मेरी पसंदः रघुवीर सहाय की कविताएँ

ठंड से मृत्यु

फिर जाड़ा आया फिर गर्मी आई
फिर आदमियों के पाले से लू से मरने की खबर आई :
न जाड़ा ज्यादा था न लू ज्यादा
तब कैसे मरे आदमी
वे खड़े रहते हैं तब नहीं दिखते,
मर जाते हैं तब लोग जाड़े और लू की मौत बताते हैं

 

 

पानी पानी

पानी पानी
बच्चा बच्चा
हिंदुस्तानी
माँग रहा है
पानी पानी
जिसको पानी नहीं मिला है
वह धरती आजाद नहीं
उस पर हिंदुस्तानी बसते हैं
पर वह आबाद नहीं
पानी पानी
बच्चा बच्चा
माँग रहा है
हिंदुस्तानी
जो पानी के मालिक हैं
भारत पर उनका कब्जा है
जहाँ न दे पानी वाँ सूखा
जहाँ दें वहाँ सब्जा है
अपना पानी
माँग रहा है
हिंदुस्तानी
बरसों पानी को तरसाया
जीवन से लाचार किया
बरसों जनता की गंगा पर
तुमने अत्याचार किया
हमको अक्षर नहीं दिया है
हमको पानी नहीं दिया
पानी नहीं दिया तो समझो
हमको बानी नहीं दिया
अपना पानी
अपनी बानी हिंदुस्तानी
बच्चा बच्चा माँग रहा है
धरती के अंदर का पानी
हमको बाहर लाने दो
अपनी धरती अपना पानी
अपनी रोटी खाने दो
पानी पानी
पानी पानी
बच्चा बच्चा
माँग रहा है
अपनी बानी
पानी पानी
पानी पानी
पानी पानी

 

 

बेटे से

टूट रहा है यह घर जो तेरे वास्ते बनाया था
जहाँ कहीं हो आ जाओ

… नहीं यह मत लिखो
लिखो जहाँ हो वहीं अपने को टूटने से बचाओ

हम एक दिन इस घर से दूर दुनिया के कोने में कहीं
बाँहें फैला कर मिल जाएँगे

 

 

ग़रीबी

हम गरीबी हटाने चले
और उस समाज में जहाँ आज भी दरिद्र होना दीनता नहीं
भारतीयता की पहचान है,दासता विरोध है दमन का प्रतिकार है
हम ग़रीबी हटाने चले
हम यानी ग़रीबों से नफ़रत हिकारत परहेज़ करनेवाले
हम गरीबी हटाते हैं तो ग़रीब का आत्म सम्मान लिया करते हैं
इसलिए मैं तो इस तरह ग़रीबी हटाने की नीति के विरूद्ध हूं
क्योंकि वही तो कभी-कभी अपने सम्मान की अकेली
रचना रह जाती है।
 

 

हँसो हँसो जल्दी हँसो

हँसो हँसो जल्दी हँसो
हँसो तुम पर निगाह रखो जा रही हे
हँसो अपने पर न हँसना क्योंकि उसकी कड़वाहट
पकड़ ली जाएगी और तुम मारे जाओगे
ऐसे हँसो कि बहुत खुश न मालूम हो
वरना शक होगा कि यह शख्स शर्म में शामिल नहीं
और मारे जाओगे
हँसते हँसते किसी को जानने मत दो किस पर हँसते हो
सब को मानने दो कि तुम सब की तरह परास्त हो कर
एक अपनापे की हँसी हँसते हो
जैसे सब हँसते है बोलने के बजाय
जितनी देर ऊँचा गोल गुंबद गूँजता रहे, उतनी देर
तुम बोल सकते हो अपने से
गूँजते थमते थमते फिर हँसना
क्योंकि तुम चुप मिले तो प्रतिवाद के जुर्म में फँसे
अंत में हँसे तो तुम पर सब हँसेंगे और तुम बच जाओगे
हँसो पर चुटकुलों से बचो
उनमें शब्द हैं
कहीं उनमें अर्थ न हों जो किसी ने सौ साल पहले दिए हों
बेहतर है कि जब कोई बात करो तब हँसो
ताकि किसी बात का कोई मतलब न रहे
और ऐसे मौकों पर हँसो
जो कि अनिवार्य हों
जैसे गरीब पर किसी ताकतवर की मार
जहाँ कोई कुछ कर नहीं सकता
उस गरीब के सिवाय
और वह भी अक्सर हँसता है
हँसो हँसो जल्दी हँसो
इसके पहले कि वह चले जाएँ
उनसे हाथ मिलाते हुए
नजरें नीची किए
उनको याद दिलाते हुए हँसो
कि तुम कल भी हँसे थे
 

 

उसका रहना

रोज सुबह उठ कर पाते हो उसको तुम घर में
इससे यह मत मान लो वह हरदम मौजूद रहेगी
 

 

अभिनेत्री

अभिनेत्री जब बंध जाती है
अपने अभिनय की शैली से
तो चीख उसे दयनीय बनाती है
पुरुषों से कुछ ज्यादा
औ’ हँसी उसे पुरुषों से ज़्यादा बनावटी
यह इस समाज में है औरत की विडम्बना
हर बार उसे मरना होता है
टूटा हुआ बचाती है
वह अपने भीतर टूटफूट के
बदले नया रचाती है
पर देखो उसके चेहरे पर
कैसी थकान है यह फैली
हँसने रोने को कहती है
उससे पुरुषों की प्रिय शैली
इन दिनों से कुछ ज़्यादा
औरत का चेहरा कह सकता है
पर क्या उसकी ऐसी आज़ादी
पुरुष कभी सह सकता है
वह उसे हँसाता रहता है
वह उसे सताता रहता है
वह अपने सस्ते रंगमंच पर
उसे खेलाता रहता है
औरत का चेहरा है उदास
पर वह करती है अट्टहास
उसके भीतर की एक गरज
अनमनी चीख बन जाती है
वह दे सकती थी कभी कभी
अपने संग्रह से गुप्तदान
पर दया सरेबाज़ार वही
खुद एक भीख बन जाती है.

 

 

सोचने का परिणाम

कष्ट के परिणाम से हम दूसरों से क्या बड़े होंगे
व्यथा को भुलाने में अकेले हम कौन ऐसा तीर मारेंगे
भले ही चूकने में या निशाना साधने में हुनर दिखला लें
तथा यह भी
कि हरदम सोचते रहना किसी की शुद्धता उत्कृष्टता का नहीं लक्षण है
गधा भी सोचता है घास पर चुपचाप एकाकी प्रतिष्ठित हो
कि इतनी घास कैसे खा सकूँगा
और दुबला हुआ करता है।
 

 

आपकी हँसी

निर्धन जनता का शोषण है
कह कर आप हँसे
लोकतंत्र का अंतिम क्षण है
कह कर आप हँसे
सबके सब हैं भ्रष्टाचारी
कह कर आप हँसे
चारों ओर बड़ी लाचारी
कह कर आप हँसे
कितने आप सुरक्षित होंगे
मैं सोचने लगा
सहसा मुझे अकेला पा कर
फिर से आप हँसे

 

 

नहीं छापते

अपना लिखा बार बार पढ़ मुझे बल बहुत मिलता है
और यह अफ़सोस बिल्कुल नहीं होता कि लिखना बेकार था
मेरे लिखे को कभी कुछ लोग दुबारा छाप भी देते हैं
उद्धृत कर देते हैं उनमें से वे अंश जो आज के समाज में
सत्ता के शीर्ष के नज़दीक निरापत्ति दिखते हैं
किंतु उन निष्कर्षों को नहीं छापते जो मेरे तर्क से
निःसृत थे ।

 

 

ख़तरा

एक चिटका हुआ पुल है
एक रिसता हुआ बाँध है
ज़मीन के नीचे बढ़ता हुआ पानी है
ख़तरे में राम ख़तरे में राजधानी है
पहले खुदा के यहाँ देर थी अँधेर न था
अब खुदा के यहाँ अंधेर है और उसमें देर नहीं।

– रघुवीर सहाय