माह विशेषः करोना-कविता


बन बैठा है क्यों मानव-बम
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बन बैठा है
क्यों मानव-बम,
धरती का हर इंसान आज।

देख रहे
मुख-पुस्तक में भी
नर नारी मरते ज्यों मच्छर
जमावड़े कर दिये इकठ्ठे
पढ़े लिखे बन गये निरच्छर
समझ अभी तक भी ना आया,
घर से ना निकलो बिनु काज।

अन्दर आग,
बाहर मुस्कान,
कुछ भी समझ न पाती मुनियाँ
हाथ मिला कर गले लगाना,
भीतर मन से निकली छुरियाँ
जहर भरा सोने का घट ले,
धोया पाखंडी ने ताज।

क्या क्या निगले
भक्ष्याभक्ष्य,
सोंच से भी दिल जाता काँप
विष फैला मानव की रग में
चटखारे ले खाये साँप
चमगादड़ उल्टे लटक गये
मानवता पर गिरी है गाज़।

शमन हो कैसे
जल ना मिला,
धूँ धूँ भीतर तक खूब जले
आग छिपी फैलाये आग,
लकड़ी को ना पता भी चले
क्यों सखि ईर्ष्या ना सखि भोली,
करोना का फैला है राज।

आँसू की स्याही में लोहू,
के छींटों की तिरछाई है
करोना है
होमो सेपियन,
के पापों की परछाई है
माँ प्रकृति से
जानवरों सा
सलूक करे, ना आये लाज।
-हरिहर झा

उस आदमी के लिए जो सात दिनों में पैदल चलकर दिल्ली से दरभंगा पहुँचता है
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बेटी ने कहा स्कूल बंद है
मैंने धीमी आवाज़ में कहा काम बंद है
कहा नहीं जाता पर –
कह गया यह शहर छोड़ कर जाना है
बेटी से पूछता हूँ –
दिल्ली से दरभंगा पैदल चलकर जाना है
तुम चल सकोगी
बेटी कहती है खिलखिला कर –
मेरी उँगलियों को पकड़ कर वह जा सकती है दूर
बहुत दूर
हम लोग पैदल चल रहे हैं |
रोहित ठाकुर

घर लौटते हुए किसी अनहोनी का शिकार न हो जाऊँ
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दिल्ली – बम्बई – पूना – कलकत्ता
न जाने कहाँ – कहाँ से
पैदल चलते हुए लौट रहा हूँ
अगर पहुँच गया अपने घर
उन तमाम शहरों को याद करूँगा
दुःख के सबसे खराब उदाहरणों में
हजारों मील दूर गाँव का घर नाव की तरह डोल रहा है
उसी पर सवार हूँ
शरीर का पानी सूख रहा है
नाव आँख के पानी में तैर रही है
विश्वास हो गया है
नरक का भागी हूँ
घर पहुँचने से पहले आशंकित हूँ
किसी अनहोनी से |
रोहित ठाकुर

लालटेन
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क्या आया मन में की रख आया
एक लालटेन देहरी पर
कोई लौटेगा दूर देश से कुशलतापूर्वक
आज खाते समय कौर उठा नहीं हाथ से
पानी की ओर देखते हुए
कई सूखते गले का ध्यान आया |
रोहित ठाकुर
C/O – श्री अरुण कुमार
सौदागर पथ
काली मंदिर रोड के उत्तर
संजय गांधी नगर , हनुमान नगर , कंकड़बाग़
पटना, बिहार


यह कैसा वक्त है! जब एक कीट युद्ध
विश्वयुद्ध में बदलता जाए
बिना अस्त्र शस्त्र निहत्थे हों मोर्चे पर
और अदृश्य सूक्ष्म छद्म जीतता जाए
यह कैसा वक्त है !
जब आदमी आदमी से डरे
घर में बन्द भ्रमित सब
थमे रुके सारे बाजार और व्यापार
व्यवस्था और प्रणाली सारी
विश्व की ठप हो जाए
यह कैसा वक्त है!
जब आज में ही जीए-मरे विश्व
क्योंकि कल का कुछ पता नहीं
देश पर देश मिट रहे हारे-टूटे
सूखे पत्तों से झरते मानव
निशि दिन काल कवलित
मरीज और चिकित्सक कोई नहीं सुरक्षित
दुशमन अदृश्य हर जगह विराजमान
बेधड़क हमें निगलता जाए
यह कैसा वक्त है!
मौत एक खबर लगातार
सुनते जिसे हम दिन रात
अपने-पराये परिचित-अपरिचित
जाने कब कौन छूट जाए
जीवन कड़ी से
भयभीत सब
यह कैसा वक्त है!
अस्पतालों के संग
मौत के भी घर बन रहे अब
ले आए घर पर क्यों हम यूँ मौत को
जहाजों में उड़ाकर, पानी पर तैराकर
यह कैसा वक्त है!
मास्क के पीछे छुपे सब अपने पराए
सूनी आँखें तलाशतीं टटोलतीं-
छींके न कोई, खांसे न कोई
कहीं यही तो नहीं वह मौत का रूप
अपनों से जो हमें बिछुड़ाए
यह कैसा वक्त है!
हाथ धो-धोकर भी पीछा न छोड़ता
दुशमन यह निर्दयी एक अकेला
दवा नहीं, पहचान नहीं
इसका कोई ईमान नहीं
यह कैसा वक्त है !
नफरत की बीमारी है यह
या मुनाफे का एक जोड़-तोड़
किसी को किसी पर अब
आस नहीं विश्वास नहीं
यह कैसा वक्त है!

यह किस वक्त में जी रहे हैं हम
इसमें कोई लुफ्त नहीं, जायका नहीं
जूम पर मिलना जूम पर हंसना रोना
अपनों के संग वाला अहसास नहीं
सूरज कबका डूब चुका सूनी सड़कों पर
बच्चे यहाँ अब खेलते नहीं
बूढ़े यहाँ पर टहलते नहीं
सामने गहरी काली मावस की रात
न युवाओ की चहचह
ना बाजारों की भागम-भाग
उदास दिन उगता
और डूब जाता चुपचाप
अंधेरे में भी न छोड़ें पर
अब हम रौशनी की आस
चलो एक दिया तो जला लें दोस्तों,
आस का विश्वास का!
3-4-2020

अपना ध्यान रखना
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एक एक शब्द था
दर्द भरा उसका
‘मैं अनाथ हो गया, आंटी
पापा छोड़ गए हमें आज’
‘क्या करोना था?’
‘हाँ’ सुनते ही चिंता थी उसे
मृतक नहीं अपितु जीवितों की –
तुम सब तो ठीक हो ना
बीमार तो नहीं कोई घर में?
‘नहीं’
पर नहीं पहुँचा ‘नहीं’ उस तक
चिंतित मन ने दोहराया बारबार
अपना वही एक सवाल
बिना फिर एक शब्द सान्त्वना के
चन्द नपे तुले निराश बोल
जैसे-तैसे निकले-
‘अपना ध्यान रखना!’

निर्मम
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निर्मम इस वक्त में
कितने पाषाणवत् हो चले हम
मौत में भी दुख नहीं अब
अपनी सुरक्षा की ही सुधि आती है
बोरे में सील बन्द लाशें
घर के बाहर से ही
अलविदा कर दी जाती हैं
शमशान की ओर
और
सूखे सारे आंसू
भयभीत आंखें
ना करना चाहतीं
ना ही कर सकतीं
अपनों के अब
अंतिम दर्शन….
3-10-2020

-शैल अग्रवाल

अन्ततः खुलना होता हर बंद को
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हर खिड़की खुलती
शुन्य से अनन्त में
अंधेरे से उजाले की ओर
बंधन से मुक्ति के लिए
ठीक वैसे ही जैसे
खुल जाती पुष्प की आँखें सुबह के लिए
अनायास सीप का मुख यायावर बूँद की खातिर
खोल देता जिस तरह उमड़ता बादल बारिश अंकुर के लिए
निर्झर उन्मुक्त हो खोल देता पट प्रवाह का : विराट दृश्य के लिए
कविता की एक खिड़की
जो खुलती बाहर से भीतर की ओर
दृश्य से इतर अदृश्य में
दरअसल, यह खिड़की खुलती जग के कल्मष से आत्मा के उजास में
खुल जाती दुनिया की हर चीज़
अपने उदगम से अस्तित्व की अनंतानंत छवियों में
खुल जाता पेङ विभोर होकर पत्तियों के सोंदर्य में ।
जब आता बसन्त गाता हुआ
जबकि खुलना निरन्तर क्रिया है: बेहद विस्फोटक
किंचित आह्लाद कारी भी
काश! खुल जाये कोई किरण हर अंधेरी राह पर
प्रकाशित करती पथ भटके राहगीर का
खामोश चीखों से ठसाठस भर जाये जब दिल दिमाग
टूटने लगे जिस्म की नसें अन्याय के असह्य शोर से
तभी खुल जायें रोशनी का एक दरवाजा
न्याय की उज्ज्वल तहरीर बन
किसी पवित्र फैसलों के पन्ने पर
सहसा खुल जायें देशों की तथाकथित अभेद्य सीमाएं
इस दुनिया को एक महादेश बनाती
नदियों के तटबंध खुल जायें: निर्बाध औ’ उन्मुक्त
समुद्र को पारदर्शी, भरा पूरा बनाती
अपने प्रवाह में खुलती जाये बहती जलधार
उजाड. प्रान्तर को हरिताभ करती
खुल जायें बंद कपाट हर सूने घर के
हताश बेघर की शरण बनते
ज्ञान के तमाम बंद गवाक्ष खुल जायें
आ जायें बाहर जिल्दों की तंग गलियों से
आदमकद दुःख में होने शरीक
या कि … ; जिद्दी किस्म की क्रूरता के दरमियां
खङा हो जायें भरोसेमंद आवाज़ बनकर
और फिर; बचा ले समूची कायनात को संभावित तबाही से
उद्विग्न प्रेम आ जायेअनादि पहरे से निकल बाहर
और; लगभग टूटने की कगार पर
किसी आदमी के लङखङाते विश्वास के भीतर
झपट कर हो जायें दाखिल
धीरे-धीरे हाथ पकड़ खींच लाये जीवन पथ पर
यूँ शामिल करता उसे जीवन -उत्सव में
हर गांठ… हर पहेली खुल जायें:तटस्थ, निर्विकार
जड. जंगम का सौन्दर्य निखर आवे अप्रतिम नैसर्गिक चमक में
विमोचित हो जायें रिश्तों के बंद वातायन शाश्वत लय में
हर अवगुंठन …; तमाम जङताएं टूटकर विलीन हो जायें —; चेतना के आगार में
टूट जायें हर गैर जरूरी पाबंदी
खुल जायें लौह जंजीर
अभेद्य प्राचीर?
-जीवन को हर क्षण उत्सव में बदलती
चूंकि; बंद होना हो जाना है सीमाबद्ध
जबकि; खुलना हो जाना है असीम औ’ सीमातीत।

कुछ लोग शहर छोड़कर जा रहे
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पर; कहीं होई हलचल नहीं
जो आए रोजगार की तलाश में- आस में
वो जा रहे कामगार पलायन कर
छेनी- हथौड़े घण् साज औजारों कें साथ
जब से कल काररवाने हुए बंद- उजाड
उदास पोटलियों में उठाये
गृहस्थी के भग्न सपने
लोग जा रहे हैं अन्तहीन
जबकि उनके पेट खाली हैं, जेब निहायत सूनी
कोई नहीं जानता किस दिशा जा रहे लोग
जबकि; हर शहर की सीमा सील है करफयू में
कहीं आबाद नहीं होता इनका घर
कोई शहर इनका अपना नहीं
कोई जमीन इनके हिस्से की जमींन नहीं
नहीं होता कोई आकाश खुद का
जलते धैर्य के साथ, मगर इनके तन निस्तेज हैं
आत्मा पर ढो रहे असंख्य गहरे गड्ढे
जिसकी गणना भला कोई नहीं करता
कारखाने की चिमनी के धुएं को पश्चाताप से देखते
न्याय देवी की मूरत को अपलक निहारते
लहराते तिरंगे में अदृश्य झांकते ये जन गण मन
स्टेशन की ऊंची इमारत पर टंगी
शहर के नाम की उदास वर्णमाला को
पढते मन ही मन- अलविदा कहते
अज्ञात भविष्य की धुंधली पगडंडियो पर
जा रहे कुछ डरे सहमे लोग
क्योकि; कदाचित-
छोटी रह गई यह पृथ्वी
उनकी जरुरतों को ढांपने
इसलिए; पतवार विहीन नौकाओं की तरह
जा रहे कुछ लोग
गोया; अनन्त की ओर।

रोज पढता हूँ मृत्यु के समाचार
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पर , अब यह कोई महोत्सव तो नहीं
न ही भय और न किसी तरह का विस्मय
न ही कोई आतंक न ही उत्तेजना
अब यह संवेदना का गोया उदास तट है
जहां प्राणों के भटकते पखेरू तोड़ते दम
सूखे हुए आंसुओ की जड़वत सांख्यिकी
जहां , महज एक सामूहिक आंकड़ा भर
रह गयी हो मृत्यु
दिवस दर्ज कर देता जिसे
— एक अंतहीन तालिका में ।

विजय सिंह नाहटा
बी– 92, स्कीम 10 — बी
गोपाल पूरा बाई पास
जयपुर– 302018

मानवता की सेवा में सन्नद्ध–कर्मवीरो के नाम
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है नमन तुम्हे मानवता हित जीवन अर्पित करने वालों
सेवा से संकट मोचक बन हमको गर्वित करने वालों
हर जंग जहां जीती हमने दुश्मन को धूल चटाई है
संक्रामकता -निशिचर के दमन की कसम उठाई है
है नमन तुम्हे खतरों से भी आंधी बन टकराने वालो
है नमन तुम्हे मानवता हित जीवन अर्पित करने वालों
स्वच्छता रहे,एकता रहे, यह भाव नहीं मिटने देना
हम रहें सुरक्षित देश रहे संकल्प नहीं डिगने देना
हारेगी सक्रामकता जब ,हारेगा विषधर*कोरोना*
है नमन तुम्हे मानव-योद्धा सबको प्रेरित करने वालो
है नमन तुम्हे मानवता-हित जीवन अर्पित करने वालों
है कर्म यही और धर्म यहीसंयम जीवन में साथ रहे
एकाकीपन से डरो नहीं ,बस जीवन का सम्मान रहे
है नमन तुम्हे संकल्प शक्ति से जीवन सफल देने वालों
है नमन तुम्हे मानवता-हित जीवन अर्पित करने वालों

मजदूरों के नाम
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बनाने चले थे नया आशियाना
तुम्हारे शहर में मिला था ठिकाना
मेहनत के हाथों कमानी थी रोटी
न सपने थे मन मेंउम्मीदेंभीछोटी
दो जून रोटी की चाहत बड़ी थी
कड़ी धूप में जिंदगी आ पड़ी थी
लेकिन ये कैसी विपद आ पड़ी है
मेरे देवता,आज रोटी छिनी है
हमने तो छोटी सी मांगी थी दुनिया
मौत का पैगाम लायी है दुनिया
अकेले सफर में, नहीं साथ कोई
अब जाएं कहां हम ठिकाना न कोई
गरीबों की दुनिया ,भूख की बस बातें ,
बेरोजगारी, में थकी सी है राते
लंबा सफर है,खुले पांव चलना
मिलने की आशा में, सबसे बिछुडना
थके पांव तन्हा और सूनख सफर है
किसको पता था, मौत का यह शहर है
मिटा दो भयावह मौत की ये दुनिया
हमें जिंदगी दो, हमें जिंदगी दो
न छोड़ें उम्मीदें,न हौसले टूटने दें
चलो आज हम ये जंग जीत लाएं,

एक दीपक जागरण का हम जलाये
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एक दीपक जागरण का हम जलाये
दें चुनौती तिमिर को, और एक नया सूरज उगाएं
एक दीपक जागरण का हम जलाएं
विश्व मंगल कामना को चेतना में साध लाएं
दूर हो मन का अंधेरा रोशनी यूं जगमगाए
एक दीपक जागरण का हम जलाएं
हम अकेले नहीं जग में,साथ सबकी भावना है
व्याधि दानव हो पराजित,यह युद्ध हमको जीतना है
दीप से मिल दीप का आलोक जग में बांट जाएं
एक दीपक जागरण का हम जलाएं

जागो मां!
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जागो मां,कब तक सोएगी
उठ भी जाओ,देर हो गई
कब से तुम्हें पुकार रहा हूं
मूंदी आंखें निहार रहा हूं
क्या तू अब कुछ ना बोलेगी
जागो मां,कब तक सोएगी ?
भूख लगी है, कैसे खाऊं
किससे मांगू,किसे बुलाऊं
देने वाले चले गए हैं
और कहां से तू लाएगी?
जागो मां कब तक सोएगी?
चलते चलते पांव थक गए
सब साथी भी यहीं रुक गये
अब कितना यू और रुकेगी?
जागो मां कब तक सोएगी?
हमको बहुत दूर जाना है
संग संग चलतें ही रहना है
यह तू कैसी नीद सो गयी
मां,कितनी दूर चली गई है
जागो मां कब तक सोएगी?


हे युवा शक्ति!!
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अब तो जागो,
हे युवा शक्ति,
बहुत हो चुका अब तो संभलो
अब भी अंधियारा क्यों मन में?,
क्यों संशय की खींची दीवारें?
बिखरे सन्नाटों में फ़ैली ,
गूंज रही आवाज किसी की ..
बंधी मुट्ठियाँ मांग रही हैं,
साथ तुम्हारा, न्याय तुम्हारा ,
है गूंज रही सब और, जागरण की पुकार,
कातर चीखें,कुंठा, लिप्सा मन की–
तुम दो बिसार.
तुम बढ़ो कदम से कदम,
हाथ में दिए हाथ.
तुम युवा शक्ति,
ऊर्जा तुम ही हो मातृभूमि की.
अब तो आओ नव जीवन पथ पर,
कर्तव्यों की छाँह तले
एक नया सूर्य बनना तुमको,
तुमको लिखना इतिहास,
समय के पृष्ठों पर ,
तुम क्रांति दूत बन जियो,
सुनो,,घायल-मन,
भींगीआँखोंकीकातरपुकार
बन राम तुम्हें आना होगा.
है तभी नाश इस व्याधि जनित रावण का है,
अब तो जागो हे युवा शक्ति ..!,
——–
पद्मा मिश्रा–वरिष्ठ कवयित्री कथाकार
जमशेदपुर झारखंड

ये भारत है
सीधा है सच्चा है कुछ कर गुजरने का जज्बा है
जितना है वो काफी है,जो है वो ही पर्याप्त है
संकट कोई भी या वक्त कैसा भी जब सामने आए
हमारे जज्बे से न लड़ पाए
ये भारत है
जिसके लिए ह्रदय भावनाओं से ओतप्रोत हो जाता है लेकिन
जिसकी व्याख्या के लिए शब्दकोष के शब्द कम पड़ जाते हैं
परिभाषाएँ संकीर्ण प्रतीत होने लगती हैं लेकिन
संभावनाएं असीमित दिखने लगती हैं
ये भारत है
अनेकों उम्मीदों को जगाता
असंख्य आशा की किरणें दिखाता
ये भारत है
-डॉ नीलम महेंद्र


विश्वास है
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अब बस प्रार्थनाएं रह गई हैं
हमारी खुली हथेलियों पर
फिसलता जा रहा है सब
आँखों से अजस्र आंसू बना।

गुजरते वक्त के साथ
गुजर चुके हैं जाने कितने
और अभी गुजरेंगे
जाने और कितने…

डराती हैं अब तो ये खबरें
फिर भी विश्वास है बाकी
तुम में जीवन में
तुम्हारे न्याय में सर्वोपरि

प्रेम प्रतीत भरी यह करुणा
तुम्हारी व्यापक यह संरचना
विनाश के कगार पर
और तुम दूर बहुत दूर
जाने किस आसमान में

विश्वास है कि एकदिन तो पर
पिघलोगे जरूर इस आँच से…
शैल अग्रवाल