लघुकथाएँः प्राण शर्मा, विजय कुमार सप्पत्ति


गरमाहट
सर्दी का प्रकोप था। बूढ़े शरीर को ठण्ड कुछ ज़्यादा ही लगती है। 75 वर्षीया सीता देवी भी ठण्ड के मारे कांप रही थी और रिजाई में दुबकी पड़ी थी।
रिजाई में ही मुँह ढके – ढके वह ठिठुरती आवाज़ में बेटे से बोली – ” एक और रिजाई मुझ पर डाल दे और और गर्म पानी की बोतल भी लेता आना। शरीर
ठण्डाठार है। ”
इतने में बेटा बोला – ” अम्मा , देखिये कौन आया है ? ”
” कौन आया है ? ”
” आप रिजाई हटा कर ख़ुद ही देखिये। ”
” बता न कौन आया है ? ठण्डीठार हूँ। ”
” आपका पोता सिंगापूर से लौट आया है। ”
अम्मा ने तुरंत रिजाई हटा कर देखा। सामने पोता ही था। उसने झट रिजाई को परे फेंक दिया और फुर्ती से उठ कर पोते को अपनी बाँहों में भर लिया।
अम्मा की सारी ठण्ड काफ़ूर हो चुकी थी।


फ्रेडरिक भारत यात्रा पर था। जयपुर , प्रयागराज , मथुरा , आगरा इत्यादि नगरों को देखता हुआ वह बड़ी उमंग के साथ भारत की राजधानी दिल्ली पहुँचा। चाँदनी चौक में उस को हज़ारों व्यक्तियों का हजूम आता हुआ नज़र आया। सभी के हाथों में बैनर थे। सभी एक स्वर में गरज रहे थे – ` नहीं चलेगी , नहीं चलेगी , नहीं चलेगी अफसरशाही। ` देखते ही देखते हजूम ने उपद्रव करना शुरू कर दिया। किन्हीं ने अन्यों की कारें जलायी , किन्हीं ने दुकानें और किन्हीं ने अफसरों के पुतले जलाये। – ` फ्रेडरिक ने हैरानी में अपने गाइड से पूछा – ` ये क्या माजरा है ? ` गाइड ने बताया – ` हज़ूर , एक कर्मचारी को फैक्टरी से निकाले जाने के विरोध में ये लोग प्रदर्शन कर रहे हैं। ` ` पब्लिक का नुक्सान कर के ? ` ` जी। ` ` बड़ी अजीब बात है ! भारत जैसे शान्तिप्रिय देश में ऐसा प्रदर्शन !!उफ़ !!!

लावारिस

दो दिनों से उसके पेट में अन्न का कोई दाना नहीं गया था। छोटी से छोटी मजदूरी के लिए उसने हर जगह पर हाथ फैलाये लेकिन निराशा का ही सामना करना पड़ा उसे। भूख की आग बुझाने के लिए वह भीख माँगना नहीं चाहता था और न ही चोरी करना चाहता था। बचपन में उसकी माँ ने सीख दी थी – ” भीख माँगने से मरना बेहतर है और भूखे मर जाना लेकिन कभी चोरी नहीं करना। चोरी करने का नतीजा तूने देखा ही है। उसके अपराध में तेरा बापू जेल की सलाखों के पीछे पड़ा – पड़ा मर गया। ”

वह अपनी भूख तो मिटा नहीं सका लेकिन एक नदी के किनारे पर आ कर उसने अपनी प्यास खूब बुझायी। अचानक उसकी कुछ नज़र कुछ फासले पर पड़े मैले – कुचैले दस पैसे के सिक्के पर जा पड़ी। वह उसकी ओर लपका। चलो , तिनके का सहारा सही।

उसमें हिम्मत जागी । पैरों ने गति पकड़ी। जा पहुँचा वह पास ही एक बेकरी की दुकान पर। दुकानदार क सिक्का थमाते हुए वह बोला – ” डबल रोटी के दो टुकड़े दे दो। ”
दुकानदार ने सिक्के को घूरा। आँखें तरेर कर वह गरजा – ” दस पैसों का सिक्का दे कर डबल रोटी के दो टुकड़े माँगता है। चल हट , इतने पैसों से तो एक टॉफी भी नहीं मिलती है। ये ले अपना सिक्का और भाग यहाँ से। ”

” एक ही टुकड़ा दे दो। ”
” कहा न , चल हट। तेरे जैसे कई भिखमंगे आते हैं। नौकरी – वौकरी कर , रोटी – वोटी यूँ ही नहीं मिलती। ”

” नौकरी ही दे दो। ”
” मैंने क्या नौकरी देने का दफ्तर खोल रखा है ? भाग यहाँ से। ”

वह मुँह लटकाये नदी के किनारे फिर आ गया । अटटहास करके सिक्के से कह उठा – ” वाह रे , दस पैसे के सिक्के, मैं भी बदकिस्मत और तू भी बदकिस्मत। हम दोनों का मेल फला नहीं। ”
उसने उसी जगह पर सिक्का फैंक दिया जहाँ से उसने उठाया था .


अभिलाषा

घर में ख़बर फैलते ही सबके चेहरों पर प्रसन्नता की लहर दौड़ गयी कि छोटी
बहु पेट से है। चार साल के बाद सबकी अभिलाषा पूरी हुयी थी।
दादा जी तुरंत तैयार हुए और बेटे और बहु की जन्म पत्रियाँ ले कर नगर के
प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य के पास पहुँच गए।
दादा जी के अलावा घर में आठ सदस्य हैं – दादी , दो बेटे , दो बहुएँ , दो बेटियाँ और एक पोता।
सभी दादा जी की बेचैनी से प्रतीक्षा कर रहे थे। बेटियाँ तो उतावली सी पाँच –पाँच के बाद उनकी राह देख आती थीं।
दादा जी का प्रवेश हुआ। उत्सुकता में सभी ने उनको घेर लिया। सभी एक स्वर में बोले – ” बताइये , ज्योतिषी ने क्या कहा है ? ”
दादा जी बोले – ” बताता हूँ ;थका – हारा हूँ , पहले कुछ पानी – वानी तो पी लूँ। ”
” पानी – वानी बाद में पीयें , पहले बताइये कि ज्योतिषी ने क्या कहा है ? ”
” आप सब बताइये , ज्योतिषी ने क्या कहा होगा ? ” कन्या का योग या —-
” पुत्र का योग कहा होगा। ”
” कन्या का ——-”
कन्या सुनते ही सबके चेहरे लटक गए।
” चेहरे क्या लटकाते हैं? कन्या का नहीं पुत्र का योग है। ”
” सच ? ”
” सच। ”
” हुर्रे। ” झूमते हुए सबने दादा जी को उठा लिया।


दुष्कर्मी
पंद्रह वर्षीय दीपिका रोते-चिल्लाते घर पहुँची.माँ ने बेटी को अस्तव्यस्त देखा तो गुस्से में पागल हो गयी– ” बोल ,तेरे साथ दुष्कर्म किस पापी ने किया है?”
” तनु के पिता मदन लाल ने.” सुबकते हुए दीपिका ने उत्तर दिया .
” तुझे कितनी समझाया था कि छाती पूरी तरह ढक कर अन्दर-बाहर कदम रखा कर.इन राक्षसों की कामी नज़रें औरतों की नंगी छातियों पर ही पड़ती हैं.नंगी छाती
रखने का नतीजा देख लिया तूने? मैं तो कहीं की नहीं रही.पचास साल के उस बूढे का सत्यानाश हो.रब्बा,वो जीते जी जमीन में गड़ जाए.मेरी भोली-भाली नाबालिग़ बेटी का जीवन
बर्बाद कर दिया है उस दुष्कर्मी ने.मुए ने अपनी बेटी का बलात्कार क्यों——- ”
मदन लाल का स्यापा करती हुई माँ दीपिका का हाथ पकडे हुए बाहर आ गयी.उसका रुदन सुनते ही अडोसी- पडोसी बाहर निकल आये.सेंकडों ही लोग इकठ्ठा हो गए.
दीपिका के बलात्कार के बारे में जिसने भी सुना वो लाल-पीला हो गया.
सभी मदन लाल के घर की ओर लपके.मदन लाल के घर तक पहुँचते-पहुँचते लोगों का अच्छा-खासा हजूम बन गया था.मदन लाल घर पर ही था .कुछ लोगों ने उसे घसीट कर बाहर जमीन पर पटक दिया.मदन लाल रोया-चिल्लाया.हाथ जोड़-जोड़ कर उसने माफियाँ माँगी.नाक रगडे उसने. गुस्साए लोगों हजूम था. किसीने घूँसा मारा और किसी ने जूता.जमकर धुनाई हुई उसकी.लहुलुहान हो गया वो.
मदन लाल को लहुलुहान करने वालों में कई ऐसे दुष्कर्मी लोग भी थे जिनके हवस की शिकार कई महिलायें हो चुकी थीं.


साक्षात्कार
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– मैं अनन्य कुमार बोल रहा हूँ।
– आप अनन्य कुमार ही बोल रहे हैं न ?
– जी , मैं अनन्य कुमार ही बोल रहा हूँ।
– नमस्कार जी , मैं कांति कुमारी बोल रही हूँ।
– कांति कुमारी ?
– जी , कांति कुमारी।
– समझा , नमस्कार कांति कुमारी जी। आपका लेख उर्वशी में पढ़ा था।
– कैसा लगा था आपको ?
– बहुत अच्छा। कहिये , कैसे याद किया है आपने ?
– अनन्य कुमार जी , आपका इंटर वियू लेना चाहती हूँ।
– ज़रूर लीजिये।
– आपके व्यक्तित्व और कृतित्व पर मैंने दस प्रश्न बनाये हैं।
– बस दस। कुछ और बढ़ाईये।
– पाँच और जोड़ दूँगी।
– आप जोड़ने का कष्ट मत करिये , मैं ख़ुद ही जोड़ दूँगा।
– नहीं , मैं ही जोड़ूँगी।
कांति कुमारी ने पंद्रह प्रश्न फ़ौरन ईमेल कर दिए। दूसरे दिन ही उसे प्रश्नों के लम्बे – लम्बे उत्तर मिल गए। उत्तरों के साथ पूरे पाँच पृष्ठों का
अनन्य कुमार का बायोडाटा भी था। कांति कुमारी पढ़ती गयी और दाँतों तले उँगलियाँ दबाती गयी। उसके पंद्रह प्रश्नों की इबारत बदली हुयी थी।
एक शब्द भी उसका लिखा हुआ नहीं था।

प्राण शर्मा

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मेन इन यूनिफ़ॉर्म

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भाग एक
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धाँय ….धाँय ….धाँय …..

तीन गोलियां मुझे लगी ,ठीक पेट के ऊपर और मैं एक झटके से गिरा….गोली के झटके ने और जमीन की ऊंची -नीची जगह के घेरो ने मुझे तेजी से वहां पहुचाया , जिसे NO MAN’S LAND कहते है … मैं दर्द के मारे कराह उठा.. पेट पर हाथ रखा तो देखा भल भल करके खून आ रहा था .. अपना ही खून देखना … मेरी आँखे मुंदने लगी … कोई चिल्लाया , मेजर , WE ARE TAKING YOU TO HOSPITAL…..देखा तो मेरा दोस्त था …मेरे पास आकर बोला ” चल साले , यहाँ क्यों मर रहा है , हॉस्पिटल में मर “… मैंने हंसने की कोशिश की ,उसकी आँखों से आंसू गिरने लगे मेरे चहरे पर….

मेरी आँखे बंद हो गयी तो कई चित्र मेरे जेहन में आने लगे , मैं मुस्करा उठा, कही पढ़ा था की मरने के ठीक १५ मिनट पहले सारी ज़िन्दगी याद आ जाती है … मैंने अम्बुलेंस की खिड़की से बाहर देखा, NO MAN’S LAND पीछे छूट रहा था .. …ये भी अजीब जगह है यार , मैंने मन ही मन कहा … दुनिया में सारी लड़ाई , सिर्फ और सिर्फ जगह के लिए है और यहाँ देखो तो कहते है NO MAN’S LAND……

कोई और चित्र सामने आ रहा था , देखा तो , माँ की था , एक हाथ में मेरा चेहरा थामकर दुसरे हाथ से मुझे खिला रही थी और बार बार कह रही थी की मेरा राजा बेटा सिपाही बनेंगा ….मुझे जोरो से दर्द होने लगा …….अगला चित्र मेरे स्कूल की था , जहाँ १५ अगस्त को मैं गा रहा था , ‘नन्हा मुन्हा राही हूँ ,देश का सिपाही हूँ’ …….स्कूल का हेडमास्टर ने मेरे सर पर हाथ फेरा …मैंने माँ को देखा वो अपने आंसू पोंछ रही थी …..मेरे पिताजी भी फौज में थे …..ज़िन्दगी का विडियो बहुत ज्यादा फ़ास्ट फॉरवर्ड हुआ अगले चित्र में सिर्फ WAR MOVIES थी जिन्होंने मेरे खून में और ज्यादा जलजला पैदा किया ….

अगले चित्र में एक लड़की थी जिसके बारे में मैं अक्सर सोचता था…वो मुझे इंजिनियर के रूप में देखना चाहती थी , मैं आर्मी ऑफिसर बनना चाहता था .. एक उलटी सी आई , जिसने बहुत सा खून मेरे जिस्म से निकाला , मेरा दोस्त ने मेरा हाथ थपथपाया ..”कुछ नहीं होंगा साले “….अगली चित्र में उसकी चिट्टियां और कुछ फूल जो सूख गए थे ,किताबो में रखे रखे ..उसे वापस करते हुए मैंने NDA की ओर चल पड़ा …

अगले चित्र में हम सारे दोस्त ENEMY AT THE GATES की कल्पना अपने देश की सरहद पर कर रहे थे ….क्या जज्बा था यारो में, हमारे लिए देश ही पहला गोल था , देश ही आखरी गोल था……और , मैं आपको बताऊँ , WE ALL WERE WAITING FOR OUR ENEMIES AT THE GATE ………

अगली चित्र में मेरे माँ के आँखों में आंसू थे गर्व के ; तीन साल के बाद की PASSING PARADE में वो मेरे साथ थी और मैं उसके साथ था . हमने एक साथ आसमान को देखकर कहा ….हमने आपका सपना साकार किया ……..अगला चित्र एक तार का आना था , जिसमे मेरी माँ के गुजरने की खबर थी …..मेरी ज़िन्दगी का सबसे बड़ा और मुख्य स्तम्भ गिर गया था … मुझे फिर उलटी आई …..मेरा दोस्त के आंसू सूख गए थे , मुझे पकड़कर कहा, “साले तेरे पीछे मैं भी आ रहा हूँ …..तू साले , नरक में अकेले मजे लेंगा..ऐसा मैं होने नहीं दूंगा” ……मैंने मुस्कराने की कोशिश की …

सबसे प्यारा चित्र मेरे सामने आया …..मेरी बेटी ख़ुशी की ……उसे मेरी फौज की बाते बहुत अच्छी लगती थी….मेरी छुट्टियों का उसे और मुझे बेताबी से इन्तजार रहता था … मेरी पत्नी का चित्र भी था वो हमेशा सूखी आँखों से मुझे विदा करने की थी …….उसे डर लगता था की मैं …..मुझे कुछ हो जायेंगा …. इस बार उसका डर सच हो गया था … मेरी बेटी की बाते …कितनी सारी बाते ….मेरी आँखों में पहली बार आंसू आये … मुझे रोना आया ..मैंने आँखे खोलकर दोस्त से कहा ..यार , ख़ुशी …….,इतनी देर से वो भी चुप बैठा था ,वो भी रोने लगा …….

अब कोई चित्र सामने नहीं आ रहा था …एक गाना याद आ रहा था ….कर चले वतन तुम्हारे हवाले साथियो….. मैंने दोस्त से कहा , यार ,ये सिविलियन कब हमारी तरह बनेगे .. हम देश को बचाते है ..ये फिर वहीँ ले आते है जिसके लिए हम अपनी जान……एक जोर से हिचकी आई मैंने दोस्त का हाथ जोर से दबाया …..और फिर एक घना अँधेरा………..

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भाग दो
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दूसरी सुबह कोई बहुत ज्यादा बदलाव नज़र नहीं आया मुझे इस देश में जिसके लिए मैंने जान दे दी….. ENEMIES WERE STILL AT THE GATE … अखबार में कहीं एक छोटी सी खबर थी मेरे बारे में …..राजनेता बेमतलब के बयान दे रहे थे ……किसी क्रिकेट में क्षेत्ररक्षण की तारीफ़ की खबर थी …..कोई ये भी तो जाने की एक एक इंच जमीन का क्षेत्ररक्षण करते हुए हम जान दे देते है …..कोई मीडिया का राज उजागर हुआ था …. कोई सलेब्रटी की मौत हुई थी जिसे मीडिया लगातार कवरेज में दे रहा था … कोई रिअलिटी शो में किसी लड़की के अफेयर की बात थी … मतलब की सारा देश ठीक-ठाक ही थी ……मुझे समझ नहीं आ रहा था की मैंने जान क्यों दी …….मेरी पत्नी चुप हो गयी थी ..अब उसके आंसू नहीं आ रहे थे …मेरा दोस्त बार बार रो देता था ….और ख़ुशी…..वो सबसे पूछ रही थी ,पापा को क्या हुआ ,कब उठेंगे , हमें खेलना है न…………………………………


बेटी

आज शर्मा जी के घर में बड़ी रौनक थी, उनकी एकलौती बेटी ममता की शादी जो थी.

बहुत से मेहमानों से घर भरा हुआ था, दरवाजे पर शहनाई बज रही थी, खुशियों का दौर था.

शर्मा जी बड़े व्यस्त थे. फेरे हो रहे थे. बेटी की विदाई के बारे में सोच सोच कर ही शर्मा दम्पति का दिल दुःख जाता था. शर्मा जी की पत्नी की आँखों से आंसू बह रहे थे. शर्मा जी भी थोड़ी थोड़ी देर में आंसू पोंछ लेते थे. फेरे हो गए, सभी दावत में व्यस्त हो गए. शर्मा जी बात बात में अपनी पत्नी से उलझ जाते थे. दोनों में कभी भी एक बात पर एकमत नहीं हो पाता था.

पार्टी में शर्मा जी हर किसी से बस यही कह रहे थे कि आज उनकी बिटिया के जीवन का सबसे अच्छा दिन है, वो एक राजकुमार जैसे इंसान से शादी कर रही है, जो उसे राजकुमारी की ही तरह रखेंगा.

ममता बहुत खुश थी, बस उसके मन में एक ही उदासी थी कि उसे अब ये पीहर का घर छोड़कर जाना होंगा. उसे पता है कि उसके पिता की वो सबसे बड़ी कमजोरी है वो कैसे उसके बिना रह पायेंगे. बस यही सोच उसके मन में चल रही थी. एक और बात थी जो उसे बहुत परेशान कर रही थी, वो थी उसके माता पिता का आपस में बार बार हर दूसरी-तीसरी बात में लड़ना. वो सोच रही थी और फिर उसके मन में एक विचार आया.

दावत करीब ख़त्म होने पर थी. थोड़ी देर में ही विदाई की रस्म थी.

ममता स्टेज पर पहुंची और उसने माइक पर सबको संबोधन करना शूरू किया.

“आप सभी का धन्यवाद कि आप लोग यहाँ आये. मेरे पिताजी और माताजी का आप सभी ध्यान रखना क्योंकि मेरे जाने के बाद वो अकेले ही हो जायेंगे. मैं एक बात कहना चाहती हूँ. मेरे पिता से और सभी लडकियों के पिताओं से. आप हम लड़कियों को बड़े प्यार से पालते है और शादी करते समय यही चाहते है कि हमें पति के रूप में कोई ऐसा इंसान मिले जो हमें राजकुमारी की तरह रखे और एक ऐसी ज़िन्दगी दे, जो परीकथाओ जैसी हो.”

सब शांत हो गए थे. सभी ध्यान से ममता की बाते सुन रहे थे.

ममता ने आगे कहा, “ आप सभी से मैं एक ही बात कहना चाहूंगी कि क्या आपने जिस लड़की से ब्याह किया है, उसे क्या आपने राजकुमारी की तरह रखा, क्या उसे परिकथा जैसा जीवन दिया. उसके साथ लड़ने झगड़ने में जीवन गुजारने के अलावा क्या आपने उसे वो सारी खुशिया दी, जिनकी कल्पना, उनके पिता ने आपके साथ उनकी शादी करवाते वक़्त की थी या जैसे मेरे पिता इस वक़्त मेरे लिए कर रहे है, या दुसरे पिता अपनी बेटियों के लिए करेंगे.”

हाल में सन्नाटा छा गया था. ममता की माँ की आँखे मानो बारिश बरसा रही थी. हाल में मौजूद कई स्त्रियाँ रो रही थी, पुरुष चुप थे. शर्मा जी का सर झुक सा गया था.

ममता ने फिर कहा, “अब भी समय है, मेरे जाने के बाद या आपकी बेटियों की विदाई के बाद आप उस औरत के साथ वही व्यवहार करिए, जो आप अपनी बेटी के साथ उसके पति या ससुराल के द्वारा होते देखना चाहते है. इससे उन औरतो को उनका खोया हुआ मान मिलेंगा, उनके पिता के चेहरों पर ख़ुशी आएँगी और आप सभी को जीने का एक नया सहारा मिलेंगा. बस मेरी इतनी सी बात मान लीजिये, यही मेरी सच्ची विदाई होंगी.”

ये कहकर ममता नीचे आ गयी, उसकी माँ और पिता ने उसे गले से लगा लिया, सारा हाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज गया था.

एक बेटी ने अपना हक अदा कर दिया था.

माँ

मैंने रेड सिग्नल पर अपनी स्कूटर रोकी . ये सिग्नल सरकारी हॉस्पिटल के पास था . उस जगह हमेशा बहुत भीड़ रहती थी. मरीज , बीमार, उनके रिश्तेदार और भी हर किस्म के लोगो की भीड़ हमेशा वहां रहती थी,

अब चूँकि सरकारी हॉस्पिटल था तो गरीब लोग ही वहां ज्यादा दिखाई देते थे. अमीर किसी और महंगे हॉस्पिटल में जाते थे. इस संसार में गरीब होना ही सबसे बड़ी बीमारी है . ऊपर से यदि कोई भयानक शारीरिक रोग लग गया हो तो , क्या कहना , जैसे कोढ़ में खाज !

मेरे लिए ये रोज का ही दृश्य था. मैं बड़ा संवेदिनशील व्यक्ति था और मुझे ये दृश्य पसंद नहीं था, पर क्या करू और कोई रास्ता भी नही था ऑफिस की ओर जाने के लिए. स्कूटर बंद करके मैंने अनमने भाव से हॉस्पिटल की तरफ देखा. वही भीड़ , वही रोना , वही कराहना !

मैंने देख ही रहा था कि एक औरत के जोर जोर से हंसने की आवाज़ आई , मैंने उस ओर देखा तो एक बूढी सी औरत जोर जोर से हंस रही थी. वो गरीब तो नहीं लग रही थी. मुझे कुछ अजीब सा लगा . फिर वो रोने लगी . मैंने अपना स्कूटर उसकी तरफ मोड़ा और उसके पास जाकर रुका .

मैंने पुछा , “माई क्या हुआ है . कुछ मदद चाहिए इलाज के लिए , क्या हुआ .बताओ तो सही .”

कुछ लोग और भी जमा हो गए थे . अपने देश में तमाशाई बड़े जल्दी जमा हो जाते है.

उस बूढी औरत ने कुछ नहीं कहा , वो रोते रोते चुप हो गयी , मैंने अपनी पानी की बोटल दी .उसे पीने को कहा. उसने भरी हुई आँखों से मुझे देखा और पानी पीने लगी .

वो थोडा शांत हुई तो मैंने फिर से पुछा , “क्या हुआ माई , हॉस्पिटल के लिए कोई मदद चाहिए . बोलिए तो . कुछ रुपया दे दूं. आपके साथ कोई नहीं है क्या . बच्चे कहाँ है ?”

उसने कहा , “यहाँ कोई नहीं है बेटा. जब मेरे बच्चे छोटे थे तब , आपस में , मेरी माँ – मेरी माँ कह कर लड़ा करते थे… आज जब वो बड़े हो गए है तो तेरी माँ – तेरी माँ कहकर लड़ते है और आज उन्होंने हमेशा के लिए यहाँ छोड़ दिया है . बचपन में मैं जब एक को संभालती थी , तो दूसरा भी आ जाता था ,कहता था माँ मुझे भी संभालो और आज जब मेरी तबियत ख़राब हो गयी है तो आपस में कहते है , तू संभाल , तेरी भी तो माँ है . अब मैं यहाँ हूँ. अकेली , सब है , पर कोई नहीं . मैंने जिन्हें संभालकर बड़ा किया है आज उनके पास मुझे संभालने के लिए न समय है और न ही प्यार बचा हुआ है ”

मैं स्तब्ध था . आसपास की भीड़ चुप थी और अब अपने अपने काम के लिए वापस जा रही थी. तमाशा ख़त्म हो गया था. अपने देश में तो ऐसा ही होता है .

मैं व्यथित था. मेरा मन भी भर आया था. मैंने धीरे से कहा, “ माई , बात सिर्फ प्यार और मोह की होती है , वो है तो सब है , वरना कुछ भी नहीं ! “

उस बूढी औरत ने फिर कहा , “मेरा कसूर क्या है , सिर्फ यही कि मैं अब बूढी हो चुकी हूँ और मैं बीमार हूँ , बचपन का मेरी माँ अब तेरी माँ में बदल चूका है. लेकिन फिर भी माँ हूँ, मेरा क्या है , आज हूँ और कल नहीं हूँ. वो जहाँ रहे खुश रहे .”

मैंने भरी हुई आँखों से उसके हाथ में कुछ रुपये रखे और चल पड़ा.

माँ पीछे ही रह गयी . अकेली !


दंगा

कल से इस छोटे से शहर में दंगे हो रहे थे. कर्फ्यू लगा हुआ था. घर, दूकान सब कुछ बंद थे. लोग अपने अपने घरो में दुबके हुए थे. किसी की हिम्मत नहीं थी कि बाहर निकले. पुलिस सडको पर थी.

ये शहर छोटा सा था, पर हर ६ – ८ महीने में शहर में दंगा हो जाता था. हिन्दू और मुसलमान दोनों ही लगभग एक ही संख्या में थे. कोई न कोई ऊन्हे भड़का देता था और बस दंगे हो जाते थे. पुलिस की नाक में दम हो गया था, हर बार के दंगो से निपटने में. नेता लोग अपनी अपनी राजनैतिक रोटियाँ सेकते थे. पंडित और मुल्ला मिलकर इस दंगो में आग में घी का काम करते थे. आम जनता को समझ नहीं आता था कि क्या किया जाए कि दंगे बंद हो जाए. उनके रोजगार में, उनकी ज़िन्दगी में इन दंगो की वजह से हर बार परेशानी होती थी.

एक फ़क़ीर जो कुछ महीने पहले ही इस शहर में आया था, वो भी सोच में बैठा था. उससे मिलने वाले मुरीदो में हिन्दू और मुसलमान दोनों ही थे और आज दो दिन से कोई भी उसके पास नहीं आ पाया था.

आज वो शहर में निकल पड़ा है, हर गली जा रहा है. और लोगो से गुहार लगा रहा है. न कोई उससे मिल पा रहा है और न ही कोई भी उसे कुछ भी नहीं दे पा रहा है. फ़कीर को दोपहर तक कुछ भी नहीं मिला.

वो थक कर एक कोने में बैठ गया. एक बच्चा कही से आया और फ़क़ीर के पास बैठ गया, फ़क़ीर ने उससे पुछा क्या हुआ, तुम बाहर क्यों आये हो, देखते नहीं शहर में दंगा हो गया है.

बच्चा बोला, “मुझे भूख लगी है, घर में खाना नहीं बना है. माँ भी भूखी है, बाबा को कोई काम नहीं मिला आज. हम क्या करे. हमारा क्या कसूर है. हम क्यों भूखे रहे इन दंगो के कारण !”

फ़क़ीर का मन द्रवित हो गया. फ़क़ीर के पास ५० रूपये थे. उसने वो ५० रूपये बच्चे को दे दिए और कहा, “जाओ घर जाओ और बाबा को कहो कि गली के मोड़ पर पंसारी के घर में बनी हुई दूकान से कुछ ले आये और खा ले.”

बच्चा ख़ुशी ख़ुशी घर की ओर दौड़ पड़ा. फ़क़ीर उसे जाते हुए देखता रहा.

थोड़ी देर बाद कुछ सोचकर फ़क़ीर पुलिस स्टेशन पंहुचा. वहां के अधिकारी भी फ़क़ीर को जानते थे. उन्होंने फ़क़ीर को बिठाया और चाय पिलाई. फ़क़ीर ने कहा, “कर्फ्यू खोल दो बाबा.” अधिकारी बोले, “फ़कीर बाबा नहीं, दंगा बढ़ जायेंगा. पता नहीं कितने लोग घायल हो जाए.”

फ़क़ीर ने कहा, “आप शहर में खबर करवा दो कि फ़क़ीर बाबा मिलना चाहते है.”

और फिर वैसा ही हुआ लोग आये. फ़क़ीर ने बहुत सी बाते कही, एक दुसरे के साथ मिलकर रहने की बात कही, ये भी कहा कि आज के बाद कोई अगर दंगा करेंगा तो फ़क़ीर अपनी जान दे देंगे. लोगो पर असर हो ही रहा था कि किसी बदमाश ने कहा, “फ़क़ीर तो नाटक करता है, सब झूठ बोलता है.” इसी तरह की बाते होने लगी और वहां फिर संप्रदाय और जातिवाद का जहर फैलने लगा.

कुछ लोगो ने गुस्से से उस बोलने पर हमला कर दिया, वो किसी और जाति का निकला, फिर उस जाति के लोगो ने इन लोगो पर हमला कर दिया, खूब मारपीट होने लगी, फ़कीर बीच में पहुंचे बीचबचाव के लिए, तब तक मारपीट फिर से दंगे में बदल गया था.

पुलिस ने लाठीचार्ज किया, सबको अलग किया तो देखा, फ़क़ीर बाबा, इस छोटे से दंगे में फंसकर मर चुके थे.

सारे लोगो में सन्नाटा छा गया. उसी वक़्त शहर में ये तय हुआ कि कोई भी दंगा नहीं होंगा. उस दिन से शहर में शान्ति छा गयी. फिर कभी उस छोटे शहर में दंगा नहीं हुआ.


विजय कुमार सप्पत्ति