प्रश्न अनेक, समाधान नहीं ।जरुरी है.प्रकृति संरक्षण ।
प्रकृति जहाँ परिवर्तनशील है वहीं सवेदनशील भी ,,विकास का हर कदम ,आधुनिकता की हर लहर उसकी नींव पर एक गहरी चोट होती है । उसकी दुनिया निरापद हरीतिमा से भरपूर रहे ,जीवन की सांसें स्वच्छ ,और निर्मल हों इसलिये उसके नियमो से खेल मत करो मानव ,अन्यथा महा विनाश होगा ”ये प्रकृति हमें हमेशा सिखाती रही है। .पर कब चेता है मानव ?.भौतिकता के युग में ऊँचा और ऊँचा उड़ने की ललक ,पर्वतों को जीत कर राह बनाने की अहमन्यता -विजेता का दर्प लिए मनुष्य ने प्रकृति को आवरणहीन बनाया है ,पेड़ काटे हैं ,हरियाली छीनी है ,कंक्रीटों के जंगल बसाए हैं ,रासायनिक और औद्योगिक विस्तार से उसकी एकांतिकता को नष्ट किया है । याद करें जब उत्तराखंड की भीषण त्रासदी प्रकृति द्वारा सिखाया गया एक सबक भी हो सकती थी,सरकारों विकास के कदम तो उठाये पर व्यवस्था ने ईमानदारी नहीं बरती । पर्वतीय समाज ने धन कमाने की लालसा और वैभव प्रदर्शन के लिए पर्वतों की स्वाभाविक और प्राकृतिक बनावट, उसके नियमों से छेड़छाड़ की परिणाम सामने है । विनाश हुआ ,हजारों जानें गईं ,हजारों लापता हो,बिछुड़ गए,मासूमों की आँखों के आंसू नहीं सूखते । दोषी कौन ?..सवाल कौंध रहे हैं ,सभी हतप्रभ हैं पर जवाब किसी के पास नहीं। पेड हमारे.सच्चे मित्र, स्नेहिल छाया में समेट लेने वाले घर के बुजुर्ग सदस्य जैसे होते.हैं।उनका न होना जीवन में बहुत कुछ खो देना है ।एच अव्यक्त पारिवारिक रिश्तों में बंधे हुए उनका प्रेम अद्भुत है। उन्हे बचाना ही होगा मानवपा के लिए जीवन के लिए।
देश को बचाना है देश के दुश्मनों से
बचाना है—
नदियों को नाला हो जाने से
हवा को धुआँ हो जाने स
खाने को ज़हर हो जाने से :
बचाना है—जंगल को मरुस्थल हो जाने से,
बचाना है—मनुष्य को जंगल हो जाने से
अब सरकार ,समाज ,व्यवस्था को चाहिए कि आपसी मतभेदों -मनभेदों को भुला कर,जाति वर्ग ,धर्म ,सम्प्रदाय और राजनितिक पार्टियों से परे होकर केवल देश के लिए इस आपदा से बचाव के लिए ईमानदार कोशिश करें ।.देश की बदली हुई परिस्थितियों के नाम सम्वेदना का एक एक स्वर ,आस्था,भक्ति ,विश्वास ,मानवीय गरिमा और करुणा सभी दांव पर लगी हैं चारो तरफ अनुत्तरित प्रश्नों की बाढ़ !.दोष किसका ?.कमी कहाँ थी ?.अगर ऐसा होता तो सब बच जाते !.अगर ऐसा हुआ होता तो यह जल प्रलय नहीं आती पर समाधान एक भी नहीं । प्रकृति से छेड़छाड़ कहें या दैवी आपदा बिनाश तो हुआ ,शिव का तीसरा नेत्र खुला .पर हम सब जानते हैं –प्रकृति के नियम ,परिवर्तन और उसकी गतिशीलता को ..सामाजिक सम्बन्धो की तरह ही दान ”-प्रतिदान ”-का अनुशासन मानती है प्रकृति। .हमने जंगल काटे-पहाड़ खोखले होते गए कंक्रीटों के जंगल बसाये ,पहाड़ों को काट कर रास्ते बनाये ,नदियों का मार्ग अवरुद्ध कर दिया हरियाली न होने से प्राण वायु [आक्सीजन [की कमी हुई ..परिणाम सामने है । प्रकृति से जितना लिया उतना दिया नहीं अब जब विनाश हो चूका है,उत्तराखंड में जो कुछ भी घटित हो रहा है ,वह भी एक दिन अतीत का हिस्सा बन जायेगा। ,लोगो के दर्द ,पीड़ा ,आंसू ,निराशा -हताशा ,और जीवन मृत्यु के बीच झूलती जिंदगियों की कहानी भी यादों में सिमट जाएगी एक दिन
इस धरती और प्रकृति के प्रति हमारा सबसे पहला दायित्व है कि हम उसका संरक्षण करें।पेडों का कटना रोककर और नये पेड लगाकर। पहले गांवों.में परंपरा थी वृक्ष लगाने की।धार्मिक परिप्रेक्ष्य में नीम,आम,बेल,आंवला आदि के वृक्ष लगाये जाते.थै जिनका प्रयोग पूजा आदि कार्यों में किया जाता था। नीम औषधीय वृक्ष तो था ही देवी पूजा में नीम के पत्तों का प्रयोग तथा अअक्षय नवमी के दिन आंवले के पेड के नीचे सपरिवार बैठकर भोजन करना पुण्य की प्राप्ति कराता था।भगवान शिव को.बेलपत्र चढाने तथा पुजा के कलश में आम के पललवौं को शामिल करना भी वृक्षों की महत्ता को.बताता है।इस प्रकार धार्मिक संस्कारों ने भी वृक्षों की रक्षा की थी।आज सब कुछ लुप्त हो.रहा है,नये पेड लगाने की परंपरी अब गांवों में भी नहीं रही। वृक्ष तो जन्म से लेकर मृत्यु पर्यंत मनुष्य का साथ निभाते हैं।इस प्रसंग में कवि नरेश सक्सेना जी की एक कविता याद आती है जो प्रकृति प्रेम व संवेदना के उच्च स्तर को छूती है –
अंतिम समय जब कोई नहीं जाएगा साथ
एक वृक्ष जाएगा
अपनी गौरैयों-गिलहरियों से बिछुड़कर
साथ जाएगा एक वृक्ष
अग्नि में प्रवेश करेगा वही मुझ से पहले
लिखता हूँ अंतिम इच्छाओं में
कि बिजली के दाहघर में हो मेरा संस्कार
ताकि मेरे बाद
एक बेटे और एक बेटी के साथ
एक वृक्ष भी बचा रहे संसार में।
मानवीय संवेदना ,जीवन और प्रकृति से प्रेम करना भी हमारी परंपरा रही है।और इस परंपरा की सशक्त वाहक रहीं हैं महिलाएं।पर्यावरण के संरक्षण में भारतीय महिलाओं की महती भूमिका है। पर्यावरण के संरक्षण एवं संवर्धन में महिलाओं की भूमिका को अलग-अलग विद्वानों ने परिभाषित किया है। कार्ल मार्क्स के अनुसार ‘कोई भी बड़ा सामाजिक परिवर्तन महिलाओं के बिना नहीं हो सकता है।’ कोफी अन्नान के अनुसार इस ग्रह का भविष्य महिलाओं पर निर्भर है। रियो डिक्लेरेशन में माना गया है कि पर्यावरण प्रबन्धन एवं विकास में महिलाओं की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। सतत विकास हेतु महिलाओं की पूर्ण भागीदारी आवश्यक है।
भारतीय सन्दर्भ में यदि विवेचना की जाय तो भारतीय महिलाएँँ वैदिक काल से ही पर्यावरण संरक्षण की पक्षधर रही हैं। हर भारतीय घर में तुलसी, केले का पौधा होना, उनका पूजन हमारे पर्यावरण से जुड़ाव को ही परिलक्षित करता है। प्रातः काल को सूर्य अर्घ्य देना, चन्द्रमा का पूजन, जल का पूजन, भूमि पूजन सहित पर्यावरण के प्रत्येक अजैविक व जैविक घटक के प्रति सम्मान का सूचक है। बदलते सामाजिक मूल्य, घटते मानवीय मूल्य, वैश्वीकरण एवं आधुनिकता की आड़ में हम पर्यावरण को निरन्तर प्रदूषित करते जा रहे हैं।
बाबा निमिया के डार जनि काटहु निमिया चिरैया बसेरा,बलैया लेहु बीरन के,,बाबा बिटिया चिरैया अस होहि।नीम के पेड को बेटी जैसा सम्मान देना और उसके कटने पर बेटी की विदाई जैसा ही दुख अनुभव होना आदि भावनाएं ही पर्यावरण के संरक्षण में प्रमुख भूमिका निभाती थीं। नीम की डाल सै देवी दुर्गा का संबंध पवित्रता का द्योतक रहा है।
निमिया के डार मैैैया डालेली
हिंडोला कि झूलि झूलि ना
वैवाहिक आयोजनों में हल्दी दूब अक्षत सिंदूर, पीपल का पेड,वट सावित्री पूजा और व्रत,,
तुलसी विवाह, तुलसी, सूर्य और पीपल को जल देना
तथा सूर्य पूजा छठ की परंपरा,–उगि हे,सुरूजदेव उगन के वेर,अरघ के फेर,,
केरवा के पात पर उगेलेसुरूज देव ।जैसे गीतों में प्रकृति के संरक्षण की बातें भी सामने आती हैं।
प्राचीन भारतीय संस्कृति में पर्यावरण संरक्षण के प्रति हमारे संस्कारों को आधुनिक समाज ने रुढ़िवादिता कह कर हमें पर्यावरण संरक्षण से दूर कर दिया है। किन्तु आज पुनः हमें अपनी संस्कृति की ओर लौटकर पर्यावरण को संरक्षित करना होगा।
भारतीय महिलाएँँ इस दिशा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती आ रही हैं। पर्यावरण संरक्षण में भारतीय महिलाओं ने सदैव ही योगदान दिया है। जहाँ भी पर्यावरण को हानि पहुँचाने का कार्य हुआ है, उसा मुखर विरोध हमारी पर्यावरणविद महिलाओं सहित सभी ने किया है। भारतीय इतिहास में ऐसे कई पर्यावरण संरक्षण आन्दोलन हुए हैं जिनकी प्रणेता महिलाएँँ रही हैं।पृथ्वी को.सुरभित बनाने के लिए, हरियाली को.जिंदा रखने के लिए आवाज उठानी होगी चाहे किसी वर्ग, प्रदेश गांव, शहर कहीं से भी हो ,यह जरुरी है पर्यावरण संरक्षण के लिए। आदरणीय रामविलास शर्मा जी की की यह कविता संवेदनशील, सार्थक संदेश देती है।
वृक्ष लगाकर इस धरती को
आओ स्वर्ग बनाएं
हरा भरा सोना है जंगल
इसे न हरगिज काटें
कॉेक्रीट का जाल बिछाकर
नहीं धरा को पाटें
ये तो शिव का वह स्वरूप जो
हरते सदा अमंगल
स्वच्छ हवा और वर्षा का जल
देते हमको जंगल
करते जो खिलवाड़ प्रकृति से
उनको सबक सिखाए
स्वच्छ हवा और वर्षा का जल
देते हमको जंगल
करते जो खिलवाड़ प्रकृति से
उनको सबक सिखाएँ।

पद्मा मिश्रा.जमशेदपुर
आणविक संकेतः padmasahyog@gmail.com