माह की कवियत्रीः मालिनी गौतम


मत छलना उसे
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मत छलना उसे
जिसने किसी अबोध बालक की
दंतुरित मुस्कान-सा
अपना निरामय विश्वास
तुम्हारे हाथों में सौंप दिया ।
मत छलना उसे
जिसने तुम्हारी चुगली खाती
तमाम आवाज़ों की ओर से
फेर लिए अपने कान
और तुम्हारी एक पुकार पर
बिखेर दी अपनी अनारदाना हँसी ।
मत छलना उसे
जिसने सदियों से
अपनी आत्मा पर बंधी
पट्टियों को खोलकर
उसमें झाँकने का हक
तुम्हें दिया ।
मत छलना उसे
जिसने तुम्हारी ओर
इशारा करतीं तमाम उँगलियों को
अनदेखा कर
अपनी उँगली थमा दी तुम्हें ।
मत छलना उसे
जिसने झूठ से बजबजाती
इस दुनिया में
सिर्फ़ तुम्हें ही सच समझा ।
अपनी फितरत से मजबूर तुम जब
फिर भी छलोगे उसे
तो यकीनन
नहीं बदल जाएगी ग्रह-नक्षत्रों की चाल
धरती पर नहीं आएगा भूकंप
पहाड़ नहीं होंगे स्खलित
नदियों में बाढ़ नहीं आएगी
तट बंध नहीं होंगे आप्लावित
दिन और रात का फर्क भी नहीं मिटेगा,
मगर ताकीद रहे
कि किसी की भाषा से
विलुप्त हो जाएंगे
विश्वास और उसके तमाम पर्यायवाची शब्द
और शब्दों के पलायन से उपजा
यह रिक्त स्थान ही
एक दिन लील जाएगा तुम्हें ।



इतना सा मनुष्य होना
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शहर की बड़ी सब्जी मंडी में
एक किनारे टाट का बोरा बिछाकर
अपने खेत की दो-चार ताज़ी सब्जियाँ
लिए बैठी रमैया
अक्सर छुट्टे पैसों के हिसाब में
करती है गड़बड़ ।
न…न….यह समझ लेने की भूल मत करना
कि रमैया को नहीं आता
इतना भर गणित,
हाँ बेशक, दो-पाँच रुपए बचाकर
महल बाँधने का गणित
नहीं सीखा उसने ।

घर में काम करती पारबती
मालकिन के कहने पर
सहर्ष ही ले आती है
दो-चार किलो मक्की
अपने खेत से
और महीने के हिसाब में
उसका दाम भी नहीं जोड़ती ।

उसे मूर्ख समझकर
एक तिर्यक मुस्कान
अपने होठों पर मत लाना,
अनाज की कीमत जानती है वह
लेकिन मालकिन के कोठार में
उसके अनाज का भी हिस्सा है
यह भाव सन्तोष से भर देता है उसे ।

सफाई वाले का लड़का विपुल
अच्छे से जानता है कि
कोने वाले घर की शर्मा आंटी
उसे एक छोटा कप चाय पिलाने के बहाने
अपने बगीचे की सफाई भी
करवा लेती हैं उससे,
ये मत समझ बैठना
कि कॉलेज में बी.ए. की पढ़ाई करता विपुल
परिचित नहीं है
“शोषण” की शब्दावली से,
लेकिन खुश होता है वह कि
सुबह-सुबह की दौड़-भाग के मध्य
आंटीजी का एक काम
उसने निपटा दिया ।

आप बेशक इन्हें कह सकते हैं
निपट मूर्ख, गंवार, जाहिल और अनपढ़
लेकिन बोरा भर किताबों की पढ़ाई
अगर सिखा न सके मानवता की ए बी सी डी
अगर सीख न सकें हम दु:ख को मापने की पद्धति
अगर गहन न हो संवेदना हमारी
अगर समझ न सकें हम
सामाजिक ताने-बाने का मनोविज्ञान
तो कम पढ़ा-लिखा होने में
क्या बुराई है?
कम से कम बचे रहेंगे मानवीय मूल्य
बचा रहेगा प्यार, स्नेह, सौहार्द
बचे रहेंगे रिश्ते
बचा रहेगा विश्वास
और बचा रहेगा
हमारा इतना-सा मनुष्य होना ।

 होटल के रूम नम्बर 303 मे
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होटल के रूम नम्बर 303 में
फल काटने के लिए मुझे
एक चाकू की दरकार थी
रूम सर्विस पर दी गई
तीन-तीन सूचनाओं के बाद भी
जब पन्द्रह मिनट तक
कोई चाकू लेकर नहीं आया
तो मेरी बेचेनी और कुलबुलाहट बढ़ने लगी ।

इतने बड़े होटल के
इतने बड़े किचन में ढेरों चाकू होंगे
फिर भी आम काटने के लिए
मुझे चाकू नहीं मिल रहा
यानी, सारे चाकू व्यस्त हैं ?
तब तो जल्दी पता किया जाना चाहिए
कि वे कहाँ व्यस्त हैं !

वे ब्रेड पर बटर और जैम लगा रहे हैं
या उनसे भाजी-तरकारी,
फल-अंडे और पनीर काटे जा रहे हैं
या वे काट रहे हैं
किसी का सर….किसी का धड़ ?
वे क्या निकाल रहे हैं अपनी तेज़ नोक से ?
फलों के बीज या
सब्जियों में अंदर छुपे कीड़े
या फिर वे निकाल रहे हैं अपनी नोक से
किसी मजलूम के शरीर की आँते?
किसी की गर्दन पर तने
वे टटोल रहे हैं जेबें
या फिसल रहे हैं
किसी आठ साला लड़की की देह पर ।
ये चाकुओं के काम पर लगे रहने का वक्त है
चाकू अति व्यस्त हैं इन दिनों
घर और रसोई की देहरी से बाहर निकलकर
अपनी धार साबित करने में ।
जल्दी पता करो
कौन सा चाकू कहाँ व्यस्त है
रूम नम्बर 303 में
मुझे दरकार है एक चाकू की
मैं एक हाथ में फल
और एक हाथ से गर्दन सँभाले बैठी हूँ।

लली का प्रेम
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जब सब कर रहे थे जमीन तैयार
मक्की और धान के लिए
ताक रहे थे हुलस-हुलस बादलों को,
लली ने कुछ धूप, कुछ छाँव में
छुपा दिया अपना प्यार
सबकी नजर बचाकर,
जैसे छुपाए जाते हैं प्रेम पत्र
संदूक के किसी अँधेरे कोने में
छुपाई जाती है पीड़ा
हँसी के आवरण में
और छुपाई जाती है उमर
काले बालों में गूँथकर ।

जैसे प्रेम अँधेरे कोने का जुगुनू है
पीड़ा हँसी की चमक
उमर काले बालों का नजरबट्टू
लली का प्यार
सुख का साया है
जिसका रंग हल्का गुलाबी, स्वाद तीखा और गंध मोहक है।

पूरे बरस सहेजती है लली अपना प्रेम,
समेट लेती है अपने आँचल में
अतिवृष्टि, प्रचंड गर्मी, कँपकँपाती ठंड
और ओला-पाला की मार,

भर गर्मी और उमस में
मिट्टी और खाद के नीचे दबायी हुई
अदरक की गाँठे ही
लली का प्यार है
लली प्रेम में उसे आदू या आदा पुकारती है
गर वो जानती होती
तमिल, कन्नड़ या अंग्रेजी
तो संभव है इल्लाम, अल्ला या जिंजर भी पुकारती ।

लली के सपने में आदू खिलता है
ब्रह्मकमल की तरह
आदू फूलता है महुए-सा
और पसारता है हाथ-पैर
किसी बाल-गोपाल की तरह
मन की आर्द्र जमीन पर।

लली को मंजूर है मोल-भाव
भिंडी, तुरई, लौकी-करेला
और जंगली कीकोड़े का
लेकिन एक पैसा कम नहीं करती वह
अदरक के भाव में।

पूछने पर हँसते हुए
बस इतना ही कहती है कि
मौसमी फ़सल नहीं है यह
साल भर सहेजा है इसे सपनों में
और सपनों का कोई
मोलभाव नहीं होता ।

रेजा
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रेजा को स्वप्न में भी
दिखाई देते हैं बड़े-बड़े पत्थर
भूरे-लाल, काले-पीले, सफेद रंग के पत्थर,
नादान रेजा यह नहीं जानती
कि पत्थरों से बनेगा
लालकिला या ताजमहल
बुलंद दरवाजा या इंडिया गेट
या फिर ठेकेदार का शानदार मकान
उसे बस इतना पता है कि
उसके झोंपड़े की नींव में
नहीं डलते ये पत्थर।

जब पत्थरों पर उकेरे जा रहे इन थे
लोकार्पण कर्ताओं या शहीदों के नाम
रेजा उकेर रही थी अपनी उँगलियों पर
बारह रुपए घंटे के हिसाब से
बारह अट्ठे छन्नू का पहाड़ा,
सौ में बस चार कम गिनते-गिनते
सौ वाट के बल्ब जितना
तेज छलका था उसके चेहरे पर
जिसके सामने धुँधला गया था
ताजमहल का नूर।

ताजमहल की तस्वीर देखकर
उसे याद आता है
अपनी साथी रेजा का
पत्थर के नीचे दबकर मर जाना।

यूँ तो पत्थर के ढेर पर
दो घड़ी सुस्ताने बैठी
रेजा के सामने
कुछ झुका-झुका सा दिखता है बुलंद दरवाजा।

“पेट पर पत्थर रखना”
यह कहावत भी
बेमानी है रेजा के लिए,
उसके लिए तो पत्थर पर ही खिलते हैं फूल
जब खिलखिलाता है उसका बच्चा
आधा पेट भात खाकर।

साँझ ढले कपड़ों से पत्थर की धूल और
महीन किरचें झाड़कर
भात पकाती रेजा
कई बार भात के किरकिराने पर भी
कर्कश नहीं होती।

इन दिनों अपनी हथेलियों पर
फफोले के दाग सहलाती रेजा
बेहद उदास है,
पत्थर-खदानों में काम बंद है
और बिना पत्थर
नहीं खिलते फूल
रेजा के जीवन में।

रेजा- मजदूरी करने वाली स्त्रियों को रेजा कहते हैं।

बस उतना ही
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वह हर जगह
बस उतना ही रही
जितना उसे होना था।

बच्चों के छुटपन में
वह रही उनके साथ
चाशनी डूबे रसगुल्ले की तरह,
उनके केशौर्य में
उसने थामा उनका हाथ
अँधेरे और उजाले के मध्य की
दहलीज़ पर खड़े रहकर,
उनकी जवानी में वह रही
चुटकी भर नमक जितनी
कि रच-बस सकें
जीवन में अन्य स्वाद।

उसकी मिठास और नमक को
प्रेमी ने जब-जहाँ किया नज़रअंदाज़
वह पानी की तरह तरल बन
बह निकली
रिश्ते में बनी तिराड़ों से
उन्हें गिराए या ढहाए बिना ।

पति, माँ-बाप, बंधु-बांधवों के
जीवन में वह रही
नमकीन से कुछ अधिक
और मीठे से कुछ कम मीठा बनकर
कि न किसी को हो डायबिटीज
और न किसी को हो रक्तचाप
हर जगह
जरूरत जितना ही होने के
इस अभ्यास में
वह बची रही
दुःख में घुलने
खुशी में बहकने
और अनमनेपन में क्षीण होने से ।

अपनी-अपनी फुर्सत में सबने सोचा
की ऐसा संतुलन साधकर
जीवन कैसे जिया जाता है ?
पर बिना सम्मान और जरूरत के
कहीं भी
होने से अधिक
हुआ भी तो नहीं जाता न !!

कल्पवृक्ष की रखवाली
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शाख से एक और पात झड़ गया
कैसे झड़ गया ?
नहीं, पीला पात तो नहीं था
कि झड़ गया
और किसी को कोई फर्क न पड़े ।

क्या चौकीदार की नजरों के समक्ष झड़ गया ?
नहीं, चौकीदार ने तो
नजरें ही घुमा ली थीं
उसकी नजरें तो टिकी थीं
किसी कल्पवृक्ष के
चमकते फूल-पत्तों और फलों पर ।

क्या हुआ होगा?
शायद कोई अकेला पात होगा
मजबूत पत्तों के झुंड से अलग-थलग,
तेज़ हवा का झोंका सह न सका होगा
संभव है कीड़ा लग गया हो पात में,
इल्लियों ने चट कर डाली हो
शाख से जुड़ी उसकी नाजुक डंडी,
किसी तीड़ ने कर दिया होगा उसे छलनी
या किसी दुष्ट मूढ़मति वानर का ग्रास बना होगा
या फिर किसी शैतान बच्चे की गुलेल का शिकार ।

कारणों की यह सूचि पर्याप्त नहीं है
कारण अनेक हैं / हो सकते हैं
होना भी चाहिए ।
यह चेतावनी है
बेमौसमी पानखर की
कि देखते ही देखते
पात असमय ही झड़ जायेगें शाख से
कचरे की टोपली में डालकर
कर दिये जायेंगें बेदखल बाग से ।

क्या कहा?
चौकीदार क्या कर रहा है?
अरे इतनी जल्दी भूल गए?
चौकीदार व्यस्त है कल्पवृक्ष की रखवाली में
तुम खुद बचा लो अपना बाग-बगीचा ।

दु:ख-1
——–

दुःख किसी पेड़ की
जड़ तो था नहीं
कि जिसे वह उखाड़ फेंकता
जड़-मूल समेत ।

दुःख तो पसरा धीरे-धीरे कैंसर की तरह
लीवर से शुरू होते हुए
एक-एक हड्डी में,
दुःख ने बनाया हड्डियों को इतना कमज़ोर
कि बाथरूम में ज़रा सा फिसल जाओ,
सीढ़ियों से जरा सा लुढ़क जाओ
तो तुरन्त टूट जाएगा
टखना, घुटना ।

फिर दुःख ने आहिस्ता से कसी अपनी गिरफ़्त
रीढ़ की हड्डी पर
अब उसका सीधा तनकर
खड़ा रहना भी दूभर था ।

दुःख से लदा-फदा
वह झुकता रहा धरती की ओर
कम होता रहा उसका नाता
आसमान से,
यह झुकना
उस फलदार पेड़ का झुकना कतई नहीं था
जो नीचे झुककर भी
बढ़ता है आसमान में ।

दुःख इतना फैला बरगद की तरह
कि उसकी शाखाओं से भी फूटने लगी जड़ें
दुःख अब पेड़ की जड़ भी था
लेकिन वह फिर भी नहीं उखाड़ सका उसे
जड़-मूल समेत ।

  
दु:ख-2
——

उसके अच्छे दिनों का
सबसे वफ़ादार साथी था दुःख ।

सुख ने जब-जब किया अट्टाहास
जीवन में
दुःख ने मजबूती से थाम लिया उसे
जैसे थामता है प्रेमी
भरोसा अपनी प्रेमिका का,
जैसे थामता है हाथ
पिता अपनी संतान का ।

दुःख ने उसको साधा
कुछ गलाया, कुछ तपाया
कुछ माँजा
कुछ घिस-घिसकर चमकाया
अच्छे दिनों के मक्कड़जाल पर
उदासी की चादर डालकर
दुःख कुनमुनाया ।

इस तरह दुःख ने अच्छे दिनों में
सच्चे दोस्त का धर्म निभाया
दुःख टँगा रहा उसके काँधे पर
बेताल की तरह …

मालिनी गौतम

▪️ मध्यप्रदेश के आदिवासी अंचल झाबुआ में जन्मी डॉ. मालिनी गौतम का बचपन आदिवासियों के बीच बीता । उज्जैन एवं इंदौर से अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद सन1994 में वे गुजरात के सुदूरवर्ती आदिवासी अंचल संतरामपुर में आ बसीं।

▪️मालिनी संतरामपुर के महाविद्यालय में अंग्रेजी की प्रोफेसर हैं । एक प्राध्यापक के रुप में वे जीवन का एकमात्र लक्ष्‍य इन बच्चों को शिक्षण के साथ-साथ दुनिया जहान की जानकारी देकर, बच्चों के सर्वांगीण विकास के द्वारा उन्हें मुख्य धारा में लाना मानती है ।

▪️मालिनी विभिन्न एन जी ओ के साथ मिलकर सन्तरामपुर के दूर-दराज के गाँवों में आयोजित कार्यक्रमों में अंधविश्वास, बेटी-बचाओ, कन्या भ्रूण हत्या जैसे ज्वलंत विषयों पर व्याख्यानों के द्वारा जागृति फैलाने के कार्य में सक्रिय हैं । वे यहाँ के अंतरिम गाँवों में जाकर सफाई-स्वच्छता, साक्षरता, अंधविश्वास, व्यसन-मुक्ति जैसे कार्यक्रमों में लगातार शिरकत करती हैं ।

▪️अंग्रेजी भाषा की प्रोफेसर मालिनी गौतम हिंदी की अनुरागी हैं । वे कविता के साथ-साथ ग़ज़ल, नवगीत, एवं अनुवाद विधाओं में भी कार्य करती हैं ।

▪️ उनकी कविताएं, गजलें, नवगीत समकालीन भारतीय साहित्य,कथादेश, नया ज्ञानोदय, पाखी,वागर्थ, आजकल,अक्षरा, इंद्रप्रस्थ भारती, बया, सदानीरा, हंस, निकट, दोआबा, बहुवचन, पूर्वग्रह, साक्षात्कार, लोकमत समाचार, जनसत्ता, मंतव्य, युद्धरत आम आदमी सहित लगभग सभी महत्वपूर्ण पत्र- पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकीे हैं।

▪️अभी तक मालिनी गौतम के दो कविता संग्रह बूँद-बूँद अहसास (गुजरात हिंदी साहित्य अकादमी द्वारा अनुदानित), एक नदी जामुनी-सी प्रकाशित हो चुके हैं। इसके अलावा एक ग़ज़ल संग्रह दर्द का कारवाँ, एक नवगीत संग्रह चिल्लर सरीखे दिन प्रकाशित हो चुका हैं।

▪️मालिनी गौतम की कविताओं का गुजराती, अंग्रेजी, मराठी, मलियालम, उर्दू, नेपाली, पंजाबी, बांग्ला आदि भाषाओं में अनुवाद भी हो चुका है ।

▪️ मालिनी गौतम को दो बार गुजरात साहित्य अकादमी पुरस्कार (वर्ष 2016 एवं 2017) , परम्परा ऋतुराज सम्मान (दिल्ली, 2015) वागीश्वरी पुरस्कार (मध्यप्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन भोपाल,2017) तथा जनकवि मुकुटबिहारी सरोज स्मृति सम्मान(सरोज स्मृति न्यास ग्वालियर, 2019)* से नवाजा जा चुका है ।

▪️मालिनी गौतम ने अनुवाद के क्षेत्र में भी काम किया है । हाल ही में उन्होंने गुजराती दलित कविताओं के हिन्दी अनुवाद का एक महत्वपूर्ण कार्य पूर्ण किया है ।

▪️इन दिनों वे कहानियाँ भी लिख रही हैं । उनकी कहानियाँ पाखी, निकट, समावर्तन आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं ।

574, मंगल ज्योत सोसाइटी
संतरामपुर-389260
गुजरात
मो. 09427078711