माह के कविः विजय सिंह नहाटा


जियेंगे मनुष्य की तरह
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हम मनुष्य हैं ; और रहेंगे
और; जियेंगे मनुष्य की तरह
एक दूजे के बीच जगह को
मनुष्य – बोध से भरते हुए।
रहेंगे पेट औ’ भूख के दरमियां
अन्न के दानों की तरह
हलक औ’ प्यास के बीच
शीतल जल की तरह
सारे वैषम्य धो दिये जायेंगे एक दिन
अंततः किसी समानधर्मा रक्त की धार से।
बच्चों की किताब के पवित्र कोने में लिखे
नीति वाक्य की तरह जियेंगे
जियेंगे मुहावरों किंवदंतियों में छुपे मर्म की तरह
मुश्किल हालात से गुजर रही दुनिया के लिए
उम्मीद के पुल की तरह जियेंगे
दुखों के पहाड़ से टूट गया एक आदमी
किसी भंगुर मन में क्षीण- सा सहारा या कि
जीने लायक बहाने की तरह जियेंगे
अनाम जियेंगे नींव में चुपचाप रखी सुर्ख ईटों की तरह
धरती में एक बीज की तरह अदृश्य जियेंगे
हम जियेंगे मनुष्य की तरह
मनुष्य की भाषा में
लिपि में मनुष्य की पढे-लिखे जायेगे
सारी जटिलताओं– सारी कुटिलताओं से सुदूर
एक ऐसे जनपद में
जहां सबसे सरल – सुबोध से सौन्दर्य बोध की छाँव तले
जीवन भर आकंठ जियेंगे
कि , पियेंगे जीवन सत्व रूपी सोमरस
गर ,बचाया जा सके इस झंझावात में
तो बचाऊंगा मनुष्य के महज मनुष्य होने का गर्व
जबकि– ; मृत्यु जो जन्म से ही एक संभावना है
आ ही जाएगी द्वार पर दस्तक देने
उस पल निर्मोही सा दे दिया जाउंगा
जब तलक जियेंगे मनुष्य की तरह
मनुष्य की भाषा में …

पिता

पिता: बीज की तरह अदृश्य औ’
रहे परिचय विहीन ताउम्र
पहले पहल एक नन्हा रूंख
कोंपल में फूटता
तूफानों ने जिसे पाला
दुलारा मौसमों ने।
इस समय भरा पूरा पेड़
संततियों से लदा पदा
जड़ें जो दिन रात फैलती रहती
पृथ्वी के इस छोर से उस छोर
प्राचीन सभ्यता की तरह ।
पिता होंगे असंभव के विरुद्ध संभव एक लौ की तरह
होंगे तमाम गुस्ताखियों के खिलाफ
क्षमा भाव की तरह पसरे हुए क्षितिज के आर पार ।
उठाये जड़ों का भार अपनी पीठ पर
या—;
लैटे होंगे बीच राह खोलने दिशाओं का मुंह
प्रकाश की अगवानी में
या गढते प्रवाह पथ जीवन के
अनगढ निर्झर के लिए ।
पिता उठाये चल दिए होंगे जीवन की
तमाम असंगतियों का टोकरा : सिर पर लादे
उस सिकलीगर के पास
जो चुटकियों में बना डालता जिद्दी औ’ जंग लगे
तालों की चाबियां
पलक झपकते :
कुछ इसी तरह होते पिता हर जटिल औ’ अनसुलझी
पहेलियों के संभावित विजेता ।
हर बार—
शून्य में एक आहट की तरह
मौन में फूटती प्रार्थना की तरह
सन्नाटे में बजते संगीत की तरह
उजाड़ में जाग्रत उपस्थिति की तरह
रहते यहीं कहीं पिता
जीवन के विराट सूनेपन को भरते
आश्वस्ति के ठोस मलबे से
कुछ कुछ इसी तरह मंडराते पिता
तितलियों की तरह अस्मिता के पराग रंध्रों पर
और गाये जाते संगीत की तरह
चट्टानों के वाद्य यंत्रों पर
किसी असमाप्त कथा के नायक की तरह
रहते किंवदंतियों के भीतर औ’बाहर।

स्त्री :
—-
एक पौधा असंख्य कामनाओं का
जिसे हर बार
उखाड़ा गया बेरहमी से
झिंझोड़ा गया जड़ों को ।
पर, हर बार फूट आती जड़ें
नरम औ’ मुलायम
निकल आती हौले – से
धरा का अंधेरा
चीरकर हरीतिमा ।
यह थोड़ा हरापन बचा है :
इस पृथ्वी पर
थोड़ी – सी रोशनी
थोड़ा – सा प्रेम
थोड़ी – सी आदमीयत
थोड़ा – सा जीवन
शायद –;
उस स्त्री की ही बदौलत।

कहीं न कहीं अभी बहुत अनुपस्थित हूं
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प्रेम और जीवन में
सुख और दुःख में
हर्ष और विषाद में ।
किनारे पर बैठे लहरें गिनते :
पछाड़ खा गिरती जीवन नदी की हहराती अपार जलराशि
अभी दूर हूं जल के स्पर्श की सिहरन से अनुपस्थित
तैर कर पार हो जाने के आह्लाद से महरूम
घृणा की मरुभूमि में ढूंढते फकत आशियाना उम्र भर
अभी अनुपस्थित हूं
प्रेम के मालिकाना हक से लगभग विस्थापित सा
कहीं सुदूर टूट रही आशा की अंतिम श्वास
बुझ रही चूल्हे की उदास राख मे दबी आखिरी चिन्गारी
तमाम खाली पेट औ’ हाथों के दरमियां पसरे सन्नाटे मे
अभी अनुपस्थित है थोड़ी सी करूणा — थोड़ा सा विश्वास
अभी अनुपस्थित है अंधेरे को
जैसे चीरकर उठता एक हाथ : भरोसा दिलाता
वहां नहीं हैं हम टूटे हुए आदमी के सपनों मे संभावित राहत की तरह
अंतहीन यात्रा पथ : महज आकस्मिक ही थी आवृत्ति
और मिट चुके हैं काल की रेत पर पदचिन्ह
और हर वृत्तान्त मे कहीं न कहीं अनुपस्थित है
कोई गाथा : जिसे पिरोया न गया
जीवन — मर्म की हर दास्ताँ से अनुपस्थित है
हमारे होने की चश्मदीद गवाह:एक अकेली पदचाप?

बाहर– भीतर कहीं न पहुंच कर
प्रश्नाकुल से हम अधबीच हैं पराजित से
किसी सारभूत क्षण से बहिर्भूत
धरती औ’ आकाश की संधि रेखा में खिलना है जिसे
हमारा अध्यवसाय जंग खाये जलयान की तरह है
जो नहीं जाता वैतरणी के पार
लादे हमारी आत्मा का मुक्ति – संकल्प ।
अपने आप में बहुत बहुत अनुपस्थित
भागते दिगंत में बिना ओर छोर
अपने भीतर के जनपद से अपदस्थ एक कथा – क्रम
धुरी से छिटकी हुई एक महायात्रा
कहीं न कहीं अभी बहुत अनुपस्थित हूं
प्रयाण में
पड़ाव पर
या फिर जड़वत – सा
मंजिल के अंतहीन आह्लाद मे।

अभी अनुपस्थित हूं अंधेरे में जैसे –; प्रेम
अतल के नीचे भी होता कोई उदगम:जहां नहीं हूं
शिखरों के पार भी होता जीवन का उत्सव
वहां भी नदारद हूं हर दृश्य अदृश्य में
सारी निचुड़ी हुई निष्पत्तियों का अवशेष शून्य-सा
मुड़ा तुड़ा छितरा बिखरा एक चिरंतन सत्य
गोया –;
जूझता किसी झंझावात से
टूटता अपने ही विजयोन्माद मे ; अहर्निश घूमता
अनभिव्यक्त सार – संवेदन लादे ; भटकता द्वार – द्वार
हर उस व्यथा प्रसंग में घटित होना चाहता हूँ
चाहता हूँ उजास की वर्णमाला में होना उदित
जहां जहां होना था हर जाग्रत धड़कन में
मगर ; वहां अनुपस्थित हूं।

क्या तुम्हें याद है ! दोस्त ?
जब जून की गर्म हवा के थपेडों ने हमारे कदमों को
चाहा रोकना
और लू ने तो हमें झुलसा ही दिया बेरहमी से
फिर भी एक आग हमें वहन करती
अंतिम दिग्विजय के लिए
संध्या के ढलते सूरज में
लौटते हुए शिविर में
क्लान्त ; निरूत्तर से हम
एक दूजे की तरफ पेड़ की टहनियों से झुके हुए
तब तक प्रतिकार औ’ प्रतिरोध के अनगिन चक्रव्यूह
तैयार थे सज-धज कर गर्मजोशी से हमारा पथ रोकने
उन बीहड़ यात्राओं में
सारे व्यूह से गुजरते हुए
कष्टप्रद रात्रियों के दरमियां
हमें याद था हमारा महान स्वप्न
कि–; सारी निरर्थक धारणाओं को चीर कर
रूढ हो चुके मिथ्यात्व की जंजीरों से बाहर
बच रहेगी एक दुनिया
और—
ठोस भ्रान्तियों की जगह स्थापित होगा
एक न एक दिन दमित सत्य
— तुम्हें तो होगा याद ?


एक पुल जिससे गुजरते हुए
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हवा की तरह फैला हुआ प्रेम
धरती की तरह धारण करता आंचल में
धूप की तरह पसरा हुआ
बिछा हुआ दूब की तरह
जैसे कि, नित पलते देखा गया
उसे सपनों की उजली कोख में
रक्त की हर धड़कन में बजता हुआ
हर दिल में होता उदित सूर्य की तरह
पूरा जनतान्त्रिक — ; सर्व सुलभ
अंतिम अचूक उपाय जो
खींच लाता
बीच मझधार से किनारे
अस्मिता की डगमग कश्ती
आदिम एक पुल —
जिस पर गुजरते हम ताउम्र।
पर –;
अब यह जर्जर हो चला इस सदी में
क्यूं हिल रही मेहराबें इसकी
जो थामे है समय को
— ज्यूं थरथरा रहा
वहशी रात के सन्नाटे में एक पुल
उस पर कांपती एक लौ
जैसे धरधराकर गिर ही जाएगा
उल्कापिंड की तरह
अतीत के किसी दु:स्वप्न में
एक पिटा हुआ नुस्खा
जिसे घेर लेंगे हतप्रभ लोग
मृत देह समझकर
अजीब विरोधाभास मे घिरा हुआ हूं
कि , नहीं ला सकता बीनकर एक प्रेम
उसके क्षितिज से किंचित बहिष्कृत होकर
कि ,नहीं कर सकता
प्रेम से बाहर रहकर
किसी दूसरे प्रेम को लिपिबद्ध
— मनुष्य की किसी भाषा में।
बस , प्रेम के लिए होना होता साकार
खुद प्रेम की सीमा रेखा के भीतर
गोया, चिर नागरिक का दर्जा लिए
कुछ उसी तरह विलीन होता एक जीवन — राग : उद्दाम
ज्यों डूबते उतराते
अपनी खोई पहचान लिए
रक्त की भाषा में घुले हुए शब्द।


शब्दकोश में रखे शब्द
—————–
उदास औजारों की तरह
निष्क्रिय पड़े रहते — ज्यों ;
कारखाने के भीतर झांकती
अंधेरे में रेंगती
एक अचल संभावना ।
कौनसा पुर्जा कसा जाएगा
और यकायक लौट जायेगी
पृथ्वी की गुम मुस्कराहट
कौनसी भाषा जिसमे समा जाएंगे सारे चीत्कार
सुबह अभी कहाँ
और, बंद हैं दिशाएं
किस जीवन सरोकार में
डुबाया जायेगा कोरा जिस्म
किस रचना का आंचल भरेगा
कैसा कौनसा आदिम शब्द
किस बिम्ब को बींध बींध लाएगा
वह कौन सा बिरला शब्द
वह यह नहीं जानते
महज —;
बचाए रखते आत्मा का उजास
बावजूद इसके यह बोध जिन्दा रहता शिद्दत से
कि एक शब्द उठेगा धरती को चीरता हुआ
आकाश की ओर झुका झुका डाली की तरह
गाहे बगाहे उसे याद आता ठौर : बंधी जिससे
अपनी नियति : प्रारब्ध अपना
एक दिन –‘
टूटना है उसे जीवन के हक में सनसनी की तरह
और सन्नाटे को चीरकर
फिर किसी कविता की पंक्ति में
खिलना है धूप की तरह।


बस मौन उठती हूँ
————–
किस अज्ञात महासागर में
वे गिर जाती नदियों की तरह
और हो जाती विलीन
गर मुझे कह दिया जाए चुनने के लिए
उन्हें समुद्र के वक्षस्थल से
मुझे ज्ञात नहीं उनके हुलिये
बस, मौन उठती हूं लहर बन : एक अर्चना स्वर
फिर फिर गिर जाती हूं :
किस अनन्त में ?
–0–

विजय सिंह नाहटा
जन्म : 15 जनवरी 1964
कालू ( बीकानेर)
शिक्षा : एम ए
राजस्थान प्रशासनिक सेवा के अधिकारी
देश की सभी नामचीन पत्र पत्रिकाओ में प्रकाशित यथा — हंस, मधुमती , समकालीन भारतीय साहित्य ,वागर्थ ,भाषा, अक्षरा , स्रवंति, विकल्प, वसुधा ( कनाडा) , सृष्टि, संविद , मनीषा ,एक और अंतरीप, सम्बोधन , भाषा परिचय, पाथेय कण ,जैन भारती ,अछूते संदर्भ, हिमप्रस्थ ,ताप्तीलोक ,प्रवेश, युगीन काव्या ,अनौपचारिका , समानांतर ,सुपाशा , समय माजरा , साप्ताहिक हिन्दुस्तान , प्रतिध्वनि ,सीराजा ,गगनांचल ,राजभाषा, माही संदेश , जागती जोत, रूङौ राजस्थान, माणक , शेरगढ एक्सप्रेस ,राजस्थान पत्रिका, दैनिक भास्कर ,
अणुव्रत, तनिमा , सांध्य उपहार , जगमग दीपज्योति , दैनिक युगपक्ष ,समाचार सफर ,मूमल, युवा दृष्टि, सुपाशा, अपना पैगाम , संयोग साहित्य, डेली नयूज तथा अन्यान्य पत्र पत्रिकाओ में कविताएं — समीक्षाएं प्रकाशित ।
कल हमारा है , दर्पण, सेतु ,दूर कहीं ,समर्पण, नाना मुंङे मोटी बात आदि समवेत काव्य संग्रहों में कविताएं प्रकाशित।
राजस्थान साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित संग्रह
‘ कविता से कविता तक ‘( 2011) में रचनाएँ प्रकाशित।
कुछ राजस्थानी कविताएं ” थार सप्तक “( चतुर्थ )
में संकलित।
मृत्यु विषयक भारतीय कवियों के संचयन में कविताएं प्रकाशित।
प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के कविता संग्रह ” आंख ये धन्य है ” पर समीक्षा पुस्तक ‘ समीक्षकों की दृष्टि में ‘ के अंतर्गत आपका आलेख ” नरेन्द्र मोदी की कविताएं : मध्यान्ह के तपते सूरज का गीत ” शीर्षक से प्रकाशित।
अनेक एकल काव्य पाठ एवम् कविता गोष्ठियों मे रचना पाठ– संवाद। अजित फाउंडेशन बीकानेर ,मरू सांस्कृतिक केंद्र जैसलमेर, नगर श्री चूरु , राजस्थान साहित्य अकादमी के समकालीन कविता पर एकाग्र कार्यक्रम जोधपुर , काव्या इंटरनेशनल जयपुर एवं अजयमेरू प्रेस क्लब अजमेर मे कविता पाठ। आकाशवाणी और दूरदर्शन से भी निरंतर अनुप्रसारण। कुछ कविताएं वेब पत्रिकाएं ‘ वेब दुनिया ” कृत्या ‘ ‘ पुरवाई ‘ एवम् ‘ लेखनी ‘ में प्रकाशित। कुछ वेबिनार में कविताएं और संवाद।
दूसरे संग्रह पर डाॅ नामवरसिंह द्वारा दूरदर्शन पर कृति चर्चा।
‘ है यहां भी जल ‘ कविता संग्रह 2007 में, ‘ लिखना कि जैसे आग ‘ कविता संग्रह 2013 में प्रकाशित। तीसरा संग्रह ‘अग्नि पाखी ‘ आपके हाथों में ।
अनेक सम्मान – अलंकरण ।
संपर्क :
बी –92 ,स्कीम 10 बी
गोपाल पूरा बाई पास,
जयपुर राजस्थान
302018
मोबाइल : 7850873701
ईमेल : nahatavijay60@gmail.Com