माह की कवियत्रीः सरस्वती माथुर

…. कविता क्या है मेरे लिये ….
मेरे लिये जीवन ह़ी कविता है,कविता ह़ी जीवन है। कविता की लाखों परिभाषाएं हैं क्युंकि उसके आयाम अनेकों हैं, नींद में साँस चल रही है वह भी लयात्मक कविता है , जहाँ गति है वहाँ कविता है …कविता एक साधना है, भावना है। कविता … सृष्टि,देश, समाज, परिवार, प्रकृति,अहसास- अनुभूति और अभिव्यक्ति का कलात्मक आकलन है, साक्षात् इश्वर से बातचीत का माध्यम है ! शायद इसलिए मेरी अभिव्यक्ति कि केंद्रीय विधा भी कविता ह़ी है।
सरस्वती माथुर

सृज़न के उन्माद में
——-
सकपकाई सी
एक चिड़िया आई
ताकती रह देर तक
पतझड़ के झड़े
भूरे पतों को
हवा बुहार रही थी
तब सन्नाटा
अटक गये थे चिड़िया के
सुर भी कंठ में पर
मौसम के गलियारों में
महक थी सूखे पत्तों क़ी
उम्मीद थी जल्दी ही
फिर फूल आयेंगे
तितलियों उनमे
ताजगी तलाशती मंडराएगी
कोयलें कूकती
हरियाली पी लेंगी
सृज़न के उन्माद में
फिर फूटेंगे अंकुर
फुलवारी में उगेगा
इन्द्रधनुष
रंग – बिरंगी तितलियों का
चिड़िया ने भी
अपने से संवाद किया कि
अब आ गया है वक्त
घरोंदा बनाने का
इस विश्वास के साथ
उल्लासित हो
वो उड़ गयी
बसंत के बारे में
सोचेते हुये !

सच
सच की रंग बिरंगी चिड़ियां
मुझे बहुत भाती है
सच मुझे बहुत प्रेय.है
उसकी महक मुझे
फूल सी महकाती है
सच अपने आप में
एक इश्वर है
जो पत्थर की अहल्या को
मानवी बना देता है
सच का ओज अग्नि तत्व
स्वयं एक शक्ति है
श्रेय है
केवल समिधा नहीं
पूर्ण महायज्ञ है !


साथ निभाना !

दिन ढलते ह़ी
ड्योढ़ी पर सांकल
खटखटाती रही हवा
घर पर सुस्ताते
थके मांदे लोगों से
जाने क्या क्या
बतियाती रही हवा
दूर खड़ा था कोलाहल
मनुहार करता सन्नाटे से कि
अब तुम करो पहरेदारी
मैं समेटे आवाज़ों को सोता हूँ
शहर -गाँव थके पसरे से
नींद की तारों वाली
बंधेज ओढा इन्हें
छवांता हूँ आँगन में
चाँद की कंदील टांग
तब तक जागना दोस्त
जब तक कि भोर की
पंखुडियां बरसा कर
फिरकनी सी चिड़ियाँ
चहक कर फिर से
मुझे न जगा दें
तब तक साथ निभाना दोस्त !

रिश्तों के पन्ने पलटते हुए
हस्ताक्षर न बन पाए हम तो
अंगूठे बन कर रह गये
सत्य ने इतनी चुराई आँखे कि
झूठें बन कर रह गये
बेबसी के इस आलम को क्या कहें
बांध नहीं सके जब किसी को
तो खुद खूंटे बन कर रह गये
रिश्तों के पन्ने पलटते हुए
दर्द कि तलवारों के हम
बस मूढे बन कर रह गये
सत्य ने चुराई इतनी आँखें
कि बस झूठें बन कर रह गये
कांच की दीवारें खींच कर
रिश्तों के पन्ने पलटते रहे
अपनों ने मारे जब पत्थर
तो किरचों के साथ
टूटे फूटे बनकर रह गये
लहुलुहान भावनाओं से
ज्वारभाटे उठने लगे
हम शांत समुंदर
बन कर रह गये
सत्य ने चुराई इतनी आँखें
बस झूठे बन कर रह गये !

नन्ही चिड़िया
वह नन्ही चिड़िया थी
धूप का स्पर्श ढूँढती
फुदक रही थी
अपने अंग प्रत्यंग समेटे
सर्दी में ठिठुर रही थी
रात भर अँधेरे में
सिकोड़ती रही अपने पंख
पर रही
प्रफुल्लित, निडर और तेजस्वी
जैसे ह़ी सूरज ने फेंकी
स्नेह की आंच
पंख झटक कर
किरणों से कर अठखेलियाँ
उड़ गयी फुर्र से
चह्चहाते हुए
नई दिशा की तलाश में !

तुम मौसम बुला लो

तुम मौसम बुला लो
में बादल ले आऊं
थोड़ी सी भीगी शाम में
फूलों से रंग चुराऊं
तुम देर तक गुँजाओ
सन्नाटे में नाम मेरा
मैं पहाड़ पर धुआं बन
साये सी लहराऊं
वक्त रुकता नहीं
किसी के लिये
यह सोच कर
मैं जीवन का काफिला बढ़ाऊं
तुम लहरों की तरह बनो बिगडो
मैं चिराग बन आंधी को आजमाऊं
तुम मौसम बुला लो
मैं बादल ले आऊं
तुम परात में भरो पानी
मैं चाँद ले आऊं!’
तुम मौसम बुला लो
मैं बादल ले आऊं
नव स्पर्श से !

मेरे सपनों के जंगल में
मैं लगातार देख रही थी
झुण्ड के झुण्ड झरे पत्ते
यूँ लग रहे थे
मानों हार गये हों युद्ध
अपनी चरमराती आवाज में
उड़ जाने को तैयार
पार्श्व में दिख रहा था`
अभिलाषाओं से भरा जीवन
और तभी नींद टूट गयी
अपने नव स्पर्श से
छू रही थी मुझे भोर
और फिर एकाएक
मेरे सपने पृथ्वी हो गये
चक्कर काटने लगे
अभिलाषाओं के उदित होते
सूर्य के चारों ओर !


डॉ सरस्वती माथुर
( ऍम .एस.सी ,पी .एच. डी)
जन्मतिथी: 5 अगस्त
मृत्यु 31 अगस्त 18.
शिक्षाविद एवम सोशल एक्टिविस्ट
साहित्य :देश की साहित्यिक पत्रिकाओं में कवितायेँ ,कहानियां ,आलेख एवम नये नारी सरोकारों पर प्रकाशन
प्रकाशन ४ कृतियाँ प्रकाशित
संपर्क :ए -२ ,सिविल लाइन
जयपुर