माह विशेषः तुझ पर है अभिमान


तुझ पर है अभिमान
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माटी में
जिसकी महक रहा
त्याग और बलिदान;
नमन उस देश के आयुध को,
तुझ पर है अभिमान।

तेरे सीने में,
भुजबल में
दिखे कईं हिमालय;
गंगा बही हृदय से
संगम, जन सागर में तय;
पार हुई
दुर्गम घाटी की ऊँचाई, ढलान।

वेश रिपु का
कितना भौंके, अपनी बेगुनाही;
कौधी विद्युत, वीरों की तो
फैलेगी तबाही;
ज्यादा चादर फैलाने के,
नहीं चलेंगे प्लान।

सोचा, क्या?
गलवान छेड लो
तो होंगे हम पस्त;
ईटों का उत्तर पत्थर से,
देकर कर दें त्रस्त;
देश बचाना धर्म हमारा,
क्यों ना रिपु को भान।

केवल गाँधी,
बुद्ध समझ कर,
मत टपकाओ लार;
अजगर दुम दबा कर भागे,
ऐसा होगा वार;
वीरों की धमनी में
बहती विद्युत का ऐलान।

हरिहर झा

तिरंगा
…………….
सरहदोँ से आते वाहनोँ मेँ
तिरंगा ओढकर सोये
कौन हैँ ये लोग…..

सुना है..
जागते थे ये
जब सोते थे हम
सुकून भरी नीँद…..

कहते हैँ…
स्पष्ट दिखाई देता है
रक्त का लाल रंग
श्वेत पृष्ठभूमि पर….

परंतु …
जिनके श्वेत कपङोँ ने
कालिख को भी
ढक लिया हो
उनका क्या……?

क्या श्वेत रंग की आङ मेँ
पनाह पाने लगी है
भीरुता भी आजकल…….?

सोच रहा हूँ….
आखिर क्यूँ है
तिरंगे मेँ
श्वेत रंग से पूर्व
“केसरिया” रंग ………?
अश्विन त्रिपाठी

फौजी-फौजी-फौजी
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फौजी भी इक इंसान है हमारी तरह
जिसे हमारा समाज महज़ जिम्मेदारियों
का गठ्ठर समझता है
व करता है सदैव इक अलग सी उम्मीद,
ताजुब तो तब होता है जब वह भी बना
लेता है खुद को समाज के तमाम बाशिंदों
से अलग और चल पड़ता है पीठ मोड़कर
सामाजिक भावनाओं की ओर से,
सिसक कर लम्बा घूंट भर लेती है प्रेयसी,
और मुंह बंद कर सिसक लेते हैं लाडले,
कांपती है माँ की दुबली पतली देह, और
चुपके से पोंछ लेता है दो मोती बापू
किसी दरवाज़े की ओट में।
कितने अलग हैं ये फरिश्ते हम सबसे,
जो अपने जिगर के टुकड़े को रोकते नहीं,
और भेज देते हैं हम सबों के लिये
अनजान राहों पर, बारूद के बिस्तर पर
गोलियों के सामने। धन्य हैं वो,
उन्हें मेरा शत-शत प्रणाम।
– शबनम शर्मा
अनमोल कुंज, पुलिस चैकी के पीछे, मेन बाजार, माजरा,
तह. पांवटा साहिब, जिला सिरमौर, हि.प्र. – १७३०२१
मोब. – ०९८१६८३८९०९, ०९६३८५६९२३

रखना तुम विश्वास
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माना तुझसे दूर, बहुत दूर
चौकसी में खड़ा सरहद पर
पर तेरे ही आँचल में रहता
तेरे आशीष की छोंव सदा ।

तेरे ही शिक्षा से तो माँ
जलती मशाल बना जीवन
बापू की फटकारों ने इसे
फौलादी एक रूप दिया।

अत्याचारियों का सीना मैंने
इसी प्रताप से छलनी किया
काम आ सकूँ देश के हित
ज्वाला अब यही अहर्निश
अंतर में मेरे जलती है।

बाज-सी पैनी दृष्टि ये मेरी
सीमा पर सतर्क परिक्रमा देती
अघाती नहीं पर आज भी
यादो के चक्कर लगा जाती है।

देश की सीमाओं के संग
तेरी भी बलैया ले आती माँ
खड़ी-खड़ी यहाँ भी
घंटों तुझसे बतियाती है।

कमजोर नहीं पर तेरा बेटा
थरथर कांपें दुश्मन जिससे
देश की रक्षा के संकल्प में
हंस-हंस बैठा मौत के मुंह में।

कितनी रात जागा हूँ यूँ
माँ, मैं भूखा और प्यासा
होश नहीं मुझे अब इसका
सरहद की माटी ही माँ
बनी ओढ़ना और बिछोना ।

सीमा की दुल्हन-सी रखवाली
पहनाऊँ अरमानों का गहना
पर तेरे हाथ की रोटी भी माँ
अक्सर याद आ जाती है
सोंधी वह थाली सपनों में आ
माँ, तू ही तो खिला जाती है।

तेरी अंसुवन भीगी पाती यह
पढता हूँ मैं पलट-पलट
एक-एक शब्द में लगता
तू ही तो गले लगाती है।

लौटूंगा शीघ्र तुझतक फिर
तेरी गोदी में सिर रखने को
हौसलों की खाली झोली को
हिम्मत से भर लेने को।

गर ना भी लौटूँ हँसता-खेलता
तो भी उदास तुम मत होना
कहना बापू से प्यारा नन्हकू
आज बड़ा हुआ इतना ।
पूरे देश की आन संभाली
बना बापू का बहादुर बेटा।

गौरव अब यही, यही हमारा सम्मान
आनेवाली पीढ़ियाँ करेंगी हम पे मान
रोकूँगा नित उन कदमों को
करते जो अवैध अतिक्रमण
रौंदते माँ के आंचल को
और दोस्त होने का दम भरते

बिखरने ना दूंगा पावन माटी को
दुश्मन के दूषित कदमों तले
तेरी सौगंध उठाई है माँ
इस पर ही जीने-मरने को।

तेरी गोदी में किलका कभी
खेलूँगा अब रणभूमि में
सोता भले ही बन्दूक की नोंक
जागूँगा आजाद अपनी धरती में।

करूंगा रखवाली मरते दमतक
दोनों माओं का रूप न उजड़ने दूँगा
खुशियों के मेले से ये सपने
दिनरात मुझे जगाते हैं।

फौलादी ये वादे और इरादे
कितनी ताकत दे जाते
प्रार्थना कर कि मरते दमतक
तेरे लाल का शौर्य ना छूटे।

युद्ध नहीं थी लालसा मेरी
पर कायर नहीं शिक्षा तेरी
जिन्दगी और मौत दोनों में ही
वीर सपूत मैं कहलाऊँ।

मिट्टी यह मेरे वतन की
पावन जो गंगा-जमना सी
रगरग में मेरी रहे बहती
इसकी रक्षा प्रथम धर्म है

दुखी मत होना, गर्व करना
गर लौटूँ ना एकदिन
हँसते-हँसते इसमें ही
मैं सो जाऊँ।

फूल-फूल उगूँगा फिरसे
इसी माटी के कण-कण से
लहकूंगा-महकूंगा फिर-फिर
इसी लहराते आंचल में।

खेलूँगा, देखूँगा जी भर तुझे
उन्ही घर-आँगन खेत-खलिहान
गंगा-जमुनी कछारों पर
मोती तुम ये व्यर्थ न करना
रोके रखना, प्रतीक्षा करना

बोलो, करोगी ना मुझ पर विश्वास
उम्मीदों का एक दीप जलाए
मुस्कानों के चौबारे पर!

शैल अग्रवाल