कविता आज और अभी/ दिसंबर जनवरी 2015

                                                                                                                          भयः कुछ कविताएँ
fear 15

 

 

मुझे इस धरती को पढ़ते डर लगता है

 

मुझे इस ठण्डी हवा से डर लगता है
मुझे इस भयावनी शांति से डर लगता है …
मुझे निज के अनंत कोलाहल से डर लगता है ।
मुझे मुर्दा लोगों के हँसने-गाने से डर लगता है
उनकी करूणा से डर लगता है
उनकी हमदर्दी से डर लगता है ।

दूधनाथ सिंह

 

 

 

सावधान

‘यह क्या हो गया है मुझे
कि हर वक़्त इतना सावधान
बोलने में लिखने में
खड़े होने और बैठने तक में
इतना डर कैसे चला आया’

-लीलाधर मंडलोई
 

 

 

 

 

डरता हूं अपने सन्‍नाटे से

 

मेरे बचपन में
राख हुई झोपड़ी का
नीला धुआं
अब तक फैला है
मेरे भीतर

 

मैं उस धरती पर बिखरे भय से
डरा हुआ हूं आज तक

-लीलाधर जगूड़ी

 

 

 

 

 

 

मैं रात लिखती हूँ
काली पड़ जाती हूँ
मैं दिन लिखती हूँ
झुलस जाती हूँ
मैं रास्ता लिखती हूँ
बियाबान हो जाती हूँ
मैं दहलीज लिखती हूँ
दरक जाती हूँ

आईना लिखते
टूट जातीं हूँ टुकड़ों में
फूल लिखते ही मैली हो जाती हूँ

तितली लिखते काँप जाती है
माँ की गोद
पंछी लिखते
पिता की नजर जमीन में धंस जाती है

प्यार लिखते सीमाओं जात बिरादरी में बाँट दी जाती हूँ

लडकी लिखते तुम्हारी आँख से
टपकते लार में सन जाती है मेरी देह

जलती चिता की कालिख से मैंने
अभी अभी तुम्हारे लिए
लानत नफरत घृणा
और सच कहूँ
तुम्हें बस “आदमी “लिखा

-शैलजा सक्सेना

 

 

 

 

 

 

 

इंटेलिजेंस फेलियर

 

कुछ और असुरक्षित होती है दुनिया
हर किसी के लिए
हर आतंकी हमले के बाद

चाहे जहाँ भी हुआ हो हमला
जिनकी भी जानें गयीं हों
हमें लगता है कि सोमालिया और उस जैसी जगहों में
होने वाले हमलों का मलबा
कभी नहीं पहुँचेगा
पहली और दूसरी दुनिया तक

उन्हें लगता है कि तेल की खाड़ी से
सारा तेल ले जाकर
वो करते रहेंगे
देशों का पुनर्निर्माण
साम्राज्यवादी तर्ज़ पर

और सबको लगता है
कि कभी नहीं पता चलेगा
ऐसी जगहों में आये दिन
फटने वाले बमों के निर्माताओं का नाम
पता, ठिकाना

दुनिया बँटी रहेगी
सुरक्षित और असुरक्षित खेमों में
इतने यातायात, परिवहन, भ्रमण
और भागमभाग के बीच
उड़ान और ढ़लान के बीच

कि किसी के पास नहीं होता
किसी का नाम
और कितने मेहमान होते हैं हम
दूसरे देशों के वायुयानों में उड़ते हुए
बिल्कुल अजनबी देश के वायुयानों में उड़ते हुए
जिनसे फ़ोन करके हमने पूछा होता है
कि उनके हवाई अड्डों से गुज़रने के लिए
हमें ट्रांज़िट वीज़ा तो दरकार नहीं

कि रोज़ बदल रहे हैं
आने और जाने के नियम
और हमारा पुराना शासक
फिर से बना रहा है पैसे
बना कर ढेर सारे कायदे, क़ानून
और किनकी क्या नाराज़गियाँ हैं
जो पहुँचती नहीं
अंतर राष्ट्रीय वार्ताओं के टेबलों तक

वो जो एक घना सा जाल है
हवा में
अंतर राष्ट्रीय संपर्क और सहयोग का
क्यों टूटा है वह इस बीच बार बार

और कुछ अजीब सा है
ज़मीन पर चलने वाली गोलिओं में भी
जैसे पहचान कर मारे गए हों अजनबी
और जबकि हो रही है तहक़ीक़ात
फूलों से लदे
बंद वातानुकूलित कमरों में

क्या कर रही है
जनता भी
बनाये रखने को
एक दूसरे के जीवन की शांति…………….

-पंखुरी सिन्हा

 

 

 

 

 

कितने भय

 

भय उसकी आँखों में था
अभी दूध पीते लाल को नहला-धुलाकर
काजल का जिसने टोना लगाया है

 

भय उसका भी है
भूल तो नहीं जाओगे मुझे
बारबार प्रियतम को जो याद दिलाती है

 

अशुभ के भय में जीती
पति के सकुशल दफ्तर पहुँचने पर
फोन का जो वादा ले आती है

 

कामना, संभावना, दवा-उपचार
पूजा पाठ, जादू टोना
आक्रंमण या पलायन
पर भागें कैसे

विज्ञापन की भीड़ में खोए
जुटते जाते भांति भांति के बाजार
कसता  ही जाता है मकड़जाल

 

भय बेचने का नया तरीका
भय जीने का नया तरीका-
दौड़ में पीछे ना रह जाएँ हम…

 

 

पुनः पुनः

बाज के पंजे में चिड़िया
चिड़िया की चोंच में चींटी
चींटी के बिल में मिलते हमें
चिड़िया के चन्द अवशेष
जीवन बस एक चक्र

पुनः पुनः वही
अपनी-अपनी उड़ान
और अपने अपने भय…

 

 

 

 

 

इतना भय क्यों प्यार में

 

साये सा रहता है साथ जो
हर धड़कन हर चितवन में
रोते नयन उसके जाते ही
और आंसू छलक आते
हंसते कोरों पर
बिछुड़ने के भय में
मिलने पर…

 

 

 

भय का युग है ये

 

बंदूक की नोक पर
काट लिया है
आखिरी पेड़
और भून ली है
आखिरी मछली
बूंद-बूंद जल को तरसती
मरेगी अब बूढ़ी पृथ्वी
चांद पर मंगल पर
बृहस्पति या बुध पर
कौनसे गृह पर जाकर
बसेंगे फिर हम…

 

 

 

 

वह भूखा था

 

रोटी के लिए लड़ा
तो भरे पेट वालों ने
रोटी नहीं, गोली दी

एक और तीली लगाई
ताकि बुझे ना निर्मम
धधकती पेट की आग
और और और जलें
राम रहीम व जैकब

एक दूसरे को मारें
भूने खाएँ…
ताकि बिकते रहें
उनके हथियार

हर लड़ाई बस
भय की ही तो
शह और मात है।
 

 

 

औरत मांस का लोथड़ा

 

नुचने और खाने को
फेंक दी जाती

अनावश्यक, अनचाहा जो
फेंक ही देते हैं लोग
कुत्ते के आगे या
कूड़े के ढेर पर…

 

 

 

इक्कीसवीं सदी के भय

पैसा पैसा और पैसा
सबसे ज्यादा मेरे ही पास
ताकत का अनैतिक विस्तार
सारे सुख और भोग-संभोग

टुन्न है आदमी
पीकर स्वार्थ की शराब

नाचे भस्मासुर रंगीन
अपने ही सिर पर रखे हाथ
पर कितना आतुर
कितना विह्वल…

-शैल अग्रवाल

 

 

 

कशमकश

यह कशमकश हैं कैसी
यह उलझन हैं क्यों अनसुलझी
अनचाहा डर हैं
उदासी और खामोशियों
का सफर हैं
गुम हो गया कुछ
छूट गया हैं सचमुच
कैसी है ये जिंदगानी
जहां रहा न कोई मनमानी

रौशनी में भी हैं अँधेरा
कालिमा लेकर आये सवेरा
रुकावटों का है तानाबाना
गमो का है शामियाना

आँखों में आंसू , चेहरे पर बेबसी

साफ़ नज़र आती है
कैसे कहूँ अब दिल की बात
वक़्त ये बेचैनी सताती है
सब बदल रहा है
अपनों से दूर हो रहा है
गुमनाम जिंदगी में खुद की पहचान ढूंढ  रहा है
हर मोड़, हर राह पर
उम्मीद का टूटना दिख रहा है
कहते है ईश्वर के घर
देर है अंधेर नहीं
पर लगता है मुझे ऐसा
ईश्वर के घर
देर के बाद कुछ है ही नहीं।
दर्द

खुद की कुचलन के दर्द की  तड़पन को

हर माँबेटीबहनअपने भीतर महसूस करती

अपने अस्तिव को बचाने के लिए पल-पल

अंदर ही अंदर जलती

आक्रोश हैंगुस्सा हैंनफरत

वह बुझाये केसे 

डर समाए हुए हैं खौफ समाये हुए हैं

कब किसी इन्सान रूपी राक्षस  

से सामना हो जाये

कब हमें नौच डाले ?

बदनाम होने का डर

मन चाहता हैं बहुत कुछ
पर डरता क्यों हैं ?
बदनाम तो हर वो आदमी हैं
जो
आज उचाईयों पर हैं
फिर
घबराता क्यों हैं ?
समाज एक से नहीं
कई व्यक्ति व समूह  से बना हैं ।
सबका अपना – अपना नजरिया हैं ।
सबकी अपनी -अपनी सोच हैं ।
फिर क्या हैं बदनाम
और
क्यों हैं बदनाम, यह कौन तय करेगा ?
इसकी परिभाषा ही अपरिभाषित हैं ।
सुमन कुमारी
मकान न.246,गली न.9
ब्लाक-एफ, मोलड़बंद,बदरपुर
नई दिल्ली -110044
मो.9968362721

 

 

कुत्तिया

 

एक कुत्तिया
बड़े-बड़े थन लटकाये
घुसती पुंछ को
पावों में दबाये
वहाँ-जहां
पहले से ही तीन पिल्ले
अपनी माँ को चाट रहे है

माँ अपने सूखे थन
पर काटना बरदाश्त नहीं कर पाती
वह उठकर भागती है
बच्चे गुडककर इधर-उधर गिर जाते हैं
दोनों कुत्तियाँ एक-दूसरे को देखती हैं
दोनों की आखों में
दर्द है, भूख है
और है कुछ लाचारी

कोई नहीं भोंकता
कोई नहीं लड़ता
शायद बेबसी है
जीने की
जीते रहने की
लड़ने की
लड़ते रहने की
अपने ही आप से
इस जीवन से

 

 

 

 

 

गुरु

कैसा था तुम्हारा प्रवचन
कि पड़ौसी इकबाल
अब दुश्मन लगता है
कैसा था वह ज्ञान
कि दूसरा धर्म
अब अधर्म लगता है
क्या था वह आशीर्वाद कि
मेरे भगवान की जगह
तुम्हारी तस्वीर ने लेली
तुमने मेरी आस्था बदली
दोस्त बदले, भगवान बदले
और तुम अब एक इंद्रिय
सुख से हार कर
कालिख पोते बैठे हो

 

-अमिताभ विक्रम द्विवेदी

E-mail IDs: amitabhvikram@yahoo.co.in

असिस्टेंट प्रौफेसर ( भाषा विज्ञान और साहित्य विभाग, माता वैष्णव देवी विश्विद्यालय,

कटरा  जम्मू कश्मीर)

 

 

 

जो काल्पनिक कहानी नहीं है की कथा

 

किंतु यह किसी काल्पनिक कहानी की कथा नहीं थी
कथा में मेमनों की खाल में भेड़िये थे

उपदेशकों के चोलों में अपराधी थे
दिखाई देने के पीछे छिपी
उनकी काली मुस्कुराहटें थीं

सुनाई देने से दूर
उनकी बदबूदार गुर्राहटें थीं

 

इसके बाद जो कथा थी, वह असल में केवल व्यथा थी
इस में दुर्दांत हत्यारे थे, मुखौटे थे,
छल-कपट था और पीड़ित बेचारे थे
जालसाज़ियाँ थीं, मक्कारियाँ थीं,
दोगलापन था, अत्याचार था
और अपराध करके साफ़ बच निकलने का
सफल जुगाड़ था

 

इसके बाद कुछ निंदा-प्रस्ताव थे,
मानव-श्रृंखलाएँ थीं, मौन-व्रत था
और मोमबत्तियाँ जला कर
किए गए विरोध-प्रदर्शन थे

लेकिन यह सब बेहद श्लथ था
कहानी के कथानक से
मूल्य और आदर्श ग़ायब थे

कहीं-कहीं विस्मय-बोधक चिह्न
और बाक़ी जगहों पर
अनगिनत प्रश्न-वाचक चिह्न थे

 

पात्र थे जिनके चेहरे ग़ायब थे
पोशाकें थीं जो असलियत को छिपाती थीं
यह जो ‘ काल्पनिक कहानी नहीं थी ‘
इसके अंत में
सब कुछ ठीक हो जाने का
एक विराट् भ्रम था

यही इस समूची कथा को
वह निरर्थक अर्थ देता था
जो इस युग का अपार श्रम था

कथा में एक भ्रष्ट से समय की
भयावह गूँज थी
जो इसे समकालीन बनाती थी
जो भी इस डरावनी गूँज को सुन कर
अपने कान बंद करने की कोशिश करता था

वही पत्थर बन जाता था …

 

 

 

 

 

कुछ समुदाय हुआ करते हैं

 

कुछ समुदाय हुआ करते हैं
जिनमें जब भी कोई बोलता है
‘ हक़ ‘ से मिलता-जुलता कोई शब्द
उसकी ज़ुबान काट ली जाती है

जिनमें जब भी कोई अपने अधिकार माँगने
उठ खड़ा होता है
उसे ज़िंदा जला दिया जाता है

कुछ समुदाय हुआ करते हैं
जिनके श्रम के नमक से
स्वादिष्ट बनता है औरों का जीवन

किंतु जिनके हिस्से की मलाई
खा जाते हैं
कुल और वर्ण की श्रेष्ठता के स्वयंभू ठेकेदार
कुछ अभिजात्य वर्ग

सबसे बदहाल, सबसे ग़रीब
सबसे अनपढ़ , सबसे अधिक लुटे-पिटे
करोड़ों लोगों वाले कुछ समुदाय हुआ करते हैं

जिन्हें भूखे-नंगे रखने की साज़िश में
लगी रहती है एक पूरी व्यवस्था

वे समुदाय
जिनमें जन्म लेते हैं
बाबा साहेब अंबेडकर महात्मा फुले
और असंख्य महापुरुष

किंतु फिर भी जिनमें जन्म लेने वाले
करोड़ों लोग अभिशप्त होते हैं
अपने समय के खैरलाँजी या मिर्चपुर की
बलि चढ़ जाने को

वे समुदाय
जो दफ़्न हैं
शॉपिंग मॉल्स और मंदिरों की नींवों में

जो सबसे क़रीब होते हैं मिट्टी के
जिनकी देह और आत्मा से आती है
यहाँ के मूल बाशिंदे होने की महक

जिनके श्रम को कभी पुल, कभी नाव-सा
इस्तेमाल करती रहती है
एक कृतध्न व्यवस्था

किंतु जिन्हें दूसरे दर्ज़े का नागरिक
बना कर रखने के षड्यंत्र में
लिप्त रहता है पूरा समाज

आँसू, ख़ून और पसीने से सने
वे समुदाय माँगते हैं
अपने अँधेरे समय से
अपने हिस्से की धूप
अपने हिस्से की हवा
अपने हिस्से का आकाश
अपने हिस्से का पानी

किंतु उन एकलव्यों के
काट लिए जाते हैं अंगूठे
धूर्त द्रोणाचार्यों के द्वारा

वे समुदाय
जिनके युवकों को
यदि हो जाता है प्रेम
समुदाय के बाहर की युवतियों से
तो सभ्यता और संस्कृति का दंभ भरने वाली
असभ्य सामंती महापंचायतों के मठाधीश

उन्हें दे देते हैं मृत्यु-दंड

वे समुदाय
जिन से छीन लिए जाते हैं
उनके जंगल, उनकी नदियाँ , उनके पहाड़
जिनके अधिकारों को रौंदता चला जाता है
कुल-शील-वर्ण के ठेकेदारों का
तेज़ाबी आर्तनाद

वे समुदाय
जो होते हैं अपने ही देश के भूगोल में विस्थापित
अपने ही देश के इतिहास से बेदख़ल
अपने ही देश के वर्तमान में निषिद्ध

किंतु टूटती उल्काओं की मद्धिम रोशनी में
जो फिर भी देखते हैं सपने
विकल मन और उत्पीड़ित तन के बावजूद

जिन की उपेक्षित मिट्टी में से भी
निरंतर उगते रहते हैं सूरजमुखी

सुनो द्रोणाचार्यो
हालाँकि तुम विजेता हो
अभी सभी मठों पर तैनात हैं तुम्हारे खूँख्वार भेड़िए
लेकिन उस अपराजेय इच्छा-शक्ति का
दमन नहीं कर सकोगे तुम
जो इन समुदायों की पूँजी रही है

सदियों से जहाँ जन्म लेने वाले
हर बच्चे की आनुवंशिकी में दर्ज है
अन्याय और शोषण के विरुद्ध
प्रतिरोध की ताक़त

-सुशांत सुप्रिय

 

 

 

 

मैं दंगाई नहीं

मैं आज तक नहीं गया किसी मस्जिद तक
किसी मंदिर के अन्दर क्या है मैंने नहीं देखा,
सुनो रुको
मुझे गोली न मारो
भाई तुम्हे तुम्हारे मजहब का वास्ता

मत तराशो अपने चाक़ू मेरे सीने पर,
जाने दो मुझे
मुझे तरकारियाँ ले जानी हैं
माँ रोटिया बेल रही होंगी!

-अमित आनंद

 

 

 

कल के अखबारों के लिए

आख़िरी दिसंबर की इस सर्द रात
अपने कमरे में जब मैं तलाश रहा हूं
अपनी नींद के लिए एक सुरंग
कमरे के बाहर
पसर चुका होगा कुहासा
गांव की सड़कों पर

खुले आकाश के नीचे सोए
किसी आदमी के स्वप्न में अबतक
आ चुकी होगी एक गरम रजाई
किसी भूखे बच्चे की नींद में
पके भात की खुशबू से
महक रहा होगा घर-आंगन
किसी बूढ़े की बुझी आंखों में
उभर रहा होगा अगली फसल
और पिछले कर्ज़ के बीच से
जवान बेटी की ससुराल का रास्ता

मेरे पड़ोस की बूढी रशीदन
अब तक रो चुकी होगी
पिछले दंगे में मारे गए
अपने जवान बेटे के लिए
नशे में धुत्त किसी ग्राहक के आगे
आहिस्ता-आहिस्ता
कपड़े उतार रही होगी मुन्नीबाई
औलाद के लिए परवतिया डायन
जला आई होगी दीया
गांव के भुतहा कुएं के पास

मंदिर में
भगवान को बंद कर सुरक्षित
घर लौट गए होंगे
भोला पंडित

लिखी जा रही होंगी कहीं कविताएं
बन रही होगी कहीं बारूदी सुरंग
मादक संगीत पर कहीं
थिरक रहे होंगे जवान ज़िस्म
हो रहा होगा किसी लड़की का
सामूहिक बलात्कार
आतंकवादी हत्याएं कर रहे होंगे
कश्मीर के किसी दूरदराज़ गांव में
किसी दंगाग्रस्त शहर में
सुरक्षाबलों ने संभाल लिए होंगे मोर्चें

इस वक़्त तक मेरी प्रेमिका
अपने पति को चूमकर
करवट बदल चुकी होगी

आधी रात की इस निस्तब्धता में
मेरे उलझे ख़्यालों के साथ
मेरे कमरे में एक चिड़िया है
झरोखे में फड़फड़ाती है पंख
जैसे टाइप कर रही है
उदास मौसम के खिलाफ़
अपना संक्षिप्त वक्तव्य
कल के अखबारों के लिए !

– ध्रुव गुप्त

 

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