यात्रावृत्तः प्रकृति की गोद में जीवन -अनिता रश्मि


हमारा देश अप्रतिम सौंदर्य से भरा। हमारा झारखण्ड भी। झारखण्ड के जर्रे-जर्रे को प्रकृति ने मुक्त हस्त से सजाया है। हर तरफ निर्झर-नदियाँ, पहाड़-पठार, घाटी-वन, तालाब-अहरा। यहाँ जिधर भी निकल जाएँ, प्राकृतिक दृश्य आपके पाँवों को रोक लेंगे, आँखों को सुकून पहुँचाएँगे। पर्यटनाकाश पर चमकने के लिए यह पूरी तरह से तैयार है। वन और प्रकृतिपूजक वनवासी अपनी उपस्थिति से पर्यावरण का वह रूप दिखलाते हैं कि मन बाग-बाग!

लेखन की अनेक विधाओं में सबसे ज्यादा मेरी प्रिय विधा यात्रा वृत्तान्त रही है। वजह-उपन्यास, कहानी, लघुकथा तकलीफ़देह स्थितियों पर तकलीफ़ में डूबने के बाद लिखा। लेकिन जीवन में केवल दुःख-दर्द, तकलीफ़ नहीं है। प्रकृति ने जितना दिया है, जो दिया है, सब आन्नद की सृष्टि करता है… आन्नद की अलौकिक वर्षा! मानव-प्रदत अनेक चीजें, निर्माण भी। अतः यायावरी हमेशा सुखद। कई अज्ञात रहस्यों से रू-ब-रू करानेवाला भी। उस पर लिखना हमेशा सुखदायी।

बहुत दिनों से राँची के आस-पास के प्राकृतिक स्थलों के नवीनतम बदलाव से मिलने की इच्छा थी। पहले भी कई जलप्रपातों में भटक चुकी थी। इधर फिर से इच्छाएँ जोर मारने लगीं। मैं परिवर्तन देखना चाहती थी हर जगह का। शुरूआत दशम जलप्रपात से करना चाहा और हम छः लोग पहुँच गए राँची से 45 कि. मी. दूर बुंडु स्थित दशम जलप्रपात। राँची, हजारीबाग हर तरफ से यहाँ आने के लिए बस, छोटी गाड़ियाँ मिल जाती हैं।
रास्ते भर कुसुम के गगनचुम्बी लाल पत्तियोंवाला कुसुम, पत्रविहीन किंशुक ( पलाश ) मिलता रहा। वन में ‘ आग ‘ लगी थी जंगल की आग टेसू अर्थात परास अर्थात पलाश से। मुझे उस आग से भेंट करनी थी।

परिवर्तन –

बहुत पहले किशोर वय में हम नीचे से प्रपात के पास पहुँचे थे। वहीं पतली धाराओं के नीचे स्नान किया था ( तब नहीं थी इतनी क्षीणकाय ) नीचे बहती काँची नदी के सहारे चट्टानों के पार भोजनादि बना था। बड़ी-बड़ी चट्टानों थीं लेकिन हम कठोर, काली चट्टानों पर पाँव धर दूसरी ओर गए थे। सामने था सबसे चौड़ा झरना।…नीचे बहुत गहराई। पास जाना खतरे से खाली नहीं। हम पास गए भी नहीं। अभी लोग एकदम निकट जाकर निर्झर के नीचे स्नान का आन्नद लेते हैं। पर सावधानी अपेक्षित।
आज सामने था, बेहद-बेहद खूबसूरत विहंगम दृश्य दशम का। ढंग से बनाई गई सीढ़ियाँ, विभिन्न व्यू प्वांइट, जहाँ से अद्भुत प्रपात के अस्सीम सौंदर्य का दर्शन सुलभ। हम इस बार नीचे से पत्थरों पर नहीं चढ़ रहे थे, ऊपर से उतर फाॅल को करीब महसूस कर रहे थे। हर प्वाइंट से दिखलाई पड़ रहा था वह। झरनों से गिर काँची नदी सामने जिधर गहराई में बहती-लचकती बढ़ गई थी, वह भी साफ नज़र आ रहा था। घनघोर जंगल भी। झरना चट्टानों से फूटता नज़र आ रहा था। लाख छटपटाती रह गई, सीढ़ियों से या नीचे से निर्झर का स्त्रोत पता नहीं चल पाया। काँची नदी के जल से निर्मित फाॅल के दस धाराओं में गिरने के कारण इसे दशम नाम से नवाज़ा गया था। हमारी मंजिल फाॅल का निचला हिस्सा थी।
नवनिर्मित पार्क, जंगल का अद्भुत विस्तार पर्यटकों की किलकारियों से गूँज रहा था। सबको स्वच्छता का ध्यान रखना था… पूरी व्यवस्था थी। कुछेक आदत से लाचार लोगों को छोड़ सब रख भी रहे थे।

हम एकदम नीचे जाकर झरने का आन्नद ले रहे थे। काफी समय वहाँ बिताया। ठंडी फुहारें आनन को भिगो उस कानन में एक अजीब तंद्रील अवस्था का सृजन कर रहीं थीं। प्रकृति सदा आपको अलग तरह की अनुभूति से सराबोर कर देती है। आप नवीन ऊर्जा, उत्साह और प्रसन्नता से भर उठते हैं। मौन साधक से बैठे हम देर तक अपने अंदर और प्रकृति के बीच के रिश्ते में खोए रहे। कुछेक की हँसी, कुछेक पर्यटक मौन साधना में रत!
वहाँ से वापस सीढ़ी पर बढ़ते हुए चट्टानों में फूटते जीवन को देखती रही। कहीं कठोर पाषाण को फाड़ उगता कोई नव कोंपल…. कहीं पाषाण के टुकडे़ पर लहराता हरियाला गाछ, तो कहीं अभी-अभी ठूँठ से जन्म लेता जीवन। मोबाइल में कैद होते रहे दृश्य। आँखों के रास्ते दिल में जगह बनाते रहे।

स्थानीय लोगों को यहाँ रोजगार मिला है। कुछ लोग विविध दुर्लभ वनोत्पाद की भी बिक्री कर रहे थे। गाइड, गोताखोर, स्थानीय आदमी, पर्यटन मित्र जगह-जगह तैनात। अच्छी व्यवस्था पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए।

लौटते हुए दशम फाॅल के ऊपरी हिस्से पर भी जाने का फैसला खुशियों से भर रहा था। नए बने रेस्तरां की छतरियाँ, काँची नदी बुला रही थी। ऊपर से गहरे झरने को ज्यादा पास से अच्छी तरह देख पाने का लालच भी कम नहीं था। वहीं से तो नदी चट्टानों को तोड़़ती-फोड़ती निर्झर के रूप में ढल जीवन की गतिशीलता से रू-ब-रू करानेवाली थी। वहाँ जाने को सीढ़ियाँ नहीं हैं। है पथरीला रास्ता।
हम ऊपर में वहीं दाहिनी ओर से फूटे उबड़-खाबड़ कच्चे रास्ते पर बढ़ चले।
जगह-जगह खाने-पीने की व्यवस्था। स्थानीय लोग आॅर्डर पर घरेलू भोजन कराते हैं। विभिन्न जगहों पर प्लास्टिक लगाकर भोजनादि बनाने की तैयारी। बहुत कम कीमत पर वे भोजन बनाकर खिलाते हैं। नीचे निर्झर के पास खाना बनाना मना हो गया है अब।

सामने काँची नदी का अद्भुत विस्तार…लेकिन अभी सिमटा हुआ। चट्टानों पर कूदते-फाँदते बच्चे….। तटिनी पारकर और ऊपर रेस्तराँ की छतरियों के निकट जाते लोग….! पानी भरने पहुँची स्त्रियाँ-बच्चियाँ….इन्हें सर पर ढोकर पानी ले जाते देखना सुखद तो नहीं…. कितनी उबड़-खाबड़ पगडंडी। उस पर तेजी से बढ़ते चार पाँव सोचने के लिए विवश कर रहे थे कि हमें हर हाल में जल संरक्षण की कोशिश खुद भी करनी है, दूसरे को भी सिखाना है।
हम वहीं पत्थर पर बैठे रहे कुछ देर। भाई मानस की इच्छा थी, प्रकृति के सान्निध्य में देर तक उसके अनहद नाद को सुना जाए, महसूसा जाए। आस-पास आकाशचुम्बी लाल पत्तियोंवाले कुसुम, यूकलिप्टस और अन्य विटपों की मासूमियत को परखा जाए। भोले-भाले वासिंदों के साथ समय बिताया जाए।
लेकिन दिवाकर अपना तेज समेट रहा था और हमें लौटना था। हम गाड़ी की ओर लौट पड़े। एक जगह पर दो लोग छोटे से आशियाने में महुआ का दारू बेचते हुए मिले। यहाँ लोग गाँव में ही महुआ चुलाकर दारू बनाते हैं। आस-पास गाँवों की उपस्थिति से यह जगह गुलज़ार। अब वहाँ नक्सलियों के भय का वातावरण नहीं।
हर साल बलि लेता है दशम। – सब कहते थे। लेकिन अब नहीं। चाक-चौबंद व्यवस्था। बहुत सारे ‘ पर्यटन मित्र ‘ रक्षक! बस, हिदायतों का पालन करना है।
बलि के पीछे की भी एक लोककथा यहाँ करवट लेती रही है।

लोककथा –

यहाँ सांदु-नवरी की प्रेमकथा आकार लेती रही है। अपनी साँवली-सलोनी प्रेयसी नवरी से मिलने बाँसुरी वादक सांदु काँची नदी से निर्मित झरने को लता के सहारे पारकर रात में ऊपर पहुँच जाता। सांदु मुंडा बाँका छैला….उसके बिना गाँव का हर आयोजन अधूरा!…. हर समय फेंटे में बँधी रहनेवाली बंसी में ऐसी धुन निकालता कि सब मंत्र-मुग्ध!… उसके छैल-छबीले स्वभाव के कारण ही सब उसे छैला कहते।
उसकी बाँसुरी की तान में राधा की तरह दीवानी उसकी प्रेमिका नवरी उस साँवले कृष्ण से मिलने को बेताब रहती थी। गाँववालों को उनकी रासलीला रास नहीं आ रही थी। लता के सहारे झरना पारकर अपनी प्रेमिका से मिलने जाता है छैला… सब तरफ यह शोर था। मन ही मन उसको प्यार करनेवाली उसकी भाभी के दिल में यह बात शूल की तरह चुभती। उसने हमेशा चाहा कि वह नवरी से नहीं मिले। लेकिन सांदु-नवरी का प्रेम अमर!
अंततः एक रात बाँसुरी कमर में लटकाए छैला बने सांदु को झरना पार करते देख वह जल-भुन गई। उसने एक धारदार चाकू उठाया और चल पड़ी काँची नदी की ओर। उसने लता रेत दी। और झरने के पास से दर्रे में गिरकर छैला की दर्दनाक मौत हो गई। बाँसुरी की मीठी तान मौत की चीख बन गई सदा के लिए।
सब कहते थे – आज भी सन्नाटे में बंसरी की मीठी तान सुनाई पड़ती है।
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खैर! अब हम वापसी की राह पर। जगह-जगह पुराने ढंग के साफ-सुथरे घर, खलिहान, ज़िंदगी को आसान बनानेवाली बकरी-छगरी, मुर्गे-बत्तख प्रकृति की गोद में सुस्ताते हुए। कहीं-कहीं सोहराई पेंटिंग की चमक। शहरी क्षेत्रों, कई बस्तियों, ग्रामों में फूस-खपडे़ की छत को आजकल पक्के घरों ने परे खिसका दिया है। सब जगह बिजली के तार कच्चे घरों के अंदर रौशनी की उपस्थिति की गवाही दे रहे थे। खेतिहर व्यक्तियों की बस्ती, खेती के विविध औजार, पुआल, हल देखते हुए हम बैक टु दी पैवेलियन।
हाँ! डूबते प्रभाकर…ललहुन रौशनी के बढ़ते वृत्त के बावजूद जंगल की आग को कैदी बना लेने में सफल रही, यह संतुष्टि साथ थी। झरने सी हँसी सबके चेहरे पर सबको उद्भासित करती हुई। एक वादा और…. खुद से अपने झारखण्ड के अन्य जलप्रपातों में भी उपस्थिति दर्ज करनी है शीघ्र।
अनिता रश्मि