माह विशेषः युद्ध या शांति -शैल अग्रवाल


प्यार, उपकार.
मान अपमान
वैभव और तिरस्कार
सुविधा अनुसार
व्यापार है जिन्दगी
एक प्यास …
जैसे रेत हो सूखी
आस में तिरकी
सोख लेगी सब
तन और मन…
सूखा एक कंकाल
बेहाल है जिन्दगी…

एक और युद्ध
भयभीत हैं ये भी और वे भी
क्रुद्ध हैं ये भी और वे भी
मान लो कि यही सही है
जो वह कह रहे हैं
कितने मरे और किस के मरे
फर्क नहीं पड़ता, सच तो यह है कि
मानवता का अपहरण हुआ
बाल खींचकर ले जाया गया
औरतों को नंगा किया गया
व्यभिचार हुआ
किसने किया कितनी बार किया
क्या फर्क पड़ता है
प्यार, इज्जत और मानवता
नहीं है तो नहीं है
बाहुबली और चालबाजों की ही है
अब यह व्यापारी दुनिया
पैसों के साथ खड़ी
आदर्शों और उसूलों पर नहीं
लूट-खसूट, जालसाजी और धोखाधड़ी
वैभव की कामना करती
भूखे नंगों के हाथ हथियार बेचती
अगर तुम कुछ बदल नहीं सकते
तो मान लो कि बदल गई है दुनिया

भूखों और निर्बल के आंसू मत देखो
बच्चे जो बच्चे थे कल तक आज नहीं हैं
बड़े हो गए हैं एक ही रात में बन्दूक थामकर
इस कटती मरती दुनिया को देख
बिलखो मत,
मान लो कि दफन हो गई है मानवता
अंत की ओर बढ़ते वहशी और उन्मादी
शांति नहीं चाहते, तो नहीं ….


अशांत है मन, बेचैन है मन
इन्न्तजार करते इन्तजार देखते
कल एक चिड़िया देखी थी
जले ठूँठ पर इंतजार करती
अपने खोए बच्चों का
वहीं नीचे एक बूढ़ा भी था
ध्वस्त घर और टूटी चारपाई चिपका
चिड़िया की तरह ही सूनी आँखों से
अपनों की वापसी का इंतजार करता
पंक्ति बद्ध लाशें भी थीं वहाँ
दफनाए जाने का इंतजार करतीं
बच्चे-बूढ़े वयस्क और औरतें
किसी की खबर नही थी किसी को
कोई रहम नही था उस विध्वंस में
युद्ध था वह अहम् का, वहम का
और इसमें तो सौ खून भी माफ हैं
भले ही अबोध और नादानों का ही हो
सही कौन, गलत कौन, फर्क ही नहीं अब
हारेगा कौन जीतेगा कौन पता ही नहीं अब
क्या रुकेगा यह युद्ध भी कभी
सवाल निरर्थक क्योंकि जवाब ही नहीं
मुनाफा बहुत है शस्त्रों के व्यापार में
डर जाते हैं लोग आणविक विध्वंस के नाम से
शौर्य प्रदर्शन यह ताक़तवर का
और इंतज़ार बेबस का
अशांत है मन., बेचैन है मन
कौन है जो इसे रोके अब
प्रदर्शित यह ताना शाही और अभिमान
धड़ल्ले से हो रहा अत्याचार
निर्लज्ज और पाशविक व्यापारिक दोहन
धर्म जाति और देश के नाम पर

कटती-पिटती और मिटती जा रही मानवता
क्या फिर राम कृष्ण या पैगंबर आएँगे
शांति बिगुल बजाएँगे ….
कहाँ उड़ गए वे सारे के सारे
शांति का संदेश देते कबूतर
उड़ाए थे जो हमने तुमने मिलकर झुंड के झुंड
लालच का यह घना कोहरा
निगल गया है सारी संवेदना
उम्मीदें हमारी टूटी बिखरी इन्तज़ार करतीं
पर दूसरे का दुःख तो अब दुःख ही नहीं
पड़ोसी की भूख कब अपनी भूख रही
अंधों की इस अँधेर नगरी में
सुरक्षित है अगर अंधा
तो सुरक्षित मान लेता पूरी दुनिया
कैसे बुझे यह चिनगारी
राख कर दी जिसने मानवता और सभ्यता
ख़ूँख़ार जानवरों से अधिक आक्रामक वक्त यह
अशांत है मन बेचैन है मन
क्या है शेष भी साहस , शौर्य और विवेक
जो कर दे दूध का दूध पानी का पानी
सुना था नियम कानून और संविधान
सभ्य समाज के उपकरण
विकसित समाज की पहचान
कानून नहीं जहाँ मात्र सर फोड़ने वाली लाठी
सहारा अपंगु असहायों का
फिर क्यों तोड़े मरोड़े जा रहे कानून और लोग
सुविधा के लिए, स्वार्थ के लिए
लेन-देन की इस व्यापारी दुनिया में
छोटे-बड़े हजार मुनाफों के लिए
कौन दे रहा है ग़लत संरक्षण
अगर राजा कह दे तो सब ठीक आज भी
मंत्री भी कह देगा सब ठीक और संतरी भी
और ढहा दिए बेवजह ही हजारों के घर
भूखा लटका मिला था कल फिर
हलकू किसान अपने ही खेत में
और हवलदार संत सिंह की
नन्ही लुटी नुची मुनिया
गंदे पानी के नाले में पड़ी
कहाँ हैं सहृदय वीर विवेकी इनसान
चंदा-सूरज से दिनरात रौशनी फैलाते
जिनके भरोसे घूमती थी पृथ्वी हरी-भरी
सौर मंडल सहित झिलमिल आकाश लिए
सूख रही क्यों अब पर डरती और कांपती
भूखे बिलखते अनाथ और बेघरों की कब्र बनी
इन्तज़ार करती भयभीत
अपनी बेबसी पर आँसू बहाती?


भूले क्यों

एक अधिकार यह भी तो मूलभूत
जीने का जब तक जीवन है
कौन खेल रहा यहाँ पर
फिर ईश्वर ईश्वर
कहता पीड़ा से मुक्ति का
मौत ही अब उपचार
कितना आसान कितना स्थाई
कितना सुलभ यह सिद्धांत
ताक़तवर का मनमानी करने को
अनचाहा हटा देने को
क्रोध, लालच और नफरत का विस्तार
कितने विकारों की यह चिनगारी
ऐसी लपट भस्म जिसमें हो जाएगी
करुणा, मानवता, यह दुनिया सारी
आसान है कानून बनाना
ऊँची-ऊँची बघारना
पर निष्पक्ष और संतुलित निर्णय
कभी आसान नहीं
लौटानी है यह झीनी चुनरिया
बेदाग और सुहानी धाती की तरह
ताकि खिलखिलाता रहे शिशु
भविष्य के उन्मुक्त आँगन में।।…


इक्कीसवीं सदी में
चन्द सत्ता धारियों के निर्णय पर
नई धारणाएँ और नई मान्यताएँ
मनमानी और असहज जो बड़ी
गरीबों को गोली से उड़ा दो
अस्सी से ऊपर का उपचार बन्द करो
इन्हें संसार से हटा दो
सहूलियत की इस दुनिया में
सुविधानुसार ही चलेगी अब जिन्दगी
वह दिन दूर नहीं
जब मानव अधिकार कुछ नहीं
निर्मम मासूम को देकर सजा
कह देना कितना आसान है
चने के साथ घुन तो पिसेगा ही
पर लगता यह सही नहीं….


-शैल अग्रवाल

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