हास्य-व्यंग्यः श्री श्री एक सौ साठ श्री-अशोक गौतम

दिली वादे के मुताबिक वे चारों चंदाखोर साल बाद मंदिर के प्रांगण में आज मिले तो उन्हें अपने सामने पा मंदिर के भगवान बहुत प्रसन्न हुए कि….. कहीं तो किसीने मिलने का वादा निभाया। कही जगह, कहे वक्त।
उन्होंने साल पहले बसों में चढ़ चढ़ ताजे केले संतरों के नाम पर सड़े केले संतरे बेचने के बाद तय किया था कि वे चारों पुराना धंधा बंद कर दिन दुगना रात सौ गुणा फलने फूलने वाला चंदे का धंधा शुरू करेंगे। कौन सुनता रहे मरने तक साले दो टके के ड्राइवरों की गालियां। अबे , अपने बाप की बस समझ रखी है क्या? साले गधे की तरह चढ़ जाते हैं बिन पूछे बस में। चोर संतरे के नाम पर नींबू बेच देते हैं जनता को….और भी न जाने क्या क्या? ऊपर से सवारियां संतरे केले खरीदें या न, बस का शरीफ से शरीफ कंडक्टर तक आधा दर्जन केले संतरों पर हाथ साफ करके ही रहे, मुस्कुराता हुआ पूरे हक से। उन्हें बुरा भी लगता। साले एक वे चुपके चुपके देश तक को हंसते हुए बेचें और इधर हम चिल्ला चिल्ला केले संतरे भी न बेचें? वोटर और नेता का आधारभूत फर्क उन्हें तब पहली बार पता चला था।
तो साल पहले जिस मंदिर के बाहर वे एक दूसरे के गले लग सरकार के स्टार्टअप का हिस्सा होते चंदे का धंधा करने को अलग हुए थे, आज ठीक साल बाद बारह बजे उसी मंदिर के आगे मंदिर में मंदिर को हाजिर नाजिर मान अपने अपने चंदे के धंधे का वार्षिक रिपोर्ट कार्ड एक दूसरे के आगे पेश करने को बेताब थे। अब वे केले संतरे बेचने वाले नहीं, पेशेवर चंदाखोर थे। नए धंधे में लगने से पहले उन्होंने तय किया था कि साल बाद उनमें से जो सबसे बड़ा चंदाखोर निकलेगा शेष तीनों अपने अपने हाथों की लंबाइयों का सदुपयोग करते उसे सरकार द्वारा चंदाखोरी के श्री श्री एक सौ आठ श्री राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाजने की पुरजोर सिफारिश करेंगे। पुरस्कार का सारा खर्चा भले ही उन्हें क्यों न उठाना पड़े। वे जानते थे कि सरकार अब अपने अपने चहेतों को आंखें मूंद कर कर्ज दे नंगी हो चुकी है। बैंक दिवालिया होने के कगार पर हैं।
चारों चंदाखोर मिलते ही आपस में यों गले लगे ज्यों मौसेरे भाई न होकर फिल्मों के सगे भाई हों। चार भाई एक धंधा। फिर उनका पूरे अपनापे से गले लगना। यहां तो एक मां के जाय भी एक दूसरे के गले लगने से पहले सौ बार सोचते हैं।
मिले तो चारों की आंखों में खुशी चमक के बीच असली आंसू! चारों जी भर एक दूसरे, दूसरे तीसरे, तीसरे चैथे, चैथे पहले के जी भर गले लगे। तब उनमें इतना प्रेम देख, हद से अधिक सहृदयता से उन्हें गले लगते देख मंदिर के भगवान की आंखों तक में आंसू छलक आए। काश! गले मिलने के बहाने एक दूसरे के गले पर छुरी चलाने वाला ये समाज इनसे कुछ सीख पाता।
जब वे एक दूसरे के गले लगते लगते थक गए तो तीनों ने पहले से पूछा ,‘ अच्छा बोल, तूने साल में कितने दिन चंदे का धंधा किया? चंदाखोरी के धंधे के नाम पर क्या किया?’
यह सुन पहले ने अपनी चंदे से भरी विदेशी बैंकों की पासबुकों पर पर ताव देते कहा,‘ मित्रो! मैं हफ्ते में पांच दिन ही चंदे का धंधा करता था केंद्रीय कर्मचारियों के वर्किंग शेड्यूल की तरज पर। तीन सौ पैंसठ दिन और रातों में मैं जान गया कि इस देश में किसी भी तरह का चंदे का धंधा करते जनता तो जनता, भगवान तक को मजे से ठगा जा सकता है। मैंने हर जात के पढ़ेलिखे से लेकर ठेठ गंवार तक को गरीबों के लिए अनाथ आश्रम हेतु चंदे के नाम पर इतना ठगा… इतना ठगा कि मेरे इस देश करोड़ों जमा हैं और बाहर के बैंकों में …’
‘यहां के बैंक में जमा क्यों नहीं करवाए? स्वदेशी बैंक किसलिए हैं?देश का पैसा देश के खाएं तो कोई बुरा है क्या? ’ तीसरे ने पूछा तो उसने चिंतक होते कहा ,‘ एफआरडीआई के डर से! अपनी सरकार छुट्टे सांडों को कर्ज देकर पाल रही है बेचारे बकरों के पेट की घास छीन । इसलिए मित्रो सावधान! दूसरे देश में स्वदेशी की बात करते विदेशी बैंकों को भरना हमारा राष्ट्रीय दायित्व रहा है ,’ उसकी चंदोखोरी के बारे में स्पष्ट पालिसी सुन तीनों ने तालियां बजाईं तो मंदिर के भीतर का भगवान सहमा।
अब दूसरे से तीनों से पूछा,‘ तो तूने चंदाखोरी में क्या अप्रत्याशित किया?’
तब तीनों को अपनी चंदाखोरी का सच्चा किस्सा सुनाने से पहले उसने लंबी हुंकार भरी ,‘ मित्रो! मैंने देखा कि देश युगों से अस्वच्छ है। हर स्तर पर। मैनें देखा कि आज भी जनता को स्वच्छता के नाम पर जमकर बहलाया फुसलाया जा सकता है। इस पावन कार्य में काफी खाया जा सकता है। सो मैंने जितना मेरे पास दिमाग था, सारा का सारा इनवेस्ट कर देश में सरकार को अपने साथ रखने के लिए ,सरकार के स्वच्छता अभियान को और तूल देने के लिए एक एनजीओ खोली, नाम रखा, स्वच्छ भारत इन इंडिया ! देखते ही देखते ,मेरी फुसफुसी अपील सुनते ही विदेशों से करोड़ों का चंदा मेरी एनजीओ के खाते में आने लगा। इतना चंदा मिला कि उसको गिनते रहने के चलते अपने ऑफिस में झाड़ू लगाने तक को समय न निकाल पाया। अब विदेशों में मजे से चंदे के दम पर कारोबार कर रहा हूं। चैबीसों घंटे एक टांग इस देश में तो दूसरी दूसरे देश में रहती है। सच पूछो तो दोस्तो! आठ महीने से एक टांग से इस देश का तो दूसरी टांग से दूसरे देश का सफर करते करते अब मैं थक गया हूं,’ कह वह हंसा तो तीनों उसके सामने अपने को बौना फील करने के बाद भी उससे अधिक हंसे।
अब चंदाखोरी की सच्ची कहानी सुनाने की तीसरे की बारी थी। सो उसने तीनों का आदेश पा मंदिर के भीतर दुबके भगवान की मन से शपथ खाई और अपनी चंदाखोरी का किस्सा सुनाने लगा,‘ मित्रो! मैंने समाज की जनता की अपने अपने भगवान में आस्था को पहले चार पांच दिन गहराई से भांपा नापा। जब मुझे लगा कि सब अपने अपने भगवान के नाम पर कुछ भी देने को तैयार हो जाते हैं तो मैंने पहले एक के भगवान का मंदिर बनाने के नाम पर देश में चंदे का धंधा शुरु किया। चार ही दिन में मुझे इस धंधे में गजब का रिस्पांस मिला तो मेरी बांछें खिल उठीं। लगा, एक नहीं, इस धंधे के लिए सौ जन्म भी कम हैं। आस्तिक तो आस्तिक, नास्तिक तक दिल खोलकर , आंखें मूंद कर मुझे चंदा देने लगे। कहीं से डालर में तो कहीं से पौंड में ….. कोई तो ब्लैंक चेक तक पोस्ट कर देता। अब मेरे दस देशों में अपने सिक्स स्टार होटल हैं।’
‘ सिक्स स्टार??’ तीनों ने एक साथ पूछा।
‘ हां तो ! फाइव से एक स्टार आगे,’ कह वह मुस्कुराया तो पहले ने उसकी पीठ थपथपाई। तब उसे लगा कि सरकार को वही श्री श्री एक सौ साठ श्री राश्ट्रीय चंदाखोर अवार्ड हेतु नामांकित होने वाला है। अब तीनों को एक दूसरे के चंदाखोरी के धंधे पर शक सा होने लगा था। ईर्ष्या में ऐसी ही होता है मित्रो! यह दोस्तों तो दोस्तों , भगवानों तक में भी विद्यमान रही है।
अब तीनों ने अंतिम से सहमे हुए कहा,‘ मित्र! अब तुम भी अपनी चंदाखोरी का सत्य किस्सा सुनाओ। पर एक बात ध्यान रहे, जितना सच, उतना बक। झूठ माशा भर नहीं। हम सच्चे दोस्त हैं,’ अपने मित्रों का आदेश पाते ही उसने गला साफ कर कहना शुरू किया,‘ मित्रो! मुझे चंदाखोरी का कौन सा धंधा करूं, ये सोचने में दो हफ्ते लग गए। काफी सोचने के बाद आखिर इस नतीजे पर पहुंचा कि मंदिर मस्जिद, के लिए चंदा मांगने से बेहतर श्मशान घाट के आधुनिकीकरण के लिए चंदे के धंधे में आसानी से सक्सेस हासिल की जा सकती है। आई फील कि देश के श्मशानों की दशा देश की जनता से भी बदतर है। अरे , कम से कम वह तो प्लेटफार्म चकाचक होना चाहिए जहां से हर चोर हराम खोर तक आगे जाता ह, अपनी चोरी, हरामखोरी पर न चाहते हुए भी लगाम लगाता है। हर स्तर का आदमी चैन से मरे या न, पर वह मरने के बाद चैन से जलना जरूर चाहता है। अतः मैंने जब श्मशान की नब्ज को पढ़ा तो मुझे इसके सिर पर चंदाखोरी की असीम संभावना नहीं संभावनाएं दिखीं और मैंने चंदाखोरी के इस प्रोजेक्ट पर पूरी तन्मयता से काम शुरू कर दिया। मैंने हर जीने वाले से लेकर हर मरने वाले से यह कहते हुए मुस्कुराते चंदा उगाहना शुरू किया कि मैं तुम्हें मरते ही एक आलीशान श्मशान दूंगा ताकि चैन से न जीने वाले मरने के बाद वहां पहुंच गद्गद् हो उठें। मैं हर जात के मरने वाले को ऐसा आलीशान श्मशान बनाऊंगा कि भगवान तक मरने को लालायित हो उठें। मेरे इस प्रोजेक्ट को हर मरने वाले ने तो हाथों हाथ लिया ही, अमरत्व की चाह रखने वाले ने भी हाथों हाथ लिया। मैंने महसूस किया कि मेरे इस प्रोजेक्ट की अवधारणा से ही सब मरते मरते जीने के सारे गम भूलने लगे थे। मेरा आइडिया सबने हाथों हाथ उठाया। क्योंकि जीना किसीको हो या न , पर मरना तो सभी को होता है।’
‘तो??’ तीनों ने उसके दांतों तले अपने उंगलियां दबााते पूछा।
‘तो क्या! यह निर्विवादित सत्य है कि जीने के नाम पर कोई उतना चंदा नहीं देता जितना मरने के बाद के नाम पर देता है। कौन नहीं चाहता कि जिंदे जी की रोज की किच किच की मुक्ति के बाद बंदा जलते हुए तो कम से कम चैन की सांस ले?’
‘तो ?’ पहले ने पूछा।
‘तो क्या? साइंटिफिक एप्टीट्यूड वाले लोग तक आज भी धर्मभीरु से अधिक मृत्युभीरु हैं , यह पहली बार पता चला। इस प्रोजेक्ट की कंपलीशन के लिए झोपड़ों में रहने वाले गरीबों ने दिल खोलकर चंदा यह सोच कर दिया कि जिंदा जी आलीशान मकान न सही तो मरने के बाद आलीशान श्मशान ही सही। गरीब से कुछ और खरीदा जाए या न पर मृत्यु के बाद के सुखद सपने वह मजे से आंखें मूंद खरीद लेता है, इसके लिए चाहे उसे अपना पेट काटना पड़े चाहे दूसरों का। यही नहीं, जो दिन रात आलीशान महलों में रहे उन्होंने भी आलीशान श्मशान निर्माण के नाम पर दिल खोलकर चंदा दिया। मरने के बाद भी आलीशान मिले तो और चाहिए ही क्या! वे किसीके गिरे घर को बनाने के लिए भले ही दस रूपए न दें, पर आलीशान श्मशान के लिए लाखों गुप्तदान दे घोर स्वार्थी से परम परमार्थी होने लगे। घर में एक साथ रहने के बाद भी एक दूसरे से छिपकर। और एक ही शहर में करोड़ों चंदाखोरी में बिन डरे , बेखौफ इकट्ठे कर गया ।
‘फिर?’ दूसरे ने उसे मन ही मन गाली देते पूछा।
‘फिर क्या? बाद में हर शहर से करोड़ों चंदे में इकट्ठे कर गधे के सिर के सींगों की तरह गायब होता रहा। मैं आगे तो श्मशान पीछे,’ उसने ठहाका लगाया।
‘ तूने तो श्मशान भी नहीं छोड़ा रे हे अव्वल दर्जे के चंदाखोर! पर मरने के बाद ऊपर मुंह कैसे दिखाएगा?’
‘ जैसे नीचे वाले शान से काले मुंह दिखाते हैं,’ उसने लापरवाह होते उसे जवाब दिया तो तीसरे ने कहा,‘ यार! ये तो हद है! मुर्दे क्या सोच रहे होंगे तेरे बारे में? जिंदों को तो हम सब्जबाग दिखाते ही रहते हैं पर उनको भी सब्जबाग?’
‘ देखो दोस्त! मैंने तो केवल चंदा खाया है, मुर्दों को आवंटित जमीन नहीं। मुर्दों की दशा आज हम जिंदों से भी दयनीय है। अब तो जिंदों ने उनके सिमटते श्मशानों को भी हथियाना शुरू कर दिया है। वे बेचारे मर गए जनहित याचिकाएं करते करते। कहीं कोई सुनवाई नहीं। मैंने कम से कम उनकी जमीन तो नहीं हथियाई।’
‘मतलब?’ चौथे ने उसके कमीनेपन को दाद देते पूछा।
‘अरे कंबख्तो ! मरने के बाद जलना ही तो है। दिल्ली में जलें चाहे गांव में। चंदन में जले चाहे अधे जल बहा दिए गंगा में। जब वे आलीशान महलों में रहते हुए भी मरने के बाद जलने से नहीं बच पाए तो…. बेवकूफ कहीं के। ’
तब तीनों ने लंबी सांस ले बुझे मन से उसका नाम सरकार को उस वर्श के श्री श्री एक सौ साठ श्री राष्ट्रीय चंदाखोर पुरस्कार हेतु रिकोमेंड कर दिया , फिर चाय पान किया, दारूपान किया और साल बाद फिर मिलने का वादा कर अपने अपने धंधे पर अपने अपने कीर्तिमान स्थापित करने का बोझ लिए एक दूसरे से भरी आंखें किए जुदा हो गए ताकि पद्मश्री से चार कदम आगे के शुरू किए इस पुरस्कार को जब तक हो सके जीवित रखा जा सके।
अशोक गौतम
गौतम निवास, अप्पर सेरी रोड़
नजदीक मेन वाटर टैंक, सोलन-173212 हि.प्र.