यात्राः बर्फानी बाबा की-गोवर्धन यादव

आपने अब तक अपने जीवन मे अनगिनत यात्राएं की होगी,लेकिन किन्हीं कारणवश आप अमरनाथ की यात्रा नहीं कर पाएं है, तो आपको एक बार बर्फ़ानी बाबा के दर्शनों के लिए अवश्य जाना चाहिए। दम निकाल देने वाली खडी चढाइयां, आसमान से बातें करती, बर्फ़ की चादर में लिपटी-ढंकी पर्वत श्रेणियां, शोर मचाते झरने, बर्फ़ की ठंडी आग को अपने में दबाये उद्द्ण्ड हवाएं,जो आपके जिस्म को ठिठुरा देने का माद्दा रखती हैं,कभी बारिश आपका रास्ता रोककर खड़ी हो जाती है,तो कहीं नियति नटि अपने पूरे यौवन के साथ आपको सम्मोहन में उलझा कर आपका रास्ता भ्रमित कर देती है, वहीं असंख्य शिव-भक्त बाबा अमरनाथ के जयघोष के साथ,पूरे जोश एवं उत्साह के साथ आगे बेढ़ते दिखाई देते हैं और आपको अपने साथ भक्ति की चाशनी में सराबोर करते हुए आगे, निरन्तर आगे बढ़ते रहने का मंत्र आपके कानों में फ़ूंक देते हैं। कुछ थोड़े से लोग जो शारीरिक रुप से अपने आपको इस यात्रा के लिए अक्षम पाते हैं,घोड़े की पीठ पर सवार होकर बाबा का जयघोष करते हुए खुली प्रकृति का आनन्द उठाते हुए,अपनी यात्राएं संपन्न करते हैं. सारी कठिनाइयों के बावजूद न तो वे हिम्मत हारते हैं और न ही जिनका मनोबल डिगता है, आपको निरन्तर आगे बढते रहने के लिए प्रेरित करते हैं। ​

रास्ते में जगह-जगह भंडारे वाले आपका रास्ता, बडी मनुहार के साथ रोकते हुए,हाथ जोड़कर विनती करते है कि बाबा की प्रसादी खाकर ही जाईये. भंडारे में आपको आपके मन पसंद चीजें खाने को मिलेगीं.कहीं कढ़ाहे में केसर डला दूध औट रहा है, तो कहीं ईमरती सिंक रही होती है,बरफ़ी,पॆड़ा,बूंदी,कचौडियां,न जाने कितने ही व्यंजन आपको खाने कॊ मिलेगें, वो भी बिना कोई रकम चुकाए. ऐसा नहीं है कि यह नजारा आपकॊ एकाध जगह देखने को मिले,आप अपनी यात्रा के प्रथम बिन्दु से चलते हुए अन्तिम पड़ाव तक, शिवभक्तों की इस निष्काम सेवा को अपनी आँखों से देख सकते है. हमारी बस को जब एक भंडारे वाले( अब नाम याद नहीं आ रहा है) ने रोकते हुए हमसे प्रसादी ग्रहण करने हेतु विनती की,तो भला हममे इतनी हिम्मत कहां थी कि हम उनका अनुरोध ठुकरा सकते थे. काफ़ी आतिथ्य-सत्कार एवं सुसुवादू प्रसाद ग्रहण कर ही हम आगे बढ़ पाए थे. मन की आदत बात- बात में शंका करने की तो होती है. मेरे मन में एक शंका बलवती होने लगी थी कि ये भंडारे वाले,अगम्य ऊँचाइयों पर जहाँ आदमी का पैदल चलना दूभर हो जाता है,यात्रा के शुरुआत से पहले अपने लोगों को साथ लेकर अपने-अपने पंडाल तान देते है. रसॊई पकाने में क्या कुछ नहीं लगता?, वे हर छोटी-बड़ी सामग्री लेकर इन ऊँचाइयों पर अपने पंडाल डाले यात्रियों की राह तकते हैं और पूरी निष्ठा और श्रद्धाके साथ सभी की खातिरदारी करते हैं. वे इस यात्रा के दौरान लाखों रुपया खर्च करते हैं,भला इन्हें क्या हासिल होता होगा? क्यों ये अपना परिवार छोड़कर, काम-धंधा छोड़कर यात्रा की समाप्ति तक यहाँ रुकते हैं? भगवान भोले नाथ इन्हें भला क्या देते होंगे?​

मन में उठ रहे प्रश्न का उत्तर जानना मेरे लिए आवश्यक था. मैंने एक भक्त से इस प्रश्न का उत्तर जानना चाहा तो वह चुप्पी लगा गया. शायद वह अपने आपको अन्दर ही अन्दर तौल रहा था कि क्या कहे. काफ़ी देर तक चुप रहने के बाद उसने हौले से मुँह खोला और बतलाया कि वह एक अत्यन्त ही गरीब परिवार से था..रोजॊ-रोटी की तलाश में दिल्ली आ गया. छोटा-मोटा काम शुरु किया. सफ़लता रुठी बैठी रही. समझ में नहीं आ रहा था कि क्या किया जाए? किसी शिव-भक्त ने मुझसे कहा-भोले भंडारी से मांगो. वो सभी को मनचाही वस्तु प्रदान करते हैं.बस, उसके प्रति सच्ची लगन और श्रद्धा होनी चाहिए. मैंने अपने व्यापार को फ़लने-फ़ूलने का वरदान मांगा और कहा कि उससे होने वाली आय का एक बड़ा हिस्सा वह शिव-भक्तों के बीच खर्च करेगा. बस क्या था,देखते-देखते मेरी किस्मत चमक उठी और मैं यहां आने लगा.मेरी कोई संतान नहीं थी.मैंने शिव जी से प्रार्थना की और आने वाले साल पर मेरी मनोकामना पूरी हुई.इतना बतलाते हुए उसके शरीर में रोमांच हो आया था और उसकी आँखों से अविरल अश्रुधारा बह निकली थी. इससे ज्ञात होता है कि यहाँ आने वाले सभी शिव भक्तों को भोले भंडारी खाली हाथ नहीं लौटाते. शायद यह एक प्रमुख वजह है कि यहाँ प्रतिवर्ष लाखों की संख्या में शिवभक्त आते है. यह संख्या निरन्तर बढती ही जा रही है. दूसरा कारण तो यह भी है कि बर्फ़ का शिवलिंग केवल इन्हीं दिनों बनता है और हर कोई इस अद्भुत लिंग के दर्शन कर अपने जीवन को कृतार्थ करना चाहता है. और तीसरी खास वजह यह भी है कि लोग अपने नंगी आँखों से प्रकृति का अद्भुत सौंदर्य देखना चाहते है.​

जो शिवभक्त हिम से बने शिवलिंग के दर्शन कर अपने जीवन को धन्य बनाना चाहते हैं,,उन्हें जम्मु पहुँचना होता है. जम्मु रेलमार्ग-सड़कमार्ग तथा हवाई मार्ग से देश के हर हिस्से से जुडा हुआ है.

आइए…बाबा बर्फ़ानी के दर्शनों के लिए जाने पर कौन-कौन से पड़ाव आपको मिलेंगे. विस्तार से जानकारी उपलब्ध कराई जा रही है कि उस स्थान पर पहुँचकर आपको क्या देखने को मिलेगा आदि-आदि. आपकी यात्रा जम्मु से प्रारंभ होती है।

पहला पड़ाव पहलगाम जम्मू से ( 297 कि.मी ) _

जम्मु से पहला पड़ाव पहलगाम है. यात्री टैक्सी द्वारा नगरोटा-दोमल-उधमपुर-कुद-पटनीटाप-बटॊट-रामबन-बनिहाल-तीथर-तथा जवाहर सुरंग होते हुए पहलगाम पहुँचता है. पहलगाम “नूनवन” के नाम से भी जाना जाता है. यह एक अत्यंत सुन्दर रमणीय स्थान है. जनश्रुति के अनुसार भगवान शिव ने माँ पार्वती जी को अमरकथा का रहस्य सुनाने के लिए एक ऐसे स्थान का चयन करना चाहते थे,जहाँ अन्य कोई प्राणी उसे न सुन सके. ऐसे स्थान की तलाश करते-करते शिवजी पहलगाम पहुँचे . यह वह स्थान है,जहाँ उन्होंने अपने वाहन नन्दी का परित्याग किया था. इस स्थान प्राचीन नाम बैलगाम था,जो क्षेत्रीय भाषा में बदलकर पहलगाम हो गया. यात्री यहाँ भण्डारे में भोजन कर रात्री विश्राम करते हैं।

-दूसरा पड़ाव चन्दनवाडी पहलगाम से-(16कि.मी.)

यात्री सुबह चाय-पानी का टैक्सी द्वारा चन्दनवाड़ी पहुँचता है. चन्दनवाड़ी के बारे में मान्यता है कि भोलेनाथ ने यहाँ अपने माथे का चन्दन छोडा था. यहाँ से कुछ ही दूरी पर प्रकृति द्वारा निर्मित 100 मीटर लंबा पुल,जो लिद्दर नदी के ऊपर बना है. पर्वत श्रृंखलाएं यहाँ अपना रुप-रंग बदलती जाती है. आगे की यात्रा थोड़ी कठिन है,जिसे घोड़े अथवा पालकी द्वारा तय की जा सकती है.​

तीसरा पड़ाव-शेषनाग झील​ चन्दनवाड़ी से (13 कि.मी.)

चन्दनवाड़ी से शेषनाग झील की ओर जानी वाला रास्ता काफ़ी कठिन तथा सीधी चढ़ाई वाला है. पिस्सु घाटी होते हुए लिद्दर नदी के किनारे-किनारे मनोहर दृष्यों को निहरते हुए यात्री शेषनाग पहुँचता है. यह स्थल झेलम नदीका उदगम स्थल है,जिसे शेषनाग सरोवर भी कहते हैं. पहली झलक में यूं प्रतीत होता है कि कोई विशाल फ़णीधर(शेषनाग) कुण्डली मारे बैठा हो. झील के पार्श्व में खड़ी ब्रह्मा-विष्णु-महेश नाम की तीन चोटियाँ प्रकृति का एक महान चमत्कार है. इस झील का पानी नीला है. ऐसी मान्यता है कि भगवान शिव ने अपने गले में लिपटे हुए शेषनाग का यहाँ परित्याग किया था. इसी कारण इसका नाम शेषनाग झील पड़ा. चारों ओर बर्फ़ से ढंकी पहाड़ियॊं को निहार कर यात्री धन्य हो जाता है.झील से थोड़ा आगे यात्रियों को रात्रि विश्राम करना होता है.यहाँ भी जगह-जगह भण्डारे लगे होते हैं,जहाँ यात्री अपनी पसंद के सुस्वादु भोजन खाकर तृप्त हो जाता है.​

चौथा पड़ाव- पंचातरणी.​ शेषनाग से -(12.6 कि.मी.)-

सुबह होते ही यात्री चाय-पानी-नाश्ता कर पंचतरणी की ओर प्रस्थान करता है. मार्ग में महागुनस पर्वत है जिसकी ऊँचाई 14500 फ़ीट है. महागुनस पर्वत अपने आप में एक आश्चर्य है. हरे-भूरे,-कभी सिन्दुरी रंग में दिखाई देने वाले इस विशाल पर्वत तथा उस पर जमी बर्फ़ की परतों से सूरज की किरणे परावर्तित होकर लौटती हैं, तो यह किसी विशाल हीरे की तरह जगमगाता दिखाई देता है. ऊँचाई पर होने की वजह से आक्सीजन की मात्रा मे कमी होने लगती है,जिससे यात्री को साँस लेने में कठिनाई होती है.एक कदम आगे बढ़ाना भी दुष्वार सा लगने लगता है. अतः यात्री को चाहिए कि वह यहाँ बैठकर थोड़ा सुस्ता ले और अपने आप को सामान्य स्थिति में ले आए. कपूर की डली भी उसे पास में रखनी चाहिए. उसे सूंधने में राहत मिलती है.यहाँ जोर आजमाइश करने की जरुरत नहीं है.​

भगवान भोलेनाथ ने यहाँ अपने पुत्र श्री गणेश का त्याग कर दिया था. तभी से इसका नाम महागणेश पड़ा. कालान्तर में महागणेश “महगुनस” हो गया.थोड़ा आगे चलने पर पंचतरणी नामक स्थान आता है. ऐसा कहा जाता है कि जब शिव माँ पार्वती को अमरकथा सुनाने के लिए यहाँ से गुजर रहे थे,तब उन्होंने नटराज का रुप धारण कर नृत्य किया था. नृत्य करते समय उनकी जटा खुल गई थी जिसमें से गंगा प्रवाहित होते हुए पाँच दिशाओं में बह निकली. ऐसी मान्यता है कि भोले ने यहां पंच महाभूतों का परित्याग कर दिया था. यात्री यहां रात्री विश्राम करता है तथा जगह-जगह लगे भण्डारों मे भोजन करता है​

अन्तिम पड़ाव- पवित्र गुफ़ा पंचतरणी से (6 कि.मी)

यात्री भगवान भोले नाथ के बर्फ़िले शिवलिंग के दर्शन पाने को बेताब हो उठता है. यात्री पंचतरणी से 3 कि.मी सर्पाकार पहाड़ियों पर चढ़कर, 3 कि.मी बर्फ़िली चट्टानॊं पर चलते हुए, बर्फ़ से अठखेलियाँ करता हुआ, उत्साह के साथ आगे बढ़ता है,क्योकि यहीं से वह दिव्य गुफ़ा के दर्शन होने लगते है. गुफ़ा को देखते ही यात्री की अब तक की सारी थकान मिट चुकी होती है.​

समुद्र सतह से 12730 फ़ीट की ऊँचाईं पर 60 फ़ीट चौडी, 25फ़ीट लंबी तथा 15फ़ीट ऊँची गुफ़ा में यात्री की आँखें प्रकृति द्वारा निर्मित शिवलिंग को निहारकर धन्य हो उठती हैं. यहीं हिम से निर्मित माँ पार्वती जी के भी दर्शन होते हैं. प्रकृति ने गुफ़ा के ठीक ऊपर एक कुंड बनाया है जिसे “रामकुण्ड “ के नाम से जाना जाता है, इस कुंड से अमृत के समान जल गुफ़ा के भीतर बूँ- बूँद में टपकता है. बूँद नीचे गिरने के बाद जम जाती है. बूंद-बूंद के इसी जमाव से विशाल शिवलिंग की निर्मिती होती है.

हजारों फ़ीट की ऊँचाइयों से प्रकृति का अद्भुत नजारा देखकर यात्री को काफ़ी प्रसन्नता का अनुभव होता है.गुफ़ा के पास ही हैलीपैड भी बना हुआ है,जहाँ से आप हेलिकाप्टर को पास से उतरता हुआ तथा आसमान में उड़ान भरते देख सकते हैं. वे यात्री जिनके पास समय कम है अथवा वे शारीरिक रुप से कमजोर हैं, इस सेवा का लाभ उठा सकते हैं. आपकी यात्रा के शुरुआती बिन्दु से लेकर यात्रा के अन्तिम पड़ाव तक भारतीय फ़ौज के जवान दिन-रात आपकी सुरक्षा में तल्लीन रहते हैं. कभी-कभी घुसपैठिये इस यात्रा में विध्न उत्पन्न करने से बाज नहीं आते.फ़ौज के रहने से आपको चिन्ता करने की तनिक भी आवश्यकता नहीं है.​

भगवान अमरनाथ के दर्शन-पूजा-पाठ आदि के बाद यात्री अपनी यात्रा से वापिस लौटने लगता है. यहाँ से एक छोटा रास्ता नीचे उतरने के लिए “बालटाल” होकर भी जाता है. यदि आप इस काफ़ी उतार वाले रास्ते का चयन करते हैं तो आपको रास्ते में लेह-लद्दाख-कारगिल-सोनमर्ग-गुलमर्ग होते हुए श्रीनगर आना होता है. यहाँ आकर आप शिकारे का आनन्द उठा सकते हैं. कश्मीर का यह पिछला हिस्सा सौंदर्य से भरपूर है. प्रकृति नटी का अनुपम नजारा आपको यहाँ देखने को मिलता है.​

अमरनाथ की यात्रा यद्दपि कठिन अवश्य है,लेकिन मन में यदि उत्साह और उमंग है तो निःसन्देह इसमे आपको भरपूर आनन्द आएगा. यदि आपने प्रकृति के इस अद्भुत नजारे को नहीं देखा तो सब बेकार है. अतः एकबार पक्का मन बनाइये और बर्फ़ानी बाबा के दर्शनों का लाभ उठाइये. यात्रा करने से पहले हमें क्या-क्या करना चाहिए और कौन-कौन सी सावधानियां बरतनी चाहिए,उस पर थोड़ा ध्यान दिए जाने की जरुरत है.​

1-यात्री अपना नाम-पता-टेलीफ़ोन नम्बर-मोबाइल नम्बर आदि को अपनी जेब में अवश्य रखें और साथ ही अपने साथियों के नाम पते भी लिखकर रखें. यह पर्ची जरुरत पड़ने पर काम आएगी.(2) अपने साथ सूखे मेवे,नमकीन अथवा भूने चने तथा गुड़ अवश्य रख लें.(3) सर्द हवा से चेहरे को बचाने के लिए वेसलीन,मफ़लर,ऊनी दास्ताने,बरसाती,मोजे,कोल्ड क्रीम साथ रखें ,क्योकि यहाँ कभी भी बारिश अथवा बर्फ़ पड़ सकती है. खुले आसमान और खुली धरती के बीच आपको यहाँ रहना होता है.फ़िर यहाँ टैंटॊं के अलावा कोई शैड-वैड आपको देखने को भी नही मिलेगे ( 4) यदि आप पिट्टु या घोड़े वाले को साथ लेते हैं तो उनका रजिस्ट्रेशन -कार्ड अपने पास रख लें और यात्रा की वापसी में लौटा दें.(5) रास्ता उबड़-खाबड़ अथवा फ़िसलन भरा मिलेगा ही, अतः जूते वाटरप्रुफ़ तथा ग्रिप वाले ही पहने.(6) चढ़ाई करते समय थक जाएं तो बीच-बीच मे आराम करते चलें.अपने आपको ज्यादा थका देने का प्रयास न करें.(7) आवश्यक दवाएं अपने पास रखें. हालांकि यहाँ पर पूरी व्यवस्था सरकार बना कर चलती है,फ़िर भी अपने पास दवाओं का किट रख लें.(8)मुझे यह कहने मे तनिक भी संकोच नही हो रहा है कि हम भारतीयों मे यहाँ-वहाँ कचरा फ़ेंक देने की बुरी आदत है. कृपया इससे बचें. अपनी खाली प्लास्टिक की बोतलें अथवा प्लास्टिक की थैलियाँ यहाँ –वहाँ न फ़ेके. जब गाँव-शहर में ही समुचित सफ़ाई की व्यवस्था हम नही बना पाते, तो पहाड़ों के दुर्गम स्थान पर कौन सफ़ाई करने की हिम्मत जुटा पाएगा?.. कई सज्जन लोग बोतल को पानी से आधी भरकर उसे नदी मे बहा देते हैं. पता नहीं, अनजाने में ही हम पर्यावरण का कितना नुकसान कर बैठते हैं.इसका अन्दाजा नहीं लगा पाते (9) मेडिकल फ़िटनेस का सर्टिफ़िकेट यात्रा से पूर्व अवश्य बनवा लें.(10) भारत सरकार ने चप्पे-चप्पे पर सुरक्षा के कड़े बन्दोबस्त करती हैं. इसके अलावा आपकी निगरानी के लिए हेलीकाप्टर से भी नजर रखी जाती है. अतः सैनिकों के द्वारा दिए गए निर्देशों का कडाई से पालन अवश्य करे.

यात्रा जरुर कष्टप्रद है, लेकिन रोमांच से भरी हुई है. अपनी नंगी आँखों से प्रकृति के लोभ-लुभावन दृष्यों को निहारकर चलते हुए यात्री को पता ही नहीं चल पाता कि उसकी यात्रा कब पूरी हो गयी है और जब वह लौटता है तो बरसों-बरस उसकी आँखों के सामने बाबा बर्फ़ानी के दिव्य छवि दिखाई देती है.

​जय हो बर्फ़ानी बाबा की

गोवर्धन यादव

103, कावेरी नगर छिन्दवाड़ा (म.प्र.) 480001​गोवर्धन यादव​9424356400​Email- goverdhanyadav44@gmail.com

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