लघुकथाएँः आलोक कुमार सातपुते

भयदोहन

एक दिन मैं एक अनजाने भय से ग्रस्त हो गया, और अपने निकटतम मित्र से अपने भयग्रस्त होने की बात कही । उसने मुझे लताड़ा-तुम्हारे जैसे नास्तिकों का यही हश्र होता है । फिर उसने मुझ पर तरस खाते हुए मुझे ईश्वर की शरण में जाने की सलाह दी । मेरे यह पूछे जाने पर कि मुझे ईश्वर कहाँ मिलेगा, उसने मुझे ईश्वर के विभिन्न ब्राण्ड्स के बारे में बताया। उसके बताये अनुसार सबसे पहले मैं मंदिर पहुँचा, वहाँ मुझे नर्क का भय दिखाया गया। मैं और भयभीत होकर वहाँ से चर्च पहुँचा, वहाँ मुझे शैतान का भय दिखाया गया। मैं और ज़्यादा भयभीत होकर मस्ज़िद पहुँचा, वहाँ मुझे आतंक के सहारे जे़हाद करने की सलाह दी गयी। अंत में बहुत ही ज़्यादा भयभीत होकर मैं मनः-चिकित्सक के पास पहुँचा ।
…आज मैं पूर्णतः भयमुक्त हूँ । मैंने ईश्वर के विभिन्न ब्राण्ड्स से तौबा कर ली है ।

औरतें

हम हिन्दू उदार प्रवृत्ति के व सहनशील होते हैं, इसीलिए तो इतने आक्रमणों के बाद भी हमारा धर्म व हमारी संस्कृति जीवित है।”

” हम मुसलमान अपने धर्म की रक्षा के लिए जान भी लड़ा देते हैं। हम एक-एक दस-दस के बराबर होते हैं, इसी कारण से तो हम इतने व्यापक हैं।”

” हम सिक्ख हैं। हमारी उत्पत्ति ही मुस्लिम संस्कृति से हिन्दू संस्कृति की रक्षा हेतु हुई है। लेकिन हाँ, हम हिन्दू नहीं हैं। हमारी बहादुरी तो जगजाहिर है।”

” हम ईसाई बुद्धिमान होते हैं। हम दलितों को अपने धर्म में मिलाकर उन्हें स्वाभिमान से जीना सिखाते हैं। हमने अपनी बुद्धि के सहारे सारी दुनिया पर राज किया है।”

” हम क्या बोलें…? बस इतना ही कि हम औरते हैं।”

पाप
मध्यरात्रि एक ट्रक ड्राइवर स्पीड से ट्रक चला रहा था। नज़दीक किनारे बायीं ओर उसे एक सायकल सवार जाता हुआ दिखा । अचानक उसके समक्ष एक गाय आ गयी। उसने गाय को बचाने के लिऐ अपनी बायीं ओर कट मारा। सायकल सवार अब ट्रक की चपेट में आ गया। ट्रक ड्राइवर ने मन ही मन ईश्वर को धन्यवाद दिया कि आज वह गो-हत्या के पाप से बच गया।

योग्यता
‘‘सर मैं वरिष्ठ पत्रकार श्री जे.के. सिंग का भाई हूँ। उन्होंने मुझे आपके पास कलाकार के रिक्त पद के सिलसिले में भेजा है।

सर मैं कला के सभी क्षेत्रो में दखल रखता हूँ। सर ये कुछ बड़ी साहित्यिक पत्रिकाओं के अंक हैं, जिनमें मेरी रचनाएँ छपी हैं। सर ये फोटो-ग्राफी का डिप्लोमा और उससे सम्बन्धित पुरस्कार और सर ये रही मेरी संगीत विशारद की डिग्री और सर ये मेरी मूर्तिकला के नमूने और सर ये…’’

‘देखो मिस्टर तुम्हारे इस ताम-झाम से हमें कोई मतलब नहीं है। तुम्हारी सबसे बड़ी योग्यता यह हैं कि तुम उस वरिष्ठ पत्रकार जे.के. सिग के भाई हो, जिसके पास हमारी कई सारी पोल हैं। तुम अपना आवेदन दो और निकल लो।’

सेवकपुर
उसे देश में राजशाही की परम्परा थी, और राजा बड़ा ही अलोकप्रिय हो चला था। आस-पास के दूसरे देशों में लोकतंत्र की बयार बह रही थी। उस देश के लोग भी अपने यहां लोकतंत्र लागू करवाना चाह रहे थे, और इस हेतु क्रान्ति के लिये माहौल बनाने में जुटे हुए थे। परेशान राजा ने राजगुरू से सलाह ली। राजगुरू की सलाह पर राजा ने खुद को प्रजा का सेवक घोषित कर दिया। राजदरबारी अब शासकीय सेवक हो गये। कुछ समाजसेवक तो पहले ही थे । अब एन.जी.ओ. भी समाज की सेवा की दुकान लगाने लगे । और तो और, प्रजा का खून चूसने वाले व्यापारी भी खुद को सेवक कहने लगे। आम जनता में भी कई तरह के सेवक पैदा हो गये। राज्य में जो जितना अधिक सम्पन्न था वो उतना ही बड़ा सेवक माना जाने लगा। इस तरह उस राज्य में लोकतंत्रात्मक राजशाही कायम हो गयी, और जन-भावना के मद्देनजर उस देश का नाम सेवकपुर रख दिया गया।

संवेदना
मोटर-सायकल से गुजरते हुए एक जगह लगी भीड़ को देखकर वह रूक गया । उसने एक लड़के से पूछा, तो पता चला कि पास के स्कूल की एक लूना सवार महिला शिक्षिका को ट्रक ने ठोकर मारकर मौत की नींद सुला दिया है। वह अन्दर तक काँप गया। उसकी पत्नी भी वहीं पास के स्कूल में शिक्षिका थी और लूना से ही आती-जाती थी। वह आशंकित होकर धड़कते दिल से भीड़ को चीरते हुए पहुँचा। उसकी नजर लाश पर पड़ी। लाश किसी दूसरी महिला की थी। उसने चैन की साँस ली, और फिर अपनी गाड़ी स्टार्ट कर सीटी बजाता हुआ अपने घर आ गया।

मूल्यांकन

” जी लड़का तो वैसे एक छोटी सी नौकरी में है पर है बड़ा प्रतिभावान। कला के सभी क्षेत्रों तथा मूर्तिशिल्प, रेखाचित्र, छायाचित्र, साहित्य व संगीत में पारंगत है वह…।” एक रिश्ता सुझाते हुए मध्यस्थ ने लड़की के पिता से कहा।

” अच्छा अपनी इन कथित कलाओं से वह कितना कमा लेता है ? ” लड़की के पिता ने प्रश्न किया।

” जी उसने कला को कला ही रहने दिया है…पेशे के तौर पर नहीं अपनाया है। चूँकि ये सब उसके शौक मात्र हैं अतः वह इन कलाओं से कुछ भी उपार्जित नहीं करता है।” मध्यस्थ ने जवाब दिया।

” तो काहे का कलाकार है। ऐसी कलाओं को पालने का क्या औचित्य है जिसमें धनोपार्जन न हो… मेरा तो ये मानना है कि धनोपार्जन ही वस्तुतः कला है, बाकी सब बेकार की बातें हैं।”

” मैं अपनी पुत्री का ब्याह ऐसी जगह नहीं कर सकता।” लड़की के पिता ने सपाट उत्तर दिया।

धर्मांतरण का राज

उसने उस भूखे व्यक्ति को भरपेट भोजन कराया, और उसके बाद सामान्य औपचारिकता के नाते यूँ ही पूछ लिया- भाई तुम्हारा नाम क्या है? तुम किस ईश्वर को मानते हो? तुम्हारा धर्म क्या है? इस पर उस व्यक्ति का जवाब था-आज से तुम मुझे जो नाम दोगे वही मेरा नाम होगा। मेरे ईश्वर तुम हो…सिर्फ तुम, और तुम्हारा धर्म ही मेरा धर्म है।

…अब उसे धर्मान्तरण का राज समझ में आ गया।

चढ़ावा

एक जीर्ण-शीर्ण मंदिर से चोरी हुई प्रतिमा संयोगवश पुलिस ने बरामद कर ली। थाने में प्रतिमा लोगों के दर्शनार्थ रख दी गईं। खूब रुपये-पैसे का चढ़ावा चढ़ने लगा। थानेदार समेत सारा स्टाफ भक्तिभाव से पूर्ण हो गया। थानेदार ने देखा कि इस चढ़ावे में तो ऊपर के किसी भी अधिकारी को कुछ देना नहीं पड़ता है। वह रोज उस प्रतिमा से प्रार्थना करता कि प्रभु आप स्थाई तौर पर यहीं थाने में विराजमान हो जाइये। उधर प्रतिमा ने भी सोचा कि वहाँ जीर्ण-शीर्ण मंदिर में तो कोई पूछ-परख नहीं थी। यहाँ तो भक्तों की भरमार है, सो एक दिन थानेदार के प्रार्थना करने पर प्रतिमा ने ‘तथास्तु’ कहकर एक फूल उसके हाथ में दे दिया।
कुछ दिनों बाद वहाँ थानेदार भगवान का मन्दिर बन गया।
अब दोनों खुश हैं।

फ्यूजन

कई हजार वर्ष पहले भारतीय वनों में सभी बंदर मिल-जुलकर रहते थे। उनमें कोई छोटा या बड़ा नहीं था, सब बराबर थे। अपराधी प्रवृत्ति के बंदरों को तड़ीपार कर दिया जाता था। तड़ीपार किये गये बंदर, दूर एक लोकतांत्रिक व्यवस्था वाले देश में शरण पा जाते थे।

एक बार तड़ीपार किये गये बंदरों का एक झुंड वापस आया, सभी ने टोपी लगा रखी थी। वे बड़े ही आकर्षक लग रहे थे। उन्होंने लोकतांत्रिक व्यवस्था का ऐसा चित्र खींचा कि भारतीय बनों के बंदरों ने वर्तमान व्यवस्था को नकार कर लोकतांत्रिक व्यवस्था की माँग की, इस बीच अचानक डार्विन का विकासवाद का सिद्धांत आ गया। बंदर आदमी के रूप में आ गये। टोपीधारी बंदर टोपीधारी आदमी बन गये जो आज तक लोकतंत्र के ठेकेदार बने बैठे हैं।

पागल
अपने शहर में मैं यों तो बहुत से पागलों को घूमते हुए देखता रहा हूं, लेकिन मुझे दो पागलों ने विशेष रूप से आकर्षित किया। उसमें से एक भोला नाम का पागल था। वह हमेशा कॉपी-पुस्तकें और पेन बगल में दबाये घूमता रहता था। उसके बारे में सभी जानते थे कि वह पढ़ाई में बेहद होशियार था,और पढ़ते-पढ़ते ही पागल गया था। वह उस दौर में इंजीनियरिंग का छात्र था, जब इंजीनियर सबसे प्रतिष्ठित पद माना जाता था। भोला के अलावा एक वासु नाम का पागल का किस्सा बड़ा इंटस्ट्रेटिंग था। उसका एक दोस्त दांतों का डॉक्टर था। एक बार वासु के दांतों में तकलीफ हुई तो वह अपने वह अपने उसी लंगोटिया दोस्त, जिस पर वह सबसे ज्यादह भरोसा करता था, के पास दांत उखड़वाने पहुंचा। उसके दोस्त ने कहा कि दांत उखाड़ने पड़ेंगे। उस डॉक्टर के पास एनीस्थिसिया खत्म हो गया था, लेकिन उसने अपने पास एनीस्थिसिया खत्म हो जाने की बात न बताते हुए कहा कि एनीस्थिसिया के बहुत सारे साईड इफेक्ट्स होते हैं, इसलिये मैं उसके बिना ही तेरा दांत उखाड़ता हूं। तुझे थोड़ी तकलीफ तो होगी, लेकिन तू एनीस्थिसिया के साईड इफेक्ट्स से बच जायेगा। इसके अलावा तेरी सहन-शीलता की भी परीक्षा हो जायेगी। अपने यार की बातों में आकर उसने हामी भर दी और दांत उखाड़ने के दौरान हुए असहनीय दर्द से उसके दिमाग में केमिकल लोचा आ गया और वह पागल हो गया। तब से वह जिसे भी देखता है कहता है कि तूझे थोड़ी तकलीफ़ तो होगी, पर मैं तेरा दांत उखाड़ दूंगा।

आलोक कुमार सातपुते
जन्म – 26/11/1969
शिक्षा- एम.काॅम.
प्रकाषित रचनाएंॅ-दैनिक भास्कर ,राजस्थान पत्रिका ,अमर उजाला, राष्टीय सहारा, दैनिक जागरण, नवभारत, देषबन्धु, हरिभूमि, आदि लोकप्रिय समाचार-पत्रों में रचनाओं का प्रकाषन ।
साहित्यक पत्रिकाओं में- हंस , वागर्थ कथादेष ,नया ज्ञानोदय, आम आदमी , कथाक्रम, पाखी, पुनर्नवा, कादम्बिनी , वर्तमान साहित्य, कथाबिम्ब ,संवेद , अपेक्षा,, समरलोक ,आदि आन्दोलित करने वाली पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाषन ।

संग्रह का प्रकाषन- षिल्पायन समूह के नवचेतन प्रकाषन,से लघुकथा संग्रह अपने-अपने तालिबान का प्रकाषन।
2 Samayik Prakashan-Vetal Fir Dal Par
3 Diamond Books-
Mohara
छायाचित्रों/रेखाचित्रों का पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाषन

अनुवाद – English उड़िया ,उर्दू एवम् मराठी भाषा में रचनाओं का अनुवाद एवं प्रकाशन ।