मोहन राजेश कुमावत, कपिल शास्त्री, निर्मल डे


पाँच लघुकथा

मोहन राजेश कुमावत
ज्ञानवृद्धि
19, चौधरी कॉलोनी, साकेत नगर,
ब्यावर – 305901
राजस्थान
मो-8079044302

लघुकथा-१
निस्तब्ध
अपनी बाईक खड़ी करते हुए आँगन में बहिन की स्कूटी न देख रोहित समझ गया कि कोमल अभी घर नहीं लौटी है।
दरवाजे पर बाट जोहती मां पर बरसते हुए वह कुछ घुटे स्वर में बोला,” दस बज रहे हैं, दीदी अभी तक घर नहीं लौटी है, ऑफिस तो छह बजे बंद हो जाता है।”
“आ जाएगी बेटा ऑफिस के काम से रुकना पड़ता है। तू इतनी देर कहां था ?”
“मेरी बात छोड़ मां। दीदी की बात कर। लड़की है,बत्तीस पार कर चुकी है,अब तक शादी नहीं की और …”
“तू तेरी चिंता कर बेटा। तू भी अठ्ठाईस का हो गया है, मुझे तो तेरी चिंता है, तेरी शादी कैसे होगी, न तो बाप दादा की जमीन- जायदाद और न ही कोई काम -धंधा या रोजगार ऐसे निखट्टू को लड़की कौन देगा? ” मां का स्वर मुर्झाया हुआ था।
“मैं कोशिश तो कर रहा हूं मां इतने एग्जाम दिए पर तकदीर ही साथ नहीं दे रही तो क्या करूं ? ” स्वयं को सोफे पर पटकते हुए रोहित हताश स्वर में बोला,”पर दीदी के बारे में लोग तरह तरह की बातें करते हैं।”
“लोगों की बातों पर ध्यान मत दे बेटा, तू अपनी नौकरी का जुगाड़ बैठा।” खाने की थाली परोसते हुए मां ने संजीदा स्वर में कहा,”यह मत भूल कि कोमल की शादी होते ही तेरी बाइक में जंग लग जाएगी।”

लघुकथा-२
पर्यावरण दिवस

पर्यावरण के महत्व पर भाषणबाजी के बाद वृक्षारोपण का कार्यक्रम संपादित हुआ।
स्कूल प्रांगण में बाउंड्री के पास ही पांच – छह गड्ढ़े पहले से ही खोदे जा चुके थे, नर्सरी से लाये गये कुछ फल -फूलदार पौधे भी तैयार थे।
तालियों की गड़गडा़हट और कैमरों की लाइट के‌ बीच
विधायक और सभापति के साथ उपखण्ड अधिकारी तथा कुछ गणमान्य अतिथियों ने भी वृक्षारोपण किया।
सभाभवन में अतिथियों के अल्पाहार के बाद स्कूल का प्रांगण खाली हो गया पर पत्रकार प्रसून जी वहीं टिके रहे।
प्रधानाचार्य के चैम्बर में बैठते ही उन्होंने पूछ लिया, “गुप्ता जी मुझे याद है कि पिछली बार सांस्कृतिक कार्यक्रम की कवरेज के लिए मैं यहाँ आया था,तब मैदान में बाउंड्री के पास जहाँ आज वृक्षारोपण हुआ है,उसी जगह मेरे कद से भी बड़े वृक्ष लगे हुए थे। वही जगह अचानक खाली कैसे हो गयी ? पहले जो पेड़ लगे हुए थे वे कहाँ गये ?”
“आप भी समझदार होकर कैसी बातें करते हैं प्रसून जी!”, गुप्ता जी ने संजीदा स्वर में कहा,”वे सब पिछले विधायक जी के द्वारा लगाये हुए थे। अब जब सरकार बदल गई तो वे भी वहीं गये जहाँ सरकार गयी। ”
समझाइश के अन्दाज में प्रधानाचार्य जी ने अपनी बात पूरी की, “बाउंड्री को छोड़कर और कोई जगह तो है नहीं,जहाँ नये विधायकजी से पौधे लगवा लेते। जो भी हो, पर्यावरण दिवस तो मनाना ही था।”

लघुकथा-३
बुझते चिराग

वाइब्रेशन मोड में टेबल पर रखा फोन काफी देर से घर्रघर्रा रहा था।पंकज के इशारे पर दादी के सिरहाने बैठी पिंकी ने फोन उठाकर स्क्रीन पर नजर डाली और धीमे से बोली-“मम्मा नाना का फोन है।”
दादी के कमरे में रामचरित मानस का पाठ हो रहा था।
पापा बार-बार फोन क्यों कर रहे हैं असमंजस में बैठी नीतू फोन उठाकर कमरे से बाहर आ गयी और बोली -“हां,पापा…”
“नीतू” -पापा की भर्रायी आवाज नीतू के कान बेध गई – “तुम्हारी माँ … तुम्हारी मम्मी सीरियस है बेटा, तुम्हें याद कर…”
नीतू के चेहरे पर बेबसी उभर आयी- “पर मैं अभी कैसे आ सकती हूँ पापा, यहां माँ जी भी बहुत सीरियस है, कल से दो बार मुँह में गंगाजल दे चुके हैं” -नीतू रूआँसे स्वर में बोली-” दीये की लौ टिमटिमा रही है,चिराग कभी भी बुझ सकता है पापा।”
“यहां तो बुझ ही चुका है बेटा” -पापा की भीगी- भीगी सी आवाज इतनी धीमी थी कि कमरे से बाहर आ रही चौपाइयों में ही खो गई, नीतू को कुछ सुनायी ही नहीं दिया ।
उसने पूछा -“क्या हुआ पापा ?”
“कुछ नहीं,” पापा ने संयत स्वर कहा -“कह रहा था कि ऐसे में तुम्हें आने की जरूरत नहीं है बेटा,यहाँ बिन्नू की बहू सब संभाल लेगी तुम अपना फर्ज निभाओ,
समधिन जी की सेवा करो।”
पार्श्व में गूंजती चीखें चीत्कारें नीतू के कानों तक पहुँच पाती,उसके पहले ही फोन कट गया।

लघुकथा-४
अदृश्य

शहर जल रहा था। चारों ओर आग ही आग थी। सड़कों, गली, मोहल्लों में जली हुई गाड़ियों के ढेर लगे थे। स्कूटर ,बाइक, ऑटो , कारों, बसों, यहाँ तक की एंबुलेंस और पुलिस की गाड़ियों तक को नहीं छोड़ा गया था। दंगाइयों ने बिना किसी भेदभाव के सभी को समभाव फूंका था।
इधर-उधर करहाते जिस्मों के बीच खामोश पड़ी लाशें खुद इस इंसानी हैवानियत की गवाही देने को तैयार थी, पर जलती हुई दुकानों से उठ रहे धुएं के बादल नरपिशाचों के इस तांडव पर पर्दा डालने का प्रयास कर रहे थे । धुएं के इसी गुबार की आड़ में खाकी वर्दी इन बेजान गवाहों को खुर्द-बुर्द करने की कोशिश में जुटी थी।
जलती हुई गाड़ियाँ कराहती हुई, एक दूसरे से पूछ रही थी हमारा कसूर क्या है,हम तो इंसान के हाथों की कठपुतलियां हैं, वह जिधर चाहे ले जाता है,जैसे चाहे चलाता है। हमें क्यूं जलाया भाई?
धधकती हुई दुकानें भी चीख रही थी,अरे हम तो इंसान की हर जरूरत पूरी करने के लिए ही बनी हैं, हमसे क्या दुश्मनी थी। तुम्हारे धर्म -दर्शन,राजनीति से हमें क्या लेना देना,हमें क्यों फूंक दिया?
इन बेजुबानों के सवालों का जवाब देने की फुर्सत किसे थी? पेट्रोल बम और पत्थर फेंकते दंगाई उनके पीछे लाठियाँ लेकर दौड़ती और हवाई फायर करती पुलिस,अपने- अपने काम में व्यस्त थी।
अपनी नश्वर देह से मुक्त होकर कालिख पुते शहर में स्वच्छंद विचरण करते हुए भोलानाथ के जीव ने जिस्मानी कैद से आजाद इशरत मियां की रूह से पूछा -“भाई जान हमें इस नामाकूल दुनिया से रुखसत करने वालों का मकसद क्या था ?”
इशरत मियां की रूह बोली -“पंडित जी यही सवाल लेके तो मैं आपके पास आया हूँ।”
अनुत्तरित दोनों आत्माएं टीवी चैनलों पर घड़ियाली आँसू बहाते ,इस विभीषिका के प्रारूपकारों के प्रलाप सुनकर सिर धुन रही थी।जो अपना मकसद पूरा हो जाने की खुशी में इतराये एक दूसरे को दोषी ठहरा रहे थे।
उनके रक्तरंजित हाथ आज भी अदृश्य ही हैं।

लघुकथा-५
तुषारापात

बारह बजे परीक्षा केंद्र से बाहर निकलते ही मानसी ने नरोत्तम की गोद से चुन्नू को झपट लिया और स्कूल के बरामदे में ही बैठकर उसे अपनी छाती से लगा लिया। लगभग चार घंटे बाद माँ के आँचल में लिपटा चुन्नू दुग्धपान में जुट गया।
अपने शिशु को स्तनपान कराते हुए माँ के चेहरे पर जो तृप्ति की झलक दिखाई देती है, उसे देखते ही नरोत्तम ने अपनी जिज्ञासा की गाँठ ढीली की और पूछ बैठा –” पेपर कैसा हुआ ?”
“ए-वन !”–मानसी चिंहुक उठी, “इस बार कोई नहीं रोक सकता। नाइंटी वन क्विश्चन किए हैं,चार-पाँच गलत निकल सकते हैं, इससे ज्यादा नहीं।”
नरोत्तम का चेहरा खिल उठा -“अरे दस -बारह भी गलत हो जाएं तो क्या फर्क पड़ता है।सत्तर – पिच्हत्तर से ऊपर तो मेरिट जाने की नहीं। आखिर तुम्हारी मेहनत रंग लाई ही।”
“मेहनत तो आपकी भी शामिल है जी, माँजी ने भी कम मेहनत नहीं की,घर के सारे कामकाज तो आप दोनों ने ही संभाले,मेरे चुन्नू को भी … अरे हाँ, पीछे से इसने आपको तंग तो नहीं किया,रोया तो होगा?”
“अरे वाह,रोएगा क्यों अपने बाप की गोद में था। पिछले छह महीनों से इसी गोद में खेलते- खेलते मुझे भी माँ समझने लगा है।”
–नरोत्तम ने हँसते हुए कहा- “चलो अब चुन्नू सो गया है। बाहर चलकर तुम भी कुछ खा पी लो, फिर बस स्टैंड भी पहुँचना है।”
“भई मेरा पेट तो पेपर देख कर ही भर गया,आपको जो खाना है खा लेना। वैसे दो तीन घंटे बाद घर चलकर ही खा लेंगे न, होटल का खाना पचेगा भी नहीं और फ़िज़ूल में सौ-डेढ़ सौ की चपत लग जाएगी “-मानसी चुन्नू को उसे थमाते हुए बोली।
वे रिक्शा पकड़ कर केंद्रीय बस स्टैंड पहुँचे वहाँ मेले का माहौल था। बामुश्किल शाम सात बजे एक बस में जगह मिली। शाम अपना दामन समेट चुकी थी,दिसंबर की सर्दी अपनी रंगत दिखाने लगी थी।
चुन्नू को सीने से दुबकाए ठंड से ठिठुरते हुए,रात नौ बजे घर पहुँचे। माँ जी ने खाना तैयार कर रखा था, आते ही खाना परस दिया और बोली” पहले रोटी खा ले बेटा, सुबह से भूखी है,दूध कैसे उतरेगा।मेरा चुन्नू बेटा भूखा रह जाएगा।”
“माँ पेपर बहुत अच्छा हुआ है, आपके आशीर्वाद से इस बार नौकरी पक्की है।” -मानसी ने बिना पूछे ही बता दिया तो माँ जी का चेहरा भी चमक उठा -“भगवान करे बेटा,तेरी नौकरी लग जाए।अब तेरा ही आसरा है,इसकी नौकरी तो लगने से रही, प्राइवेट नौकरी में पढ़ने का टेम ही कहाँ मिलता है इसे।”
सास -बहू बातें कर रही थी कि नरोत्तम ने टीवी ऑन कर दिया। समाचार चल रहे थे। हेडलाइंस में लिखा आ रहा था — ‘शिक्षक भर्ती परीक्षा का पेपर लीक, आयोग द्वारा सुबह की पारी की परीक्षा निरस्त।’
नरोत्तम ने चुपचाप टीवी ऑफ कर दिया।

पाँच लघुकथा

कपिल शास्त्री, भोपाल

लघुकथा-१
चोरी

उस दिन पूरा अपार्टमेंट एक सात–आठ साल के बच्चे की दर्दभरी चीखों से दहल उठा था।फ्लैट का मुख्य दरवाज़ा भी खुला हुआ था।रहवासी इस चीत्कार को सुनकर कॉरिडोर में बाहर निकल आए थे और उसके पापा को दबी ज़ुबान में समझाइश दे रहे थे कि “मारिए मत,समझाइए।” लेकिन पापा के क्रोध के आगे सब बेबस थे।किसी के घर के अंदरूनी मामले में ज्यादा हस्तक्षेप भी नहीं कर सकते थे।
पापा उसे दीवार से भड़ीक–भड़ीक कर बेरहमी से मार रहे थे और रहवासियों को बताते हुए चिल्ला रहे थे कि “घर में कोई पैसे की कमी है जो इसने चोरी की।”मां ने अपने बच्चे के बचाने की असफल कोशिश की थी।बिचारे बच्चे को उल्टी होने लगी थी।निश्चित ही एक नौकरीपेशा मध्यमवर्गीय पिता के आत्मसम्मान को गहरी ठेस लगी थी।
इस बात का अंदेशा तो उसी समय हो गया था जब मोहल्ले में ही दुकान चलाने वाली औरत इस फ्लैट में लड़ने आई थी। मां ने तो स्वीकार ही नहीं किया कि उसके बेटे ने चोरी की है तो उस औरत ने मोबाइल से सी.सी. टी.वी.की फुटेज दिखा दी।पुख्ता सबूत के साथ उसका इल्ज़ाम था कि बच्चे ने उसके गल्ले से सात सौ रूपये निकालें हैं।उस वक्त बच्चा स्कूल गया हुआ था और पापा ऑफिस तो उन दोनों के लौटने पर ही फैसला होना था।
ऊपर के फ्लोर पर रहने वाले अधेड़ उम्र के पति पत्नी विमलेश और सुचित्रा इस बात पर जोर दे रहे थे कि इतने छोटे बच्चे को नहीं मालूम होता कि चोरी क्या होती है।वो तो कुछ न कुछ उठा लेता है।यह एक साइकोलॉजिकल डिसऑर्डर होता है।
इसी विषय पर बिस्तर पर बैठकर जब दोनों बात करने लगे तो सुचित्रा ने अपने बचपन का एक किस्सा साझा किया कि एक बार वह पापा के साथ बाज़ार गई थी।पापा को आम इतने पसंद थे कि उन्होंने पूरी पेटी ले ली थी।उसी समय उसको एक बड़ा सा आम बहुत अच्छा लगा और उसने उठाकर चुपके से अपनी झोली में रख लिया था।
घर आकर उसने पापा को दिखाया कि “पापा ये देखो ये कितना अच्छा आम है।“ पापा ने पूछा कि “क्या ये आम तुमने चुराया है?“
“चुराना क्या होता है।इतने सारे फल रखे हुए थे।मुझे जो अच्छा लगा वो मैनें रख लिया।”मैनें भोलेपन से जवाब दिया तो फिर पापा ने पूछा “क्या तुमने इसके पैसे दिए थे?”
“पैसे तो आप दे रहे थे।“ मैनें फिर बिना अक्ल वाली बात की।
पापा बोले “मैनें तो जो आम की पेटी खरीदी थी उसके पैसे दिए थे।तुम्हारे इस आम के पैसे नहीं दिए।अच्छा ये बताओ कि अगर ये चोरी नहीं थी तो तुमने आम छुपाया क्यों?मुझे या दुकानदार को बताया क्यों नहीं?”
मैं झेंपकर रह गई थी।उनके इस प्रश्न का मेरे पास कोई उत्तर नहीं था। पापा उस आम के साथ मुझे साथ लेकर फिर उस दुकान पर गए और मेरी करतूत बताकर उस एक आम के पैसे पूछे और बोले “म्हारी छोरी ने तमारे यहां से एक आम उठाई लियो।”मेरी चोरी अब मेरे पापा द्वारा ही सार्वजनिक कर दी गई थी।मैं शरमाई लजाई हुई पापा से चिपककर खड़ी रही।दुकानदार अच्छा–खासा परिचित था तो बोला “अरे कईं वकील साब, शर्मिंदा करी रिए ओ !तम हमारे यहां से इतनो फल खरीदो हो।बच्ची ने एक आम उठाई लियो तो कईं हुई गयो !बच्चे तो भगवान का रूप होवे हैं।सोची लेंगे कि एक आम भगवान ने भोग में चढ़ी गयो।”लेकिन पापा नहीं माने और उस एक आम के भी पैसे दिए।इस तरह पापा ने बिना क्रोधित हुए ही मुझे समझा दिया था कि चोरी क्या होती है।
बचपन के भोलेपन में चोरी और ईमानदारी का यह संस्मरण सुनने के बाद जब विमलेश ने अखबार में करोड़ों के भ्रष्टाचार की ख़बर पढ़ी तो बोला “बचपन की नादानी में और शक्तिसंपन्न बनने पर ही यह मानसिकता होती है कि नैतिकता की ऐसी–की–तैसी जो मेरी मर्जी है वो करूंगा।
लघुकथा-२
सामान्य-असामान्य

शादी के अट्ठाइस साल बाद अब मैं घर में कोई चलते-फिरते,उठते-बैठते एवइं प्यार कर लेने वाला पति नहीं रह गया था बल्कि टांड से भारी सामान उठवाने,पीठ खुजलवाने व दुखती गर्दन पर मसाज करवाने में ही मेरा प्रयोग/दुरुपयोग ज्यादा हो रहा था।
वैसे भी बहुत ग़मगीन माहौल से लौटे थे।पत्नी की कॉलेज टाइम की ख़ास सहेली वंदना का हट्टा-कट्टा पति राजन कोरोना की दूसरी लहर में नहीं बच पाया था जो अत्यंत अविश्वसनीय किंतु सत्य था।यह बात भी वंदना ने उसे फ़ोन करने पर ही पाँच महीने बाद बताई थी जब पत्नी ने उसका स्टेटस देखा जिसमें लिखा था कि ‘अब मेरी दुनिया किसी और दुनिया में है।’
एक वक्त था जब इन दोनों से गहरा दोस्ताना था फिर ज़िन्दगी की भागदौड़ में कई वर्षों तक मिलना नहीं हो पाया था।
मिलने से पहले ही पत्नी ने जैसे वंदना के निर्देश थे मुझे फारवर्ड कर दिए थे कि “अब वह इस दुःख से उबरने की कोशिश कर रही है इसलिए सामान्य रूप से जैसे पहले मिलते थे वैसे ही मिलना है क्योंकि वह ऐसा मानती है कि राजन कहीं नहीं गए वह उनके बीच ही हैं।बच्चों को भी ऐसा ही बताया गया है।कोई सांत्वना देने आए हैं ऐसा नहीं लगना चाहिए।तुम तो चुप ही रहना।मैं संभाल लूँगी।”पति-पत्नी के अलौकिक प्रेम को समझते हुए व्यवहार करना भी कोई सामान्य बात नहीं थी।
फिर भी राजन की बात निकली,वंदना के आँसू निकले,पत्नी ने अपने रोक कर रखे,मेरी आँखें नम हुईं।घर का माहौल और दर्दनाक था।राजन की मुस्कुराती हुई हार लगी हुई फ़ोटो लटकी थी।राजन की माँ की यादाश्त चली गयी थी।वह अब भी बिस्तर पर लेटे-लेटे ही राजन-राजन पुकारती हैं लेकिन राजन नहीं आता है।वृद्ध पिताजी की आँखों की रोशनी चली गयी है।बातों-बातों में ही पता लगा कि वंदना का छोटा भाई भी अब नहीं रहा।उसका एक्सीडेंट हो गया था।भरसक कोशिश थी कि न खुद रोया जाय न वंदना को और रुलाया जाय।इसी कोशिश में जब वंदना अंदर चाय लेने गयी तो पत्नी के दिल में दबा हुआ ग़ुबार फूट पड़ा था जिसकी आवाज़ रोक ली गयी थी और उसके वापस आते ही आँसू पोछकर फिर सामान्य बन जाने का अभिनय किया।
घर वापस लौटकर मैं सामान्य होने के लिए बिस्तर पर बैठकर टी.वी.देख रहा था तो पाया कि श्रीमतीजी मुझे एकटक निहार रहीं थीं।यह कुछ असामान्य सा लगा तो मैंने भवें उचकाकर मूक प्रश्न किया कि “क्या हुआ?”इसके उत्तर में उन्होंने जल्दी से आकर झुककर मुझे बाहों में भर लिया था।जो पत्नी मुझे सामान्य रहने का पाठ पढ़ाकर ले गयी थी सोचा न था लौटने पर उसका व्यवहार इतना असामान्य हो जाएगा।

लघुकथा-३
चांटा
“मम्मी बचपन में मैं तो पढ़ाई-लिखाई में भी कमजोर थी और शरारती भी बहुत थी इसलिए मैंने आपसे कई बार चांटे खाये हैं जो मैं डिज़र्व भी करती थी लेकिन आप तो इंटेलिजेंट और गंभीर थीं,तो क्या आपने भी कभी अपनी मम्मी से चांटा खाया है?”
“हाँ,बारह साल की ऊमर में तेरे कारण दो चांटे खाने पड़े थे।”
“मम्मी,अब इतनी ऊँची भी मत छोड़ो,सच बताओ।”
“सच्ची !हुआ ये था कि मुझे तीन साल की ऊमर में ननिहाल छोड़ दिया गया था।रात में मुझे सोता हुआ छोड़कर चले गए थे।सुबह जब उठी तो मैं मम्मी….. मम्मी…पापा… पापा चिल्लाकर गेट की तरफ भागी थी।नानाजी ने नौकर को गेट लगाने का आर्डर दे दिया था।मैं गेट बजाती रही,रोती रही।फिर मौसी जबरदस्ती गोद में उठा कर अंदर ले गईं।इसीलिए जब भी देवदास देखती हूँ तो अंत में वो पारो के भागने वाले सीन को देखकर एक सिहरन सी होती है।”
“चार साल बाद जब मैं थोड़ी बड़ी हो गयी तो वापस बुला लिया गया था लेकिन एक फाँस तो चुभ गयी थी।मम्मी से मैंने पूछा भी था कि “सिर्फ मुझे ही क्यों छोड़ा गया,गुड्डू और मुन्नी को क्यों नहीं?”
“मम्मी का जवाब और चुभने वाला था कि “गुड्डू तो लड़का है,वो हमारे लाड़ का है,उसे कैसे छोड़ सकते थे!और मुन्नी छोटी थी।और तुम्हें कौनसा जंगल में छोड़ दिया था!”
“फिर”
“फिर मैं अपनी उमर से भी बड़ी हो गयी थी। बारह साल की उमर में मैंने एक फैसला सुनाया था कि मैं सिर्फ एक बच्चा पैदा करूँगी।इस पर एक चांटा पड़ा था कि इतनी छोटी सी ऊमर में बच्चा पैदा करने की बात कर रही हो!बेशरम कहीं की।”
“और दूसरा?”
“एक चांटे के बाद तो रेसिस्टेंट हो गयी।दूसरा इसके ठीक बाद ही तब पड़ा जब मैं ढीट जैसी फिर मुँह लड़ी कि सिर्फ एक लड़की पैदा करूँगी और उसे बहुत प्यार करूँगी।”

लघुकथा-४
सहूलियत

मैं मोबाइल पर फेसबुक में मगन था।दरवाज़े पर एकाएक हुई खटखट से तारतम्यता भंग हुई।पत्नी पूजा कर रही थी तो दरवाज़ा मुझे ही खोलना पड़ा।बीस लीटर मिनरल वाटर की कैन दरवाज़े पर ही रखकर और अपने दोनो हाथ पीछे बांधकर वो लड़का ढीट जैसा खड़ा था।
आज वो लड़का नहीं था जो हर एक दिन छोड़कर टेलिफोनिक आर्डर पर पानी दे जाता है और मेरे एक बार दिए गए निर्देश कि “कैन किचन प्लेट पर रख कर जाओ।”का पालन करता हैं।”
किचन प्लेट पर भी इस तरह रखवाता हूँ कि उसका नल थोड़ा बाहर रहे ताकि मैं आसानी से गिलास या बोतल भर सकूँ।बीस साल पहले हुई स्लिप डिस्क के कारण आज भी कोई भारी चीज़ उठाने पर रीढ़ की हड्डी में दर्द आ जाता है।
“ये किचन प्लेट पर रख दो।”मेरे आदेश का त्वरित पालन करने के बजाय उसने आश्चर्य से देखा तो मुझे क्रोध आ गया।मैंने अब ज़रा रूखेपन से ऊँची आवाज़ में अपना आदेश दुहराया “खड़े-खड़े देख क्या रहे हो,इसे किचन प्लेट पर रख दो।”और उसकी ओर पीठ करके कैन के किचन प्लेट पर स्थापित होने का निरीक्षण करने लगा।
उसने अनमनेपन से कैन उठाकर मेरे करीब से निकलते हुए किचन प्लेट पर रख दी।तब तक पत्नी भी पूजा करके आ चुकी थी।मेरे पास खुल्ले चालीस रुपये नहीं थे तो मैंने उन्हें देने का बोलकर फिर बिस्तर पर लेटकर मोबाइल की आभासी दुनिया मे खो गया।
“तुमने उससे इतनी भारी कैन किचन प्लेट पर रखवाई!”पत्नी की डाँटती हुई कर्कश आवाज़ ने एक बार फिर तारतम्यता भंग की।
“क्यों क्या हुआ!हमेशा ही तो रखवाता हूँ।”मैंने उस फटकार पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए पूछा।
“तुमने देखा नहीं!उसके दाएं हाथ मे उँगलियाँ ही नहीं थीं।उसने बाएं हाथ से उठाकर और उस टुंडे हाथ को ही नीचे लगाकर जैसे तैसे कैन को रख दिया।”श्रीमतीजी के इस व्यक्तव्य ने मुझे भीतर तक आत्मग्लानि से तो भर दिया था लेकिन मैंने थोड़ी तफ्तीश करते हुए पूछा “मुझे तो नहीं दिखा, तुम्हें कैसे दिख गया?”
जब वो कैन उठाकर रख रहा था तभी मैंने देख लिया था और मैंने जब उसे दस रुपये के चार नोट दिए तो वो गिन नहीं पाया,ऐसे ही रख लिए।”पत्नी की पैनी दृष्टि ने संवेदनहीनता के मामले में मुझे घेर लिया था। फिर भी मैंने अपना बचाव करते हुए कहा “मैं नहीं उठा सकता था।”
“तो दोनो मिलकर उठा लेते।”पत्नी ने परिस्थितिवश सहयोगात्मक रूख अपनाने की बात कहकर मुझे निरुत्तर करने की कोशिश की।
“फिर भी वो जवान था और मैं अधेड़।”ये तो निश्चित ही मेरा कुतर्क था जो उन्हें चिढ़ाने के लिए ही था।
“तुम्हारा कुछ नहीं हो सकता।”चिढ़कर पत्नी ने वार्तालाप का पटाक्षेप एक हताशा के साथ किया।कैन तो स्थापित हो चुकी थी पर फिर मेरी तारतम्यता स्थापित नहीं हो पाई।

लघुकथा-५
पुकारो,मुझे नाम लेकर पुकारो
दिल में जो ठानी थी वो आज करके मानी थी।आज उसने बहुत सारे कपड़े धो लिए थे।वाशिंग मशीन का टब लबालब भरा हुआ था।सब एक साथ छत पर ले जाना तो उसके बस का नहीं था सो दो-तीन बार में ले जाने का निश्चय कर लिया।धूप भी आज खिली-खिली सी थी।
पहली बार गयी तो देखा कि सामने श्रीवास्तव साहब के घर की ऊपरी मंजिल पर कोई नया किरायेदार आ गया है जो गैलरी में खड़े होकर मुस्कुराते हुए बड़े प्यार से “जया” “जया” पुकार रहा है।शायद उसकी पत्नी का नाम हो और जैसे वह आते साथ ही पूरे मोहल्ले को बताना चाह रहा है कि उसकी पत्नी का नाम जया है जो उसकी एक पुकार पर हाज़िर हो जाती है।
थोड़ी देर में उसकी पत्नी नाईट गाउन में ही कॉफ़ी लेकर आ गयी और वह दोनो हँस-हँस कर बातें करने लगे।युवा दंपत्ति में प्रेम तो था जो उनकी आँखों से भी झलक रहा था।फिर पत्नी अंदर काम करने चली गयी।
अब वो उसी प्यार से उसके नाम की लंबी-लंबी पुकार लगाने लगा पर ऊपर छत की ओर देखकर नहीं लगा रहा था ताकि सीधा शक के दायरे में न आ सके।क्या मुझे छेड़ रहा है!उसे बड़ा अटपटा लगा और आश्चर्य भी हुआ कि उसे उसका नाम कैसे पता पड़ा!हो सकता है उसने श्रीवास्तव साहब से पूछ लिया हो।हो सकता है उसके कोचिंग के बोर्ड में से उसने उसका नाम व मोबाइल नंबर नोट कर लिया हो।हो सकता है मोबाइल में सर्च कर लिया हो और अब वो फ़्रेंड रिक्वेस्ट भी भेजे।एक तो ये मिसेस साटनकर और बड़तोनिया भी बहुत पंचायती हैं।अपने घर से ज्यादा दूसरों के घर बैठकर दुनियाभर की पंचायतें करती हैं।ज्यादा पढ़ी-लिखी औरतों से चिढ़ती भी हैं।हो न हो उन्होंने ही इस असामाजिक तत्व को मेरे पीछे लगाया हो! पत्नी के सामने तो बड़ा आदर्श पति बन रहा था और उसके जाते ही अपनी छिछोरी हरकतों पर उतर आया। हालाँकि ये आवाज़ तो उसकी पत्नी के कानों तक भी पहुँच रही होगी फिर भी बड़ी निर्लज्जता से पुकारे जा रहा है।ज़रूर पत्नी पर हावी रहने वाला पति होगा।मैं तो निखिल को ऐसी हरकत पर दो मिनिट में राइट कर देती।
पड़ोसी हुआ तो क्या हुआ!अभी अपरिचित है और एक विवाहित पुरुष होते हुए पड़ोसी महिलाओं को उनके नाम से पुकारना तो उसकी घोर अभद्रता है,असभ्यता है।वो उसकी पुकार पर उदासीन बनकर कपड़े तान पर डालती रही।काश कभी निखिल मुझे इतने प्यार से पुकारते तो कुछ और बात होती पर किसी परपुरुष के मुँह से यह पुकार कितनी भद्दी लग रही है।
याद आया जब नई-नई दुल्हन बनकर आयी थी तो वो निखिल को नाम से पुकारने के लिए जोर देती थी।वो मज़ाक उड़ाते हुए बोलते थे कि “तुम्हें कोई रावण उठाकर नहीं ले गया है जो जंगल-जंगल सीते-सीते पुकारता रहूँ।प्रत्यक्ष सामने रहने पर भी लोग क्यों नाम से पुकारते हैं,उसको अपनी जगह बुलाने के लिए ही पुकारते हैं।मैं तो खुद ही तुम्हारे पास आ जाता हूँ तो पुकारने की ज़रूरत ही नहीं है।”
शादी से पहले स्कूल में अटेंडेंस लेने के लिए क्लास टीचर ने औपचारिक रूप से पुकारा और घर में सबने घर के नाम से ही पुकारा।तमन्ना ही रह गयी कि कोई उसे प्यार से उसके नाम से पुकारे।

पाँच लघुकथा

निर्मल कुमार डे
लघुकथा-१
समझौता
“हैलो बबली! कैसी हो ?”
पिता की आवाज सुनकर बेटी ने आँसू पोंछा और सामान्य स्थिति की आवाज में फोन पर कहा, “ठीक हूँ बाबूजी।”
“घर पर सब ठीक है न बेटा?”
“हाँ बाबूजी! सब ठीक है।”
” ”
“बाबूजी! आप मेरी चिंता नहीं करना। पहले आप कितने स्वस्थ थे? बीपी,शुगर कुछ नहीं था।”
” हाँ बेटा!तुम्हारी चिंता…!”
“बाबूजी! सब ठीक हो जायेगा।”
पिता की आँखें गीली हो चुकी थीं।
“बेटा, गोलू भी अब पाँच साल का हो गया। अपने बच्चे के लिए तुम्हें थोड़ा समझौता…।”
“आप बेफिक्र रहें पापा। मुझे आपकी भी चिन्ता लगी रहती है।”
लघुकता-२
व्हाट्सएप पर बेटे का मैसेज था,”पापा इस महीने रूपये नहीं भेज पा रहा हूँ। किसी तरह मैनेज कर लेंगे।”
‘तुम चिंता मत करो दीपक।मन लगाकर काम करो।” पिता ने जवाब टाइप किया।
“पापा मैं बहुत जल्द आ रहा हूँ।। अमेरिका में रहकर मैं बिल्कुल अकेलापन महसूस कर रहा हूँ। आपके त्याग और परिश्रम से मैंने अपनी पढ़ाई पूरी की और नौकरी भी लग गई अच्छी कंपनी में। लेकिन…अब मुझे आपके साथ रहना चाहिए।”
“क्या नौकरी छोड़ दी तुमने?” पिता ने चिंता जताई।
“जी पापा! मैंने यहाँ की नौकरी छोड़ दी है लेकिन अपने ही देश में एक बड़ी कंपनी में ऑनलाइन ज्वाइन कर ली है।”
” ”
“अब हमलोग साथ ही रहेंगे।”
पिता की आँखों में सुकून चमक उठा।

लघुकथा-३
तुलना
“आपने शादी के पहले खुद मुझसे बहुत सारी जानकारी ली। फिर दूसरों से क्यों तुलना? मैंने तो कभी अपनी डिग्री की गलत सूचना नहीं दी।”
पत्नी की बातों से आकाश को लगा पत्नी आज मूड बना कर बात कर रही है,
“क्यों आज तुम बहुत नाराज़ हो?”
“मैं नाराज़ नहीं हूँ, नाराज होकर भी क्या कर सकती हूँ!” नीला ने कहा।
“तो फिर?”
“आप मेरे पति हैं। आपकी जिन बातों से मुझे दुख होता है उसकी चर्चा बाहर नहीं करना चाहा,अपने माता- पिता से भी नहीं,इसी लिए आपसे की।”
“दूसरे की पत्नी से तुलना करना मुझे खराब लगा। हर इंसान की अपनी अलग-अलग शख्शियत होती है।”
” हाँ इसे मैं मानता हूँ”, आकाश को लगा कि नीला इतनी साधारण नहीं है जितना वह समझता है।
“आप मर्द लोग दूसरों की बीबी की प्रशंसा कितनी आसानी से कर लेते हैं। कोई औरत पराए मर्द की प्रशंसा कर दे तो उसे बदचलन तक कहने से बाज नहीं आता उसका मर्द।” नीला ने कहा।
“बस करो मैडम, आपकी बातों में दम है। चलो अब चाय तो पिला दो आकाश ने कहा।
नीला आकाश को पहली बार पराजित देख हँस पड़ी और चाय बनाने किचेन में गई।

लघुकथा-४
हल्दी की रस्म धूमधाम से मनाई गई, जब कुछ एकांत मिला तो सुनीता ने अपनी दोस्त से कहा, “कंगना! कल तुम्हारी शादी है,शादी के बाद फिर कब भेंट होगी पता नहीं।एक बात पूछनी थी!”
” हम लोगों ने वर्षों साथ रहकर कॉलेज की पढ़ाई पूरी की,ऐसी कौन -सी बात है जो तुम आज पूछना चाहती हो?”
“असल में तुम्हारी भावना को ठेस न लगे इसीलिए…!”
” तुम मेरी जिगरी दोस्त हो। जो भी पूछना चाहती हो पूछ लो।कोई संकोच या झिझक नहीं।”
“तुम्हें अपने पिता की याद नहीं आती?तुम उनसे फोन पर बात नहीं करोगी?”
“मुझे पिताजी कभी याद नहीं आए। क्यों उनसे बातें करूँ?”
कंगना ने दृढ़ता से कहा।
“जब मैं पाँच साल की थी,पिताजी मम्मी और मुझे घर से निकाल दिए थे। फिर उन्होंने अपनी एक सहकर्मी मित्र से शादी कर ली।
जब वे छोटी नौकरी में थे,सीमित आय थी,मेरी मम्मी से शादी की थी।बाद में अच्छी पगार वाली नौकरी मिली, ओहदा बढ़ा तो मेरी मम्मी को अपनी जिंदगी से दूध की मक्खी की तरह निकाल दिए। मेरी भी चिंता नहीं की।”
दोनों की आँखें नम हो चुकी थीं।
“माँ ने समाज और परिवार में एक बेसहारा की जिंदगी कैसे जी ?,.कितना संघर्ष किया है? इसे मैं अच्छी तरह जानती हूँ।उनकी जिजीविषा और कुर्बानी पर एक महाकाव्य लिखा जा सकता है।”
“क्या पिताजी कभी तुमसे नहीं मिले?”
” जब मेरी नौकरी लग गई और इसकी जानकारी किसी मित्र से मिली तो अपने मित्र के माध्यम से मुझसे मिलने की इच्छा जताई थी।”
“तुमने क्या जवाब दिया था?”
“मैंने साफ मना कर दिया था। उन्हें पता लगना चाहिए था कि मैं एक आत्मनिर्भर स्वाभिमानी माँ की बेटी हूँ।”

लघुकथा-५
कन्या पूजन
” लो साक्षात दुर्गा को ले आया।”
पति की गोद में एक नवजात बच्ची को देख पत्नी को आश्चर्य हुआ।
“किसकी बच्ची है? क्यों ले आए?” पत्नी ने पूछा।
“भगवान की बच्ची है। सुबह -सवेरे मैदान में झाड़ी के पास मिली। लावारिस बच्ची को मैं ले आया।
अगर नहीं लाता तो कुत्ते और कौवों की शिकार हो जाती।कितनी मासूम है, देखो।”
“कितने निर्दय हैं इस बच्ची के माँ -बाप!” अगर बेटा होता तो…!”
” छोड़ो उन जालिमों को। पिछले नवरात्र में कन्या पूजन के लिए लड़कियाँ नहीं मिल रही थीं। तुम्हें भी परेशान देखा था।
अब हम दोनों इसकी परवरिश करेंगे।”

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