांस का डंडा लिए रहती।
अचानक मुझे पता नहीं क्या हुआ कि मैं बीमार हो गई। उटपटांग तो ऐसा वैसा मैंने कुछ खाया नहीं था। वैसे मालिक की मां ने कई बार अपनी बहू से कहा भी था कि मुझे कम खिलाया कर। जो कहीं मैं बसूचका गई तो ठीक न होगा। पर मालिक की बीवी तो मुझे एकदम वयस्क करने पर तुली थी। मालिक को जब मेरे बीमार होने का पता चला तो अपने को बुखार होने के बाद भी वह बिन छुट्टी दिए, नंगे पांव ही दफ्तर से रात को ही मेरे पास आ पहुंचे। दस मील पैदल चल कर। तब मैं बीमार भी ऐसी हुई कि….. एकबार जो मैंने न चाहते हुए भी बिस्तर पकड़ा …..मालिक ने मुझे स्नोडन हास्पिटल दिखाने की भी सोची पर मेरे शायद ग्रह ठीक न थे।
मालिक की पत्नी ही जानती है उसने मुझे किस किस वैद्य को नहीं दिखाया। किस किस से खोट दोश नहीं गिनवाया । जिसने जो भी टोना टोटका बताया, उसने सब कराया। पर मुझे मालिक की पत्नी से स्वतंत्रता से पहले की बची जितनी सेवा करानी थी ,उतनी करवाई और मैं चली गई, अपने खुदा के पास।
मैंने महसूसा कि मेरे जाने के बाद कई दिनों तक मालिक का घर , घर में सबके होने के बाद भी शमशान सा बना रहा। मालिक ने मेरी की आत्मा की शांति के लिए घर में पंडितजी से हवन पूजन दान करवाया। मेरी पूंछ के बाल पूरे परिवार का मुंडन करवा, मेरी आत्मा की शांति के लिए पंडितजी के कहे गंगाजी में बहाए। विदेसी मूल की होने के बाद भी मालिक ने जीपीएफ निकलवा मेरे पूरी ईमानदारी से कर्म किए। ऐसे जो वे अपने फादर के करते तो मालिक के फादर को मोक्ष मिलता। बेचारे अभी भी प्रेत योनि में न फंसे होते।
मेरे क्रिया कर्म पूरे होने के बाद मालिक उदास, एकबार फिर कुत्ता बिजनेस के सपने लेते अपनी ड्यूटी पर लौटे तो उसकी बेटी और मां ने चैन की लंबी सांस ली।
तो पाठको! इधर कनक निसरी, उधर डेजी की कमर्शियल आत्मकथा बिसरी। अब डेजी की आत्मकथा के प्रकाशन के लिए धांसू प्रकाशक न मिलने तक जय रामजी की!
अशोक गौतम
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