लघुकथाएँः दीपक मशाल, निर्मला सिंह


एक-दो रोज की बात होती तो इतना क्लेश न होता लेकिन जब ये रोज की ही बात हो गई तो एक दिन बहूरानी भड़क गई.
”देखिये जी आप अपनी अम्मा से बात करिए जरा, उनकी सहेली बूढ़ी अम्मा जो रोज-रोज हमारे घर में रहने-खाने चली आती हैं वो मुझे बिलकुल पसंद नहीं”
”लेकिन कविता, उनके आ जाने से बिस्तर में अशक्त पड़ीं अपनी अम्मा का जी लगा रहता है..” गृहस्वामी ने समझाने की कोशिश की.
”अरे!! जी लगा रहता है यह क्या बात हुई.. आना-जाना हो तो ठीक भी है मगर उन्होंने तो डेरा ही जमा लिया है हमारे घर में..” स्वामिनी और भी भड़क उठी
दूसरी ओर से फिर शांत उत्तर आया, ”अब तुम्हे पता तो है कि बेचारी के बेटों ने घर से निकाल दिया.. ऐसी सर्दी में वो जाएँ भी कहाँ?”
”गज़ब ही करते हैं आप.. घर से निकाल दिया तो हमने ठेका ले रखा है क्या उनका? जहाँ जी चाहे जाएँ.. हम क्यों उनपर अपनी रोटियाँ बर्बाद करें?” मामला बढ़ता जा रहा था
हार कर गृहस्वामी ने कहा-
”ठीक है तुम्हे जो उचित लगे करो.. उनसे जाकर प्यार से कोई बहाना बना दो”

”हाँ मैं ही जाती हूँ.. तुम्हारी सज्जनता की इमेज पर कोई आंच नहीं आनी चाहिए, घर लुटे तो लुटे..” भुनभुनाती हुई कविता घर के बाहर वाले कमरे में अपनी सास के पास बैठी बूढ़ी अम्मा को जाने को कहने के लिए वहां पहुँची. पहुंचकर देखा कि बूढ़ी अम्मा अपनी झुकी कमर, किस्मत और बुढ़ापे का बोझ एक डंडे पर डाले, मैली-कुचैली पोटली कांख में दबाये खुद ही धीरे-धीरे करके घर के बाहर की ओर जा रही थीं. अन्दर चल रही बहस की आवाज़ उनतक न पहुँचती इतना बड़ा घर न था. आँखों में आंसू भरे उसकी बेबस सास अपनी सहेली को रोक भी न सकी.

मगर शाम को रोटियाँ फिर भी बर्बाद हुई, अम्मा खाने की तरफ देखे बगैर भूखी ही सो गई थी.

तसल्ली
दो महीने हो गए थे पासपोर्ट के लिए आवेदन जमा किये हुए लेकिन ना तो कोई पुलिसथाने से जाँच के लिए आता और ना ही पूंछने पर पासपोर्ट कार्यालय से कोई समुचित जवाब देता.. ऑनलाइन चेक करने के लिए फार्म संख्या आदि डालने पर बताया जाता कि पुलिस रिपोर्ट अभी तक जमा नहीं हुई. पुलिस थाने में पता करने पर वह जवाहर भवन से पता करने का कह के पल्ला झाड़ लेते.. कुछ समझ में नहीं आता कि क्या करें कि तभी एक दिन शाम के वक़्त जवाहर भवन से एक अधेड़ उम्र के अधिकारी सज्जन पासपोर्ट के सम्बन्ध में जाँच के लिए प्रकट हुए.
दो-चार फ़ॉर्मल सवाल करने के बाद अन्दर लॉन में आ गए. चाय, बिस्किट और नमकीन का मज़ा लेते हुए पिताजी से उनकी नौकरी के दौरान हुईं रोचक घटनाएं सुन दोस्ती बढ़ाते रहे. बीच-बीच में बड़े प्यार से आश्वासन देते जाते,
”अब किस बात की देर है..अब तो बेटी का पासपोर्ट बन ही गया समझिये.”
पिताजी भी कह देते, ” अरे साब, आप जैसे सज्जन अधिकारी के हाथ में फ़ाइल पहुँची है तो काम हो ही जाना है.. फिर एक सरकारी अधिकारी दूसरे की मदद नहीं करवेगा तो कौन करेगा फिर..”
लेकिन कप में चाय की मात्र कम होने के साथ-साथ अधिकारी के ”अब तो बेटी का पासपोर्ट बन ही गया समझिये” श्लोक की पुनरावृत्ति की आवृत्ति और आयाम बढ़ते जा रहे थे.
अंत में पिताजी ने मुस्कुराते हुए, जेब से दो सौ-सौ के नोट निकाल कर उनके हाथ में थमाए तो अधिकारी थोडा सकुचाये.
”अरे रख लीजिये बाबू जी दीवाली पर बच्चों को अंकल की तरफ से पटाखे खरीद दीजियेगा, कुछ आपको थोड़े ही दे रहे हैं” भ्रष्टाचार के खिलाफ चल रही देशव्यापी मुहिम से डरे बाबू को बड़ी तसल्ली हुई.
खिलखिलाते हुए कह उठे, ”आप भी कमाल करते हैं सिंह साहब.”

सहजीविता
सफ़ेद कबूतर और कबूतरी के उस जोड़े ने दुनिया देख रखी थी और वो बहेलिया था कि उन्ही के घोंसले वाले पेड़ के नीचे अपने दाने,जाल और आस बिछाए था। कबूतर और कबूतरी ने एक दूसरे की तरफ देखा, मुस्कुराए और फिर भोजन की तलाश में पास के कस्बे की तरफ उड़ गए।

मगर शाम होते-होते जब कबूतर को कहीं से भी दाने हासिल न हुए तो खाली ही अपने घोंसले में लौट आया। वापस आकर पता चला कि कबूतरी के साथ भी वही हुआ। मारे भूख के दोनों का बुरा हाल था, नीचे देखा तो जाल और दाने अभी भी बिछे हुए थे। कबूतर ने कबूतरी से पूछा, ”क्या कहती हो? खाया जाए?”

”पगला गए हो क्या? एक रात भूखे नहीं सो सकते, चार दानों के लिए जान जोखिम में डालने पर तुले हो..” कबूतरी ने गुस्सा दिखाते हुए कहा।

”घबराओ मत प्रिये, मैं पता करके आया हूँ। कस्बे में मंत्री जी कल एक खेल प्रतियोगिता के उदघाटन समारोह में हमें अपने हाथों से शांति के प्रतीक के रूप में उड़ाने वाले हैं, जिसके लिए ही ये बहेलिया हमें पकड़ना चाहता है। सिर्फ एक रात की बात है, अभी खाना भी मिलेगा और कल आज़ादी भी।”

वो युगल मुस्कुराते हुए दानों पर जा बैठा, झाडी में छिपे बहेलिये ने जाल खींच लिया।

ताकत
वो नौसिखिया कार चालक सांझ होते ही कार लेकर सड़क पर आ उतरा. कार चलाना तो सीख गया मगर अभ्यास की कमी थी, जिसको कि पूरा करने वास्ते वह कम भीड़-भाड़ वाले इलाके की तरफ मुड़ गया। अचानक पानी से भरे गड्ढे के ऊपर से कार निकली तो गड्ढे का गन्दा पानी राह चलते एक साइकिल सवार की कमीज को गन्दा कर गया। साइकिल वाले के चिल्लाने पर आस-पास के लोग जमा हो गए और कार को आगे बढ़ने से रोक दिया गया। अपनी आँखों को बड़ा-बड़ा करते हुए उस साइकिल वाले ने नौसिखिये पर चीखना शुरू कर दिया, ”स्साले, अन्धा होकर चलाता है? इतना बड़ा खड्डा नहीं दिखा तुझे? मेरी नई कमीज़ ख़राब कर दी। तुझे क्या लगता है ऐसे ही निकल जाएगा यहाँ से.. जानता नहीं है तू मैं कौन हूँ। इस इलाके के दादा का ख़ास आदमी हूँ मैं। अब चुपचाप नई कमीज़ के पैसे निकाल वर्ना स्टेयरिंग पकड़ने के लिए हाथ सलामत नहीं रहेंगे..”

धमकी का असर हुआ। नौसिखिये ने बिना कुछ कहे सुने चंद नीले-पीले नोट निकाल कर ‘बेचारे’ साइकिलवाले के हवाले कर दिए।

अगले मोड़ पर मुड़ते समय पता नहीं कहाँ से एक मोटर साइकिल सवार जल्दबाजी में कार से हल्का सा टकरा गया। हालांकि टक्कर बड़ी मामूली थी और मोटर साइकिल वाले को चोट भी नहीं लगी, लेकिन कार रोक कर उसने भी नौसिखिये को बाहर निकाला और उसने भी धमकाते हुए कहा कि, ”हाथ में मेहंदी लगा कर कार चला रहा था? चार पहिये पर सवार है तो किसी की जान लेगा? मैं यहाँ के कमिश्नर को अच्छी तरह से जानता हूँ. अगर अभी दो हज़ार नहीं निकाल के दिए तो थाने में टाँगे तुडवा दूंगा तेरी.. लाइसेंस जाएगा सो अलग.”

डरते हुए एकबार फिर उसने दो हज़ार रुपये मोटरसाइकिल वाले को थमा दिए और वहाँ से अपनी जान लेकर दूसरे इलाके की तरफ भागा।

लेकिन उसकी बदकिस्मती कहें या खराब ड्राइविंग कि इस बार सच में उसने एक सफ़ेद एम्बेसडर को पीछे से ठोक दिया। तुरत प्रक्रिया हुई, तीन गुण्डे टाईप के लोग मुँह में पान दबाये उसकी तरफ बढ़े और कॉलर पकड़कर उसे कार से बाहर निकालने के साथ-साथ तीन-चार थप्पड़ रसीद कर दिए। जैसे कि उसे उम्मीद थी उनमे से एक अश्लीलतम गालियाँ देते हुए बोल पड़ा, ”जानता है किसकी गाड़ी ठोकी है तूने? मंत्री जी के भतीजे की। पूरी डिग्गी चपटी कर डाली। अब इसका पैसा तेरा बाप भरेगा? चल निकाल बीस हज़ार वर्ना पता भी नहीं चलेगा कि कहाँ से आया था और कहाँ गया।”

पैसे तो अब जेब में थे नहीं, सो उसने अपने गले में पड़ी सोने की मोटी चेन उन गुन्डेनुमा लोगों को सौंप उनके पास गिरवी रखी अपनी जान छुड़ाई और अब अत्यधिक सावधानी के साथ कार चलाने लगा।

पर हाय रे बदकिस्मती कि घर से थोड़ी ही दूरी बाकी रहते, अँधेरे में कार एक बार फिर किसी भारी-भरकम वस्तु से टकरा गई।

डर के मारे थर-थर कांपते हुए उसने कार रोक कर देखने की कोशिश की कि इसबार कौन है कि तभी एक शांत और मधुर आवाज़ कानों में पड़ी, ”माफ़ करना, मैं तुम्हारे रास्ते में आ गया।”

देखा तो कार एक चबूतरे से टकरा गई थी. चबूतरा किसी धार्मिक इमारत का था।

नौसिखिये ने हिम्मत करके पूछा, ” आप कौन हैं?”

”भाई, मैं ईश्वर हूँ और मैं किसी का कुछ नहीं बिगाड़ सकता..”.

रेजर के ब्लेड

”मनीष तुम्हारे पास कोई ब्लेड पड़ा है क्या? मुझे शेव बनानी है और देखा तो ब्लेड ख़त्म हो रखे हैं. बाजार तो कल ही जा पाऊंगा” आँगन में खड़े होकर सुखलाल ने अपने ही मकान में हिस्सा बांटकर ऊपर वाले हिस्से में रह रहे बेटे को आवाज़ देकर पूछा.

आँगन के ऊपर पड़े जाल पर आकर मनीष ने कहा, ”पिताजी, अब आपके तरह एक ब्लेड के ज़माने नहीं रहे. मैं चार ब्लेड वाला जिलेट का सेफ्टीरेजर इस्तेमाल करता हूँ, आप भी करके देखिये. आपकी किस्मत कि एक नया रेजर अतिरिक्त पड़ा हुआ है.”

”जो भी हो दे दे बेटा, अभी काम चलाना है”

”अच्छा दे देता हूँ आप भी क्या याद रखेंगे पिताजी, लेकिन बाज़ार जाएँ तो लौटाने के लिए याद से इसी कंपनी का रेजर लाइयेगा.”

मनीष ने ऊपर से रेजर का नया पैकेट फेंका तो वह सुखलाल के हाथ से टकरा कर आँगन के फर्श पर गिर पड़ा. वो कैच करता भी कैसे, दिमाग तो इस सवाल का जवाब खोजने में उलझ गया था कि, ”क्या ब्लेड बढ़ने से खून के रिश्ते भी इतनी तेज़ी से कटते हैं?”

ये कब तक

बहुत खिन्न मन से घर पहुँचा था वो। मैच हारने के बाद से लगातार बड़बड़ाए जा रहा था, ग़ुस्से का एक बड़ा हिस्सा बल्ले पर भी उतारा गया था।
उसका ख़्याल था कि, ‘अगर वह ख़ुद ऐन वक़्त पर आउट ना होता तो उसकी टीम को जीतने से कोई नहीं रोक सकता था’।
बाथरूम में फ़व्वारे के नीचे ठण्डे होते हुए भी कितनी बार दीवार पर घूँसे बरसाए!
नहाकर बाहर निकलते- निकलते अशांत मन दूसरों पर दोष मढ़ने लगा था। उसने तौलिए से बाल रगड़े और दाँत भींचकर कह उठा “वही बॉल यॉर्कर डालनी थी उसे मादर..”
अचानक ठिठका वह, जब देखा कि माँ इस्तरी की हुई शर्ट उसे देने के लिए सामने खड़ी थीं।

“सॉरी मॉम” कहकर उसने नज़रें फेर लीं।

“कोई बात नहीं बेटा, हम माँ- बहनें और होती किसलिए हैं! किसी मैच में जब तुमने किसी बॉलर को टारगेट बनाया होगा तो उसने भी घर जाकर हमें यूँ ही तो याद किया होगा।”
कमरे से बाहर जाती माँ ने उदास और मद्धिम स्वर में कहा।

दीपक ‘मशाल’

अमेरिका से हिन्दी के नवलेखन के सशक्त हस्ताक्षर


प्रतिरूप
” बेटी तुम तैयार नहीं हुई, आज तो तुम लोगों को गौरव की शादी में जाना है ! ”

” नहीं, मम्मी हम दोनों नहीं जाएंगे, आप और पापा चले जाओ !”

” क्यों नहीं जाओगे तुम दोनों बहन, भाई ? अरे! गौरव तो पल्लव का दोस्त है, तुम सब बचपन के साथी हो, तुम्हें जाना चाहिए।”

गौरव की शादी में पल्लव और पल्लवी नहीं गए।

खूब सज-धजकर, हमेशा की तरह हीरोइन-सी लगती कुसुम और अशोक चले गए। वहां जाकर उसके कानों ने अपनी खूबसूरती की, स्मार्टनेस की खूब प्रशंसा सुनी। काफी लोगों ने उसकी बेटी और बेटे के न आने का कारण पूछा।

कुसुम ने-जैसा कि उसके बच्चों ने कहा था-बता दिया कि तबियत ठीक नहीं है। बात आई-गई हो गई। कुसुम इस तरह से कई पार्टियों में अकेली गई। कुछ न कुछ बात पल्लवी ऐसी कह देती जिसका जवाब कुसुम के पास नहीं होता।

लेकिन धीरे-धीरे पल्लवी का चिड़चिड़ापन, रूखापन बढ़ता ही जा रहा था…साथ में मां-बेटी के बीच में दूरी बढ़ती जा रही थी। एक बार पल्लवी की सहेली का जन्मदिन था, जिसमें उसने कुसुम, अशोक और उसके भाई सभी को बुलाया था।

पल्लवी तो वहाँ भी जाने के लिए मना कर रही थी लेकिन कुसुम जिद पर अड़ गई कि मैं नहीं जाऊँगी जब तक बेटी तू नहीं जाएगी…।

इतनी-सी बात …! पल्लवी का पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया। ऊँचे स्वर में बोली- ” मम्मी, प्लीज ! मैं नहीं जाऊँगी आपके साथ ! सुंदर तो मैं भी हूं और आप भी हैं, लेकिन जहां कहीं भी मैं आपके साथ जाती हूं, लोग आपकी ही तारीफ पहले करते हैं और मेरी तारीफ करते समय कह देते हैं कि मां इतनी सुंदर है तो बेटी को सुंदर होना ही था। मुझे लगता है जैसे मैं कुछ हूं ही नहीं…मुझे नहीं जाना। आपके साथ मेरा व्यक्तित्व ही दबकर रह जाता है। ”

पल्लवी की बात सुनकर कुसुम हतप्रभ-सी हो गई- उसने सपने में भी नहीं सोचा था कि उसकी अपनी ही बेटी उससे ईर्ष्या करेगी, उससे होड़ करेगी…वह तो बड़ी खुश थी कि उसकी बेटी उसका प्रतिरूप बनी है।

खेल
ग्रीन पार्क कालोनी में एक छोटा सा पार्क है, जहाँ सांय काल के समय कुछ महिलाएँ अक्सर आकर बैठ जाती हैं और अपने अपने दुख सुनाती हैं। उनके साथ रिटायर हुए प्रिंसिपल शर्मा की पत्नी भी बैठती हैं और बातें करती हैं।

उस दिन भी सरोज शर्मा पार्क में जाकर वृद्ध महिलाओं के पास बैठ गईं, लेकिन वह उस दिन शान्त रहीं, महिलाओं की बातें बड़ी ध्यान से सुनती रहीं—

सुनो बहिन ! मेरा बेटा तो इतना अच्छा है कि हर रात को दूध खुद गर्म करके मुझे देता है, जो कुछ भी कहूँ खाने के लिए लाता है “ राधा अपनी साड़ी का पल्लू ठीक करते हुए बोली।

बहिन, सच कह रही हूँ, मेरा बेटा भी बहुत ख्याल रखता है मेरा। “ मैं जरा भी बीमार पड़ जाऊँ तुरंत दवाई ले आता है“ सीता ने कहा।

“अरे, तुम लोगों का तो बेटा ही अच्छा है मेरी तो बहू भी बहुत अच्छी है। सर्दियों में नहाने के लिए गर्म पानी देती है। और तो और वह… “ इससे पहिले कि कुसुम आगे कुछ बोलतीसरोज चीख पड़ी–“ बन्द करो तुम सब झूठी बकवास। किसी का बेटा अच्छा नहीं है, तुम सब मेरी तरह झूठ बोलती हो “ यह देखो मेरा मुँह देखो, आज मेरे उसी बेटे ने इतनी जोर से मारा है, जिसकी मैं हर रोज यहाँ बैठ कर तारीफें किया करती थी। मेरी तरह तुम सब कब तक फटे लिहाफ पर खोल चढ़ाती रहोगी ? “ ।

कहते ही फूट-फूट कर सरोज रोने लगी और उसकी बात सुनकर सब एक दूसरे को चोरों की तरह देखती हुई, चुपचाप एक-एक करके चल दीं।

गुरु दक्षिणा
सुबह से लेकर राततक दीपिका अपने ईमानदार, मेंहनती, सत्यवादी पति प्रेमप्रकाश पर ताने कसती रहती थी।

“क्यों बिना फीस लिए बच्चों को पढ़ाते हो ? “

कभी कहती “ क्यों स्कूल के गरीब बच्चों की फीस तुम जमा करते हो? क्या सब गरीबों का तुमने ठेका ले रखा है? “

“ क्या तुमने अपनी बेटी के दहेज के बारे में सोचा है? अगर यही हाल रहा तब क्वारी बैठी रहेगी। “

बहस, पत्नी की बातों का एक छोटा सा उत्तर प्रेम प्रकाश जी देते “ हमें दहेज की क्या ज़रूरत पड़ेगी ? हमारी बेटी सुंदर है, ऊँचे पद पर कार्यरत है। “

ज्वालामुखी सी फट पड़ती थी दीपिका “ अरे! आप किस दुनिया में रहते हो, हर लड़के वाला इन सब गुणों के साथ दहेज भी मांगता है। “

आए दिन ऐसी ही बातें होती रहती थीं। बेटी सुन-सुनकर तंग आ गई थी। खैर भला हो ईश्वर का कि लड़की का रिश्ता अचानक एक दिन एक इंजिनीयर लड़के के साथ तय हो गया, लेकिन लड़कों वालों ने नगद एक लाख रुपयों की मांग की।

एक तो रुपयों का अभाव दूसरे पत्नी के तानों से प्रेमप्रकाश जी बीमार पड़ गये। यह खबर कालेज के साथ-साथ पूरे शहर में फैल गयी।

अचनक एक दिन प्रेमप्रकाश जी के घर कालबैल बजी। दीपिका ने दरवाजा खोला-प्रेम प्रकाश जी के पुराने विद्यार्थियों को देखकर आश्चर्य में डूब गयी। विद्यार्थियों ने बैठते ही संग गुरूजी को पूछा- इतनी देर में गुरु जी कमरे में आये। सभी विद्यार्थियों ने, जो अच्छे पदों पर कार्यरत हो गए थे, अपनी-अपनी जेबों से लिफाफे निकाले और गुरू जी को देने के लिए खड़े हो गये-

इसके पहले कि प्रेम प्रकाश जी कुछ कहते, झट दीपिका ने लिफाफे पकड़ लिए। “ इनमें क्या है ?“ प्रेम प्रकाश जी ने पूछा।

“ सर आज हम जो कुछ भी हैं वह आपके ही कारण हैः इन लिफापों में आपकी बेटी की शादी के लिए रुपए हैं। सर, यह वापस मत कीजिएगा। गुरु –दक्षिणा के रूप में स्वीकार कर लें।“ कह कर सभी विद्यार्थी जो बड़े-बड़े अफसर थे वापस चले गए।


दाह संस्कार

दीनदयाल की मृत्यु हो गई, उनके अंतिम संस्कार हेतु लखनऊ से दूसरा बेटा आया, कानपुर से सबसे बड़ा बेटा भी आया , तीसरा और सबसे छोटा बेटा तो हमेशा दीनदयाल के साथ ही रहता था। उसने ही पिता का उपचार एम्स में करवाया था, क्योंकि दीनदयाल लगभग एक महीने से बीमार चल रहे थे, वह भी गंभीर रूप से।

नौकरी से रिटायर होने के कुछ दिनों बाद ही दीनदयाल की मृत्यु हो गयी थी, अतः वह तीनों बेटों के पास बारी बारी से रहते थे। पिता के इलाज में छोटे बेटे के काफी ज्यादा रुपये खर्च हो गये थे और वह कुछ कर्ज के बोझ से भी दब गया था। अतः वह काफी देर तक पिता के शव के पास चुपचाप गमगीन बैठा रहा, फिर धीरे से अपने दोनों बड़े भाइयों से पिता का दाह संस्कार करने के लिए बोला।

छोटे भाई की बात सुनकर दोनों बड़े भाई ऐसे चुप हो गए, जैसे उन्हें सांप सूंघ गया हो। थोड़ी देर बाद छोटे बेटे ने अपनी बात दोहराई , तो दीनदयाल का बड़ा बेटा बोला, ‘देखो घी और लकड़ी तो बहुत मंहगे हैं, इसलिए पिताजी का शव विध्युत शवदाह गृह ले चलते हैं। उसी से …इस तरह फूल चुनने और हवन का झंझट भी नहीं होगा।‘

तुरंत मंझला बेटा बोला, ‘ क्यों न पापा का शव गंगा में बहा दें, उससे अस्थि विसर्जन का भी झंझट नहीं होगा?’

अपने चाचा और पापा की बातें दीनदयाल का बेटा गौरव वहीं बैठा सुन रहा था। चीखते हुए बोला, ‘ बाबा का अंतिम सेस्कार जैसे आप लोग कह रहे हैं , उस तरह नहीं होगा । उनका दाह संस्कार वैदिक रीति से ही होगा। और हां पापा, आप चिंता न करो, मरने के बाद आपका शव मैं बिजली से जलवा दूंगा।‘

गौरव की बातें सुनकर उसके पापा और चाचा के चेहरे पेड़ से टूटी हुई सूखी डाल की तरह नीचे लटक गए।

निर्मला सिंह

जन्म स्थान, तिथि : बरेली, ०९ अप्रैल, १९४३
शिक्षा : एम.ए., एल.टी.
प्रकाशित पुस्तकें : उपन्यास – पिघलता सीसा, अक्षम्य
लघुकथा संग्रह – बबूल का पेड़, सांप और शहर।
कहानी संग्रह – पिंजरा खुल गया, क्षितिज के पार, धुंए के पहाड़, संजीवनी बूटी, धुंए की इमारत, सन-सेट-व्यू, मुठ्ठी में बंद खुशबू।
सम्मान : भारत व यूके की अनेक संस्थाओं द्वार सम्मानित
प्रकाशन : लगभग सभी भारतीय पत्र-पत्रिकाओं एवं पत्रिका पुरवाई (लन्दन) तथा बी.बी.सी., व आकाशवाणी से रचनाएं प्रकाशित प्रसारित