परिचर्चाः आभासी दुनियाः शैल अग्रवाल, इला प्रसाद, शील निगम


आभासी दुनिया को पसंद और नापसंद करने के लिए अपनी-अपनी वजह और अपने-अपने विचार हैं। अभी थोड़े दिन पहले एक बहस चली थी फेसबुक पर ही फेसबुक की उपयोगिता और अनुपयोगिता पर। प्रस्तुत हैं लेखनी के पाठकों के लिए उसी बहस में से चन्द विचार-

क्यों हूँ मैं फ़ेसबुक पर ?

“मानस भाई ने पूछा तो पाया कि यह तो वैसा ही सवाल है जैसे कोई पूछे क्यों हो घर में?

आराम स्थली है हमारी । अच्छा लगता है । घर परिवार है यहाँ, बैठकी है हमारी । कई जबाव एक साथ ही दिमाग में घूमे।

सन 2006 से फ़ेसबुक को सार्वजनिक किया गया था और दिसंबर 2007 से हम भी थे फेसबुक पर ।

सबसे पहले जिनसे जुड़े वह थे तीनों बच्चे जो अब तक डॉक्टर बन चुके थे और हमसे दूर, यहीं इंगलैंड में ही दूसरे शहरों में काम पर थे। फिर कुछ ख़ास कवि-लेखक मित्र व भारत में बसे परिजन जुड़े । वजह साफ़ थी, जब जी चाहे या ज़रूरत पड़े आवाज़ दे दो, आवाज़ सुन लो। इसके पहले मैसेंजर का चैट बौक्स था पर एक निर्धारित निजी जगह नहीं थी । फ़ेसबुक की यह परिकल्पना वाकई में जोड़ने वाली है और भौगोलिक दूरियों को मिटाने वाली और यह आयाम जुड़ता है इसकी न्यूज फ़ीड या होम पृष्ठ से। अब तो इसमें ग्रूप और विषय विशेष पन्नों की भी सुविधा है; यानी कि हॉबी या समाजिक पृष्ठ।

पहले किसी को मित्रता के लिए मना नहीं करती थी पर बीच में कुछ अराजक व अभद्र तत्व भी आए , जिनकी शीघ्र ही छटनी भी कर दी। शुरु-शुरु में टाइम वेस्टर भी बहुत आते थे जो बेहद ही वाहियात और घटिया तरह के सवाल-जबाव करके समय बर्बाद करते थे पर धीरे-धीरे सब कुछ सैटल होता चला गया ।

नेट को ज्ञान का हाइवे तो पहले दिन से ही माना था, अब इसकी वजह से इसमें सामाजिक और पारिवारिक पहलू भी जुड़ गए हैं और कम्प्यूटर ने लाइब्रेरी के साथ-साथ ऑफ़िस और बैठकी का रूप भी अख्तियार कर लिया है। आज तो यह साथ-साथ दैनिक अख़बार भी बन चुका है और एक साहित्यिक पत्रिका भी। जैसे शहरों के संस्करण होते हैं इसकी न्यूज फ़ीड हमारी अपनी निजी ।

सुबह-सुबह उठते ही देश विदेश की ख़बरों के साथ-साथ घर परिवार की भी सारी ख़बरें मिल जाना बेहद सुखद है। नए पुरानों की कविता कहानियाँ सबका आनंद। घर परिवार की तरह ही प्यार मोहब्बत और आल्हाद व उपलब्धियाँ ही नहीं, लड़ाई-झगड़े और मतभेद सभी की साक्षी…

थैंक्यू फ़ेसबुक और मार्क जुबेरबर्ग इस अनूठी सोच और सुविधा के लिए। कई इसके ख़िलाफ़ हैं, पर मैं नहीं।

कोई भी चीज़ अच्छी या बुरी नहीं होती, इस्तेमाल या नीयत ही अच्छी या बुरी है। जो आग रोटी सेकती है, वही सावधान न रहो तो हाथ जलाती है।
शैल अग्रवाल
e.mail:shailagrawal@hotmail.com

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क्यों हूँ मैं फेसबुक पर
“फे़सबुक वह खिड़की है जो मेरी कई दुनियाओं को जोड़ती है । समय का अंतराल अर्थहीन हो जाता है, दूरियांँ मिट जाती हैं, पल ठहर जाते हैं, जब मैं फे़सबुक पर होती हूँ । कितनी ही साहित्यिक-असाहित्यिक कथाओं का भरा-पूरा संसार खुल-खुल जाता है मेरे लिए।

ये कहानियाँ मात्र मेरे मित्र-परिचित ही नहीं ले कर आते मेरे लिए वरन कई बार तो एक कथा से दूसरी कथा जुड़ती है, एक खिड़की से दूसरी खुलती है और समय पंख लगा कर उड़ जाता है ।

परिचितों -मित्रों की संख्या भी अधिक नहीं मेरे फे़सबुक पर । कई मूकदर्शक हैं, कुछ हो कर भी नहीं हैं तब भी, तब भी अपनी खिड़की के इस पार खड़े हो कर दुनिया जहान की खबरे मात्र सुनती ही नहीं, जिस दुनिया में रहती हूँ उसकी कथा भी जब सुन-बाँट लेती हूँ तो बड़ा सुख मिलता है !

समस्या बस इतनी है कि आजकल समय की कमी है, यूँ कहूँ कि अकाल-सा है, लेकिन तब सारे वक़्त की इकतरफ़ा व्यस्तता से बाहर निकल आने का एक रास्ता फ़ेसबुक पर भी खुलता है ।

बचपन के साथी, सगे-संबंधी, कई ऐसे लोग हैं जो फ़ेसबुक ने ही खोज निकाले मेरे लिए और उनके लिए फे़सबुक का दूसरा पन्ना खोला । फे़सबुक न हो तो ये रिश्ते टूट जाएँगे, ख़त्म हो जाँंगे । दूरियाँ पाट पाना संभव नहीं होगा । मैंने फे़सबुक पर इन रिश्तों को बड़े जतन से संभाल रखा है ।

हूँ मैं फे़सबुक पर, रहूँगी, गाहे-बगाहे ही सही, जब अपने व्यस्त पलों में से कुछ पल चुरा सकूँ, इस कोने में अपनी हाज़िरी लगा जाना सार्थक लगता है ।”

इला प्रसाद
ह्यूस्टन अमेरिका
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क्यों हूँ मैं फेसबुक पर

सोशल मीडिया और आभासी दुनिया की भूमिका कितनी सकारात्मक, कितनी नकारात्मक-
कम्प्यूटर और मोबाइल पर उपलब्ध इलेक्ट्रॉनिक माध्यम के सन्दर्भ में सोशल मीडिया और आभासी दुनिया का रूप आज एक विस्फोट की स्थिति में उभर के आया है जिसने विश्व भरके अधिकतर लोगों को अपनी गिरफ्त में ले रखा है,जिसका परिणाम ये है कि इसे प्रयोग में लाने वाले हर व्यक्ति की मुट्ठी में दुनिया समा गयी है कुछ सकारात्मक और कुछ नकारात्मक रूप से. मेरे विचार में अगर उपभोक्ता इसके नकारात्मक पहलू को नज़रअंदाज़ करते हुए केवल सकारात्मक फ़ायदों को ले कर चले तो फिर सोने पर सुहागा हो जायेगा. लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है,कुछ लोग ऐसे हैं जो इसे गलत दिशा की ओर ले जा रहे हैं जिसका परिणाम अन्य उपभोक्ताओं को भारी पड़ जाता है। विशेष रूप से आज की युवा पीढ़ी,चाहे वे लड़के हो या लड़कियाँ ,जब वे इसका दुरुपयोग करते हैं तो विश्व भर में जालसाजी,धोखेबाजी,हत्या,आत्महत्या,अनजाने लोगों के बीच अनैतिक सम्बन्ध आदि आपराधिक घटनाएँ बढ़ने लगी हैं.

वैश्वीकरण और संचार क्रांति की वजह से विश्व एक ग्लोबल गाँव में बदल गया है जिससे ‘विश्व-कुटुम्बकम्’ की अवधारणा सत्य होती प्रतीत होती है. जहाँ एक ओर इससे नये रिश्ते जुड़ रहे हैं वहीं दूसरी ओर ये पारिवारिक विघटन का भी कारण बन रहे हैं जिससे समाज में पारिवारिक समस्यायें उत्पन्न हो रही हैं.इसके अतिरिक्त क्योंकि लोग अधिक से अधिक आभासी दुनिया से जुड़े रहते हैं, वे अपनी दिनचर्या के अन्य अनेक अतिआवश्यक कामों को पूरा समय नहीं दे पाते. यहाँ तक कि अपने परिवार तथा पारिवारिक क्रिया-कलापों से भी विमुख होते जा रहे हैं. वास्तविकता से कट कर आभासी दुनिया में पूर्णत: विलीन हो जाते हैं.इसे एक लत भी कहा जा सकता है.

फ़ेसबुक, इन्स्टाग्राम और ट्विटर आदि से जुड़ने पर जहाँ एक ओर सामाजिक दायरा बढ़ता हैं वहीं दूसरी ओर नकारात्मक टिप्पणियों से मन अशांत रह कर अवसाद का शिकार भी हो सकता है जिसका मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य पर बुरा असर होता है.

न्यू मीडिया के आ जाने से एक ओर प्रिंट मीडिया पिछड़ने सा लगा था पर सोशल मीडिया के आ जाने से यही प्रिंट मीडिया नए कलेवर में उभर कर सामने आया है. जिसने लेखकों,कवियों और पत्रकारों को नयी दिखाई है।आज फ़ेसबुक पर अनेकों साहित्यिक समूह उभर आये हैं जिनसे जुड़ कर आभासी दुनिया के लोगों में साहित्य के प्रति रुझान पैदा होता जा रहा है. अनेक प्रकाशक पुस्तकों के प्रकाशन तथा विमोचन संबंधी सूचना सोशल मीडिया के माध्यम से प्रसारित करते हैं जिनमें अधिक से अधिक लोग जुड़ कर लाभ लेते हैं. रोज़ हजा़रों उद्गार,कहानियाँ व कविता-शायरी पटल पर पेश की जातीं हैं, कुछ परिपक्व कुछ अपरिपक्व. पर रचनाओं की चोरी भी की जातीं हैं जिनका पता मूल लेखकों को चल ही नहीं पाता.यदि पता चल भी जाये तो वे कुछ कर नहीं पाते.

एक समय था जब सारे समाचार टी.वी. व अख़बारों से मिलते थे, अब सोशल मीडिया पर समय की गति से भी तेज़ गति मिल जाते हैं और हज़ारों-लाखों की संख्या में प्रतिक्रिया भी आ जाती है. इस तरह समाचारों और मनोरंजन के साधनों के अति तीव्र प्रक्षेपण में सोशल मीडिया सिद्धहस्त है.जिसका फायदा भी है और नुकसान भी.इसी बात को मद्देनज़र रखते हुए पिछले दिनों भारत में कई राज्यों में इंटरनेट बंद रखा गया.

आज हमारे समक्ष अनेकों उदहारण हैं जिनसे पता चलता है कि देश-विदेशों की राजनीति में इस सोशल मीडिया ने कितने राजनीतिज्ञों को व्यक्तिगत तथा सामाजिक लाभ दिलाया हैं इनमे प्रमुख हैं-बराक ओबामा,अरविन्द केजरीवाल,अन्ना हज़ारे,प्रधान मंत्री कार्यालय आदि. फेसबुक पर आम पेशेवर, ज्योतिषी, डॉक्टर,इंजीनियर ,नेता, वैज्ञानिक, समाज-सेवी, घरेलूछात्र-छात्राएँ,कलाकारों के आलावा राजनितिक दल,व्यावसायिक कम्पनियाँ और शैक्षणिक संस्थान सभी जुड़े हुए हैं. जहाँ एक ओर इन्हें लाभ ही लाभ मिलता है वही कहीं न कहीं नुक्सान भी उठाना पड़ जाता है जैसे कई जगहों में दंगे सोशल मीडिया के कारण ही हुए और वहीँ शशि थरूर का प्रेम-प्रसंग भी इसी मीडिया के कारण जगज़ाहिर हुआ था। जिसका परिणाम अत्यंत मार्मिक दुर्घटना का कारण बना.

अंत में मैं आप सब का ध्यान इस ओर दिलाना चाहूँगी कि देश की सुरक्षा में सोशल मीडिया किस तरह हानि पहुँचाती है। भारत में तो रक्षा मंत्रालय ने अर्धसैनिक बलों में तैनात लोगों को सोशल मीडिया से दूर रहने की हिदायत दी है.इसकी वजह कहीं न कहीं देश की रक्षा को खतरा होने की आशंका है ही क्योंकि इसमें कहीं न कहीं विदेशी खुफ़िया एजेंसी प्रतिद्वंदी देशों को बहलाने-भड़काने का काम कर रही हैं. अमेरिका तथा अन्य प्रगतिशील देशों ने भी इस खतरे को महसूस करते हुए सुरक्षा सम्बन्धी कई कड़े कानून बनाये गए हैं.इसके आलावा कई आतंकवादी संगठन इससे जुड़ कर अपने अपने खतरनाक इरादों को पूरा करने में सफल भी हो जाते हैं. आज जरूरत इस बात की है कि सोशल मीडिया के उपभोक्ता अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बरक़रार रखते हुए इसके नकारात्मक प्रभावों के प्रति जागरूक रहें।

अंत में मैं सिर्फ इतना कहना चाहूँगी कि मुझे सोशल मीडिया से मीठे अनुभव ही हुए हैं क्योंकि मैंने आभासी दुनिया के सकारात्मक पक्ष को ही ज्यादा महत्व दिया, जिसका सबसे बड़ा उदहारण यह है कि वर्ष २०१५ में प्रतिलिपि.कॉम द्वारा प्रकाशित दस हज़ार से भी ज्यादा कहानियों को पढ़ा गया, जिनमे से प्रथम १५ लेखकों में से मुझे सर्व प्रथम स्थान प्राप्त हुआ। मेरी लिखी कहानी ‘रेपिस्ट’ को १३९६६७ पाठकों ने पढ़ा और अपने विचार लिखे.कहानी ‘ममता के आँसू’ अब तक १६६३९ पाठक पढ़ चुके हैं.आभासी दुनिया से अब तक मुझे ५६६७८६ पाठक मिल चुके हैं. सोशल मीडिया की ओऱ से मुझे दिया गया वर्ष २०१९ के लिएयह सबसे बड़ा तोहफ़ा है.

शील निगम
बी-४०१/४०२,मधुबन अपार्टमेंट,
गुलशन कॉलोनी के पास,
फिशरीज यूनिवर्सिटी रोड,
वर्सोवा ,
अँधेरी (पश्चिम)
मुंबई-६१
फोन ०२२-२६३६४२२८
मोबाइल -०९९८७४६१९८ ,०९९८७४९०६९२