माधवी जैन, प्रतिभा द्विवेदी, रेणु चंद्रा


पाँच लघुकथा

डॉ माधवी जैन
इंदौर , भारत ।

लघुकथा-१
कमल के फूल
नय नवरात्रि मेले की भोर । पहाड़ी पर दुर्गा माता का प्रसिद्ध मंदिर । पहाड़ी पर ही नवरात्रि का मेला । भोर का समय । , विशाल जन सैलाब व दो एवं चार पहिया गाड़ियों के बेतरतीब आगमन के मध्य एक , सात – आठ वर्षीया मासूम बच्ची , बेचने को कमल के चंद फूल सामने टोकरी में रख , सड़क पर बैठी ! बिखरे बाल , आंखों में उजास ! मेरे ठिठके कदमों को देख गुहार लगाती , ” आंटी ! फूल ले लो न कमल के !”
मैं विस्मित ! कौन सा !

***

लघुकथा-२
ब्लू टिक !
अभिलाषा परेशान थी।
व्हाट्स ऍप पर चार दिनों से इकतरफ़ा ‘ कहा – सुनी ‘ ही चल रही थी।
उसे भैया से रोज ढेरों बातें शेयर करना होती थीं ।
वह अचरज में थी, अचानक यह भैया को क्या हो गया !
भैया से ब्लू टिक नहीं मिल रही थी !
वह जानती थी ,
भैया ऐसा कभी नहीं करेंगे ।
वे मेरा मैसेज पढ़े बगैर तो जवाब दे सकते नहीं !
भैया ने भेजे हुए मैसेज पढ़े तो हैं । लेकिन ! ब्लू टिक तो है ही नहीं !
जादू है अथवा जादूगरी…..
भैया उसके मैसेज क्यूं नहीं पढ़ रहे भला !
धुंधलके में जीना उसे गवारा नहीं ।
बिना वजह ,अबोला करती नहीं !
वजह हो , तो स्पष्ट हो ।
बेवजह अनसुनी हो, तो निस्सार है सम्वाद ।
आज उसने धुंधलके से परे हटने का निर्णय किया ।
फ़ोन मिलाया , घनघना दिया।
उधर, भैया हँस दिये।
उनकी , मात्र व्हाट्स ऍप सैटिंग्स बदली हुई थीं।
उन्होंने पुनः सैटिंग्स बदल कर , पढ़ चुकने को ‘ ब्लू टिक ‘
अप्लाय कर दिया ।
अब हँसी पुनः पसर चुकी थी ।

***

लघुकथा-३.
रंग !
राधिका आज फिर सुबह से मचल गई थी। माँ परेशान ।
” माँ……..! तुम इतनी गोरी हो , मैं क्यों नहीं ! ”
दूसरी कक्षा में पढ़ रही राधिका सांवले वर्ण की थी ।
लेकिन समझती थी ….. गोरी बालिकाओं को अधिक स्नेह मिलता है । अजनबी अथवा जान – पहचान के लोग भी, पहले उन्हीं की ओर मुखातिब होते हैं । बाकी बच्चों को तो उनके स्नेह की खुरचन ही मिलती है।
फिर …. राधिका की तो , माँ भी गोरी थी !
उस दिन सौभाग्य से , रसोई में सब्जी काटते समय माँ की उंगली पर , हल्के से चाकू चल गया । खून छलक आया ।
माँ को उपाय सूझ गया था ।
माँ ने राधिका को अपनी उंगली की चोट दिखाई ।
राधिका घबरा कर रोने लगी व माँ से चिपक गई ।
माँ ने कहा , ” हम सभी इंसान , चमड़ी के भीतर एक – से हैं।
ईश्वर ने हम सबको भीतर – से एक – सा ही बनाया है।
अगर मेरी चमड़ी का रंग काला होता , तो क्या मुझे चोट लगने पर तुम्हें इतना ही दर्द नहीं होता ? होता ,क्योंकि तुम मुझे प्यार करती हो , तुम नही चाहतीं , मुझे चोट लगे ,व दर्द हो। प्यार का रंग ही असली रंग है। इसलिये , चमड़ी के रंग के आधार पर हम सभी को भी , एक – दूसरे से भेद – भाव नहीं करना चाहिए । हम सभी चाहते हैं न , सब स्वस्थ रहें , किसी को चोट न पहुंचे। हर बच्चे को एक- सा प्यार मिले । यह बात जब कभी बड़े लोग भूल जाते हैं , तो कुछ देर को वह गोरे रंग के बच्चों की ओर आकृष्ट हो जाते हैं । वे भूल जाते हैं कि , उनकी इस बात से बाकी बच्चों के मन को चोट पहुंचेगी ।
होली का त्यौहार भी इसी लिये आता है। सभी को एक रंग में रंगने , प्यार के रंग में। ”
राधिका को गोरे – काले रंग के परे , प्यार का रंग समझ आ गया था । उसने झट से आंसू पोंछे व मुस्कुराते हुए ,अपनी पसंदीदा , मां की गुलाबी साड़ी लेकर आईने के सामने जा खड़ी हुई । उनकी गुलाबी बिन्दी लगा ली व साड़ी भी कंधे पर डाल ली । इस वक्त तो गुलाबी रंग में ही उसकी दुनिया समाई थी।

***

लघुकथा-४
पाषाण !
सदाशिव को पत्थरों से बड़ा प्यार था । जब भी किसी पत्थर को तराशने बैठता , तो मानो पाषाण के मन को भी भेदने बैठ जाता । आज इनके भी मन की सुनूंगा !
पहाड़ पर पाषाणों की क्या कमी !
लेकिन उत्तराखंड में रहने वाले सदाशिव को तो हर पाषाण विशिष्ट नजर आता था । हर पाषण में एक मूरत नज़र आती थी ।
सोचता ! हम इन पहाड़ों का संरक्षण क्यों नहीं करते ! केदारनाथ की त्रासदी से अभी उबरे भी नहीं हैं , कि फिर मानसून आते ही , पहाड़ भरभराकर गिरने लगे हैं !
पाषाण को छेदना कितना कठिन है । और पहाड़ों का निर्माण तो असंभव ! यानि, संरक्षण ही उपाय है।
पहाड़ के पैरों तले बैठे सदाशिव के हाथों आज गणपतिजी आकार ले रहे थे । बादलों के संग संग , मन में वही चाह घुमड़ रही थी,
आज मुझसे बोलो पाषाण !
छैनी का अंतिम प्रहार शेष था ।
आज सदाशिव की व्याकुलता , मूर्ति में आकार ले चुके गणपति जी की अपनी व्याकुलता से एकाकार हो रही थी ।
आज पाषाण बोल पड़ा ,
” सदाशिव ! तुम सदा पाषाण का मन भी भेदना चाहते थे न , तो सुनो !
पहाड़ों पर सड़क बनाने के लिये हम पहाड़ों का छेदन , बारूद की अनियंत्रित मात्रा से करना न्यायसंगत है क्या ?
पहाड़ काटकर अंधाधुंध घर बसाना जरूरी है क्या ?
विकास के लिये समझदारी व संवेदन शीलता से काम नहीं लिया जा सकता जैसे तुम करते आए ! क्या सुनियोजित तरीके से उसे अंजाम नहीं दिया जा सकता ?
जिस सड़क को बनाने के लिये , तुम मानव निस्संकोच हो पहाड़ों का सीना चीरते हो न , वही सड़क गायब हो जाती है , हमारे भूस्खलन से । न पहाड़ बचते हैं , न सड़कें ।
एक है प्रागैतिहासिक संपदा , तो दूसरी संपर्क सूत्र ।
आखिर तुम मानवों को मिलता क्या है ?
दोनों से ही हाथ धो बैठते हो !
पाषाण को संवेदना के साथ छेदकर , जब अमूल्य मूर्ति पा सकते हो तो उसका सीना चीरकर प्रलय क्यों आमंत्रित करते हो !
अब भी संभल जाओ ।
जरा अपने पाषाण हृदय को छेदो ,
मुझे वहां भी पाओगे !
अगर पहाड़ न बचे ,
तो तुम भी न बच पाओगे !
फिर भी विध्वंस ही चुनते हो !
सदाशिव सोच रहा था ,
जब पाषाण के हृदय को भेदकर भी
भाव उकेरे जा सकते हैं ,
तो इंसान के हृदय को भेदना , इतना दुष्कर क्यों है !
क्या मानव – हृदय , पाषाण से भी कठोर कोई वस्तु है !!

***

लघुकथा-५
पाठशाला !
शिक्षा विभाग में घर से सुदूर कार्यरत मनोहरजी , क्रिस्मस की सुबह स्टेशन पर बैठे , अपनी घर – वापसी की ट्रेन का इंतज़ार कर रहे थे । निर्धन किंतु विनयशील विद्यार्थियों की मदद को , उनके हृदय के कपाट सदा खुले रहते , जिन्हें स्वयं उनकी जीवन – यात्रा में नित्य चले आने वाले झंझावात भी , कभी बंद न कर पाते थे।
विद्यार्थियों के लिये तो मानो चलती – फिरती पाठशाला ही थे वे ।
ट्रेन आने में कुछ विलंब था।
अचानक उन्हें , अपनी पीठ के पीछे रखी अपनी अटैची , हौले – से सरकती महसूस हुई ।
झट पलटे तो देखा , सहसा वे दो अनजान हाथ थम गए थे , दो कदम ठिठक गए थे , दो आंखें पल भर को नज़रें मिलाकर अब चुरा रही थीं । वह कुली चोर निगाहों से , मानो जमीन में गड़ा जा रहा था ।
उसके चेहरे पर उम्र , लाचारी , आत्मग्लानि सब एक साथ चस्पा थे।
मनोहरजी जड़वत खड़े रह गए । .
वह कुली हाथ जोड़कर समक्ष आ खड़ा हुआ ।
” हमें माफ़ कर दो साहब । कभी किसी की चीज़ पर नज़र तक नहीं डाली । मजबूरी क्या नहीं करवा लेती !
पत्नी बहुत बीमार है घर पर । संभालने वाला मैं अकेला ।
हाथ तंग पड़ गए । ”
मनोहरजी स्तब्ध !
धम्म से वहीं कुर्सी पर बैठ गये ।
कुली पैर पकड़ बैठ गया ।
अवरुद्ध कंठ से माफ़ करने की गुज़ारिश करने लगा ।
जीवन की पाठशाला समक्ष थी ।
तभी , सामने से कुछ बच्चे , सांता क्लॉज़ की टोपियां लगा , अपने परिवार की छ्त्रछाया में , अपनी भावी ट्रेन – सवारी की पुलक में उछलते – कूदते हुए निकले , अजनबी यात्रियों की ओर ‘ मैरी क्रिसमस ‘, का अभिवादन उछालते हुए !!
मनोहर जी ने सहसा कुली को कंधे पकड़ उठाया , अपनी जेब में से पाँच सौ रुपये निकाल मुस्कुराकर उसकी जेब में डाल दिये , नज़दीक आती अपनी ट्रेन को देखा व पुनः अपनी सीखने – सिखाने की राह पर चल पड़े ।

पाँच लघुकथा।
डॉ प्रतिभा द्विवेदी
भोपाल

लघुकथा-१
“गली के कुत्ते”

गली में एक चमचमाती कार बंगले के सामने रुकी । कार से मालिक के साथ झबरीले बालों वाला खूबसूरत’ टॉमी'(कुत्ता) नीचे उतरा ।
उसे देखकर गली के कुत्ते मन ही मन अपने भाग्य को कोस रहे थे।
अगली सुबह बंगले के मालिक ‘मॉर्निंग वॉक’ के लिए निकले।
उनके हाथ में थी – एक सुनहरी जंजीर और जंजीर से बंधा हुआ खूबसूरत ‘टॉमी’ ।
अब गली के कुत्ते अपने भाग्य पर इतरा रहे थे ।

***

लघुकथा-२
आडिट

“अच्छा मैनेजर साहब,अब हम चलते हैं।आपका काम काफी अच्छा है।””
आडिटर साहब ने लम्बी… डकार लेते हुए कहा।
फाइलों के ढेर को हमेशा के बंद करते हुए मैनेजर साहब के चेहरे पर संतुष्टि के भाव थे।
आडिट निपट चुका था।

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लघुकथा-३
आज की बेटी”

राधिका बुखार में तपते हुए आलू के पराठे सेंक रही थी क्योंकि उसकी कॉलेज गोइंग बेटी अभी-अभी घर लौटी थी और उसे जोरों की भूख लगी थी ।
बेटी खाने में मगन थी और मैं विचारों में——
“एक संवेदनहीन बेटी संवेदनशील बहू हो सकती है?”

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लघुकथा-४
“महिला सशक्तिकरण”

अबे! कुत्ते क…अंधा है क्या?
लेकिन मैडम मैं……. मेरी गलती नहीं,वो हकलाया।
‘चु….प ,वो दहाड़ी।
मैं तुम ऑटो वालों को अच्छी तरह से जानती हूं नजर कहीं रहती है, ध्यान कहीं रहता है।
कहते हुए वो दो-चार भद्दी गालियां देती हुई स्कूटी लेकर निकल गई।
क्या भैया, कैसा जमाना आ गया है?राॅंग साइड से तो वो खुद आ रही थी और उल्टा तुम्हें ही… ‌‌..
ऑटो में बैठी सवारी (मैं)बोल पड़ी।
जाने दो मैडम, ऑटो वाले ने धीमे किंतु उपेक्षा पूर्ण स्वर में कहा-
‘ऐसी दो-चार सशक्त महिलाओं से रोज पाला पड़ता है’।

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लघुकथा – ५
“श्रद्धांजलि”

बहनों -भाईयो !
“आज आपके क्षेत्र की टू लेन सड़क चमचमाती फोर लेन सड़क में तब्दील हो चुकी है।अब विकास का नया अध्याय लिखा जायेगा। आज इस सड़क के लोकार्पण की आपको लख- लख बधाइयां।”
नेताजी का जोशीला भाषण समाप्त हुआ।सम्पूर्ण पंडाल तालियों की गड़गड़ाहट और नेताजी के जयघोष से गूंज उठा।
इधर,मैं विकास की बलि चढ़े सैकड़ों वृक्षों को मन ही मन श्रद्धांजलि अर्पित कर रही थी ।

पाँच ळघुकथा
रेणु चंद्रा

लघुकथा1.⁠ ⁠बाबूजी का श्राद्ध

श्राद्ध पक्ष चल रहे थे। घर में बाबूजी का ग्यारस का श्राद्ध निकालना था। दो चार दिन पहले ही पंडित जी को न्योता दे दिया था। उस दिन सुबह जब याद दिलाने के लिये उन्हें फोन किया तो,वे कहने लगे,”क्या करूँ मुझे तो बिल्कुल समय नहीं है, दूसरी जगह से भी न्योता है,पहले वहाँ जाऊँगा । फिर वहीं से आफिस चला जाऊँगा । आपके यहाँ तो शाम को ही आ सकूँगा|”
क्या करते ? आजकल पंडित जी मिलते कहाँ हैं ? सो मानना पड़ा ।
श्राद्ध का खाना तो हम सुबह ही खिलाना चाह रहे थे। क्योंकि, माँ का कहना था,”जब तक श्राद्ध निकाल कर पंडित जी को भोजन ना करा दें, घर का कोई सदस्य भोजन नहीं करता है, ऐसी परम्परा है| हम सभी का सिर चकरा गया । सभी सोच में पड़ गये कि क्या करें?”
तभी उनका फोन आया बोले,”एक बात और कहनी थी आपसे,एक जजमान के यहाँ खाना खा कर आऊँगा,सो अधिक खा नहीं पाऊँगा। अत: टिफ़िन तथा दक्षिणा ठीक से दे दीजिएगा ।
थोड़ी देर में देखा कि घर के द्वार पर एक दीन-हीन बूढ़ा आदमी निढ़ाल अवस्था में बैठा था और बुदबुदा रहा था-“बहुत भूखा हूँ माई..,कई दिनों से ठीक से खाना नसीब नहीं हुआ.., कुछ खाने को दे दो… ।”
हम सोच ही रहे थे कि फिर आवाज सुनायी दी, “माई ! कुछ खाने को दे दो …|”
उस पर बड़ी दया आ गयी। माँ के कहे अनुसार, पहले पंडितजी का टिफ़िन लगाकर रख दिया और उसे घर के अहाते में बैठा कर हमने आग्रह पूर्वक भरपेट भोजन कराया। वह तृप्त होकर, ढेर सारी आशीष देता हुआ चला गया। उस दिन मन को बहुत संतुष्टि हुई और लगा आज बाबूजी का श्राद्ध ठीक से सम्पन्न हुआ ।

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लघुकथा-२
वसीयत

आलोक नाथ जी रिटायर होने के बाद अपने कमरे तक ही सीमित होकर रह गये थे। रिटायरमेंट पर जो थोड़ा बहुत पैसा मिला था वह घर की मरम्मत, दो बेटों और एक बेटी की शादी में खत्म हो गया। पता नहीं क्यों, तभी से वे अपने ही घर में बेगाने से हो गये । उन्हें महसूस होने लगा था कि वे अब अपने बेटे बहुओं पर बोझ हो गये थे । वे चाहते थे कि उनकी वजह से घर में कोई झगड़ा ना हो, सभी शान्ति पूर्वक रहें ।
उम्र के इस पड़ाव पर अब नौकरी भी नहीं रही और शरीर भी थकने लगा था । ऐसे में पत्नी भी बीमारी की वजह से उनका साथ छोड़ कर चल बसीं । अब यह अकेलापन उन्हें निरीह बना रहा था । उन्हें लगता था वे अब ज्यादा दिन जिन्दा नहीं रहेंगे । एक दिन अपने कमरे में बैठे हुए वे कुछ लिख रहे थे । तभी बड़े बेटे ने पूछा,”पिता जी आप यह क्या लिख रहे हैं?”
उन्होंने कहा,”मैं अपने पोते-पोतियों के लिये वसीयत लिख रहा हूँ।”
बेटे ने मज़ाक बनाते हुए कहा,”पिता जी आपके पास है ही क्या, जो आप वसीयत लिख रहे हैं ?”
उन्होंने एक लम्बी साँस भरी और गर्व से कहने लगे,”सच कहा बेटा! धन दौलत, जमीन-जायदाद ना सही, फ़िर भी मेरे पास देने को एक बहुत कीमती पोटली है जिसमें जिन्दगी भर की कमाई हुई ईमानदारी, सच बोलने की हिम्मत और कर्तव्य परायणता है । जिसे मैने आज भी सम्भाल कर रखा है ।”
भरे मन से उन्होंने कहा, “तुम्हें तो कुछ नहीं दे सका लेकिन वही संस्कार के रूप में अपने पोते-पोतियों में बराबर-बराबर बाँट देना चाहता हूँ ।”

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लघुकथा-३
गृह प्रवेश

वसुधा ने आसान किश्तों में अपना एक फ्लैट खरीद लिया था। जब फ्लैट आ ही गया तो उसने सोचा कि वहाँ जाने से पहले घर की शुद्धि के लिए हवन-पूजन करवा लेना चाहिये। किसी के बताने पर एक पंडित जी से बात तय हुई और गृह प्रवेश की तिथि तय कर दी गयी। वसुधा ने आस पड़ोस में सभी को निमन्त्रण दिया।
पूजा से एक दिन पहले ही पंडित जी का फोन आया कि वे किसी कारणवश नहीं आ सकेंगे। वसुधा बहुत निराश हो गयी क्योंकि सारी सामग्री आ चुकी थी और सभी को निमंत्रण भी दे दिये गये थे। तभी उसका रचना जी से मिलना हुआ।
वे एक प्रौढ़ विदुषी महिला थीं जो संस्कृत महा विद्यालय में पढ़ाती थीं। जब उन्हें पता चला कि फलां- फलां पंडित जी ने मना कर दिया है, तब वह कहने लगीं कि,”तुम बुरा ना मानो तो एक बात कहूँ।”
वसुधा ने कहा,”हाँ! हाँ! आप कृप्या करके कहिये।”
रचना जी बताने लगीं, “मैं ब्राह्मण परिवार से हूँ, मुझे भी हवन पूजन का काफी अच्छा ज्ञान है, जो मुझे अपने पूर्वजों से विरासत में मिला है और मैंनें इसकी शिक्षा भी ली है|”
रचना जी ने कहा,”यदि तुम चाहो तो मैं विधि-विधान से हवन- पूजा करवा दूँगी। परन्तु मेरी एक शर्त है कि इसके लिये मैं कुछ भी नहीं लूँगी। आगे जैसी तुम्हारी इच्छा।”
यह सुनकर वसुधा भी सोच में पड़ गयी। फिर घर में बुजुर्गों से सलाह करने पर उसे बात समझ में आ गई। नियत दिन व समय पर पूजा रखी गयी। कुछ आमंत्रित लोगों ने पंड़ित जी के स्थान पर स्त्री को देख कर विरोध जताया|
एक पड़ोसी क्रोधित होकर बोले,”पंडित जी कहाँ है?”
“…स्त्री…और हवन…पूजा, यह क्या मजाक है?”
तभी विनोद जी भी उनके स्वर में स्वर मिलाते हुए कहने लगे,”आपने हमें यहाँ अपमान करने के लिए बुलाया है क्या?”
अधिकतर बुद्धिजीवी लोगों ने इसे सराहा और सहमति भी दी । इस तरह गृह प्रवेश की पूजा विधि-विधान से सम्पूर्ण हुई ।

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लघुकथा-४
शोक-सभा

रवि ने सुबह-सुबह जब अखबार खोला तो तीसरे पेज़ पर अपने अभिन्न मित्र विजयेन्द्र की मौत तथा तीये की बैठक का समाचार पढ़ कर सुन्न रह गया । कई दिनों से वह उससे व्यस्त रहने की वजह से नहीं मिल पाया था । उसके घर फोन किया तो पता चला कि वह तो अच्छा भला था । आफ़िस के लिये घर से निकला था ,अचानक एक ट्रक ने टक्कर मारी और सड़क दुर्घटना में उसकी मृत्यु हो गई ।
विजयेन्द्र, रवि का पक्का दोस्त था । उसे खो देने का दुख वह बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था । उसकी आँखों से अवसाद भरे अश्रु बह चले थे । पत्नी ने बहुत समझाया और दिलासा देते हुए कहा,”हमें उनके घर चलना चाहिये और उन्हें धीरज बँधाना चाहिये ।”
भारी मन लिये वह दोनों उनके घर पहुँचे । मित्र की पत्नी का रो-रो कर बुरा हाल था । वे किसी तरह उसे दिलासा देने की कोशिश करने लगे । हर तरह की मदद करने का वायदा किया और कर भी क्या सकते थे ।
शोक सभा शुरू हो चुकी थी । पंडित जी के धार्मिक प्रवचन हो रहे थे । वे भी श्रद्धांजलि देने के लिए दुखी मन से सभा में बैठ गये । आने वाले लोगों का ताँता बँधा था । सभी रिश्तेदार, आफ़िस के सहकर्मी,दोस्त और सभी मिलने-जुलने वाले आ रहे थे । लेकिन ऐसा लगा कि सभा में ज्यादातर लोग शोक व्यक्त करने नहीं बल्कि आपस में मिल कर इधर-उधर की बातें ही करने आये थे।
ठीक पीछे बैठी एक महिला दूसरी से बोली,”तेरे पडोस में जो लड़की रहती है उसका प्रेम-प्रसंग कैसा चल रहा है?”
दूसरी ने जवाब दिया,” पूछ मत ! रोज़ ही सज-सवँर कर उससे मिलने जाती है “।
तभी दायें बैठी युवती अपने पास वाली से बोली,” मैं तो अपने बॉस से परेशान हो गई हूँ।”
दूसरी तरफ से आवाज़ आई,” सुना है तेरी नन्द की सगाई टूट गई ।उसके ससुराल वाले कितना दहेज माँग रहे थे?”
रवि के यह सब सुन-सुन कर कान पक गये थे। इतने दुख में यह सब बातें…
तभी सुनाई दिया, ” रोमा सुन, जाने वाला तो चला गया ,चल यहाँ से निकलते हैं, पिक्चर देखेंगे और खाना भी बाहर ही खा लेंगे । ”
रोमा ने खुश होकर धीरे से कहा,” हाँ! ठीक है। अब घर जाकर खाना कौन बनायेगा ।”
रवि ने भीगी आँखों से पत्नी को देखा। दोनों हैरान थे।

***

लघुकथा-५
उबलती चाय

शाम ढल चुकी थी । रात का अँधेरा गहरा गया था । बच्चों को सुला कर कुसुम पति का इंतज़ार कर रही थी । अधजले चूल्हे पर पतीली चढी़ थी । तभी दरवाजे पर दस्तक हुई । उसने उठकर दरवाज़ा खोला ।
“आ गये ?”
“हूँ—”
“बड़ी देर कर दी ।”
“हूँ—”
“क्या हुआ?”
“कुछ नहीं ।”
“नौकरी मिली क्या?”
“नहीं ।”
“अब क्या होगा ?”
“————-”
“थक गया हूँ ।”
“नहा लो ।”
“हूँ–खाना लगा दो ।”
“बना नहीं ।”
“क्यों ?” वह गुस्से में चिल्लाया।
“कुछ नहीं था। मैने तुम्हें सुबह ही बता दिया था।”
“जैसे-तैसे बच्चों को कुछ खिला कर सुलाया है।”
“आँच पर क्या है ?”
“पानी उबल रहा है ।”
“काहे ?”
“दूध भी नहीं है,हम काली चाय ही पी लेंगे ।”
“थक कर आने पर खाना भी नहीं खिला सकती । बेशरम.. !”
वह कड़क कर गुस्से में बोला ।
उधार नहीं ला सकती थी—
वह डर से काँपते हुए धीरे से बोली,”मुझे अपनी इज्जत प्यारी है।”
बत्ती बंद हो गयी । सन्नाटा पसर गया।

***

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