माह विशेषः क्या लकतंत्र को खतरा है- पंकज मिश्र अटल


लग रहा है
मुझे फिर कुछ अजीव सा,
ले रहा है मौसम
गहरी सांसे,
सहमी- सहमी हैं हवाएं,
दिशाएं भी हैं गुमसुम
रुक नहीं रहीं हैं हरकतें,
हो रही है सुगबुगाहट
कि बढ़ रहा है कद
तानाशाह का,
फुसफुसा रहें हैं दबी जुबान में
चौराहों पे लोग,
क्या लोकतंत्र को खतरा है।


आंधियां
बढ़ा रहीं हैं रफ़्तार
और घबराहट में हैं छप्पर
कर ली गई हैं तैयारियां मुकम्मल
निबटने के लिए हर स्थिति से
होती जा रहीं हैं
स्थितियां बद से बदतर
ताख़ पे रखे नियम
उतारे जाते हैं
भांपकर मौके की नज़ाकत को
हो चुका है दमहीन शब्द
लोकतंत्र
पूछते हैं शब्द धीमे- धीमे दीवारों से
लगता है लोकतंत्र को खतरा है।

चेहरे पर
रखकर चेहरा वह आता है
बांट कर शब्दों को और
जताकर अपनी ताकत
कर जाता है
भीड़ को नपुंसक
भीड़ कस लेती है कमर
अंधेरे की वकालत में
पूछते हैं वेवस होकर कुछ चेहरे
क्या जीवित है लोकतंत्र, और
तोड़ देते हैं दम सारे शब्द
अंधेरे की गोद में।

आओ
सोचो और देखो गौर से
सारे आदर्श हैं सिर्फ़ तुम्हारे हिस्से में
वह आयेगा और इसी तरह
बांटेगा तुम्हारे ही रक्त में भिगोकर शब्दों को
तुम्हारे जैसे अनगिनत लोगों को
जानता हूं कि
ढाल लोगे तुम उसके अनुरूप स्वयं को
क्योंकि एक समूह बन चुका है
संस्कारित गुलाम,
जो न कुछ सोचता है और न ही देखता है
अपने स्तर से,
टकराता है चीखों से शब्द लोकतंत्र
और लुढ़क जाता है असहाय सा,
हो जाते हैं फिर चेहरे मायूस।

उसके आते ही
हिलने लगते है हाथों के हुजूम
चमक उठतीं हैं आंखें
लाया है चाशनी में डूबे शब्द
और चाटना शुरू कर देते हैं
मुर्दा भीड़ के चेहरे
भर जाता है गर्मी
ठंडी देहों में कुछ देर के लिए
होते हैं तब्दील राख़ में धीरे-धीरे
रखे जाते हैं जिंदा राख की गरमी पर,
कब समझोगे,
करोगे कब यकीन, कि
कर ली गई हैं साजिशें मुकम्मल
कर रहीं हैं कोशिशें हवाएं भी
राख में सिसकती चिंगारियों के ख़िलाफ़
लोकतंत्र के ख़िलाफ़
और दुबक जाता है
आखिरी सवाल भी उम्मीद का।

अवाक हैं चेहरे
उड़ रहीं हैं हवाइयां
न ही कोई कुछ भी है पूछता,
न ही देता है कोई भी कुछ जवाब
ताकते हैं होकर खोफजदा से,
बढ़ रहे हैं अंधेरे आत्मविश्वास के साथ
उनके पास हैं नारे
मुखौटे और साजिशें भी,
वे जानते हैं नाटक को
करना तब्दील हकीक़त में
और साबित करना
झूठ को भी सत्य पूरे सलीके से
शुरू हो गई है फुसफुसाहटें
बढ़ती जा रही है ठंडक, कहता है कोई, कि
बेंटिलेटर पर है लोकतंत्र।

आओ
टटोलो जमीनें
बहो मत हवाओं में
बह रहा है इनमें तिलिस्म
जानो हकीक़त
छुओ धरातली सतह आहिस्ते से
जिस पर चलना तो दूर
क़दम रखना भी है दूभर
क्योंकि बड़े तरीक़े से ओढ़ा दिए गए हैं कायदे
सिल दिए गए हैं होंठ
कर दिए गए हैं सभी गुमराह
पूछती है चुभन
नोकों से पत्थरों की, क्यों बह रहा है अंधेरा
अपनी ही ओर
क्या कोई
ख़तरा है लोकतंत्र को।

@ पंकज मिश्र ‘अटल ‘
जवाहर नवोदय विद्यालय सरभोग, बरपेटा, आसाम