कहानी विशेषः दादी और रिमोट-सूर्यबाला

चूँकि इसके सिवा कोई चारा न था
गाँव से दादी ले आई गई।
हिलती, डुलती ठेंगती, ठंगाती।
लाकर, ऊँची इमारतों वाले शहर के सातवें माले पर पिंजरे की बूढ़ी मैना-सी लटका दी गई।’
नीचे झाँकी तो झाँई आए और ऊपर देखो तो एक पे एक, डब्बा पे डब्बा से घेरे, आसमान पे लटके घर। इतने कि आसमान नजर आता ही नहीं। पूरब वाली खिड़की से दिखता सिर्फ बालिश्त भर आसमान का नुचा सा टुकड़ा। उसी में रात-बिरात झाँक जाते, कुल जमा, चार छ: तारे।
न सप्तर्षि, न सुकवा (शुक्रतारा)।

और सबेरा? जैसे जंग छिड़ी हो कहीं। भोर हुई नहीं कि भागम-भाग। अड़ाक-फड़ाक खुलते, बंद होते दरवाजे। जूते-चप्पल, कंघी, इस्त्री, अफड़ा-तफड़ी। और अपने-अपने थैले, बकसियाँ लटकाए सब दरवाजे से बाहर।

बाप दफ्तर चलाने, माँ कॉलेज पढ़ाने और बेटे-बेटी इस्कूल।
दरवाजा भेंड़ती मालकिन, हर रोज बाहर निकलते हुए जंगबहादुर से वहीं एक हिदायत दुहराती क़ि वह दादी के लिए रोटियाँ, दाल और सब्जी मेज पर ढाँक कर, दरवाजा पूरी चौकसी से बंद करता जाए।
दादी को भी यहीं समझाया जाता कि कोई कितनी भी घंटी मारे, खोलना नहीं हैं। हमसे हर एक के पास चाबी तो हैं ही।
सो, आधे-पौने घंटे बाद जंगबहादुर भी दादी से वही हिदायत दुहराता, बीड़ी का सुट्टा मारता, दरवाजे से बाहर हो जाता।
अब? दो चार माला फेरने के बाद, दादी सारे गाँव के टोले-पड़ोस और नाते-पट्टीदारों को कोसना शुरू कर देतीं जिन्होंने बिना लाग-लपेट के सीधम-सीध ‘सहेर’ के ठिकाने पर चिठ्ठी तान दी थी कि
‘आगे समाचार यह है कि आपकी माँ को सहेर जाने के लिए हम लोगों ने राजी कर लिया है। अब आप फौरन से पेस्तर आओ और ‘डाइरीक्ट’ लिवा ले जाओ। अपनी जमीवारी सँभालो। काहे से कि आप जान लो, उमिर और बुढ़ाया सरीर अब पूरी तरह पक के चू पड़ने को है लेकिन मानती फिर भी नहीं। टोल-पड़ोस का हेत-हवाल लेने, गिरती-भहरती हर कहीं पहुँच जाती हैं। दो-तीन मर्तबा तो ऊँचे-खाले लुढ़क भी चुकी हैं। अब मलहम पट्टी और डॉक्टर-वैद का उतना सरंजाम हमारे बस का कहाँ?

और सहेर में जानो कि आपका आलीसान मकान, नौकर-टहलुए, सान-सौकत के सारे बँदोबस्त। त़ो आप जांगर-पौरूष से थकी अपनी बूढ़ी माता की सेवा करके इहलोक, परलोक सुधारी और हम भी आपकी थाती आपको सुपुर्द कर गंगा नहाएँ। इसलिए चिठ्ठी को ‘तार’ जानो औरे आकर उन्हें अपने साथ ले जाओ। इस बार वे जरूर चली जाएँगी।’

इंतजाम पहले से था। साफ-सुथरा चाँटा-पोंछा घर। एक कोने में उनकी कोठरी। पदें ढँकी खिड़की, तिपाई, जग। जग में पानी और तिपाई पर बिस्कुट का पाकिट भी। और तो और उनकी खाट के ऐन सामने एक छोटा टी.वी. भी।

इन सबके बीच पूरी निगरानी के साथ दादी को स्थापित कर दिया गया। नल की टोटियाँ खोल बँद करके बताई गई। खिड़की के हुक और दरवाजों के हैंडल। कमोड में पानी चलाने की तरकीबें।

इस स्थापना-पर्व के बीच ही बेटे के बेटे ने पुट्ट से रिमोट की बटन दबा दी।
दादी हकबकाई, भौचक ज़ैसे यक्ष-किन्नर, नाग-गंधर्व, तीनों लोक, चौदहों भुवन से लेकर संपूर्ण ब्रह्मांड डाँवाडोल हो, इस चौखूँटी ‘पेटी’ (बक्से) में। हरिणाकुश से लेकर गौरा-पार्वती तक। जय जगदंबे! दादी निहाल हो लीं। बच्चों की तरह रिमोट हाथ में लेकर किलक उठीं।
जैसे अल्लादीन का चिराग हाथ लग गया हो। फिर लजाई। बच्चा के बाप ने मसखरी की
‘अब इन्हें दो-तीन वीडीओ गेम्स और लाकर दे दो तुम लोग। इनका वक्त आसानी से कट जाया करेगा।’

सो, वक्त कटने लगा। सुबह-शाम और रात, एक पर एक उतरने लगे ऱसोई में जंगबहादुर द्वारा उतारे जाने वाले आलू-तोरई के छिलकों की तरह। गैस पर सब्जी छौंकने की आवाज के साथ शाम घिरती और रात मेज से प्लेटें उठा लेने के बाद दिनचर्या समेट ली जाती। सुबह फिर वही भूचाल।

घर के लोग अपने-अपने समय पर आते-जाते। आपस में थोड़ी बातचीत करते फिर अपने-अपने काम में मशगूल हो जाते। दादी उनके आसपास कहीं न कहीं बैठने-उठने, चलने-फिरने की कोशिश करती रहतीं। फिर थक कर अपनी कोठरी में आ कर रिमोट का बटन दबा देतीं।

दो-चार दस हफ्ते बीतते न बीतते दादी उदास हो लीं। ‘पेटी’ का रंगारंग जादू बेअसर साबित होने लगा। दादी खेत-खलिहान, गड़ही-पोखर ढूँढ़ती तो उधर बड़े-बड़े रंगीन फूलों वाली आदमकद फुलवारियाँ दीखतीं। गाँव-सिवान तलाशती तो घुटनों तक घाघरी चढ़ाए, सीना उधारे होस से बेहोस फूहड़पने पर उतरीं छोकरियाँ। बाकी पूरे समय धाँय-धाँय छूटते, गोले-बारूद, ताड़-ताड़ दगती बँदूकें क़हीं उघड़ी खाल, कहीं लिथड़ते शरीर, रिसता खून पहली बार देखा तो दिमाग चकराया और वहीं की वहीं घुमटा खा के लुढ़क गई थीं। पाँच-दस मिनट में पानी के छीटें मार, गुलाब का शरबत पिला के दुरूस्त किया गया। होश-हवास लौटे तो खिसियाई। सबके सामने सफाई दी ‘गोली बारूद वाली बटन निकाल दो। जान थोड़ेई देनी है। मैंने तो राधेकृष्ण के लिए बटन दबाई थी। भगवान लोग अब क्यों नहीं आते?’

बच्चों ने ठहाका लगाया ‘आप जो आ गई। सारे भगवान भाग खड़े हुए।’ फ़िर समझाया गया ‘सब कुछ रोज-रोज नहीं आता। हम लोग सारे दिन तो रहते नहीं। बटन दबा-दबा कर देख लिया कीजिए। ओ.के.?’ और रिमोट दादी के हाथों में थमा कर चलते बने।

लेकिन शाम को बच्चों के पिता ने सुना तो एक झोंके में सब पर दहाड़े निकाल बाहर करो टी.वी. उनकी कोठरी से। वरना हमारी गैरहाजिरी में कुछ हो-हवा गया तो कौन जिम्मेवार होगा? ऐं? नहाना-धोना, खाना-पीना, पूजा-पाठ, इतना काफी नहीं क्या? बाकी समय चुपचाप माला जपें, बस।’

माला के नाम से दादी का दिल बैठ गया। जैसे पढ़ाई के नाम से बच्चों का। लेकिन अधेड़ हुए बेटे के सामने कहें तो कैसे? च़ुपचाप साँस रोके, अपने लिए, किए गए फैसले का इंतजार करती रहीं। प़ूरे समय दिल धड़कता रहा। बस, अब कोई आया, ‘पेटी’ उठाके ले जाने। कहीं कुद खड़कता, जान मुँह को आ जाती। अच्छा हो या बुरा, समय काटने का साथी तो हैं न! चला जाएगा तो क्या करेंगी दिनभर? ले-दे के वही एक खिड़की ज़िसके बगल वाली बिल्डिंग की कफ्फन सी सपाट दीवाल के सिवा कुछ दिखता ही नहीं। लगता हैं जैसे ऊँची उठती दीवाल के बीच चिन दी गई हों।

खैर, देर रात तक कोई नहीं आया तो उन्हें ढाढ़स बँधा। गई नहीं ‘पेटी’। बच गई। पर बटन दबाने की भी हिम्मत न पड़े। हतबुद्धि सी रिमोट लिए बैठी रहीं। बैठे-बैठे उकता गई। न रिमोट छोड़ते बने, न माला उठाते बने। हार कर रिमोट पकड़े-पकड़े ही अचानक बटन दब गई। अ़रे! सामने, पेटी पर तो सावन के झूले-हिंडोले और रंग-बिरंगी ओढ़नियाँ फहराती, लड़कियाँ तीज कजली गा-गा के झूला झूल रही थीं। सब की सब बिछुए, टीके, मेहँदी, महावर, कंगन-चूड़ियों से लैस। जितने श्रृंगार और सज्जा की दादी कल्पना कर सकती थीं, उससे कई-कई गुना ज्यादा। इतना सिंगार! (दादी ने तो ‘सोलह’ ही सुने थे) जुटता किसे है। दादी का जी लहक उठा। बड़ा खुसहाल गाँव हैं। जगदंबे माता सबके सुख-सुहाग की रच्छा करें।
मगन, मन, दादी लड़कियों के सुर में सुर मिला कर गाने की कोशिश करने लगीं।

सावन रितु आ–ई, धीरे-धीरे सावन रितु
खोलो मोरे सजना, चंदन केवड़िया
(क्योंकि)
चुनर मोरी, भी—जे, धीरे-धीरे
सावन रितु आ—ई धीरे-धीरे
सुनते-सुनते दादी पूरी तरह तन्मय हो गई।

गीत के ‘बोलों’ के हिसाब से शरमाने, लजाने और मुस्कुराने लगीं। मुग्ध दृष्टि से टकटकी लगाए, फूलों के गजरे लिपटे, पेंगे बढ़ाते झूलों को देखती रहीं। देह-दसा की सुध-बुध बिसर गई। आँखों के आगे बस सावन की झिरी, भीगीं चूनर और चंदन केवड़िया
– कि पट्ट से प्रोग्राम खत्म हो गया। पर्दे पर कलाकारों के नामों की सूची बदलने लगी। दादी का सपना टूटा। पर मन की हरियाई नीम पर वही झूले, वही गाने, पेंगे मारते रहे। अगले पूरे दिन भी वे अपनी खुरखुरी आवाज और थरथराते गले से सोलह शृंगार और चंदन केवड़िया का गीत निकालने की कोशिश करती रहीं।

सारा दिन बहुत अच्छा बीता। उससे अगला भी। पर आखिर कितने दिनों तक वही एक गीत गाते रहा जा सकता था? दादी हर दिन बटन घुमाती रहतीं कि लड़कियाँ फिर आएँ, फिर झूला झूलें, कजली गाएँ लेकिन वह गीत दुबारा नहीं आया।

अलबत्ता बटन दबा-दबा कर उसे ढूँढ़ते रहने के दरम्यान कभी किसी गरीब बेसहारा की झोपड़ी में आग लगाते लोग, कभी चीखती, तड़पती लुगाई को नोचते, खसोटते दरिंदे। गोली तो लोग यों मार देते जैसे कंचे खेल रहे हों। धाँय-धाँय गालियाँ चलती और पटापट हँसते-खेलते इंसान खून से तरबतर धरती पर लोट जाते। कभी बाप की गोद में बेटा, कभी औरत की गोद में उसके आदमी का सिर बेजान लुढ़क जाता।

दादी रोक न पातीं। हिलक के रो पड़ती ‘बैन’ कह-कहके देखो-देखो। अरे राच्छसों खड़े-खड़े गोली दाग दी रे दैय्या बेचारे निहत्थों बेकसूर पे मैंने खुद अपनी आँखों से देखा मार के पुलिया पार से छलांग लगा दी, कसाइयों ने अ़रे राम-रहीम का पहरा उठ गय क्या रे, दुनिया से कहीं आग में जिंदा झोंक रहे हैं, कहाँ पानी में घाँट-घाँट के कहाँ बिजली का करेंट लगा के कहाँ हो दीनबँधु! दीनानाथ।
उत्तेजना में साँस चलने लगती। ओठ लटपटाने लगते। हर छोटे-बड़े को बुला कर फूलती साँसों के बीच आँखों देखे ‘अन्याय’ की दुहाई देने लगतीं। बच्चे हँस पड़ते लेकिन बच्चों को माँ झुँझला कर रिमोट छीन लेती’ जब समझती नहीं तो देखना काहे का। सब कुछ को सच मान लेती है। जान छुड़ाने की गरज से किया उपाय, जान की जहमत बन गया। शुरू-शुरू में मजा लेने वाले बाकी लोग भी क्रमश: दादी द्वारा वक्त-बेवक्त उचारे जाते ‘बैनो’ से आजिज आने लगे।

एक बार घर की मालकिन ने किसी पड़ोसन के सामने परेशानी बयान की। उसने सुझाया, सुबह नौ-दस के बीच चैनल सात पर किसी महात्मा का प्रवचन आता है। वैसे महात्मा लगता तो पूरा गुरू घंटाल है पर दादी का हिसाब बैठ जाएगा। वक्त कटी हो जाएगी।

और अगली सुबह टाइम देख कर दादी के सामने बटन दबा दी गई। दादी के सामने बटन दबा दी गई। दादी गद्गद्। ऐन सामने, घर के घर में, लंबी दाढ़ी, तिलक-त्रिपुंड और गेंदे-गुलाब की मालाओं से सुसज्जित महात्मा जी प्रकट हो गए। चारों तरफ रंग-बिरंगी झालरे, झंडियों से सजा पंडाल, खचाखच भरे आलम (लोग) ब़ैक ग्राउंड में कैसियों टोन पर बजती बांसुरी की धुन। बीचों-बीच रेशमी चादर से ढ़की चौकी पर विराजमान महात्मा जी
‘जय बांके बिहारी, गोबरधम गिरधारी, वंशी के बजैय्या, रास के रचैया, माखन चोर, बोलो यशोदानंदन, केसनिकंदन, कन्हैयालाल की ‘
‘जै— रसमग्न, झूमते-गाते, श्रोताओं का समवेत स्वर गूँज उठा। दादी हर्ष-विह्वल, आँखों से आँचल लगा आनंदातिरेक के आँसू पोंछने लगीं।

बस, अब तो रोज यही सिलसिला चल निकला। अपने सारे काम जैसे-तैसे समेट, गिरती, लटपटाती दादी, साढ़े आठ से ही टी.वी. के सामने आ बैठतीं। बैठने के साथ ही बेताबी बढ़ती जाती। कहीं देर न हो जाए। महात्मा जी पहुँच न गए हों पंडाल में। स़मझाने, बताने से ज्यादा फायदा नहीं।
बटन दबते ही कैसियों टोन की धुन के बीच मंद-मंद मुस्कुराते, दाढ़ी सँवारते महात्मा जी प्रकट हो जाते। दादी का पोपला मुँह नवोढ़ा सा खिल उठता। टकटकी बँध जाती। महात्मा जी बीच-बीच में चुटकुले भी छोड़ देते। ‘पेटी’ के अंदर का पंडाल हँस पड़ता, दादी भी। थोड़ा बहुत जानने, समझाने पर भी कभी-कभी रहा नहीं जाता। थोड़ी सकुचाती, लजाती बच्चों से पूछतीं
‘महात्मा जी हम सबको देख रहे होंगे क्या?’
‘हाँ, कल आपको उनकी चिठ्ठी भी मिलेगी’
दादी बच्चों की उदंडता और मसखरी का बुरा नहीं मानतीं। उनका ध्यान तो भाव-विभोर करने वाली धुन और प्रवचन में रमा रहता। अक्सर पंडाल में बैठे भक्त श्रोताओं की तरह वे भी झूमने की कोशिश करतीं। और कभी-कभी तो उन्हें अपने आपको तत्व ज्ञान प्राप्त होता भी महसूस होने लगता।

लेकिन एक दिन बड़ा पंगा हो गया। पूरी फजीहत हो। दादी मगन मन और दिनों की तरह महात्मा जी का प्रवचन सुन रही थीं कैसियो टोन की बँशी वादन गूँज रहा था। बीच से उभरता महात्मा जी का स्वर भी ‘वह रास का रचैया, गोप बालों का खिलैय्या, मोर मुकुटधारी वृन्दावन बिहा ‘
— कि महात्मा जी का मुँह खुला का खुला रह गया और कार्यक्रम पलट गया। शायद वह महात्मा जी के प्रवचनों वाला आखिरी कैसेट था और टाइमिंग में थोड़ी गड़बड़ी होने से एक डेढ़ मिनट पहले ही बँद कर दिया गया था।
उसके बाद उस चेनल पर किसी और कार्यक्रम की घोषणा हो गई। इधर दादी का हाल-बेहाल, सुन्न सकता कि बैठे-बिठाए, हँसते-बोलते, प्रवचन करते, महात्मा जी देखते-देखते अंतर्ध्यान हो गए। मुँह तक खुला का खुला। हाय कैसी तो छवि और कैसा तेज। अब कहाँ देखने को मिलेगा मुखमंडल, और कहाँ से सुनने को मिलेगी ब्रज की बाँसुरी।

उन्हें सही बात समझाने की काफी कोशिश की गई। थोड़ी बहुत समझीं भी पर मन टूटा सो टूटा। उस पूरे दिन अन्न-जल नहीं ग्रहण कर पाई। दूसरे दिन भी उदास, तीसरे दिन भी लस्त। अकेली कोठरी, पहाड़ सा दिन।

आखिर सोग से उबरने के लिए पुन: रिमोट की शरण में जाना पड़ा। यह भी डर था कि कहीं बेटे के कानों में बात न जाने पाए कि फिर से ‘पेटी’ की करामात के कारण दादी हलकान। ‘बेटा कम हठ्ठी नहीं। इस बार कहीं सचमुच हड़ककर ‘पेटी’ हटवा दी तो।

अत: धीरे-धीरे दादी ने वापस सब कुछ देखना शुरू कर दिया। जो कुछ भी, जब भी आता, देखने, समझने की कोशिश करतीं। पहले लगातार देखते हुए कुछ न कुछ टीका-टिप्पणी भी चलती रही। कभी लानतें भेजतीं, कभी कोसतीं, लेकिन फिर लोगों के झुँझलाने-झल्लने पर वह सब भी कम हो गया। जब कभी मन घबड़ाता, अकेलापन, उदासी, काटती, बटन दबा देतीं। धीरे-धीरे मार-धाड़ से डरना, रोना, कलपना भी बँद हो गया। घर वालों को राहत मिली। अब, अपने-अपने काम से घर लौटने के बाद शाम को दादी उन्हें बेवजह घेरने-घारने के बदले अपनी कोठरी में टी.वी. देखती मिलतीं या टी.वी. देखने के बाद थकी आँखों को आराम पहुँचाती। अब वे जबरदस्ती के ‘सिली’ सवालों से किसी को परेशान भी न करतीं। उलटे कभी-कभार बात चलने पर, किस प्रोग्राम को कितने हजार चिठि्ठयाँ मिलीं या क्या-क्या कीमती चीजें इनाम में थीं, या साबुन तेल वाली छोकरियाँ कैसी घाघरी, कैसा जंपर पहने थी, यह भी बताती। बड़ों और बच्चों दोनों के लिए दादी से मिली ये ज्ञानवर्धक सूचनाएँ अतिरिक्त मनोरंजन का माध्यम हो गई और उन्होंने अब दादी को ‘टेलीविजन इनफॉरमेशन ब्यूरो’ के नाम से पुकारना शुरू कर दिया।

किचेन में जेट-स्पीड से दाल बघारता या रोटियों को फटाफट तवे से गैस पर फेंकता, जंगबहादुर भी अब दादी की विस्तृत पूछा — पैखियों से मुक्त हो गया था। उसकी माँ की दवा, बाप की दारू और बहनों की शादियों से संबँधित चिंताएँ और सुझावों के साथ-साथ दादी की किचेन में पहुँच कर की जानेवाली टोकाटोकी और दखलंदाजी भी बँद हो गई। अधेड़ बेटा घी-दूध खाए तो ठीक, न खाए जो ठीक। उसके दफ्त जाने से पहले ‘जान है तो जहान है’, की नसीहत भी नहीं।
स्थितियों के साथ दादी के इस समझौते और समझदारी पर पूरा घर मन ही मन संतुष्ट और चमत्कृत था। देर आयद दुरूस्त आयद। सबकी जिन्दगी अमन चैन से कटने लगी। दिन, हफ्ते और महीने पे महीने बीतते गए।

अचानक इतवार की एक दोपहर, नीचे आवा-जाहियों से भरी सड़क पर कहीं गोलियाँ चलने जैसी आवाज आई और मिनटों में पूरी कालोनी लोमहर्षक उत्तेजना से सनसना गई। एक खौफनाक दहशत भरा सियापा सारी आवाजाहियों को निगल गया।

पता चला, ठीक, तीन इमारतों के पहले कोने पर, दो नकाबपोश अजनबी एक अठ्ठाईस साल के लड़के पर गोलियाँ दागते निकल गए। लड़के का मृत, छलनी हुआ शरीर हाथों में था, बाप अवसन्न, पथराया-सा बैठा है क़ोई पास तक जाने की हिम्मत नहीं कर पा रहा द़म घोंटू सन्नाटे में पुलिस की गाड़ियों की दनदनाहट दूर हो गई।

इतवार की दोपहर। माँ-बाप तथा बच्चे सभी घर पर। चेहरे आतंक से सहमे।
शायद छोटे वाले लड़के को खयाल आया। भागा गया। एक स्वाभाविक उत्तेजनावश उसने सोती हुई दादी को झकझोर कर जगा दिया और जल्दी-जल्दी एक साँस में पूरा किस्सा बयान कर गया।
दादी पहले तो जैसे कुछ सुन, समझ ही नहीं पाई। फिर बच्चे से समझा कर बताने को कहा। उसने दुबारा बताया। इस बार बताते हुए डरा भी कि कहीं दादी ने रोना-बिलखना शुरू कर दिया तो माँ से अलग फटकार मिलेगी।
लेकिन आश्चर्य! दादी ने कोई हड़बड़ी या उत्तेजना नहीं दिखाई। आराम से टेक लगाती उठीं। आँखों पर पानी के छींटें मारे, ऐनक लगाई और पोते को ‘अधिकारिक सूत्रों’ की जानकारी सी देती, शांत स्वर में बोलीं —
‘मुझे मालूम है – कल सेई मालूम है — कल ही देखा था मैंने।’
‘क्या? ‘ लड़का झल्लाया। ‘आप होश में तो हो?’ — अभी आधे घंटे पहले की बात है ये। यहाँ, ठीक अपनी सड़क के नीचे गोली दगी औ़र आप कहती हो कल सेई मालूम है’ उसने दादी के लहजे की नकल की।
‘एकई बात है’ — दादी ने शांति से बच्चे को पुचकारा — ‘अब ये तो आए दिन के टंटे हैं। कल ‘पेटी’ पे भी एकदम येई दिखाया था — रात-दिन यई चल रहा है। ‘आठो प्रहर’ — फिर पोपले आँखों पर जबान लटपटाती इत्मीनान से पूछ बैंठीं – ‘चाय की हुड़क लग रही है। ज्यादा सो ली क्या। ज़ंगबहादुर ने चाय चढ़ाई कि नहीं, देख तो जरा बेटा।’


जन्म 25 अक्तूबर 1943 वाराणसी