कहानी समकालीनः जंजीरें-देवी नागरानी

जीवन मृत्यु के दो पाटों के बीच, पीड़ा को अपने भीतर ज़ब्त करते हुए एक ऐसी ख़ुशी को जन्म देने की कगार पर खड़ी सकीना उस उजाले का इन्तज़ार कर रही थी जो उसके जीवन की अंधेरी पगडंडियों को रौशन करने के लिये आमादा था। डॉक्टर और नर्स भी नई सुबह की एक नई मधुर किलकारी सुनने की उम्मीद में अपनी तरफ़ से उसकी गिरती हालत से जूझ रहे थे। पर क़ुदरत के किये पर किसी का बस कहाँ ? नियति के हर मुक़म्मल फ़ैसले के सामने सभी अपने हथियार डाल देते हैं.
नारी का ममत्व उसकी विवशता नहीं उसकी फ़ितरत है। अपनी कोख से जन्मे बच्चे का लालन पालन करना, अपने आँचल की छांव में अपना सारा वात्सल्य उसपर न्यौछावर करना नारी का सौभाग्य है, क़ुदरत की ओर से मिला वरदान! प्रसव पीड़ा के उपरांत जो ममता का सागर नारी की छाती में छोलियाँ मारता है, उस ख़ुशी का अनुमान फ़क़त वह माँ ही लगा सकती है जो पीड़ा के दौर से गुज़रकर उस ख़ुशी को हासिल करती है. यह एक आस्था है जो हौसलों के परों में संचार के समस्त साधन भरकर, बेपरवाज़ पंछी को तव्वजू से अपना लक्ष्य पाने के लिए मददगार साबित होती है।
उसी ख़ुमार भरे दौर से गुज़रती सकीना को इस प्रसव पीढ़ा के पश्चात झकझोर कर होश में लाने का प्रयास करते हुए डॉक्टर रमाकान्त ने उसकी ओर मुख़ातिब होते हुए कहा – ‘सकीना तुम्हें बेटा हुआ है।’
सकीना ने आँखे खोलकर डॉक्टर के चेहरे पर ढलती मुस्कान देखी और उस सखेद स्वर की तहों में एक अनचाहा अर्थ पढ़ने की कोशिश की। फिर अपने बगल में नज़र फिराई तो उसके शरीर में जैसे जान लौट आई ।
‘मुझे अपना बेटा दे दो, मैं उसे अपनी छाती से लगा लूँ’-ममता ने सब्र के सारे बांध तोड़ते हुए कहा। डॉक्टर रमाकान्त के इशारे पर नर्स ने रेशमी कपड़े में लिपटा शिशु उठाकर सकीना की गोद में रखते हुए धीमे से कहा – ‘यह जिसकी अमानत थी, उसे जाकर मिल गई।’ सकीना ने जैसे कुछ सुना ही नहीं । बस रेशम से नर्म, मख़मली शिशु को अपनी छाती से लगाकर आँखें मींचे लेटी रही, उसके चेहरे पर अनोखी सांत्वना का आलम रहा। अपनी बाँहे बेटे के नाज़ुक शरीर के ईर्द-गिर्द लपेट लीं, कुछ इस तरह जैसे वह अपने वजूद से एकाकार हुई हो.
‘सकीना यह बच्चा मर चुका है’ फुसफुसाहट करती आवाज़ें अपने आस-पास सुनकर वह ख़्यालों के घोर अँधेरे में डूबती रहीं। उसे लगा जैसे सूरज की पहली किरण के साथ उसका बच्चा इस जहान में आया तो सही पर रोशनी में आँख खोलने के पहले अंधेरे में विलीन हो गया। पीछे छोड़ गया एक धुँधला-सा कोहरा जो सोचों पर बेरहम कचोटते वार करता रहा।
यह कैसी घोषणा है? सुनकर उसे लगा जैसे कोई ख़याल पनपा, सांस लेकर परछाई की तरह लुप्त हो गया. अपनी माँ के ममत्व का मर्म भेदी न बन सका। सकीना की आँखों से अश्कों की लड़ियाँ गालों से लुढ़कती, छाती से लिपटे नवशिशु को नहलाती रही। पीड़ित ममता जीवन और मृत्यु के बीच की खाइयाँ लाँघते हुए अपने जीवन का मातम मनाती रही। मूर्छित दशा में भी सकीना की स्पंदित आवाज़ कुछ अस्पष्ट शब्दों की हुंकार में जैसे आप बीती सुना रही थीं – ‘मैं जानती हूँ मेरे बच्चे, तू मुझे लेने आया है, मौत की अंधेरी गुफ़ा से निकालकर ज़िन्दगी की रोशनी में लाया है ताकि मैं तुझे पा सकूँ. चलो किसी ऐसी जगह जहाँ कोई माँ अपने बच्चे से जुदा होने का ग़म न झेले, दुख की सिसकियों की बजाय सुकून की शहनाई सुन सके।’
और इसी ख़ुमारी के आलम में एक हिचकी की सरसराहट हवाओं में फैली और सांस की कड़ी जैसे टूट गई। वातावरण की ख़ामोशियों को तोड़ती हुई दो आत्माएँ एक दूजे के आलिंगन में बस गई। बस पिंजरे खाली हो गए, पंछी परवाज़ कर गए। सुबह की पहली किरण कमरे के दर-दरीचों से झांक कर अन्दर आई, ममतामयी माँ का शान्त चेहरा चूमकर चली गई, क्योंकि जीवन पर अब शाम हावी थी। दो तन एक दूसरे के आगोश में ऐसे समाए जैसे कभी वो परस्पर जुदा ही न हुए थे। इस अमर मिलन के मंज़र ने हर चश्म को तर कर दिया। शिशु माँ की छाती से लिपटा हुआ अपनी प्यास बुझाता रहा और सकीना-क़ैद में एक माँ, जिसे वह बच्चा अपने पिता ‘आलम’ के ज़ुल्मों की शहनशाही ज़ंजीरों की पनाह से मुक्त कराने के लिए मसीहा बनकर आया।
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यही सकीना जब सात साल की थी, उसकी माँ गुज़र गई, बाप माँ बन गया । यह सोए तो वह सोए, यह जागे तो वह भी जागे । पिता ने प्यार व तव्वजो से सींचा, फिर भी सकीना के मुरझाए मन की कली फूल न बन पाई । गुड्डे-गुड़ियों का खेल बाल मन को बहला न सका। सारी कायनात माँ बिना सूनी-सूनी-सी लगती थी। अपने अश्क छुपाने की कोशिश में उसकी ज़बान पर ताले लगते गए। उसकी सोचों पर पहरे लगे रहे, उलझे विचारों की ज़ंजीरों में वह जकड़ी रहती । सब कुछ होते हुए भी जाने क्यों वह ख़ुद को दरिद्रता की हीन भावना की दलदल में धंसता हुआ पाती।
जिन्दगी की सार्थकता के संदर्भ में एक साधक का कथन है – ‘हमारे असंख्य सुख हमें चाहे मनुष्यता की पहली सीढ़ी तक भी न पहुँचा सकें किन्तु हमारा एक बूँद आँसू भी जीवन को अधिक मधुर, अधिक उर्वर बनाए बिना नहीं गिर सकता ।’ अपने बच्चों की ख़ातिर आँधियों में एक टिमटिमाते दिये के समान उम्मीदो के नाम पर नाउम्मीदों से जूझते हुए माँ-बाप ज़िन्दगी की सारी चुनौतियाँ स्वीकार कर लेते हैं.
पिता ने माँ के स्नेह की पूर्ति करने की भरपूर कोशिश की, पर माँ न बन पाया। प्यार में कोई बंटवारा न हो इसलिए दूसरी शादी तक नहीं की । बावजूद इसके जो अभाव की दरारें सकीना के दिल पे उकरीं, उन्हें वक़्त भी न भर पाया । जैसे-जैसे वह बड़ी होती रही वैसे-वैसे उसे यह आभास होने लगा कि बिछड़ने की पीड़ा और मिलन की मिठास क्या होती है ? इन अहसासों को नारी मन बाँटना चाहता कोई और आँखों में बसे दर्द को टटोलता, अपने आंचल से उसकी नम आँखों को सोखता?
वह निश्चित रूप से यह जानती थी कि पिता के सिवा और कोई उसकी भलाई चाहने वाला नहीं। सारी जायदाद, ज़मीन, मकान तक गिरवी रखे हुए थे। शायद माँ की बीमारी ने पिता को कर्ज़ की तहों में दफ़्न कर दिया था। पर वह बेटी पर अपना प्यार निछावर करता रहा। कितनी रातें जागकर, कितने दिन कष्टों में गुज़ारकर उसने सकीना को बड़ा किया। जितना हो सका उसे पढ़ाया, लिखाया, पर अपनी टूटती हुई कश्ती को पार पहुँचाने में असमर्थ रहा। सकीना को पिता का प्यार मिला, इससे इन्कार नहीं। शबनमी सौंदर्य उसके चेहरे पर जगमगा रहा था, पर वह कली कैसी? जिसकी मुस्कान में महक न हो, जिसके आगे पीछे कोई भंवरा न मंडराए? जिसे अपने होने का अहसास ही न हो, अपनी क़िस्मत पर भी भरोसा न हो ?
बच्चा हो और माँ न हो, इस रिक्तता ने उसके हृदय के ख़ालीपन को कभी भरने ही नहीं दिया।
अठारह साल की दहलीज़ पार करते ही, सकीना के दिल का सुकुमार कमल दुनिया की फज़ाओं की चहल-पहल, अपने आसपास की रौनकों की गर्मी पाकर कुछ अंकुरित होने लगा । उस पर रंगत आनी अभी बाक़ी थी । अपने ही ख़यालों में डूबी वह रोज़ जहां समुद्र के किनारे सैर करने जाती, वहीं दूर खड़ा ‘आदम’ नाम का एक नौजवान हर रोज़ उसकी सुन्दरता को निहारता, रसपान करता, सराहता, और निहाल होता। एक दिन सकीना की नज़र ‘आदम’ की नज़र से टकराई । क़ुदरत का नियम अटूट है – समयानुसार धरती में बोए बीज भी पानी पाकर अंकुरित होते है, ऐसा ही एक नाज़ुक विस्फोट सकीना के दिल में हुआ। उसके दिल की धड़कन बढ़ी जब एक दिन उसके बहुत क़रीब आकर आदम ने कहा – ‘मुझसे शादी करोगी ?’
‘…………’
‘मुझे तुम्हारी हामी का इन्तज़ार रहेगा, ख़ुदा हा़फिज़…।’
दो किनारों के बीच का फ़ासला बना रहा। सकीना ने मन ही मन आदम के प्रस्ताव के दामन को अपनी चुनरी बना ली, जिसे ओढ़कर वह मन से जीवन की प्यार भरी फुलवारी में अपना पहला क़दम रख चुकी थी।
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क़ुदरत को भी जैसे कुछ और ही मंजूर था । ‘मन्सूर’ उसी शहर की दरगाह का मुजावर था, जिसका भतीजा ‘आलम’ शौक़ीन मिजाज़ और रंगीन तबीयत वाला था। मन्सूर के कर्ज़ों तले दबा सकीना का पिता अब कर्ज़ चुकाने में असमर्थ-सा हो गया था। दबाव के कारण तमाम जागीर, मकान नीलाम करने पर भी कर्ज़ का भुगतान नामुमकिन साबित हुआ। बचने की एक ही राह सामने खुली थी – वह थी सकीना !
एक दिन मौक़ा पाते ही मन्सूर ने अपना पहला तीर फेंका – ‘क्या सोच रहे हो मियाँ, इस बढ़ती उम्र में क्या अकेले ही कर्ज़ का… बेटी का… इतना सारा बोझ ढो पाओगे?’
‘नीलामी से अगर किसी तरह भरपाई होती है तो मैं उसके लिये तैयार हूँ ।’ सकीना के पिता ने जैसे रिहाई की दरख़्वास्त की!
‘सकीना की शादी अगर आलम से हो जाती है तो सब कुछ नीलाम होने से बच सकता है, दूसरी सूरत में नीलामी के पश्चात तुम दोनों बाप-बेटी को दर-दर की ठोकरें नसीब होंगी।’
बाप बेचारा ज़हर के प्याले पीता तो कितने ? ज़िंदगी की बाज़ी वह हार चुका था। दांव पर द्रोपदी की तरह उसके जिगर का टुकड़ा बेटी सकीना थी, जिसकी ख़ुशी के लिये उसने अपना घर नहीं बसाया। वह किस तरह उसे बेघर होते हुए देख सकता? पिता ने माँ बनकर जवाबदारी निभाने का प्रयास किया और अब सर पर लटकती तलवार से ख़ुद को बचाने की ख़ातिर सकीना भी उनसे विमुख नहीं हो सकी। सकीना ने ख़ुद को मंझधार में पाया। दो नौकाओं पर सवार होकर न तो वह ख़ुद पार पहुँच पाती और न ही पिता को डूबने के लिये किनारे पर अकेला छोड़ पाती।
दिल की निखरती कली ज़माने की गर्दिश की धूप में कुम्हलाने लगी । आदम उसके दिल की धड़कन था और आलम उसकी दुनिया का ख़रीदार। भगवान भी किसी को सौंदर्य की दौलत से मालामाल करता है तो किसी को पैसे की दौलत से मालामाल कर देता है। सकीना ने पिता की पाक मुहब्बत पर अपने दिल की धड़कन क़ुरबान कर दी।
शादी हो गई पर आबादी के आसार नज़र नहीं आए। आलम एक रंगीन मिज़ाज बांवरा भंवरा, पैसों की झनकार से सोए हुए ज़मीरों को जगा देता, या कभी नशे की मदहोशी में रक़्स करते लोगों को सुला देता। वक़्त पड़ते जब उसको बाप बनने का मौक़ा नहीं मिला तो वह सकीना पर अपने गुस्से के अंगारे बरसाने लगा, चाबुकों की मार से उसकी कोमल काया को लहूलुहान करता रहा। लेकिन सकीना की ज़बान पर जाने क्यों ख़ामोशी के पहरे रहे ? ख़ुद को बांझ कहलवाने से वह मौत को गले लगाना ज़्यादा पसंद करती। आलम की मार उसकी साँसों को तन से जुदा न कर सकीं, पर वह एक निराश, बेबस, बेपर पंछी की तरह बस कफ़स में सांसें लेती रही।
इसी दौरान उसका पिता भी इस फ़ानी दुनिया से कूच कर गया। मजबूरी के हर बन्धन से ख़ुद तो आज़ाद हो गया, पर सकीना के मन को क़ैद से रिहाई न दिला पाया। एकदिन आदम सकीना से मिलने आया और उसे दिलासा देता रहा।
‘सकीना तुम अपने आप को कभी अकेला मत समझना! कभी कोई ज़रूरत हो तो आवाज़ देना…!’ कहते हुए आदम ने अपनी नज़रें ज़मीन में गाड़ दीं।
सकीना अपने पिता के ग़म में वैसे ही बेहाल हुई जा रही थी, आदम के स्वर में अपनेपन के अहसास को महसूस करते, वह बहुत तड़पी, रोई । वह अपनी चौखट की मर्यादा की सीमा जानती थी, इसलिए उसने आदम से अपनी शादी-शुदा ज़िन्दगी में दख़ल न देने का वचन लिया। प्यार करने वाले मर मिटने का जज़्बा लिये फिरते हैं। आदम भी ऐसे ही एक परवाने की तरह जलता रहा, पिघलता रहा, पर अपने वचन की सीमाओं का उलंघन नहीं किया।
ज़िन्दगी में हादसे तो होते हैं, पर जो करिश्मे होते हैं वे भी अपने आप में बेमिसाल होते हैं। जो सकीना अपनी माँ की ममता के लिये पल-पल तरसी, अपने माँ न होने के ज़हर को निरन्तर पीती रही, वह ज़हर अमृत बना और उसके गर्भ में जीवन का नवअंकुर पलने लगा । वह बाँझ न थी, वह माँ थी !
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‘सकीना यह बच्चा मर चुका है, जिसकी अमानत थी, उसे मिल गई है ।’ मिली-जुली आवाज़ें उसे होश में लाने की नाकाम कोशिशें करती रहीं । शिशु को छाती से लगाए, अपनी ममता की छाँव में सोए बालक को जैसे लोरी सुनाते-सुनाते वह ख़ुद भी सो गई। परिंदा पैरों में पड़े रेशम के हर बंधन से आज़ाद हो गया, हर ग़ुलामी के बन्धन से मुक्त!
आलम ने पिता बनने की ख़ुशी में जो शादमाने और जश्ने-बहारों की महफिलें सजाईं, वे सब मातम में बदल गईं। ख़ुशियों का नक़ाब ओढ़े हुए ग़म की धारधार चोट से वह खुद को बचा न पाया। शायद हक़ीकतों से नाता टूटने का आभास रहा, उसे सब कुछ फ़ानी लगने लगा। उसकी रूह जैसे सकीना के तन के साथ उसकी क़ब्र में दफन हुई हो. आलम का वजूद पल पल अपने बेटे की याद का एक धधकता दरिया बनकर, खुश्क होंटों की अनबुझी प्यास लिये बहता रहा, निरंतर बहता रहा !
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देवी नागरानी जन्म: 1941 कराची, सिंध (तब भारत) , हिन्दी, सिंधी तथा अंग्रेज़ी में समान अधिकार लेखन, हिन्दी- सिंधी में परस्पर अनुवाद। 8 ग़ज़ल-व काव्य-संग्रह, एक अंग्रेज़ी काव्य-The Journey, 2 भजन-संग्रह, ४ कहानी संग्रह, २ हिंदी से सिंधी अनुदित कहानी संग्रह, 8 सिंधी से हिंदी अनुदित कहानी-संग्रह प्रकाशित। अत्तिया दाऊद, व् रूमी का सिंधी अनुवाद.(२०१६), श्री नरेन्द्र मोदी के काव्य संग्रह ‘आंख ये धन्य है का सिन्धी अनुवाद(२०१७) चौथी कूट (साहित्य अकादमी प्रकाशन), NJ, NY, OSLO, तमिलनाडू, कर्नाटक-धारवाड़, रायपुर, जोधपुर, महाराष्ट्र अकादमी, केरल, सागर व अन्य संस्थाओं से सम्मानित। साहित्य अकादमी / राष्ट्रीय सिंधी विकास परिषद से पुरुसकृत।
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