मंथनः अमित विषमय-शैल अग्रवाल

हर जानी-अनजानी, प्रेम कहानी, तुम जानो या मैं जानूँ की तर्ज पर एक निजी कहानी है। हर दार्शनिक, हर कवि, हर व्यक्ति ने इसे अपनी तरह से सुलझाने की कोशिश की है, समझना चाहा है, जिया है।

क्या है आखिर कई कई अहसासों से भरा यह सतरंगी प्रेम? महज एक आकर्षण जो ईर्षा, विछोह, पीर, उलझन और शर्मिंदगी को ही जन्म देता है, जिसकी वजह से आज भी औनर किलिंग हो रही हैं हमारे समाज में। जात-पांत के दायरों में घुटा आज भी कई कई अंधेरे कोनों में बेबस ही दम तोड़ रहा है यह। या फिर प्रेम एक अमृतकलश, जिसे छककर पीते हैं पीनेवाले और अघाते नहीं।… जो रंक को राजा बनाकर सुख के सिंहासन पर बिठा देता है।

“सरल से भी गूढ़, गूढ़तर
तत्त्व निकलेंगे
अमित विषमय
जब मथेगा प्रेम सागर
हृदय ।”
-शमशेर बहादुर सिंह

कहते हैं प्रेम संपूर्ण भक्ति और समर्पण है। विश्वास और आस्था है, जहाँ दूर-पास और हार-जीत ..मैं और तू -सभी भेदभाव मिट जाते हैं.. दुख व पीड़ा तक सुख का पर्याय बन सकती है…फिर संशय कैसा… प्रेम दीवानी राधा तो कभी सोच ही नहीं सकती थी कि धोखा हुआ । अपने किशन के चरित्र , सिद्धांत व ध्येय, सभी पर पूरा भरोसा था उन्हे। इतनी कृष्णमय थी राधा कि कृष्ण कभी दूर ही नहीं हुए उनसे। ना तो अपने कृष्ण को कभी खोया उन्होंने और ना ही रुक्मणि के कृष्ण को चाहा… यही एक दूसरे के प्रति उनका अदम्य और अपराजेय प्रेम ही तो था, जिसने राधेश्याम को आजतक अलग नहीं होने दिया। मीरा को जहर के प्याले के बाद भी जिन्दा रखा। पर इतना प्यार इतनी आस्था; इतना विश्वास भी तो साधारण जीवन में संभव नहीं। इतनी सच्चाई और इतना समर्पण भी तो होना चाहिए, साथ-साथ अपराजेय साहस और विश्वास भी।
यूँ तो प्रेम की निर्मल धारा युगों से अविरल बह रही है , पर उस निश्छलता में भीग पाना, उस अमृत को आत्मसात कर पाना विरलों को ही आ पाता है। इसी संदर्भ में याद आ रही है फैज साहब की एक मशहूर नज्म,

वो लोग बोहत खुश किस्मत थे
जो इश्क को काम समझते थे
या काम से आशिकी करते थे
हम जीते जी मशरूफ रहे
कुछ इश्क किया, कुछ काम किया

काम इश्क के आड़े आता रहा
और इश्क से काम उलझता रहा
फिर आखिर तंग आकर हमने
दोनों को अधूरा छोड़ दिया।

अधिकांशतः भृतहरि की नायिका जैसा ही तो हाल रहता है हमारा , जो यह तक न जान पायी कि जरूरी काम के लिए जाते नायक को किन शब्दों के साथ विदा करे वह। यदि ‘ जाओ’ कहती है तो नायक सोचेगा कि वह उसे प्यार ही नहीं करती, इसीलिए तो झट से जाओ कह दिया। ‘मत जाओ’ कहने पर भी उसका ही नुकसान होगा और ‘ थोड़ा और रुककर जाओ’ कहने पर काम भी बिगड़ेगा और साथ में जाने की घड़ी भी नहीं टलेगी। अन्त में वह हारकर नायक से ही पूछती है कि अब वही बताए कि ऐसे समय में वह उसे क्या कहकर विदा दे।
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उत्तर नहीं हूँ मैं
प्रश्न हूँ तुम्हारा ही !
नये-नये शब्दों में तुमने जो पूछा है बार-बार
पर जिस पर सब के सब केवल निरुत्तर हैं
प्रश्न हूँ तुम्हारा ही !
-धर्मवीर भारती
प्रेम के कई रूप हैं , कई कहानियाँ हैं संसार में भी और विश्व साहित्य में भी। सभी एक से बढ़कर एक…अप्रतिम और पूरी तरह से भिगोने वाली। माँ के वात्सल्य में तो त्याग और प्रेम की पराकाष्ठा ही मिलती है। पर क्या संभव है ऐसा प्रेम… एक बार वैज्ञानिकों ने जानना चाहा कि क्या है सीमा इस मातृ प्रेम की भी, या किसा भी प्रेम की…क्या आत्म संचय और संरक्षण ही सबसे प्रबल भावना नहीं जीवित प्राणी में? क्या वह खुदको ही सबसे अधिक प्यार नहीं करता! यह उस वैज्ञानिक सोच का नजरिया था जो मन से नहीं बुद्धि से सोचती है। हर चीज के प्रयोग और प्रमाण चाहती है।
वैज्ञानिकों ने प्रयोग किया। बन्दरिया जो मरे बच्चे को भी मोहवश अपने सीने से ही लगाए रहती है, उसे बच्चे सहित एक टैंक में बन्द करके पानी भरना शुरु कर दिया , जब तक पानी गर्दन तक था बन्दरिया बच्चे को सीने से भरसक चिपकाए रही पर जैसे ही पानी और ऊपर उठा और उसकी अपनी जान पर बन आई, उसी बच्चे को फर्श पर फेंककर, बच्चे पर ही पैर रखकर तुरंत बाहर आ गई और अपनी जान बचा ली। शायद सच्चाई हो इस तथ्य में भी। या फिर शायद जानवर थी इसलिए ऐसा हुआ। क्योंकि मानव इतिहास में तो प्रेम में पड़े इन्सान द्वारा त्याग की, खुद को मिटा देने की, साहस व शौर्य की अभूतपूर्व गाथाएँ हैं।

शिव भी हैं एक रूप इसी प्रेम केः शिव जिसका अर्थ ही कल्याणकारी है । शिव जो अपने विकारों और अहं को शेर की छाल की तरह बिछाकर समाधिस्थ हो सकते हैं…शिव जो अपने त्रिशूल की तरह ही मनसा, वाचा, कर्मणा जन कल्याण के लिए समर्पित हैं। शिव जिन्होंने रूप और चौंसठ कलाओं के प्रतीक चंद्रमा को अपने मस्तिष्क पर धारण कर रखा है, वह भी ओजस्वनिनी गंगा के शीतल प्रवाह समेत….कहीं कोई विकार या परेशानी नहीं, बस शान्त और निर्मल उजाला ही उजाला। जननायक और आदर्श पुरुष राम भी एक रूप है इसी प्रेम के जिन्होंने कर्तव्य की राह को ही जीवन का प्रेम बनाया और एक रूप भगतसिंह भी हैं इसी प्रेम के, जो हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर झूल गए। माँ, पत्नी, सखा, प्रेमी, मित्र कई-कई रूपों में विद्यमान है यह हमारे बीच। प्रेम की यह अजस्र् धार जीवन को आदिकाल से ही सींचती आई है। तो क्या प्रेम इस जुझारु लगन का नाम है-जहाँ प्रेम-पात्र ही जीवन का ध्येय और प्रेरणा बन जाता है? क्या प्रेम सर्वोच्च त्याग है- प्रेमपात्र पर सबकुछ वार और त्याग सकता है प्रेमी…सांसारिक सुख , धन दौलत …परिवार यहाँतक खुद अपना जीवन भी?
बौद्धिक और मानसिक धरातल से उतर कर देखें तो एक शारीरिक रूप भी है इसी प्रेम का जो पूरी प्रकृति में व्याप्त है और हमारी इस सृष्टि की निरंतरता का आधार है । इसके संचय के लिए पशु-पक्षी और कीड़े मकोड़े…पूरी प्रकृति ही संलग्न रहती है इसमें।

जब कबीर जैसे संत और विचारक कह गए कि ‘ ढाई अक्षर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय ‘ तो कुछ तो होगा ही इस प्रेम में जो बांधे रखता है हमें। आदिकाल से ही हर जीव को वश में किए हुए है। अलग नहीं होने देता प्रकृति और पुरुष को। परन्तु मात्र स्त्री-पुरुष के बीच का आकर्षण ही तो प्रेम नहीं… कई कई और भी रूप हैं इसके। हर रूप में पाते और खोते हैं हम इसे एक ही जीवन में। जीते हैं इसे। प्रेम बिना न तो हम हैं और ना ही हमारे यह रिश्ते-नाते…हमारी यह रंग-बिरंगी-फलती-फूलती दुनिया और इसका यह अटूट आकर्षण। प्रेम जितना सहज और सुगम है उसके परिणाम उतने ही विविध। राह सच की हो या प्रेम की प्रायः दुर्गम और कांटों भरी ही रही है, पर इस डर से इस अनादि अनंत बगिया के सौंदर्य में कोई कमी नहीं आई – न तो फूलों के नैसर्गिक रूप और महक में और ना ही भँवरों की गुनगुन में ही।
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तेरह-चौदह साल की किशोर व संवेदन-शील उम्र थी वह और बनारस से इलाहाबाद तक का लम्बा सफर। धूल-धक्के और भीड़-भाड़ से ऊबीं आँखें अचानक ही आगे-आगे चल रहे एक ट्रक पर लिखे शेर पर जा अटकी थीं। शेर था: ” नशा शराब में नहीं मेरे खून में है साकी, होता जो नशा शराब में बोतल न झूम जाती।” ( कुछ साल बाद यही शेर प्रकाश मेहरा की फिल्म शराबी के एक गाने में भी सुनने को मिला)। उसी वक्त बुद्धि से लेकर मन तक बिजली-सी कौंध गयीं वे पंक्तियां। बात सही और सोचने लायक थी। बाहर जो चल रहा है, वह नहीं, अन्दर जो है, वही तो बदलता है हमें… हंसाता-रुलाता, झुमाता और नचाता है।

पहली बार समझ में आया कैसे सोच का दृष्टिकोण तक बदल सकता है मात्र एक शब्द…एक भाव…एक नजर। पहली बार पूरी तरह से अंतर्मुखी होकर मन की शक्ति से अवगत हुई। आज की पीढ़ी या मुन्नाभाई के शब्दों में कहूँ तो मष्तिष्क में चल रहे ‘ केमिकल लोचे’ से वह मेरा वाकई में पहला साक्षात्कार था। वैसे भी किसी भी बात या अहसास को पूरी तरह से अनुभव करने के दो ही तो तरीके होते हैं; या तो उसे मन की गहराई से समझ लें, या फिर जी लें।
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“जहाँ प्रेम तहं नेम नहिँ, तहां न बुझि व्यवहार
प्रेम मगन मन भया, कौन गिने तिथि वार।“

यह कबीर हैं; पूर्णतः प्रेम में समर्पित और न्योछावर। शिव की चाह में आत्मसात कर लिया था उन्होंने प्रेम को खुद में। उनका प्रेम स्व तक केन्द्रित नहीं था। स्वार्थी नहीं था। आम आदमी में न तो इतनी समझ और ना ही इतना संयम व साहस।
” घर भी मुझसे न फूँका जाए / जी चाहे कि कबीर हो जाऊँ। ” दीक्षित दनकौरी जी ने कहीं लिखा है। वाकई में क्या है इतना साहस और समझ हमारे पास जो इस उद्दाम भाव को समाहित कर सकें, ईमानदारी से जी सकें। जैसे कि कबीर होना घर फूंकने यानि सब त्यागने की, अत्याचार के खिलाफ साहस की मांग करता है, वैसे ही प्रेम में भी दढ़ता, प्रतिबद्धता, त्याग और साहस की मांग है, जो सब के बस की बात नहीं, फिर चाहे यह प्रेम प्रेमिका से हो, मां बाप से हो, देश से हो या फिर एक विचारधारा या समूह से।

जीवन हो या प्यार अंततः दोनों में ही प्रतिबद्धता का उतना ही महत्व है जितना कि त्याग और सामंजस्य का। प्रेम अनुभूतियों का अमृत कलश है या भ्रमः एक छद्म मरीचिका ; व्यक्तिगत अनुभव, बड़ी हद तक, खुद हम पर, हमारे व्यवहार और समझ पर ही निर्भर है और फिर हजार दुख और परेशानियों के बावजूद भी प्रेम ही तो वह विश्वसनीय अटूट शक्ति है जिसके सहारे दुनिया टिकी हुई है और जिसने जीवन को जीने लायक बना रखा है। पर सब सहज नहीं, बहुत कुछ क्लिष्ट, उलझा और उलट-पुलट भी है इसमें। बाधाएँ हैं, बलिदान हैं और त्याग हैं। शेक्सपियर ने कहा था सच्चे प्यार का मार्ग कभी सुगम नहीं होता और खुसरो ने लिखा-

खुसरो दरिया प्रेम का उलटी वाकी धार।
जो उतरा सो डूब गया जो डूबा सो पार।

आजकल तो वैसे भी वाकई में उलटी ही बह रही है यह धार, विशेषतः समाज और रिश्तों के संदर्भ में !
आए दिन ही जब प्रेम के वीभत्स और क्रुद्ध व ईर्षालु रूप में खुद प्रेमी द्वारा प्रेमिका के चेहरे पर तेजाब फेंकने की खबरें मिलती हैं तो यह वैलेंटाईन डे और मदनोत्सव जैसे त्योहार बेमानी महसूस होने लगते हैं। प्रेम और कला की देवी सरस्वती की पूजा-वंदना दिखावा लगने लगती है और राधाकृष्ण की पूजा पूर्णतः खोखली। ऐसे में प्रेम खुद भी तो मात्र एक धोखा, छलावा काम वासना या स्वार्थ की सिद्धि का साधन ही प्रतीत होता है। फिर भी न तो प्रेम हारा है और ना ही प्रेम करने वाले। हाँ जब यह साधु-संत भी जिनका आम जनता अनुसरण करती है वासना में ही मोक्ष ढूँढते हैं और पशुवत् खुद अपनी ही भक्त और सेविकाओं का यौन शोषण करते हैं और आध्यात्म और दर्शन में अग्रणी समझे जाने वाले हमारे देश में सामूहिक बलात्कार होते हैं तो लगने लगता है कि क्या वाकई में प्रेम मर गया है, या मरणासन्न है ! इसकी हत्या की साजिश में क्या पूरा समाज शामिल हो चुका है अब! समझ और सहानुभूति ने हाथ धो लिए हैं इससे ! स्वार्थ और स्वामित्व का अजगर क्या वाकई में पूर्णतः निगल चुका है प्रेम और रिश्तों की मिठास को!

प्रेमी अब आत्मविभोर हो प्रेमसागर में नहीं, इर्षा , डाह और दुख के सागर में डूबते या डुबो दिए जाते हैं! दुख, अपमान और मौत का वरण करते हैं, प्रिय का नहीं। प्रेम और कर्तव्य की स्थिति जटिल और दुरूह समझ में आती है क्योंकि साहस और बलिदान व संयम की मांग करती है परन्तु यह स्वार्थ और वासना से उत्पन्न मति विभ्रम समाज में फैले कीटाणुओं की तरह ही तो है जिनपर कीटविनाशक छिड़कना पूरे समाज की ही जिम्मेदारी और कर्तव्य है।

कैसे मदद करें हम इस सर्व व्यापी और विविध रूपी प्रेम जैसे सद्भाव की, जिसके बिना यह दुनिया नरक से भी बदतर और दारुणता की कगार पर दिखती है ! जिसकी ईसा, मुहम्मद, बुद्ध और महाबीर, सभी पैगम्बरों ने इतनी पैरवी की और संत कबीर ने जिसे ज्ञान का सार या उत्कर्ष ही लिख दिया और कहा कि ‘ ढाई आखर प्रेम के पढ़े सो पंडित होय‘ वह प्रेम आज मानवता से कहाँ खो गया है हमें मिलजुलकर ढूँढना ही होगा।

कहाँ से और कैसे आने दी हमने इतने सद्भाव, त्याग और कर्तव्य भरे सबसे उद्दात्त भाव में इतनी घृणा और ईर्षा, इतनी नफरत और ऊब कि खुद मां ही अपने बच्चों की हत्या करने लग जाए, संरक्षक पति या पिता पत्नी या बेटी को मार दे। भाई-भाई की परवाह न करे और मित्र शब्द मज़ाक बन कर रह जाए! कैसे वापस लाएं हम रिश्तों में , समाज में सहिष्णुता और भरोसे को वापस ? कहाँ से शुरुवात हो इस सुधार की !

माना प्रेम अंधा होता है और स्वार्थी व लालची भी, वासना तो निश्चय ही और पूर्णतः पाशविक है ही, पर प्यासे को पानी की ही तो जरूरत होती है। कानून, सजा ये सभी क्षणिक उपचार हैं। क्या आज भी साहस और सामर्थ है हममें नीलकंठ बनकर आसपास बिखरे विष को समेटने और हटाने की। गलत को गलत कहने की ! यदि हो भी तो क्या स्वार्थी और लोलुप कर्तव्यनिष्ठ को काम करने देंगे, विशेशतः आज जब समाज क्या परिवारों तक में चौपड़ बिछ गई हैं और हर हाथ मर्यादा को भूलकर शीलहरण पर आतुर हैं !

प्रेमसागर से अमृत के साथ-साथ जो यह नित नित का विषघट निकलता है उसे हटाए बगैर कैसा अमृत और कैसा उसका स्वाद व सुख ! जीवन, समाज और आसपास बिखरी इन कमजोरियों को समझना, जानना और उन्हें दूर करना, कोमल, विह्वल काव्य माधुरी ही नहीं, प्रेम का आकर्षक, समर्पित व त्यागमय रूप ही नहीं, प्रेम के उद्दाम रूपों के चित्रण के साथ-साथ इन अप्रिय सवालों को उठाना और इनके प्रति सजग करना भी साहित्य का दायित्व है। प्रेम के साथ या प्रेम के बिना जीवन तो जो है, है ही-
“मानव जीवन वेदी पर परिणय है विरह मिलन का सुख दुख दोनों नाचेंगे, है खेल आँख का मन का। “
-जयशंकर प्रसाद
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जीवन और वक्त यंत्रवत् चलते रहते है …पतझर, शिशिर, वसंत… चाहें या न चाहें , वक्त हो या न हो, मन के दरवाजे थपथपाते .. अंतस गुदगुदाते तो कभी बर्फीली हवाओं में अकेला ही छोड़ जाते। हंसाते..रुलाते…उन्मादित और आलोड़ित करते … प्यार से सरोबार करते तो कभी विरह और अवहेलना की पीड़ा और तिरस्कार के दंश तक दे जाते, वक्त की शाख पे अनायास ही खिल आते हैं, ये चन्द निर्णायक पल, जो कभी-कभी तो सोचने का क्या…जीने तक का पूरा तरीका ही बदल देते हैं। आदमी को बदल देते हैं। कुछ नहीं है जीवन सिवाय इन खट्टी-मीठी यादों के , अविस्मरणीय इन अहसासों के।

वाल्मीकि और तुलसी की कहानी हम सबकी सुनी-पढ़ी व जानी-पहचानी है। एक क्रौंच ने या पत्नी की धिक्कार ने दोनों के ही अस्तित्व को बदल डाला था। फिर मिलन का सुख ही नहीं विरह की पीड़ा भी तो उतनी ही सशक्त है और यादों की वादियों में रची-बसी कसकती उसकी महक भी। मरुथल में खड़े पेड़-सी सारी हरितिमा को अपने अंदर संजोए, आजीवन उजाड़ को ललकारती इस ताकत को अवहेलित कर पाना किसी के लिए भी आसान नहीं। यही तो है जीवन के हर तूफान की पतवार …शीरी महिवाल ही नहीं …भगत सिंह और सुभाष …गांधी व हिटलर तक का, उस अहसास और मानसिकता की सृजनकर्ता। पल जिनके बारे में गुलजार साहब ने लिखा है कि’ वक्त की शाख से लमहे नहीं तोड़ा करते। ‘ ओस की बूंदों से…पंखुरियों से नाजुक ये प्रेम के पल… इन्हें तो बस स्मृति में ही संजोया जा सकता है। शब्दों में बयान करना संभव ही नहीं। पल जो तस्बीर से फ्रेम में सजकर मन की दीवार पर लटक जाते हैं… जीवन की गड़ती चुभती कीलों के साथ आखिरी सांस तक साथ चलते हैं ।
लग के साहिल से जो बहता है उसे बहने दो
ऐसी दरिया का कभी ऱुख नहीं मोड़ा करते
-गुलजार
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ठहर कर सोचा जाए तो प्रेम के ‘ पनघट’ की ‘डगर’ वाकई में ‘कठिन’ है और आज भी झटपट ‘गगरी’ भर लाने का ना कोई सुगम पथ ही है और ना ही मूलमंत्र। आज भी तो प्यार के हर प्रश्न का प्यार ही एकमात्र उत्तर है। हर दुख, पीड़ा का यही और अकेला मरहम है।

“पैरों में पायल व आलता और मेहंदी लगे हाथों में कलाई भर-भरकर चूड़ियाँ। प्रणव की आँखें टिक नहीं पा रही थीं, न माँ पर और ना ही गौरी पर। गौरी भी तो आज पूरे ही शृंगार में थी। उसने भी तो गुलाबी गोटे वाली साड़ी ही पहनी थी। नथ, माँग टीका, सब लगाए थे। याद नहीं रहा उन्हें कि परसों ही, सप्तमी की पूजा पर सिंदूर दान के बाद माँ ने ही यह गुलाबी साड़ी गौरी और नंदिता, दोनों को दी थीं। और दिए थे टीका, चूड़ी, बिंदी, पायल, आलता सभी कुछ। बरसों के बाद उस दिन प्रणव के तबले पर अपने सितार के साथ जुगलबंदी की थी गौरी ने। भैरवी, जैजैवंती से लेकर दीप और हिंडोल राग तक, डूब गए थे वे दोनों एक दूसरे में, सब कुछ भूल और भुलाकर। मानो अपने-अपने शरीरों से निकलकर दो आत्माएँ एक दूसरे के मन में राधाकृष्ण-सी जा बैठी थीं। दूर बैठकर भी दोनों के बीच कोई दूरी नहीं थी।“
( कहानी विसर्जन से)

प्रेम-प्यार का प्रसंग चलते ही आज भी आँखों में जो छवि सर्वोपरि उभरती है वह राधाकृष्ण की ही होती है। ऐसा नहीं कि बहुत धार्मिक हूँ, या भारतीय हूँ, इस वजह से ऐसा होता है… या फिर रोमियो जूलियट, हीर-राँझा, शीरी फरहाद और लैला मजनू, आदि की प्रेम कहानियों से परिचित नहीं।

रासरंग और मिलन व विछोह के अनगिनित प्रसंगों के बाद भी जो संयम और ठहराव…काल और स्थान की दूरियों को लांघता अभिन्न और अविच्छेद सामीप्य राधाकृष्ण की जोड़ी में दिखता है, वह और कहीं है ही नहीं…एक ऐसी अजेय ललकार है इनके प्यार में जो अलग या दूर होने की सोच तक को तुरंत ही धिक्कार देती है। शायद इसलिए कि कर्तव्य की मांग पर योगी-सा कृष्ण का राधा से अलग होने का फैसला खुद अपना था… निर्णय जो अपने लिए नहीं; सार्वजनिक हित में … जन कल्याण के लिए लिया गया था ! विश्वास था उन्हें अपने प्रेम पर। समझ थी अपने कर्तव्य की। मीरा सी दीवानगी संभव है और समझ में भी आती है क्योंकि ‘गिरधर गोपाल’ के लिए उनका प्यार, साकार होकर भी अमूर्त था। भक्त और भगवान का रिश्ता था। परन्तु राधाकृष्ण तो युगल थे..मित्र थे। सदैव साथ-साथ थे। फिर भी समय की; कर्म की पुकार पर हर व्यक्तिगत सुख (बांसुरी और राधा) तकको छोड़ दिया कृष्ण ने। और राधा भी उनके निर्णय के आड़े नहीं आयी। यह इस युगल का त्याग ही तो है जिसने उनके प्यार को तप की ऊंचाइयों तक पहुँचा दिया। इस निर्वाह के लिए जो अदम्य साहस और संयम चाहिए, वह आसान नहीं, चाहे हम इन्सानों में ढूँढें या देवी-देवताओं में।पर राधा-कृष्ण का तप हो या मीरा की दीवानगी और हट, दोनों ही वन्दनीय हैं। विशेषतः तब जब दोनों ही रिश्ते सांस और शरीर-से हैं… आस्था की उस दीवानगी को छूते हैं जो या तो प्रिय में लीन होकर एकाकर हो जाती है और मिलन या विछोह से ऊपर उठ जाती है या फिर पत्थर तक को भगवान बना देती है। वैसे भी इस ढाई आखर के शब्द के रहस्यों को समझना या इस चंचल मन को पूरी तरह से बस में कर पाना इतना आसान तो नहीं! जबकि इस दरिया की तो हर बात ही निराली है । इसमें तो डूबकर ही उबरा जाता है। यह अजस्र धार ना रुकी है ना रुकेगी…संभव ही नहीं।
और इस उलझन को चतुर राधारानी ने समझा भी था और सुलझाया भी… जो कृष्णमय होकर अपना जीवन जिया उन्होने। यही वजह थी कि उनकी झलक मात्र कृष्ण को हर्षा देती है क्योंकि संसारिक सारी बाधाओं के बावजूद भी कृष्ण की सांस-सांस की जरूरत को समझा था राधा ने…उनके मन की हर बात जानी और निबाही थी। तभी तो चतुर कविराज बिहारी ने कृष्ण की नहीं, राधा की प्रार्थना की है। जानते जो थे , राधा हैं तो कृष्ण हैं।

” मेरी भवबाधा हरो राधा नागरि सोय। जा तन की झाँई परे स्याम हरित दुति होय ”

राधा वास्तव में चतुर थीं क्योंकि वे प्रेम में बाधा नहीं सहायक बनीं। और यही है प्रेम की वास्तविक परिभाषा; जो आज भी किताबों में नहीं, जीवन में ही मिलेगी हमें। कब सोच और शरीर ही नहीं, जीवन तक प्रिय को समर्पित हो जाए, प्रेमी को पता ही नहीं चल पाता और यही ‘स्व’ का मिटना ही उनके अमर सुख का कारण है। जीवन के कांटों पर भी फूलों-सा रंग और खुशबू बिखेरता है। तभी तो कबीरदास कह गये हैं कि “पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ, पंडित हुआ न कोय, ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय।” यही कबीर एक दूसरे दोहे में लिखते हैं – “प्रेम न बाड़ी उपजै, प्रेम न हाट बिकाय। राजा प्रजा जेहि रुचै शीष देय लहि जाय ”
प्रेम को पाने के लिए ‘ शीष’ यानी अहं को, अस्तित्व के अलगाव को तो त्यागना ही पड़ता है क्योंकि प्रेम गली अति सांकरी, जामै दो न समाय।‘ और यह कितना कठिन है हम सभी अच्छी तरह से जानते हैं।

जमला ऐसी प्रीत कर जैसे निसि औ चन्द्। चन्दा बिन निसि फीकरी निसि बिन चन्दो मन्द।।

और एकबार यदि ऐसा प्रेम मिल भी जाए तो उसे संभालकर रखना भी तो आना ही चाहिए।

” रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाय। टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गांठ पड़ जाए।।”

कितना भी हम तौलें परखें, यह तो मानना ही पड़ेगा कि ईश्वर की तरह प्रेम भी जिन्दा है। शाश्वत है। जीने का ही नहीं हमारे भौतिक और आत्मिक दोनों संसारों का सहारा है-
प्यार न थामता गर उंगली इस बीमार उमर की , हर पीड़ा वैश्या होती हर आंसू आवारा होता।
-गोपाल दास नीरज
यह पीड़ा में आनंद और आनंद की पीड़ा आज भी सार्वभौमिक है। तभी तो हजार उत्तेजक खबरों के धमाकों के बीच बैठे हम आप आज भी इसकी बातें कर रहे हैं। इसमें रुचि ले रहे हैं। इसके बारे में लिख-पढ़ रहे हैं। फरवरी के आते आते मौसम गुलाबी होने लगता है। आहट सुनाई देने लगती है प्यार की, बसंत की और प्रकृति के साथ-साथ मन के भी नम होने की। चाहें या न चाहें, हवाओं में इस प्रतिक्षित गुलाबी मौसम की आहट फिरफिर के सुनाई दे ही जाती है; अंकुर अंकुर फूटते पेड़ झरझर कर भी फल-फूलों के लिए पुनः पुनः तैयार हो जाते हैं। शिशिर की पथरीली हवाओं के बावजूद भी वही खिलता-महकता मौसम फलट-पलट के लौट आता है जिसमें इंसान तो इंसान, पंछी तक नीड़ बनाने के लिए तिनके एकत्रित करने लगते हैं…वह भी अदम्य जोश और उल्लास के साथ …कौनसी हवा सब कुछ बिखेर देगी …कौनसी बौझार भिगो देगी उनके पर, सरोबार करने की बजाय सबकुछ बहा ले जाएगी, इसकी परवाह किए बगैर ही।… कौन कहता है प्रेम मर गया या मरणासन्न है इतने विषमय वातारण में भी… बगिया में गूंजती वह पपीहे की पीहु पुकार, पुकार ही नहीं, एक आस एक संदेश है जीवन का, निरंतरा का।
पपीहे की कुहुक और फूलों की गमक हमें प्रेरणा देती रहेगी कि हर दुःख , हर पतझर के बावजूद प्रेम ही आधार व सृजन है इस जीवन का … मात्र इच्छा या स्वप्न ही नहीं, बसंत यानी काम है यहाँ हमारे बीच इसी धरती पर, प्रेम के रूप में, सृजन के रूप में, जैसे कि शिशिर है अंत के रूप में …यही नियम भी है और काल चक्र भी ।
प्रेम का कौन-सा रंग कब किसे छू दे, रच और समेट ले खुद में, यह एक नितांत निजी अनुभव है और अकथ भी …बिल्कुल गूंगे के गुड़ जैसा। सभी डूबते हैं, डूबना चाहते हैं इसमें!
यह चाह, यह आस तो शरीर के नष्ट होने पर भी नहीं जाती …भले ही काव्यात्मक अतिशयोक्ति ही सही पर प्रेम की हठी आस है इनमें, मनछूती हैं निम्न पंत्तियाँ,
कागा सब तन खाइयो, मेरा चुनचुन खाइयो मांस।
दो नैना मत खाइहो मोहे पिया मिलन की आस।।
-कैलासा
….
यह सिलसिला तो यूँ ही चलता रहा है, चलता रहेगा,
प्राण, तुम्हारी सुधि में मैंने अपना रैन-बसेरा माँगा।
याद तुम्हारी लेकर सोया, याद तुम्हारी लेकर जागा।

-हरिवंश राय बच्चन
प्रेम का उल्लेख होते ही एक ऐसी रेशमी गुत्थी में उलझ जाता है मन, जिसका हर सिरा बहुत मुलायम और फिसलन भरा है। मजबूत पर सुलझा पाना, समझ पाना, आसान नहीं, क्योंकि यह खुशबू-सा पल में ही उड़ भी सकता है और धागे-सा टूट भी।…
हर युग की नई पीढी अपने एक नये ढंग से महसूस करेगी और पाएगी इसे। वक्त के साथ-साथ प्रेमियों के नए-नए स्वरूप और नए-नए प्रतिमान भी उभरेंगे, प्रतिमान जो प्यार और त्याग की उद्दात ऊंचाइयों को छूएंगे। क्योंकि प्रेम का वास्ता आज भी मन से ज्यादा और बुद्धि से कम है। आज भी प्रेम ही वह खुशबू और रंग है जिसे जीवन की धूप और हवा उड़ाती भी है और बढ़ाती भी है। अज्ञेय लिखते हैं-
मैं जन्म-जन्मान्तर की अपूर्ण तृष्णा हूँ,
तुम उस की असम्भव पूर्ति।
जबकि अशोक बाजपेयी ने लिखा है-
वहाँ वह बेहद गरमी में
पानी का गिलास उठाती है,
यहॉं मैं जानता हूँ
कि ठीक उसी समय
मेरी प्‍यास बुझ रही है।
इसी दुरुह पर असंभव नहीं, प्रेम-भाव के उत्स का उत्सव मना रहे थे मौलाना रूमि जब उन्होंने लिखा –
वह लौट आया है
जो कभी ना-हाज़िर रहा ही नहीं
पानी जो कभी नहर को छोड़ कर गया ही नहीं
कस्तूरी की सुगंध, जिसकी हम ख़ुशबू हैं,
क्या सुगंध और ख़ुशबू अलग हो सकते हैं.
( अनुवाद देवी नागरानी)
अंततः यदि निदा फाजली के शब्दों में कहूँ तो आज भी यही तो सबसे बड़ा सच है-

” चाहे गीता बाँचिए, या पढ़िए कुरान/ मेरा तेरा प्यार ही हर पुष्तक का ज्ञान।”


शैल अग्रवाल
जन्मः 21 जनवरी 1947, वाराणसी, भारत
शिक्षाः बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से एम.ए. अंग्रेजी साहित्य।
e.mail: shailagrawal@hotmail.com