माह की कवियत्रीः इंदु झुनझुनवाला


माँ

मुझे जन्म देकर
अगर कोई खुश हुआ था,
तो वो तुम थी ।
मेरी साँवली-सी सूरत पर ,
अगर कोई रीझा था
तो वो तुम थी ।
बुरी नजरों से मुझे बचाने ,
ममता के आँचल से ढँका था ,
तो वो तुम थी ।
जब सब खफा थे, मेरे होने पर ,
तब गोद में लेकर,
अपनी बाहों में भरा था ,
वो तुम थी ।
सबसे लड रही थी
खामोश निगाहें मेरे लिए,
वो तुम ही थी ।
बेटी होना गुनाह तो नही ‘इन्दु ‘
कह रही थी चुपचाप,
वो तुम ही थी ,
माँ वो तुम ही थी,,, सिर्फ तुम ।

वो पिता कहलाता है,,,,

पर्दे पर हरदम नजर नहीं आता ,
पर उसका सहयोग,
हरपल ,हर क्षण, जीवन भर,
प्रत्यक्ष व परोक्ष पाता है ,
तभी आगे बढने की,
अपनी ख्वाहिश को,
बच्चा साकार कर पाता है ।
वो पिता कहलाता है,,,,

खिलौनों की ,
स्वप्न भरी दुनिया से ,
यथार्थ की धरती पर,
महलों के खूबसूरत ख्वाब,
सजाने की उमंग दे पाता है ।
वो पिता कहलाता है,,,,

परियों के किस्से सुन-सुनकर,
हसरतें मन में लिए
यौवन की दहली पर,
परी-सा साथी
ढूँढ़ने का ख्याल दे पाता है,
वो पिता कहलाता है,,,,

भले ही निवाले
हाथों से ना खिलाएं हो ,
पर हर निवाले में ,
वो प्यार की खुशबू
हरक्षण दे पाता है ।
वो पिता कहलाता है,,,,

संकोची स्वभाव, सिर पर
हाथ ना फिरा पाया हो ,
पर उसके हर बोझ को,
अपने कांधे पर वो उठा पाता है ।
वो पिता कहलाता है,,,,

ठोकरों से बचाने की खातिर
नसीहतें दे देकर ,कठोर ,बेदर्दी,
और ना जाने क्या -क्या उपनाम
पाकर भी खामोश रह पाता है ।
वो पिता कहलाता है,,,,

अपनों के
प्यार की तलाश में तरसता,
जीवन भर ,
चिकनी चुपड़ी खिलाकर भी
खुद भूखा सो पाता है ।
वो पिता कहलाता है,,,,

कठोर से चेहरे के पीछे ,
नाजुक-सा दिल लिए,
जमाने की मार से,
बचाने की कोशिश में ,
कभी मात भी खा पाता है ।
वो पिता कहलाता है,,,,

फिर भी सारे गमों को
सीने में छुपाए चुपचाप,
‘इन्दु’ की तरह
गहराती भींगी रातों में
भींग-भींग जाता है ।
वो पिता कहलाता है ,,,
वो पिता कहलाता है।

मेरा गाँव अब भी बुलाता है मुझको।

बारिश में सोंधी-सी माटी की खुशबू आँगन में ।
छत पर टप-टप फुहार झूमते सावन में।
वो नन्हीं टाफिया ओलो की छुपा मुँह में।
गड्ढों पे छप से छपकना बुलाता है मुझको।
मेरा गाँव अब भी बुलाता है मुझको।

छत से दूर नदिया की बहती धारा निरखना।
झूमती हवाओं का साँसों में जीवन भरना।
पगडंडी पे कटीली झाडियों से बचके निकलना।
वो गलियों का अपनापन बुलाता है मुझको।
मेरा गाँव अब भी बुलाता है मुझको।

वो धूलभरी राहों से गुजरना, वो इमली के बूटे।
खेत खलिहानों में चुपके से अघकच्चे फल लूटे।
कच्ची कैरी पक्के अमरूद मन में लड्डु फूटेे।
वो मौसमी नज़ारा लुभाता बुलाता है मुझको
मेरा गाँव अब भी बुलाता है मुझको।

ओस की बूंदों को आंचल में भरने की ख्वाहिश।
फूलों-पत्तों से मोती चुनने की ख्वाहिश।
बागों में तितलियों-सा उडते रहने की ख्वाहिश।
मासूम चाहतें, चमकता पानी बुलाता है मुझको।
मेरा गाँव अब भी बुलाता है मुझको।

वो अकेले में ढेर सारे सपनों की चादर बुनना।
किताबों में छुपाने गुलाबी कलियों को चुनना।
कोयल की कुहू, चिड़ियों का आंगन में फुदकना।
वो खुशबू भरा नग्मा बुलाता है मुझको,
मेरा गाँव अब भी बुलाता है मुझको।

रात भर आँखमिचौनी खेलने की चाहत।
तारों को गिनने की होड़, जीतने की चाहत।
इंद्रधनुषी रंगों पर सवार होने की चाहत।
वो खेल, वो राग रंग,बुलाता है मुझको।
मेरा गाँव इन्दु अब भी बुलाता है मुझको।


गृह स्वामी

बेफिक्र-सा दिखता वो,
घूमता फिरता है
घर के बाहर
निश्चिंत-सा।
कमाने की धुन में ,
अपने परिवार के लिए ।
बच्चों की खाट-पिट हो
या बडी की हसरतें,
पडोसियों की बकझक
या रिश्तों की नसीहतें ।
मेहमानों के किस्से
या नौकरों की जरूरतें,
मिठाईयों की लालसा
या पैसो की बरकतें ।
इनसबसे बेखबर ,
अंजान नही
पर अंजान बना रहता है ।
क्योकिं वह जानता है ,
कोई है उसके साथ ,
हमसफर हरपल,
भले ही साथ नहीं दिखती,
पर रहती है साथ
उसके जीवन में
श्वासों की भाँति,
और सम्भाल लेती है वो सबकुछ ,,
उसकी सहधर्मिणी,
सहभागिनी।
तभी तो,
वो घूमता फिरता है
घर के बाहर की दुनिया में
‘इन्दु’ घर संजोने की खातिर
बेफ्रिक घर से ।


बेटियाँ

बेटियाँ जब माँ बन जाती है
माँ के और करीब आ जाती हैं ।
अपने नाज नखरों से
घर को सिर पर उठाने वाली,
माँ के साथ चुपचाप
माँ का हाथ बँटाती हैं।
बेटियाँ जब माँ बन जाती हैं

माँ के बुलाने पर भी
अनसुनी कर देने वाली,
थकी हारी माँ के सिरहाने बैठ,
उनके सिर पर,
बडों की तरह हाथ फिराती हैं ।
बेटियाँ जब माँ बन जाती हैं ।

पापा के साथ-साथ
माँ को चिढाने वाली
पापा का गुणगान करने वाली,
अब माँ को हक की बातें बताती है ।
कभी तो आराम भी किया करो
दादी माँ के जैसे प्यार की डाँट लगाती है ।
बेटियाँ जब माँ बन जाती हैं।

हर छोटी बात पर ठुनकने वाली ,
तानों को भी चुपचाप पी ,
भूख-प्यास मिटा लेती हैं।
ससुराल में सब अच्छे हैं कहकर,
भरेमन से मुस्कुराकर गम छुपा लेती हैं,
सच में माँ की अम्मा-सी बन जाती हैं ,
बेटियाँ जब माँ बनती हैं


मिस करते है ,,,

ऐसा भी होता है दोस्त,,
जब वो पास नहीं होते,
हम उन्हें बहुत मिस करते हैं।

हसीन वादियों में
उनका ही अक्स उभरता है।
पूजा की थाल सजाऊँ
तो याद आता है
उनका टोकना जरा ढीक से देखना,
कुछ रह ना जाए।

कृष्ण में उनकी छवि-सी दिखती है,,
रजनीगंधा के फूल सजाती हूँ कमरे में,
अभिसारिका के प्रथम लम्हों की याद में।

दुआ में सबसे पहले
उनकी सलामती चाहता है मन।
दोस्तों के साथ भी उन्हीं की बातें,
कुछ खट्टी ,कुछ मीठी ।
बहल जाता है तन।

महफिल में गुनगुनाती हूँ
उनकी पसन्द का कोई पुराना गीत,
हर पल यादों में ,
श्वासो की भाँति बसते है वो ,

पर वो क्या जाने,
हम किस किस बहानों से
अहसास करते है उनका ,,,
महसूस करते है उनको,,,
सच है हम उन्हें बहुत मिस करते है ।
डॉ इन्दु


बड़ी दिखने लगी हूँ मैं।

अब बड़ी दिखने लगी हूँ मैं।
बच्चों की माँ से
,बहुओं की सास बन गई हूँ ।
कुछ पास पड़ोस के बच्चे ,
मुझे दादी भी बुलाने लगे है।
अब बड़ी दिखने लगी हूँ मैं।

पूरे घर को जचाती-फिरती,
बड़ों को सुनती ,सलाह देती,
छोटों के सामने चुप रहने लगी हूँ ,
अब बड़ी दिखने लगी हूँ।

अब किसी की बात पर खफा नहीं होती,
अब किसी भी साज पर जुदा नही होती।
हर रंग में रंगने लगी हूँ मैं,
अब बड़ी दिखने लगी हूँ मैं।

पर एक सच और भी है,
पर एक मन और भी है।
कोने में दुबका एक नन्हा-सा बच्चा,
सुबकता है,पर कुछ कहता नही है,
जिदद तो बहुत है, दिखाता नही है,
मनाने पर, मान जाता है लेकिन,
रोता बहुत है बहाता नही है।
छोटी-सी बातें भी, चुभती है उसको।
खुद ना हँसें,पर हँसाता वही है।
आज भी मचलता है कुछ पाने को,
दिल आज भी धडकता है, मिट जाने को।
कभी जोर से कहकहा लगाने को,
कभी रूठने तो, कभी मनाने को,
कोई खिलौना भा जाता है मन को,
कोई सपना रुला जाता है उसको।
चीखने चिल्लाने की जगह ढूँढती है
रात के अंधेरों में ,सहर ढूँढती है।

फिर भी उम्र के हिसाब से ,
सभी कहते है मुझको ,
मै बडी हो गई हूँ ।

क्या मैं सच मैं बड़ी हो गई हूँ?


वो लडकी

आज बेटे ने पूछा
माँ तुम्हारी हर कविता में
दर्द की बात क्यूँ है।

मुझे याद आया
बहुत पुराना पल कालेज का।
एक गुलाबी गालों वालीं,
घुंघराले बालों वाली
कद में छोटी
थोडी-सी मोटी
जब भी मिला करती थी
बात-बिन-बात हँसा करती थी।

बोलती कम थी
मुस्कुरा लिया करती थी।
हर किसी का गम
बाँट लिया करती थी।
पर उसकी हँसी का दर्द
आँखे बयां करती थी।

एक दिन मैंने
थामा उसका हाथ ,
लेकर अपने साथ,
होने लगी बरसात
पूछी जो दिल की बात।
उसके ठहाकों से गूंजे
धरती और आकाश।
दिल में इतना दर्द
कैसे हो पर विश्वास।
अपने कहने वालों से
सताई गई थी वो,
प्यार करने वालों से
रुलाई गई थी वो।
दिल पर निशां तो थे ही,
शरीर पर भी चोट खाई थी वो।

डरती थी वो छुपाती, खुद को सबसे।
डरती थी कही बहक ना जाऊँ जग से।
कोई अपना नही सुनाऊँ दास्ताँ किससे।
अंजुली में समोए मोती, फफक पडी फिर से।

आगे की दास्तान ये कि हम दोस्त बन गए,
जुल्मों-सितम के हम राजदार बन गए।
भटक ना पाए उसके कदम , डरती थी वो,
उसके सफर के हम यार रखवार बन गए।

वो दिन मेरी जिन्दगी का मुकम्मल दिन गया।
जीने का मुझको एक नया सम्बल मिल गया।
आज भी जब मिलती है वो,
गले मिलकर कहती है वो,
गर तुम ना होती तो क्या होता,
जमाने को मेरा पता भी ना मिलता।

अब म॔जिल का पता नही, तलाश भी नही,
दिल में उतरने का जरिया जो मिल गया।
आँखों की दरिया से
दिल के सागर तक बहती हूँ।
तल में छुपे सीपियों से
मोती चुरा लेती हूँ।
शब्दों की माला में
उनको पिरोकर
कविता कामिनी का
ह्रदय सजा लेती हूँ।
तभी तो कहती हूँ,
मैं दर्द खरीदती हूँ।
मैं दर्द बेचती हूँ।

कवयित्री, साहित्यकार, समीक्षक, कलाकार ,विचारक ,जीवन प्रशिक्षक, प्रोफेसर, अनुवादक , दार्शनिक, संस्थापक अध्यक्ष इत्यादि अनेक उपाधियों के चित्र में मुझे संजोते, अनेकों सम्मान और पुरस्कारों से मेरी रचनाओं और कार्यों  को सराहते मेरे अपने , मेरे मित्र, मेरे परिचित ,,, 
पर मेरा परिचय ,,,
मेरे लिए बस इतना ही, एक तलाश उन मोतियों कि जो मेरे, आपके, हमसबके अन्तर्मन में कहीं गहरे,  बहुत गहरे छुपे हैं । जिन्हें इन्तजार है मेरा ,आपका ,,हमसबका ,,,,,,
यह तलाश ही बन जाता है जैसे मेरा जीवन ,,जो हरपल मुझे गिरकर सम्भलना सिखाता है ,,,डूबकर तैरने की कला सीखने में व्यतीत जैसे सारा जीवन और जो थोडा भी आँचल में आया,, उसे बाँटते रहने का अथक प्रयास ।

डॉ. इन्दु झुनझुनवाला , बैंगलुरु, भारत

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