माह के कविः नरेश अग्रवाल


आशा

रुकी हुई ट्रेन से
जो भी फूल लेना चाहता था
बच्ची के हाथों से
उसमें कोई उसका पिता नहीं था

किसी की भी तस्वीर नहीं मिलती थी
लड़ाई पर गए पिता से

वह कितनी दूर और कहाॅं गया था
यह भी उसे मालूम नहीं था
विश्वास था उसके लौटने का

ट्रेन आगे बढ़ती जाती
घर लौटे सैनिकों को छोड़कर

स्टेशन खाली होता जाता
वह आशा में बार-बार आती

उसके फूल कभी मुरझाए नहीं
हिम्मत कभी टूटी नहीं

खूबी है मेरे पास

सूरज अमीर है
ढेर सारा प्रकाश उसके पास
समुद्र भी अमीर
ढेर सारी लहरों से गतिमान

पहाड़ भी अमीर
किसी के बल से नहीं हिलते
अपार दृढ़ता लिये हुए स्थापित

फिर भला मैं कैसे इनसे बराबरी करूंँ
जब सभी तरह से कमजोर
तनख्वाह भी मेरी छोटी-सी
तन का पसीना भी नहीं बचा पाता
पांँव भी थक जाते हैं हर शाम

बस एक ही बड़ी खूबी है मेरे पास
संघर्ष के असंख्य हथौड़े की मार से भी
न मैं बदलता हूंँ
और न ही मेरी हिम्मत टूटती है

मूलधन के साथ ब्याज

अब सिर्फ एक दवा की गोली से
नहीं चल सकेगी जिंदगी
डाॅक्टर ने इसे बढ़ाकर दो कर दी

इससे भी वह खड़ा न हो सका
एक साथ चार करनी पड़ी
फिर अनेक बीमारियों के उपद्रव से
संख्या दस तक पहॅुंच गई
और बिल हजारों में

इन्हें बारी-बारी से लेते हुए
अब सक्षम था मरीज खड़ा होने में
लेकिन चढ़ चुके उधार को
चुका सकने में समर्थ नहीं

उसकी एक-एक सांँस
इतनी महॅंगी होती जा रही थी
जैसे मूलधन के साथ
ब्याज जुड़ता जा रहा हो हर दिन

बदलाव में भी हॅंसते हुए

जल का प्रवाह
एक सुई के छेद से लेकर
सुरंग, गुफा, पथरीले इलाकों तक को
प्यार से छूते हुए
दूर निकल जाता है
या सोख लिया जाता है
फसलों से भरी जमीन में

तब भी बदले हुए आकार में
ठहरा रहता है जड़ों के भीतर
और डालियों के सूक्ष्म मार्ग में भी
बढ़ने से नहीं घबराता

दिखता है फिर हरियाली का रूप धरकर
इतने सारे बदलावों में भी हॅंसते हुए!

श्रम ही मेरा भोजन है

भूख मेरे सिर से लेकर पांँव तक फैली है
जल्दी से मुझे कुछ उपजाना है

आज और कल की भूख को सह जाऊंँगा
परसों की नहीं

चाहता हूंँ जल्द-से-जल्द मेरी फसल बढ़े
विकास हो उसका
मेरी भूख की तीव्रता की तरह
उनके दाने पककर
जल्दी ही मेरी जीभ पर हों

सचमुच यही मेरा सपना है
मैं कुछ भी संचित नहीं कर पाता
हर दिन का श्रम ही मेरा भोजन है!

संभावना

झड़े हुए पेड़ को
खूबसूरत होने में अधिक समय नहीं लगेगा
जल्द ही हरियाली लौट आएगी
फल-फूल लेकर
इसलिए आशावान हूंँ

आशावान हॅूं उस गिरे व्यक्ति को देखकर
जो संँभलने की कोशिश कर रहा
जल्द उठ भी खड़ा होगा

हर मैले-कुचैले में भी
कोई साफ रंग जन्म लेने का
संकेत देखता हूंँ

कद्र करता हूंँ उस इंसान की अधिक
जो बार-बार झुककर
सलाम कर रहा सभी को
संभावना देखता हूंँ उसमें भी
सभी से आगे निकल जाने की

सहारा

ये फूलों की लत्तर
देखते-देखते पेड़ के तने पर चढ़ गई

अब डालियों को स्पर्श करती
शीर्ष तक पहुंँच गई
और अपनी खूबसूरती बिखेरने लगी

कितना सुंदर सपना है
इन नन्ही चीजों के पास भी

अगर पेड़ आकाश जितना ऊॅंचा हो
तो उसे भी स्पर्श कर लेती हैं

बस दृढ़ सहारा चाहिए होता है
इनके कमजोर पांँवों को!

नाव

महीने भर की मेहनत के बाद
बनी नाव को देखते ही
कह दिया उस्ताद ने
यह नहीं चलेगी
पानी इसे डुबो देगा

पानी को जीतना है तो उसमें कला भरो
भार को संतुलित करो
और जान फॅूंको इस तरह कि
तरल सतह पर भारहीन होकर चले
फिसले केवल उस पर, डूबे नहीं

सुनता रहा ध्यान से वह सारी बातें
इतना जरूर समझ में आया कि
नाव को बना लेना काफी नहीं

उसमें पानी में टिके रहने की
कला भरनी भी जरूरी!

याचना

बच्चा कागज की नाव को कहाॅं चलायेगा
इसे तैरते देखने का सुख
कहांँ से पाएगा

नदी और तालाब सभी कोसों दूर
वहाॅं जाने का कोई उपाय भी नहीं

हाथ में नाव लिये सोचता रहता है बच्चा
दुविधा में ललचाए हुए
समुद्र को टीवी पर देखता है
निवेदन करता है बारिश से
अगर वह थोड़ी खुश हो जाए
तेज रफ्तार से भर दे आसपास की धरती को
तो इसे चलाने का आनंद जरूर ले सकता है

उसकी याचना में सूखे से परेशान
एक किसान का दर्द नजर आया

नरेश अग्रवाल

नरेश अग्रवाल – एक परिचय

अब तक स्तरीय कविताओं की 10 पुस्तकों का प्रकाशन तथा तथा अन्य विषयों पर 8 पुस्तकें प्रकाशित
लगभग सारी स्तरीय साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित।

‘हिंदी सेवी सम्मान, ‘समाज रत्न’, ‘सुरभि सम्मान’, ‘अक्षर कुंभ सम्मान’,
‘संकल्प साहित्य शिरोमणि सम्मान’ झारखंड हिन्दी साहित्य संस्कृति मंच सम्मान’ ‘हिंदी सेवी शताब्दी सम्मान’ बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन, पटना द्वारा महामहिम राज्यपाल के कर कमलों द्वारा दिया गया, आदि अनेक सम्मानों से सम्मानित।

सम्पर्क –
नरेश अग्रवाल
हाउस नंबर 35
रोड नंबर 2
सोनारी गुरुद्वारा के पास
कागलनगर, सोनारी
जमशेदपुर 831011
(झारखंड)
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