नीलम सक्सेना जयद, आशीष दलाल, अर्चना तिवारी, आलोक कुमार सातपुते

रिश्ता
दबरू ने खोली में ताला लगाया और देसी के ठेके पर पहुंच गया । आज उसने जमकर पीने का और घर से बाहर रहने का मन बनाया था। वह चाहता था देबू उसे घर पर न पाकर कहीं चला जाए, हमेशा के लिए। आखिर देबू उसका है ही कौन? क्यों करता है उसके लिए वह इतना सब कुछ ? जब से वह उसे कूड़े के ढेर से उठा कर लाया है तब से वह अपने शौक – मौज भूलकर, कमाई का सारा पैसा उसकी परवरिश में खर्च कर देता है। यह भी कोई जिंदगी है न शराब , न कबाब और न ही शबाब । खुद कभी स्कूल में पढ़ा नहीं लेकिन देबू को स्कूल भेजता है क्यों! दबरू ने ठर्रे की पूरी बोतल गट – गट गले से नीचे उतारी और वहीं बैठकर बुदबुदाने लगा, बहुत हो गया अब मुझे उससे कोई वास्ता नहीं रखना।
” बाबा, तुम यहाँ ठेके पर आराम से बैठकर पी रहे हो और मैं तुम्हें न जाने कहां- कहां ढूंढ आया?” सात वर्षीय देबू को सामने देख दबरू का नशा काफूर हो गया।
” बाबा, मैं तो डर ही गया था। अब कभी मुझे छोड़कर कहीं मत जाना, वरना मैं मर जाऊंगा ।” कहकर देबू सिसक – सिसक कर रोने लगा।
दबरू उसे एकटक देखने लगा । दिसंबर की कड़कड़ाती सर्दी में भी देबू के कपड़े पूरी तरह भीगे हुए थे , “क्यों रे , तू आज फिर पानी में खेल कर आया है ?” देबू ने कंप – कंपाती आवाज में कहा, ” नहीं बाबा मैं तो पानी के पास तक नहीं गया, आज तो कपड़े मेरे पसीने से भीगे हैं ।”
दबरू ने मन में सोचा मैं इससे क्यों बात कर रहा हूं ? नहीं मुझे इससे कोई रिश्ता नहीं रखना है… दबरु ने देबू को जोर से झिड़कते हुए कहा, ” अरे क्यों मेरे पीछे पड़ा है ? चला जा यहां से जहां तेरा मन करे, मेरा पीछा छोड़ दे । ” कहकर दबरु वहां से जाने लगा , थोड़ी दूर जाकर दबरु ने पीछे मुड़कर देखा; देबू अभी भी वहीं खड़ा उसे देख रहा था । दबरु वापस उसके पास आया और बोला, ” जाता क्यों नहीं ? जा – जाकर कहीं मर जा पर मेरा पीछा छोड़ दे ।
“नहीं बाबा , अब मैं तुम्हें छोड़कर कभी कहीं नहीं जाऊंगा।”
” ठीक है तू नहीं जाएगा तो मैं ही चला जाता हूं ” कहते हुए दबरू अभी कुछ ही कदम आगे बढ़ा था कि देबू के रोने की आवाज सुनकर रुक गया, उसने पीछे मुड़कर देखा ; देबू रो- रोकर एक शराबी से कह रहा था मैंने तुम्हें टक्कर नहीं मारी तुम खुद मुझसे आकर टकराए । शराबी ने देबू की तरफ थप्पड़ उछाला, दबरू ने आकर उसका हाथ पकड़ लिया और गुर्रा कर बोला, “जानता है यह कौन है बेटा है यह, मेरा बेटा ” देबू हैरानी से दबरू को देखने लगा ।

मोबाइल
निकिता को मायके में आए हुए पूरे 6 माह बीत चुके थे लेकिन दामाद जी ने किसी भी तरह से सुलह करने की कोई चेष्टा नहीं की । उनका कहना था कि निकिता जिस तरह से स्वयं गई है वैसे ही आ भी सकती है । एक दिन पापा सहित सब भाई निकिता के बाबत कोई निर्णय लेने के लिए बैठे । विचार – विमर्श , वाद- विवाद का रूप ले चुका था जिसमें तर्क – वितर्क के साथ कुतर्क को भी पूरा – पूरा स्थान मिल रहा था । निकिता के प्रति सभी का प्रेम स्पष्ट परिलक्षित हो रहा था । ससुराल में घटित हुई छोटी-बड़ी सभी बातों को निकिता बड़ा मुखर होकर बताने के साथ-साथ अपना पक्ष भी रखती जा रही थी । बीच-बीच में, समय-समय पर, अपने मायके वालों को मोबाइल पर बताई गई सभी बातों का जिक्र भी कर रही थी ।
अंत में सभी की सहमति से तलाक का केस दर्ज करने का निर्णय ले लिया गया, पूरे समय शांत बैठी मां की गंभीर मुद्रा स्पष्ट दर्शा रही थी कि वह किसी गहन चिंतन में डूबी हुई हैं। मां तन से वहां अवश्य थीं लेकिन मन से कहीं और। अपने समाज- रिश्तेदार में टूटते रिश्तों के अनेकानेक उदाहरण उनके मानस पटल पर एक- एक कर छाने लगे थे और उन टूटे रिश्तों की पीड़ा को भी वह महसूस कर रही थीं , इतना ही नहीं निकट भविष्य में घर में होने वाले परिवर्तन को भी वह भली-भांति देख समझ पा रही थीं जो कि स्वाभाविक ही था । भावावेश और अतिशयता में लिए गए निर्णय प्रायः गलत ही होते हैं । निकिता ने मां को लगभग झकझोरते हुए कहा,” मां आप भी तो कुछ बोलिए ।” मां ने स्वयं को संभालते हुए , बड़े सहज भाव से अपनी बात कही , “ठीक है, लेकिन मेरे विचार से रिश्ते को बचाए और बनाए रखने के लिए निकिता और दामाद जी को एक प्रयास और करना चाहिए ; निकिता को स्वयं ही अपने घर वापस चली जाना चाहिए । (निकिता से) सिर्फ और सिर्फ 6 महीने के लिए तुम अपना मोबाइल मुझे दे देना, हम सब दामाद जी के फोन पर ही तुमसे बात कर लिया करेंगे ।”

नीलम सक्सेना ‘जयद’
संपर्क सूत्र – 90129 19330


“कोई समय नहीं”
मेघना बचपन से अकेले ही जीव पक्षियों के साथ पली बड़ी हुई थी| उसके ममी-पापा दोनों सर्जन थे जो हर समय हस्पताल, क्लीनिक या कॉन्फ्रेंसेज़ में व्यस्त रहते थे| उनके पास अपने बच्चे के लिए कोई समय नहीं था, बस धन और शौरत के पीछे रहना जीवन लक्ष्य था| अकेली मेघना स्कुल के बाद अपने कमरे में पिंजरे में बंद पक्षी को अपना साथी समझती| आज विवाह के बाद फिर बैठी घर में पिंजरे को पकड़ खुद को बहलाती बोली, “हमारी नियति शुरू से ऐसी ही है| पहले ममी-पापा साथ नहीं होते थे| विवाह के बाद पति हर समय अपनी ही दुनिया में मस्त हैं| मीठू, तुम्हारे सिवा मुझे कोई नहीं समझता|” मेघना सोच रही थी कि खिड़की के बाहर दूर बैठा खग अपनी स्वछंद स्वतंत्र जिंदगी का आनंद ले रहा है और हम किसी साथ के इंतज़ार में हमेशा बैठे सोचते रहते हैं| मेघना ने इसी कशमश में पिंजरा खोल दिया और बोली, “जाओ, तुम तो खुली हवा में सांस लो, ऐसी ज़िंदगी का क्या फायदा? अपनी मर्ज़ी से खुद के लिए जीने में ही वास्तविक ख़ुशी मिलती है|” मेघना बेकाबू और अशांत मन से अपना बैग तैयार कर पत्र लिख अकेले पहाड़ों में घूमने निकल पड़ी|

********

बेटी का सुख
‘मनीष जी, समय की नजाकत परखते हुए आपको अब फैसला ले ही लेना चाहिए. अब आप जब तक आपकी संपत्ति का झगड़ा अपने भाई और पिताजी के संग सुलझा नहीं लेते मैं अपनी बेटी को तब तक आपके संग वापस नहीं भेजूंगा.’ एक फैसला सुनाते हुए वह उसकी तरफ मुखातिब हुए.
‘पापा जी, ये मसला बड़ा ही उलझा हुआ है. भैया पुश्तैनी मकान छोड़ेगा नहीं और समस्या सुलझेगी नहीं.’ अपने ससुर की बात सुनकर वह बोला.
‘तो आप अपनी जिद छोड़ दीजिए. वैसे भी उस मकान के एवज में आपको मन चाही रकम तो मिल रही है.’ ससुर ने उसे समझाते हुए पीछे हट जाने को कहा.
‘भविष्य में गांव के पास से बुलेट ट्रेन निकलने वाली है तब उस मकान की जमीन के भाव करोड़ों में आयेंगे. ऐसे कैसे छोड़ दूं?’ उसके दिमाग में गिनती चलने लगी.
‘मनीष जी, देखिए. आपके माता पिता आपके भाई के साथ उस पुश्तैनी मकान की वजह से ही रह रहे है. ऐसे में उनके सारे खर्चे और बीमारी में देखभाल की जिम्मेदारी आपके भाई की ही बन जाती है. आपके हिस्से अगर वह मकान आ भी गया तो उसके साथ आपके माता पिता का खर्चा और उनकी जिम्मेदारी भी आ जाएगी. ऐसे में आप दोनों की स्वतंत्रता जाती रहेगी. मैं तो कहता हूं उस मकान को छोड़ देने में ही आपकी भलाई है.’ उन्हें अपनी बेटी के भविष्य की चिन्ता सता रही थी.
‘पापा, आपने तो कभी भी बेटे और बेटी में भेद नहीं किया.’ वह अपने ससुर की बात का कोई जवाब दे पाता उससे पहले ही उनकी बातें सुन रही बेटी बोल उठी.
दोनों उसके कहने का भावार्थ न समझ पाने की वजह से उसका चेहरा ताकने लगे.
‘इनकी जगह आज अनुज भैया होते तो क्या आप उन्हें भी यही सलाह देते?’ अपनी बात रखकर अब बेटी उनका चेहरा पढ़ने की कोशिश कर रही थी.


कोई अपना सा
उसके चेहरे पर बड़ी हसरत से अपना झुर्रीभरा हाथ फेरते हुए कांपते हुए होंठों से वह कुछ बोलने को हुई.
‘आ गया रे तू बेटा. अपना नया घर बन गया न? मुझे यहां से वापस ले जाने आया है न?’ उसे देखकर वृद्धाश्रम में पड़े पड़े एक लंबे इन्तजार से सूनी और सूखी हो चुकी आंखों से अचानक ही खारा पानी बहने लगा. बेटे की सारी गलतियां जैसे अथाह समंदर में समा गई.
उसकी आंखें भी गीली हो आई. अब इस उमड़ते हुए सैलाब को सम्हालना उसके लिए मुश्किल हो रहा था. उसने धीरे से उसका हाथ अपने हाथों में लेकर हल्के से दबाया और भीगी पलकों के साये में हां में सिर हिला दिया. उसका जवाब पाकर खुश हो गई और मुस्कुराकर उसने उसके माथे को चूम लिया.
अपनी आंखों को पोंछते हुए उसने अपने पास खड़ी नर्स को कुछ निर्देश दिए और स्थेटेस्कोप को सम्हाले हुए अगले बेड की तरफ बढ़ गया.
संतुष्ट होकर वह वापस एक सपना लेकर अपने बिस्तर पर लेट गई.


अस्तित्व की लड़ाई
उसके पति होने के नाते एबोर्शन पेपर पर अपनी सहमति दर्शाते हुए वह साइन करने ही जा रहा था कि सहसा उसकी नजर दरवाजे के बाहर लगातार चहक कर शोरगुल करते हुए चिड़िया के उस जोड़े पर पड़ी ।
जिज्ञासावश उसने दरवाजे के बाहर जाकर देखा । अस्पताल की सीढ़ियों पर एक अंडा टूटा पड़ा था और उसके आसपास चक्कर लगाते हुए चिड़िया का वह जोड़ा लगातार अपनी भाषा में चीखकर अपने अजन्मे अंश के खत्म हो जाने का दुख व्यक्त कर रहे थे ।
कुछ सोचकर वह अन्दर गया । उसने अपनी पत्नी की ओर देखा और एबोर्शन पेपर हाथ में लेकर उसे फाड़कर कचरा पेटी के हवाले कर दिया ।
अपने पेट पर हाथ रखकर उदर में पल रही उस नन्हीं सी जान के सलामत होने के अहसास को उसने महसूस किया और पति का हाथ थामकर अस्पताल से बाहर निकल गई ।

अपनी लछमी
‘जान पड़े है कि बटेसर सिंह ठीक से न राखे है धन्नों को। उसे बेचे हुए आज दस दिन हो गए और इन दस दिनों में सांझ ढले दस बार वापस आ गई है अपने पुराने घर।’ उसने उसके मुंह में चारे का पुला रखते हुए अपनी घरवाली से कहा।
‘गाय हो या छोरी। अपना घर आसानी से ना भूले है बखत तो लगेगा ही।’ घरवाली ने जवाब दिया।
‘बटेसर से बात करनी होगी। लागे है वह इसे मारे है। देख, यहां इसके पेट पर सोटी का यह निशान। जनावर है तो क्या हुआ इस तरह थोड़े ही मारा जाता है।’ अब उसका हाथ उसके पेट को सहला रहा था।
‘जरूर बात करो जी। जे तो अच्छी बात है पर बुरा न मानों तो एक बात कहूं ?’ कहते हुए घरवाली उदास सी हो गई।
‘बोल।’ उसके पास से वह घरवाली के पास आकर खड़ा हो गया।
‘जे समझदारी अपनी लछमी के सासरे से दो बार वापस आने पर उसके गाल पर पड़ी उंगलियों की छाप देखकर उसे फिर वापस न भेजकर दिखाई होती तो आज वह हमारे साथ जिन्दा होती।’ घरवाली की आंखों में छाये विषाद को उसने महसूस किया और अगले ही पल धन्नों को खूंटे से बांधकर अन्दर जाकर दस दिन पहले बटेसर सिंह के दिए दस हजार उठाकर उसके घर की तरफ रवाना हो गया।


सिमटती हुई परिभाषा
‘तुझे किसने कहा था यह फॉर्म भरने को ? सबकुछ गलत भर दिया है ।’ अपने किशोरवय बेटे द्वारा भरा गया लाइफ इन्श्योरेंस का फॉर्म देखकर वह उस पर बरसते हुए चिल्ला उठे ।
‘मैं तो आपकी मदद कर रहा था । परिवार वालों के नाम ही भरने थे ।’ बेटे ने सहमते हुए जवाब दिया ।
‘समझ नहीं आता तो पूछ लेना चाहिए । मेरा काम बढ़ा दिया है । अब फिर से यह फॉर्म डाउनलोड करना पड़ेगा ।’ झुँझलाते हुए वह बड़बड़ाया ।
‘पर बताओं तो सही कि गलत क्या लिखा है तो आगे से गलती न हो ।’ बेटे ने हिम्मतकर पूछा ।
‘ये इधर देख, फैमेली मेम्बर में तूने दादी नाम लिख दिया है ।’ बेटे को समझाते हुए वह बोला ।
‘तो गलत क्या है इसमें । दादी हमारे साथ रहती है । हमारे परिवार का भाग है ।’ बेटे ने दलील की ।
‘फॉर्म की इस लाइन के नीचे ये लगी हुई रिमार्क पढ़ी तूने ? इमिडीएट फैमेली मेम्बर्स के नाम लिखने थे यहाँ ।’ उसने आगे समझाते हुए कहा ।
‘मतलब ?’ बेटे ने सिर खुजलाते हुए पूछा ।
‘मेरी इमिडीएट फैमेली मतलब तू, मैं और तेरी मम्मी ।’
‘तो दादी किसकी फैमेली में आएँगी ?’ बेटे का प्रश्न सुनकर वह हाथ में थाम रखे लाइफ इन्श्योरेस के फॉर्म में दर्शायी गई परिवार की व्यख्या को समझने की नाकाम कोशिश कर रहा था ।

आशीष दलाल
खगनौल, मध्यप्रदेश


कोहरा

कोहरा छँट गया था किंतु हड्डियों के साथ ठंड की जंग जारी थी। नुक्कड़ पर ज़िंदगी की धमक दिखने लगी थी। हमेशा की तरह भोला के ढाबे पर चाय के तलबगारों का जमावड़ा जुटने लगा था।
“बेssर लेssव बेssर! खट्टे-मीठे बेर!”
लैंपपोस्ट के खम्भे के नीचे बैठी बेरवाली ने टेर लगाई। उसने रैपरों व पोलीथीन की थैलियों को सुलगा रखा था। जिसमें अपनी ठिठुरती उँगलियाँ सेंकने की कोशिश कर रही थी।
उधर सुरतिया चार-पाँच रोज़ से बुखार में बेसुध पड़ी थी। आज थोड़ा होश आया तो नंदू की चिंता सताने लगी। खटोले पर लेटे-लेटे धोती के पल्ले से पाँच का सिक्का खोल कर नंदू को थमाते हुए कहा, “जा नुक्कड़ से कुछ लैके खा ले बचवा!”
“अम्मा अउर पइसा दे ना, जलेबी खान का बड़ा मन है।” नंदू ठुनका।
“अकल्ली ई पंजी बची है बचवा…काम पर नहीं गए ना…” आँखों को ढपते हुए सुरतिया ने समझाया।
नंदू साइकिल का टायर लुढ़काते हुए नुक्कड़ की ओर चल पड़ा। बेरवाली की अभी तक बोहनी नहीं हुई थी। वह अभी भी पोलीथिन सुलगा रही थी। बीच-बीच में आवाज़ भी लगाती जा रही थी।
“चचा, हमको समोसा चाहिए।” नंदू ने पाँच का सिक्का भोला की ओर बढ़ाते हुए कहा।
“पाँच में समोसा नहीं मिलता…क्यों सुबह-सुबह बोहनी का टाइम खराब करता है।” भोला ने नंदू को घुड़का।
नंदू रुआँसा हो पीछे हट गया। वह ढाबे में तले जा रहे समोसे और जलेबियों को बड़ी हसरत से देखे जा रहा था।
“लेव बेर! खट्टे-मीठे बेर!” बेरवाली ने फिर आवाज़ लगाई।
उसकी आवाज़ सुनकर नंदू पलटा। चिट-चिट कर जलते रैपरों को देख कर वह उसके निकट पहुँचा। कुछ क्षण के लिए उसकी भूख रैपरों से उठने वाली रंगीन लपटों के आकर्षण में भटक गई।
लपट मद्धिम पड़ने लगी तो नंदू ने अपना टायर लपट के ऊपर कर दिया। टायर जलने लगा। बेरवाली उसमें अपने हाथ-पैर सेंकने लगी। उसने गुनगुनी मुस्कान भरी निगाहों से नंदू को देखा। फिर डलिया से कुछ बेर लेकर नंदू के हाथ में थमा दिया। धीरे-धीरे टायर आग के गोले में बदल गया।
समय की आग में बहुत कुछ बदल गया। भोला का ढाबा काँच के केबिन में बदल गया। उसकी कुर्सी गद्देदार हो गई है। अब वहाँ उसका बेटा बैठता है। लैंपपोस्ट का पीला बल्ब एलईडी में बदल गया।
नंदू है कि अभी भी पंजी लिए समोसे को हसरत से देख रहा है। बेर वाली की टेर अभी भी ग्राहकों के कानों तक पहुँचने में नाकामयाब है। और कोहरा है कि फिर छा जाता है।


पलमानेन्ट
“सबेरे से कुछ बिका कि नहीं रे?” बिसुना खी-खी करता हुआ शामली को छेड़ने लगा।
“ये लो… तो का नाहीं? दुकान रखते ही ग्वालिन, गनेशा और ऊ बड़का सिपहिया फौरन बिका गया!”
“अच्छा! ई बात!…तो ऊ चटख रंग वाली मातारानी के कोई काहे नहीं ले गया?…हेहेहे…ऽ…!”
“लोग ले जायेंगे उनको भी… का पता अभी जरूरत ना हो?” आखिरी शब्द धीमे-से बोलते हुए शामली पास रखी माता रानी की मूर्ति को सामने खिसका कर झाड़ने-पोछने लगी।
“हीहीही, जरूरत? ऊ गवालिन तिख्खी नाक-नकस वाली रही तबै बिका गई… और ई माता रानी की नाक तुमरे पर गई है… हीही…तनी मोटी-मोटी, पसरी-पसरी है।” बिसुना ने फिर छेड़ा।
“चल भाग हियाँ से…माता रानी के लिए अइसा बोल रहे हो? तुमरी आँख फूटे…”शामली ने घुड़की देते हुए घूरा।
“लेव तो का झूठ बोले हम… पसरी नहीं है का? हमरी माता रानी देखी थी तू!… कितनी सुहा रही थीं!… तिख्खी नाक…फौरन सेठ लय लिए!”
“सेठ लय लिए… हुँह! मटीरल केतना घटिया रहा! कोई छू दिया तो भहराय के चली आएँगी नीचे… और रंग तो हाथ लगते ही उतर जाएगा…!” अबकी शामली ने पैतरा बदला।
“हाँ-आँ… तो कौन-सा पलमानेन्ट रखना है? और तुम्हारी मातारानी?… अच्छा मटीरल से का हुआ… मोटी-पसरी नाक ना, जिसे कोई पूछा तक नहीं…हिहीही!” बिसुना फिर खींखीं किया।
अबकी शामली ने ढेला उठाकर बिसुना के पैरों पर दे मारा। बिसुना कूदकर हट गया और अंगूठा दिखाते हुए अपनी दुकान की ओर भाग गया।
शामली की आँखों में आँसू आ गए। वह हताश होकर बैठ गई। देवी की मूर्ति को एकटक निहारा और दोबारा कपड़े से झाड़ते हुए बड़बड़ाने लगी।
“वाह रे आदमी जात…नाक-नकसा बिगड़ने से न हमें कोई पूछता है और न मातारानी को… कहा था दद्दा से कि मिट्टी में पानी संभालकर डारो… अब उनको भी का कहें, आँख से दीखे तब ना… लेकिन चिंता न करो मैय्या, हम करते हैं कुछ…पलमानेन्ट!”
शामली ने मूर्ति को बोरी में डाल लिया। आस-पास खेल रहे बच्चों की सहायता से मूर्ति को सिर पर रखा और ठसक भरी चाल चलते हुए मुड़ गई बस्ती की ओर।
आज दशमी है। नगर के सभी पण्डाल निर्जन पड़े हैं। प्रतिमाएँ विसर्जित हो चुकी हैं।
बस्ती का एक छोटा-सा मन्दिर पहली बार सुगंध और मद्धिम प्रकाश बिखेर रहा है। आज उसको अपनी देवी जो मिल गई हैं।

शिखरों की चिंता
वह चलते-चलते पहाड़ के सामने पहुँचा। बिना थमे वह ऊपर चढ़ने लगा। क्योंकि उसे तो चलना ही था।
उसे अपनी ओर आता देख पहाड़ मन ही मन हँसा, “लघुजीव और आसमान के ख्वाब!”
जब वह चौथाई रास्ता तय कर थोड़ा रुका तो पहाड़ मंद-मंद मुस्कुराते हुए बोला, “तुमसे न होगा, अभी कमज़ोर हो।”
वह कुछ न बोला, दोबारा चलने लगा। धीरे-धीरे वह पहाड़ के आधे तक पहुँच गया।
यह देख पहाड़ बोला, “यदि तुम्हारा इरादा मुझ पर विजय पाना है तो भूल जाओ, तुम जितना चढ़ोगे उसके कई गुणा मैं ऊँचा होता जाऊँगा क्योंकि मुझ पर लगातार अवसादों की परत चढ़ती जा रही है इसलिए तुम्हारी मेहनत व्यर्थ है।”
वह फिर भी बिना कुछ बोले चलता रहा।
बात को नज़रअंदाज करने से पहाड़ क्रोधित हो उठा। उसने पत्थर लुढ़काने शुरू कर दिए। वह थोड़ा थमा किंतु फिर चलने लगा। यह देखकर पहाड़ ने बड़े-बड़े पत्थर लुढ़काने शुरू कर दिए।
जब पत्थर उसकी ओर आता तो वह किसी बड़े पत्थर की ओट में हो लेता।
उसे रोकने के लिए पहाड़ निरंतर पत्थर लुढ़काता रहा। और वह थमता-चलता रहा। परिणामस्वरूप लगातार बड़े-बड़े पत्थर लुढ़काने से पहाड़ की ऊँचाई घटने लगी और वह शिखर पर पहुँच गया। फिर भी उसने चलना नहीं छोड़ा।
उसको निरंतर चलता देख खंडित, ध्वंसित, मानमर्दित पहाड़ ने हताशा भरे स्वर में पूछा, “अब तो तुमने मुझ पर विजय प्राप्त कर ही ली, अब क्या…?”
यह सुनकर दुःखी होते हुए वह बोला, “भाई, मैं दूसरी ओर तलहटी में अपने लोगों की मदद के लिए जा रहा हूँ…इसलिए मुझे तो चलना ही है…किंतु यह जानकर बहुत अफ़सोस हुआ कि अपने पर विजित होने के भय से आपने नाहक ही अपनी उच्चता समाप्त कर ली, क्षमा प्रार्थी हूँ अनजाने में आपको कष्ट दिया।”

रौनक : लघुकथा
“शाल, नी कैप, बाम, हेल्थ ड्रिंक्स, बिस्किट्स ये सब चीज़ें तो दिल्ली में भी मिलती हैं। फिर यहाँ से लाद कर ले जाने की क्या ज़रूरत है ?” स्नेहा को चीज़ें बैग में डालते देख शिखर ने पूछा।
“मिलती हैं, लेकिन ऑफिस में काम के बाद मैं ये सब चीज़ें खरीदने लगूँगी तो आधा दिन बर्बाद हो जाएगा। बहुत दिनों बाद माँ से मिल रही हूँ। इसलिए मैं चाहती हूँ कि कम से कम आधा दिन तो उनके साथ गुज़ारूँ, न कि शॉपिंग करते हुए।“
“तो ऑनलाइन ही भेज देतीं।” शिखर ने तर्क दिया।
“ हाँ, भेज सकती थी श्रीमान शिखर जी। और पिछली बार भेजी भी थीं। लेकिन सारे ड्रिंक्स पड़े-पड़े एक्सपायर हो गए थे। माँ ने उनके पैक भी नहीं खोले थे।”
“हो सकता है माँ को उसका फ़्लेवर ना पसंद आया हो।”
“अच्छा, लेकिन पिछली बार जो मैंने बाज़ार से लाकर दिया था, सेम फ़्लेवर। उसे तो माँ ने तुरंत खोल कर पिया था।”
“ऐसा क्यों ?” शिखर ने पूछा।
“ऐसा इसलिए कि प्यार के एहसास ऑनलाइन नहीं मिलते।” स्नेहा ने शिखर की नाक पकड़कर हिलाते हुए जवाब दिया।
“ओके ओके, योर हाइनेस।” कहते हुए शिखर ने सिर से कैप उतार कर झुकने का अभिनय किया। फिर दोनों खिलखिलाकर हँस पड़े।
स्नेहा ने माँ को फ़ोन पर बताया कि वह दो दिन के लिए दिल्ली आ रही है। खबर सुनते ही घुटने पकड़ कर चलने वाली आशा के शरीर में बिजली की सी स्फूर्ति आ गई।
“सुन रज्जो, स्नेहा का कमरा ठीक कर देना। वह दो दिन के लिए आ रही है।” आशा ने काम करने वाली को निर्देश दिया।
“जी मेम साब।”
“और सुन साब आएँ तो उन्हें चाय पिला देना। मैं सुपरमार्केट जा रही हूँ।” कहकर आशा सुपर मार्केट चली गईं।
काउन्टर पर बिल चुका वे जैसे ही मुड़ीं तो सामने उनकी सहकर्मी शीला मिल गईं।
“अरे, आप यहाँ?” शीला ने आश्चर्य प्रकट किया।
“हाँ कुछ सामान लेना था।” आशा ने जवाब दिया।
“कोई आने वाला है क्या ?” शीला जी ने पूछा।
“हाँ, हमारे घर की रौनक आने वाली है।”
“अच्छा तो बिटिया आ रही है !”
“हाँ शीला, हमारी बहूरानी स्नेहा आ रही हैं।” कहते हुए आशा का चेहरा ख़ुशी से चमक उठा।

आप कौन हैं?
“आपका परिचय?”
“कोशिश कीजिए, पहचान लेंगे, आपसे करीबी संबंध है।”
“हम्म, बातों से, हुलिए से तो कोई शिक्षक जान पड़ते हैं।”
“यूँ समझ सकते हैं, किंतु अभी और तहें खोलनी पड़ेंगी।”
“और तहें खोलनी पड़ेंगी, यह तो कहानी वाली बात हो गई, अच्छा तो आप कहानीकार भी हैं!”
“न..दोनों का मिला-जुला रूप किंतु पहचान अभी भी अधूरी है।”
“दोनों का मिला-जुला रूप…समझे, यानी आप विद्वान हैं?”
“ना जी!”
“तो फिर आप ही बता दीजिए!”
“बहुरूपिया।”
“बहुरूपिया? वो आपका हुलिया, आपकी पुस्तकें, आपका ज्ञान…वो सब…?”
“वो सब दिखावा है।”
“फिर भी लोग आपको सुनते हैं, पढ़ते हैं, वाहवाही करते हैं!”
“हाँ, क्योंकि लोग भी तो दिखावा ही कर रहे होते हैं ना, गुनता कौन है?”

कालजयी पात्र:
“शिष्यों, हम चाहते हैं कि इस बार किसान पर शोध जाए।”
“यह तो बहुत नेक काम है सर!”
“तो सबसे पहले कुछ मानिंद लेखकों से कहानियाँ मंगवा ली जाए!”
“ठीक है सर, लेकिन इस संबंध में एक बात मन में आ रही है!”
“अरे निस्संकोच होकर कहो!”
“सर्रर, ये जो किसान पर शोध करने की बात कर रहे हैं क्या उनका कहानी में होना जरूरी है?”
“क्या मतलब, शोध करने के लिए कहानी में किसान पात्र तो चइएँ ही!”
“मतलब कि हकीकत में जो किसान कर रहे हैं क्या उनका जिक्र नहीं होना चाहिए?”
“अजीब बात करते हो, हकीकत के पात्रों पर शोध हुआ है कभी?”
“किंतु सर, शोध में नयी चीजें भी आनी चाहिए न!”
“ओ, अच्छा, हम्म समझ गए तुम्हारा इशारा किनकी ओर है!”
“जी जी, तो क्या उनका जिक्र किया जाए?”
“ए भाई, हमें कहानियों में स्थित किसान पात्रों पर शोध करना है, जो लेखकों के कलम की नोक के दायरे में रहते हों! जिनके बारे में पढ़कर अश्रुपूरित दया भाव जागृत हो न कि वो जो खेतों को छोड़कर सड़कों पर ट्रैक्टर चलाते फिरें!”
“किंतु सर ऐसा तो वे आंदोलन के लिए कर रहे हैं न।”
“देख भाई, जिन किसानों की तुम बात कर रहे हो उनमें से एक भी ‘अधखुले अंग जिनमें केवल है कसे हुए कुछ अस्थि-खण्ड’ को परिभाषित करता है क्या?”
“पर सर अब जमाना बदल गया है, हर कोई तरक्की कर रहा है!”
“चेले, एक बात जान ले! शोध के योग्य वही पात्र होते हैं जो शोषित हुए हों और ऐसे पात्र ही कहानी को कालजयी बनाते हैं।”

-अर्चना तिवारी
********

दूनी हैसियत
उस आदमी ने पचास प्रतिशत् डिस्काउण्ट वाली दुकान से आठ सौ रूपये के जूते खरीदे, जो पचास प्रतिशत् डिस्काउण्ट के बाद उसे चार सौ के पडे़।
वह जूते पहनकर घूमता रहा। लोगों के लाख टोकने पर भी उसने अपने जूतों से क़ीमत का टैग नहीं निकाला, जिसमें जूते की क़ीमत आठ सौ रूपये लिखी हुई थी।
उसने जूतों को उनके फटते तक पहना। और आख़री तक टैग नहीे निकाला ।
…इस तरह वह आदमी अपनी हैसियत से दूनी हैसियत का आदमी बना रहा।


उल्टा चाकू
आरिफ़ मोहम्मद तेज़ कदमों से फुटपाथ पर चला जा रहा था।उसके शहर में कल ही एक मॉब-लिंचिंग की घटना हुई थी। उस लिंचिंग का विरोध करने के लिये यूनिवर्सिटी के छात्रों द्वारा सड़क पर जुलूस निकाला जा रहा था।कल हुई लिंचिंग के बारे में याद कर आरिफ़ सिहर उठा था। भीड़ कैसे उस मुसलमान को चोरी के शक में पीट रही थी। उस भीड़ में जिसके मुंह में जो आ रहा था, वह उस मुसलमान से कहने को कह रहा था। घबराहट के मारे आरिफ़ वहां ज़्यादह देर तक नहीं रुका था। शाम को उसे पता चला था कि भीड़ ने उस व्यक्ति को मार डाला है। उस दृश्य को याद कर वह पसीने-पसीने हो उठा।
चलते-चलते अचानक आरिफ़ की नज़र फुटपाथ से नीचे सड़क पर खड़े एक अंधे व्यक्ति पर पड़ी।वह शायद सड़क क्रॉस करना चाह रहा था। आरिफ़ उसके नज़दीक पहुँचा और बोला-सूरदासजी क्या आपको सड़क की दूसरी तरफ जाना है?
अंधे के हामी भरने पर आरिफ़ ने उसका हाथ पकड़ा और उसे सड़क क्रॉस कराने लगा।जुलूस अब तक आगे बढ़ चुका था।
अभी इतना शोरगुल क्यों हो रहा था? अंधे ने उससे पूछा।
कल शहर में एक मॉब लिंचिंग की घटना हो गई। उसी के विरोध में कॉलेज़ के छात्रों का प्रदर्शन जुलूस था। वे नारे लगाते हुए जा रहे थे,इसलिये शोरगुल हो रहा था।
ये मॉब लीचिंग क्या होती है?अंधे ने प्रश्न किया।
किसी आदमी को जब भीड़ घेरकर मार देती है,तो उसे मॉब- लिंचिंग कहते हैं। आरिफ़ ने जवाब दिया।
अरे यह तो बहुत ग़लत बात है। लोगों की भीड़ द्वारा किसी को घेरकर मार डालना तो कायरता वाली बात है। वैसे भीड़ ने किसको मार डाला?
सूरदासजी कोई तनवीर अहमद नाम का आदमी था।आरिफ़ ने जवाब दिया।
तब तो भीड़ ने बहुत सही किया है।ये साले पठान बहुत चढ़े-बढ़े हैं। इनको तो इनके देश पाकिस्तान भेज देना चाहिये।अंधे के मुँह से इतना सुनते ही आरिफ़ भीतर तक दहल गया। उसके हाथ-पैर कांपने लगे। उस अंधे का हाथ अब उसे बेतरह चुभने लगा। उसे लगा कि उसने किसी बेहद तेज़ धार वाले चाकू को मूठ की तरफ़ से न पकड़कर, धार की तरफ़ से पकड़ रखा है। उसे महसूस हुआ कि उस चाकू की धार से उसका हाथ लहुलुहान हो गया है। अब तक दोनों सड़क की दूसरी तरफ़ पहुंच चुके थे। सामने एक गटर का ढक्कन खुला हुआ था।एक क्षण के लिए आरिफ़ को लगा,इस चाकू को गटर में फेंक दिया जाये, पर अचानक ही उसके ईमान ने सरगोशी की- कायर कहीं के। वह एक झटके से उस अंधे से अलग हुआ और बहुत तेज़ी से आगे की तरफ़ बढ़ गया।

न्याय- (एक बंद कमरे में)
जांच अधिकारी- तुमने उन आठ आरोपियों का एनकाउंटर किस बिना पर किया?
पुलिस- सर वे बेहद ख़तरनाक मुजरिम थे, और समाज के लिए बेहद घातक थे, सो जन-भावनाओं के मद्देनज़र हमने उन आठों का एनकाउंटर कर दिया…इस बात का हमें बिल्कुल भी अफ़सोस नहीं है, बल्कि खुशी है।
जांच अधिकारी- कौन से “जन” और कौन सी “भावना”? क्या तुम उस “जन” की बात कर रहे हो, जो अपराध को रोकने का प्रयास करने की बजाय, उसका वीडियो बनाता है? या उस जन की बात कर रहे हो, जो अपने “हम-जात” या “हम-धरम” द्वारा किये गये अपराध को जायज ठहराकर उसका उत्सव मनाता है?यह ‘जन” नहीं “भीड़” है।
पुलिस- न्याय मिलने में इतना विलंब होता है कि लोगों का भरोसा न्यायिक प्रक्रिया से उठ गया है, ऐसे में हम भी क्या करें। आखिर न्याय कैसे मिले?
जांच अधिकारी -एनकाउंटर तो करो, लेकिन अपराध को रोकने की बजाय उसका वीडियो बनाने वाले नपुंसकों और अपराध को प्रोत्साहित कर उसका उत्सव मनाने वाली भीड़ का। तब कहीं जाकर सही मुआमले में न्याय होगा।
(लघुकथा संग्रह मोक्ष से)

नियति
——–
मॉब लिंचिंग के लिए घेर लिये गये एक मुसलमान से भीड़ ने कहा-बोलो वन्दे-मातरम।
मुसलमान ने पूरी ताक़त से कहना शुरू किया -वन्दे मातरम…सुजलाम सुफलाम मलयज शितलाम शस्य श्यामलाम मातरम।वन्दे मातरम…शुभ्र ज्योत्सनाम…
जान बच जाने की उम्मीद में उसने पूरा वंदेमातरम ही सुना दिया।
भीड़ अवाक रह गई। भीड़ में किसी को भी “वन्देमातरम” शब्द के अलावा कुछ नहीं मालूम था।
अब इससे पहले कि मॉब लिंचिंग का कार्यक्रम स्थगित होता,अचानक भीड़ में कहीं से आवाज़ आई- मुसलमान होकर संस्कृत बोलता है…मारो साले कटुए को।
और तयशुदा कार्यक्रम के अनुसार मॉब लिंचिंग हो गई।

दान
‘ये देखो, एक घुमक्कड़ बाबा ने मुझे मोती-मूँगा और पुखराज रत्न दिया और मैंने उसे सिर्फ सौ रूपये टिका दिया…मानते हो कि नहीं, कि हम भी उस्ताद हैं।’
‘‘अरे यार ये तो कोई अन्धा भी बता देगा कि ये रत्न नकली हैं। इस मोती की तो पाॅलिश भी निकल रही है। ये रत्न तो दस रूपये में भी महँगे हैं।’’
‘छोड़ो ना यार, वो बाबा बड़ा ही सिद्ध पुरूष था। उसने मुझे भरपूर दुआएँ दीं। आज जहाँ माँ-बाप तक अपने बच्चों को तक पानी पी-पीकर कोसते हों, वहाँ उसने मुझे दुआएँ दी.ं..समझो मैंने उसे उसकी दुआओं के बदले में पैसे दे दिये।’
‘‘अरे भइया ऐसे में तो हर आदमी दुआओं का कारोबार शुरू कर देगा।’’
‘अरे यार आप तो हमेशा निगेटिव सोचते हो। अरे भाई दान-घरम भी तो कोई चीज है। समझो हमने सौ रूपये दान कर दिये।’

गाँधी-जयन्ती
उस नगर निगम में गाँधी-जयन्ती मनाने के निर्देश शासन से प्राप्त हुए थे, जिसपर चर्चा के लिए वहाँ पार्षदों की बैठक हो रही थी।
पार्षदों में से एंग्लो-इण्डियन पार्षद ने कहना शुरू किया-हम सबको महात्मा गाँधी की जयन्ती धूमधाम से मनानी चाहिये। इस पर एक दूसरे पार्षद ने व्यंग्य कसा-हाँ भई, क्यों नहीं, गाँधीजी तो अंग्रेज़ों के मित्रे थे। हमेशा से¬फ़्टी वाॅल्व की तरह काम करते रहे।
माहौल को तनावपूर्ण होनेे से बचाने के लिए एक उद्योगपति पार्षद ने कहना शुरू किया-महात्मा वास्तव में महात्मा ही थे। उन पर इस तरह की टीका-टिप्पणी ठीक नहीं है। इस पर एक अन्य पार्षद ने फिक़रा कसा-हाँ भई, आप तो ऐसा बोलेंगे ही, क्योंकि गाँधीजी तो पूरे पूँजीवादी थे। एक प्रसिद्ध उद्योगपति से उनकी निकटता किसी से छिपी नहीं थी।
धीरे-धीरे बैठक में शोर बढ़ने लगा। मुस्लिम पार्षद गाँधी के ‘वैष्णव जन तो तेने कहिये’ और ‘हे राम’ पर ऊंगलियाँ उठाते हुए उन्हेें कट्टर हिन्दू कहने लगे, तो कट्टर हिन्दू पार्षद उन्हें मुसलमानों के दलाल के रूप में बँटवारे के लिए ज़िम्मेदार बताने लगे।
दलित पार्षद हरिजन शब्द की व्याख्या करते हुए कहने लगे कि गाँधीजी अछूतोद्धार का ढोंग करते रहे। कुछ देर बाद ऐसी स्थिति आयी कि शोर में किसी को कुछ भी सुनाई नहीं देने लगा, और आख़िर में सभापति ने हस्तक्षेप करते हुए कहा-आप लोग शाँत हो जाइये। हमें गाँधी जयन्ती सिर्फ़ इसलिए मनानी है, क्योंकि शासन से हमें इसके लिए निर्देश प्राप्त हुए हैं।
…और इसके बाद बैठक विसर्जित हो जाती है।

आलोक कुमार सातपुते

error: Content is protected !!