कविता आज और अभी/ लेखनी जनवरी-फरवरी 18

सुनो तो मन

रेत पर गीले ये पद चिन्ह
बनते ही मिट जाते
जीतते ही हार मान लेते
लहरों के इन्तजार में
बिखर जाते फिर फिर फेनिल
दिन महीने साल बने
नदी-सा बहता रहता निरंतर मन
कुछ यादें, उम्मीदें और चेहरे
साथ चलतीं कितनी यादें
कितनी पर बीच में ही डूब जातीं
अलविदा कहे बगैर ही
नए कुछ और आ जुड़ते
चलते संग-संग
जाना होगा हमें जिन्हे छोड़कर
समय पर सबको समेटे लपेटे
संगी-साथी सपनों सा
मुड़ मुड़कर टोहता
आस में जीता, जश्न मनाता
खोए बिछुड़े और पाए का
वादों और इरादों को दोहराता
बीत गया फिर एक और बरस
बूंद बंद जिया छककर पिया
हुलस हुलस तो कभी झुलस झुलस
आंसूभीनी स्मिति से विदा किया
और पल में ही विदा भी हो गया
एक ही लहर मिटा देती है सब
मन की दीवारों पर तस्बीरों सा सजा
पलकों में टिका खड़ा थमा ना रुका
स्वागत उस अनदेखे आगत का
सपनों की रंगोली से संकल्पों के हारों से
आहिस्ता आहिस्ता पर अतिथि अनजाने
सोए पड़े कितने सपने सुकुमार
तने तने लहलहाए जरूर
पर आज भी बेचैन बहुत
थके बहुत पर हार न मानें
नित नित प्रयत्नरत
जमने को, फलने को
प्रबल इस प्रवाह में
सुनो तो मन…

शैल अग्रवाल

 

 

“महानगर का बयान”

सारी ज़िम्मेदारी मेरी
सब सहना लाचारी मेरी
प्राण लुटाकर गाली खाना
बस इतनी सी पारी मेरी
फिर भी जब अवसर होगा सब गाँवों का गुणगान करेंगे
मैं तो महानगर हूँ मुझमें रहकर सब एहसान करेंगे

जब सुविधा की प्रसव पीर से गाँवो ने इनकार किया था
तब मैंने ही आगे बढ़कर ये दुखड़ा स्वीकार किया था
शुद्ध हवा ने साथ छोड़ने की जब मुझको धमकी दी थी
तब भी मैंने बस लोगों की सुविधा का सत्कार किया था
सुख से हुई बिगाड़ी मेरी
सुविधाओं से यारी मेरी
मुझको लगता था होएगी
मानवता आभारी मेरी
किन्तु गाँव की बिछड़ी यादों का निशदिन सम्मान करेंगे
मैं तो महानगर हूँ मुझमें रहकर सब एहसान करेंगे

बरसातों में कंकरीट की छत के नीचे जीने वाले
गर्मी में एसी कमरों में ठंडे शर्बत पीने वाले
सर्दी में ब्लोअर की ऊष्मा से सुख की चाहत करते हैं
तब क्यों याद नहीं आते हैं कच्चे छप्पर झीने वाले
नदिया कर दी खारी मेरी
धरती कर दी भारी मेरी
मुझे नष्ट करने वालों को
चुभती है अय्यारी मेरी
पक्की सड़कों पर दौड़ेंगे, पगडंडी पर मान करेंगे
मैं तो महानगर हूँ मुझमें रहकर सब एहसान करेंगे

मेरी निंदा के चर्चे हैं मानवता के अख़बारों में
मुझे बनाया है खलनायक सदा शब्द के व्यापारों में
पैसे की व्यवहारिकता को कविताओं में ख़ूब कोस कर
गाँव बेचने आता है सुख रोज़ाना इन बाज़ारों में
किसने छवि सुधारी मेरी
कब समझी दुश्वारी मेरी
भोलेपन की चालाकी को
खलती है हुशियारी मेरी
अंगूरों को खट्टा कहकर कुंठा का रसपान करेंगे
मैं तो महानगर हूँ मुझमें रहकर सब एहसान करेंगे
-चिराग जैन

 

 
विकास है

मान लो विकास है, सुधार है
नाम तो लेते मान-सम्मान तो देते
नेता जी तुम्हें महज कर्तव्यवश या
जाने किस किस बोझ तले ….
कभी-कभी तो बस इसलिए भी कि
चलन है इसका
अच्छा लगता है यह यू एन ओ
और यह एन जी ओ
व्यस्त कैसे कैसे भव्य आयोजनों में
खाए-अघाए ये लोग तुम्हारे नाम पर
नित नित की दावतें खाते
घर की दाल रोटी अब अच्छी नहीं लगती
किसी का जन्मदिन तो किसी का मरण दिन
सभी की सुध है इन्हें
सिवाय तुम्हारे और तुम्हारी समस्याओं के
आलू प्याज, और मिर्च मसाला ही नही
बहुत कुछ देखना और समझना पड़ता है
कभी नाम के लिए कभी महज स्वाद के लिए
जीने की लड़ाई तुम्हारी समस्या है
तीसरी दुनिया से यह अपरिचित हैं
रहना चाहते हैं
दुनिया भर की उत्तेजक खबरों सा
सेल में हर सामान मिलता है इनके यहाँ
जरूरत हो या न हो, बस लेते और देते रहो
खबरों में रहो , मुद्दे उछालो
सहमति या विरोध कोई फर्क नहीं पड़ता
यही प्रगति है यही संस्कृति है
विज्ञापन के इस युग में आदमी की जिन्दगी,
विज्ञापनों सी ही तो चलती है
पूरी सजधज और चमक लिए
विज्ञापन ही तो हैं सीधे
डेस्क से पेट तक जाते
मशीनी युग के ये सपने
भूखों के हाथ में बन्दूक दो और रोटी छीन लो
फोटो में चिपकी जबर्दस्त मुस्कुराहट ही
तुम्हे जीवित और यंत्रचलित रखेगी
फुरसत किसके पास है वरना
तुम तक आने के लिए
आत्मा को मार तन मन की भूख मिटाते
दौड़ते हांफते बेहाल लोग बेहाली पर
चन्द घड़ियाली आंसू रो भी आए तो क्या
बनावटी मुस्कान पहन बहला भी आए तो क्या
महज स्वार्थ और दिखावा ही सही,
मिलने जुलने का बहाना ही सही
आभार मानो झूठे सच्चे वादे तो किए,
वरना फुरसत किसके पास
गरीबी और भूख के लिए!
-शैल अग्रवाल

 

 

अभी अभी ज़रा दिखे हैं महराज

चिड़ियों की चहचहाहट में कैसी तो कातरता है
कायनात बचाने के लिए अपनी मुख्तसर उड़ानों में
क्या क्या उठा लें वे
कितनी गुहार क्यों न मगर
हम जो जिंदा रहने की जुटान में
सुखी सुखी
घटा रहे हैं जीव जगत के आसरे
खरच रहे हैं पृथ्वी और आकाश
पानी और हवा

हम ही होंगे शायद इसे ख़त्म कर देने वाले
हममें से कुछ
किसी और ग्रह पर जा बसेंगे
उसे भी समूचा खरच कर देने के लिए
-चंद्रकला त्रिपाठी

 

 

वो नन्हाँ सा हँसता खिलखिलाता फ़रिश्ता ,

ज़िन्दगी में खुशी की वो एक फ़ुआर,
खिलोनों के बीच में बेंठा ,बुनता एक निराली दुनिया,
बड़े लोगों- सी बातें बनाता , वो सबको हँसाता,
है कृष्णा का एक स्वरुप,
अपनी सारी डिमांड प्यार से रखता, हमें मनाता
कभी नए कपड़े , कभी नए जूतों से खुश होता
कभी माँगता चॉकलेट , तो कभी नए खिलोने,
नये वस्त्र धारण किये, लगता कृष्ण सा मनमोहक
घुटने चलता, हकलाता, डांस करता,
रखता सबका पूरा ख्याल,
प्यार और मासूमियत से भरा,
उस तोते में है मेरी जान,
जितना करू उसके लिए, लगता मुझे उतना ही कम,
जिन्दगी में बहुत कुछ सिखाता,
परेशानियों का हँसकर सामना करना,
“जिंदगी कितनी सुँदर है, जीना है पूरी तरह” -एहसास वही मुझको कराता
मेरी दुनिया में उजाला वो लाता,
भुल गयी मैं अपने सारे ग़म उसकी दुनिया में खोकर,
खुशकिस्मत है वो, जिसके घर में हो एक छोटा सा फ़रिश्ता

-ज्योति चौहान

 

 

आकाशबेल

हवा में झूलते पेड़ पर अब बेर नहीं लगते।
वही बेर जिनकी गंध और मिठास
हमें दूर से खींच लेती थी।
अधपके टूट जाते
तो हम उन्हें हंडिया में डाल कर
अनाज के टोकनों में छुपा आते।
माँ कहती – अनाज में बहुत गरमी होती है
अनाज इंसान को ही नहीं
फलों को भी मदमस्त कर देता है।
दो चार दिनों में ही बेर पक जाते और
हम मुहल्ले भर के लड़कों में
लाल हुए मीठे बेर बाँट देते
बच रहे हरे बेर लड़कियाँ छीन लेतीं।

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कभी किसी ने नहीं पूछा
इस बेर के पेड़ की जात क्या है।
कभी किसी ने नहीं जानना चाहा
बेर के पेड़ का धर्म।

बस हम धीरे धीरे भूल गए
बेर के पेड़ का होना।

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एक दिन कव्वा लेकर आया
कोई सुनहरी-सी बेल
और किसी माला की तरह
उसे पेड़ पर डाल गया।
जड़ें नहीं थी उस बेल की
फिर भी वह फैलने लगी तेज़ी से।

हमने देखा कि पेड़ धीरे धीरे
आकाशबेल की पूरी गिरफ्त में आ गया।

कुछ लोगों ने कहा
बेर के पेड़ का मुहल्ले में न रहना ही अच्छा है,
इस पर भूत रहते हैं।

अंग्रेज़ी स्कूलों में पढ़ कर
हम भी बेर की जगह
गमलों में चेरी ही उगाना चाहते थे।

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किसी ने कहा बेर का पेड़ हिंदू है
इसके फल शिवालय का पुजारी
शिव को अर्पित करता है।

हमने सोचा,
बेर के पेड़ की पक्षधरता
हमें प्रगतिशील नहीं रहने देगी।

हमें पेड़ लगाते वक्त
पीपल या वट वृक्ष से भी बचना चाहिए।
बेलपत्र और आँवला
यहाँ तक की नीम भी हिंदू पेड़ हैं
इनका ज़िक्र आयुर्वेद में होता है।
इन पेड़ों से प्रेम
हमारी राष्ट्रीय एकता को खत्म कर देगा।

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आकाशबेल पनपती जा रही है
और बेर का पेड़ धीरे धीरे सूख रहा है।
मन कहता है बचाना चाहिए एक हरा पेड़
पर इस पेड़ को बचाना
अमेरिका और इज़रायल की पक्षधरता होगी।

बेर अब नहीं लगते इस पर।
एक दिन पेड़ भी सूख जाएगा
और हमारे देश से
साम्प्रदायिकता पूरी तरह खत्म हो जाएगी।

हम फिर गंगा और यमुना के
मरुस्थल बने मैदान में
खजूर के पेड़ उगाएंगे!

-राजेश्वर वशिष्ठ

 

 

“हम आ गये हैं !”


हम आ गये हैं !
हताशाओं को तूँ अग्नि दे !
भय से कर ले शत्रुता
किनारे खड़ा विश्वास है
गाँठ बाँध अब,मित्रता

हम आ गये हैं !

हाथ में पतवार है
बीच तूँ मझधार है
गंतव्य तेरा दिख रहा
सम्मुख जो संसार है

हम आ गये हैं !

कूद जा ! इस आग में
भय न खा ! तूँ  आँच से
धैर्य रख,तप जा ! स्वयं
कुन्दन बना,जो राख से

हम आ गये हैं !

दूरदर्शी, जो हुआ
काल भी तूँ देखेगा
भयभीत होगी मृत्यु भी
जिंदगी को,सेंकेगा

हम आ गये हैं !

विचलित नहीं तू मार्ग से
चलता चला चल,सन्मार्ग पे
पवित्र होगी,आत्मा
अंततः, तूँ बोलेगा !

हम आ गये हैं !

धर्म नहीं ,ईश्वर नहीं
सत्य यही है जीवन का
प्रकृति है जो, पोषित करती
मातृत्व सा,इस उपवन का

हम आ गये हैं !

-ध्रुव सिंह “एकलव्य”