बापू और हमः शैल अग्रवाल

“एक अर्धनग्न बूढ़ा जो ग्रामीण भारत में बसता था, उसके निधन पर मानवता रोई ।”-लुईस फिशर

आखिर क्या था उस अर्धनग्न क्षीण-काय में, उसके व्यक्तित्व में जिसने विवश किया संपूर्ण विश्व को कि न सिर्फ वे उसकी बातें ध्यान से सुनें वरन् मानें भी !

एक बूढ़ा… जिसका मन सिर्फ भारत के गांवों में बसता था, भूखे नंगों और असहायों की वेदना से कराहता था, जो हर भूखे, नंगे लाचार का आत्मीय था … दीन-बंधु था। समाज से निष्काषित कोढ़ी, अपराधी, सब जिसके अपने थे, उस ऐसे संत की लड़ाई कभी अन्यायी से नहीं, अन्याय से रही। समाज की कुरीतियों व अत्याचार से थी। ईसा मसीह की तरह पाप से थी, पापियों से नहीं। यह वही बूढ़ा है सच ही जिसके जीवन का आधार था… पहला पाठ और सर्वोपरि सिद्धांत भी। गांधी जी ने न सिर्फ सत्य और अहिंसा में विश्वाश किया अपितु आजीवन इन्हें धर्म की तरह निभाया भी और यही नहीं, रास्ते में आई हर बाधा, हर तकलीफ को पूजा और व्रत के आनन्द की तरह ही लिया। यही वज़ह थी कि उनके सत्याग्रह के आगे धुरंधर और षडयंत्री सब झुक गए। ताज़ और तख्त उलट गए !

संरक्षण, स्वाधीनता और देश के खोए वर्चस्व के साथ-साथ सच की ताकत से भी अवगत कराया बापू ने हमें। हर गलत बात का अहिंसक और संयमी विरोध करना सिखलाया बापू ने हमें। समझाया कि कैसे यहीं आकर हम पशुओं से अलग और अधिक सक्षम हैं। शारीरिक बल से तो पशु संसार चलता है, मानवता की ताकत मन जीतने या मनचाहे परिवर्तन में है। शत्रु को नष्ट तो किया ही जा सकता है परन्तु यदि मित्र बना सकें तो यही सबसे बड़ी जीत है और आजीवन ऐसा ही करके दिखाया भी उस दुबले-पतले महात्मा ने। कमज़ोरी या किसी अभाव से डर पैदा होता है और डर से शत्रुता व हिंसा। यदि हम दूसरे के डर और कमज़ोरी…ज़रूरत और अभाव को समझ सकें (साथ-साथ अपने डर और कमजोरियां भी), तो संभवतः दुनिया से वैमनस्य, सारी हिंसा स्वयं ही खत्म हो जाएगी ! परन्तु यह सब इतना आसान भी तो नहीं, कभी ‘स्व’ आगे आ जाता है, तो कभी ‘कमजोरी’ या ‘ युक्ति’ !

यहीं पर धैर्य की जरूरत है जो आज शायद कहीं है ही नहीं, क्योंकि धैर्य या सहन-शक्ति तो तभी आएगी जब हम दूसरों को भी अपना-सा ही समझ पाएँगे, उनसे जुड़ पाएँगे! आज जब बापू के विचारों और सिद्धान्तों की दुँदुभी कोने-कोने बज रही है, सोचने पर मज़बूर हूँ कि विश्व को तो छोड़िए, कितने हैं हम भारतीय, जो महात्मा व उनके आदर्शों के बारे में कुछ भी जानते हैं या जानने की कोशिश करते हैं… अंश मात्र आचरण में ढालने का साहस कर सकते हैं।

आज अधिकांश लोगों का गांधीजी से परिचय मात्र बड़ों के मुँह से सुना या किताबों से पढ़ा और जाना है… बचपन में मनाए गए चन्द विध्यालय के उत्सव…चन्द गानों और भजनों तक सीमित है। इधर कुछ सफल हिन्दी फिल्म जैसे ‘लगे रहो मुन्ना भाई ‘ और ‘ गांधी माई फादर ‘ आदि ने एकबार फिर आज की युवा पीढ़ी का ध्यान महात्मा की ओर आकर्षित किया है और गांधीजी व गाँधीवाद फिरसे चर्चा का विषय बने हैं। पिछले दशक में आई रिचर्ड एटिनबरो की फिल्म ‘गांधी’ ने तो भौतिक रूप से गांधीजी को विश्व के सामने मानो पुनर्जीवित ही कर दिया था।

परन्तु गांधी जी खुद कभी किसी आडंबर या अपनी ‘फैन-फौलोइँग ‘ या किसी भी तरह के गांधीवाद में कतई विश्वास नहीं करते थे । उनकी म़त्यु उपरान्त अवसरवादियों ने गांधी से जुड़ी हर चीज का बैसाखी की तरह खूब इस्तेमाल किया। यह पीढ़ी वो पीढ़ी है जो गांधीवाद के ऐसे युग से भी गुजरी, जब गांधी से जुड़ी खादी तक भृष्टाचार और बेइमानी का प्रतीक बनकर रह गई। इसे भी खूब भुनाया और चमकाया गया और इसका सहारा लेकर खूनी पाखंडी सभी ताकत की कुरसियों पर जा बैठे। जबकि गाँधीजी खुद यह मानते थे कि तुम एक बार शक के दायरे में आ जाओ तो फिर तुम्हारे हर आशय को संदिग्ध ही समझा जाएगा और बारबार परखा जाएगा। इसलिए कोशिश यही रहनी चाहिए कि कथनी और करनी ही नहीं, सोच तक एक हो… बुरा मत सोचो, बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो, गांधी जी के तीनों बंदर भला किसे याद नहीं ! पर हजार अच्छाइयों के बावजूद भी यह वही गांधी थे जिन्हें ईसामसीह की तरह ही अपने सिद्धान्तों के लिए जान तक गंवानी पड़ी और अनन्य श्रद्धा के साथ-साथ कइयों के मन में महात्मा के प्रति कुछ अनुत्तरित विवादास्पद सवाल भी हैं ही, जैसे किः

गान्धी अगर लौर्ड इरविन के साथ समझौते में जल्दबाजी नहीं करते तो शायद भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु तीन-तीन देशभक्तों को फाँसी नहीं लगती।

क्या गान्धी अब बस नोटों पर और फिल्मों में ही जिन्दा हैं?
क्या राष्ट्रपिता गान्धी अपने पुत्र के लिए अच्छे पिता नहीं थे वगैरह….

इतिहास कुछ भी कहे, यदि हम आज के संदर्भ में और अपने नज़रिए से गांधी को जानना व समझना चाहते हैं तो हमें उनके विचारों और सिद्धांतो…उनके आदर्श और प्रेरणाओं को समझना होगा…समझना होगा कि क्या थी गांधी की सोच और ताकत। फिर गांधी का कितना अनुसरण हमें करना है…कितना उन आदर्शों को अपने जीवन में उतारने में समाज या हम सक्षम हैं ! यह फैसला खुद हमारा अपना होगा और हमारी आजकी जरूरतों के अनुसार होगा।

हम सभी जानते हैं कि सत्य और अहिंसा गांधी के चरित्र के दो सशक्त व स्थाई स्तंभ थे पर किस मिट्टी की बनी थी वह गांधी के मानस की जमीन जिसपर ये दोनों स्तंभ आजभी उसी मजबूती से खड़े हैं? आखिर क्या था गांधी जी का सत्य और अहिंसा का आग्रह…सत्याग्रह !

दुरूह इन सवालों का जवाब गांधीजी ने खुद ही अपने लेखनी से बार-बार दिया है। अपने चरित्र और जीवन से बारबार समझाया है हमें और अपनी कथनी व करनी की एकरूपता मरते दमतक कायम रखी है। गांधी जी का सत्य और हिंसा में अडिग विश्वास था। उन्होंने सत्य के बारे में लिखते हुए कहा कि यदि हम सच को समझ नहीं पाते तो यह हमारी अपनी हार है, सच की नहीं।

गांधी जी ने अपने बारे में लिखते हुए कहा था कि मैं कोई स्वप्न दृष्टा नहीं हूँ, वरन् एक आम बेहद व्यवहारिक इन्सान हूँ जो मानवता का, दीन-दुखियों का उत्थान चाहता है…उनके जीवन की असह्य पीड़ा का अन्त चाहता है। समाज के अत्याचार और अन्याय का उन्मूलन चाहता है। और इसे मानवता शान्ति और अहिंसा से सच के मार्ग पर चलकर ही पा सकती है। यह रास्ता सिर्फ ऋषि-मुनियों का ही नहीं, आम आदमियों का भी है। जानवरों के पास शारीरिक बल के अलावा और कुछ नहीं होता परन्तु इन्सान के पास आत्मिक या आध्यात्मिक शक्ति है, जो शारीरिक शक्ति से ज्यादा ताकतवर और स्थाई है।

कईबार ऐसा होता है कि हम विद्रोह करना चाहते हैं। सामने वाले की अभद्रता से उद्विग्न उसे मारना या डांटना…दंड देना चाहते हैं। परन्तु यदि तब उस एक पल में अपने को रोक सकें तो यही होगी अहिंसा। गांधी की अहिंसा का अर्थ था अत्याचार और अन्याय का शांत व संयमी विरोध। पाप को नष्ट करने के लिए पापी को नष्ट करना तो जरूरी नहीं। यदि अत्याचारी के आगे बिना झुके उसे हम बता सकें कि वह गलत है। उसकी सोच, उसकी करनी गलत है, तो यही गांधी का सत्याग्रह है…सत्य की जीत है।

सत्य और अहिंसा का यह सिद्धांत जिस दिन व्यक्तिगत स्तर से उठकर विश्व-व्यापी हो जाएगा उसदिन सारी लड़ाइयाँ खुद-ब-खुद खतम हो जाएँगीं। यही गाँधीजी का सपना था और इसी एक सपने की खातिर अंततः उन्होंने अपने प्राण तक न्योछावर कर दिए।

गांधीजी यह भी जानते थे कि लिप्सा और स्वार्थमय मनुष्य के लिए यह सब इतना आसान भी नहीं , इसीलिए कहीं पर उन्होंने यह भी लिखा है कि मैं खुद कभी-कभी अपने सिद्धान्तों पर जिस हद तक चलना चाहता हूँ नहीं चल पाता हूँ। हर व्यक्ति चल पाएगा, यह एक दुरूह सपना है फिर भी प्रयास ज़ारी रहना चाहिए। वह स्व-प्रचार या आत्म-श्लाघा में विश्वास नहीं करते थे। अपने अनुयाइयों से उनका कहना था कि तुम मेरे भक्त मत बनो, बस मेरे साथ रहो।

आत्म-त्याग और आत्म-संयम हम भारतीयों के लिए ही क्या, पूरी मानवता के लिए कोई नया सिद्धांत नहीं (देश, व्यक्ति या सिद्धांतों के लिए कुर्बानियों के कई उद्धरण हमें मानव इतिहास में मिल जाएंगे )।

गांधी जी के अनुसार हमारे ऋषि -मुनि जिन्होंने हिंसा के बीच रहकर अहिंसा वृत आजीवन पालन किया वो न्यूटन से बड़े विचारक और वेलिंगटन से बड़े योद्धा थे। अहिंसा क्रियाशील रूप में आत्मसंयम के साथ की गई आत्म संशोधन की एक निरंतर प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया में मानसिक यातना और शारीरिक कष्ट दोनों ही हैं पर इसका यह अर्थ कदापि नहीं कि अहिंसा कमजोर करती है। हम अत्याचारी के सामने मूक समर्पण कर देते हैं…अहिंसा का सेनानी तो अपने समस्त आत्मबल के साथ अपने सम्मान, धर्म और राष्ट्र के लिए आखिरी सांस तक लड़ता है और साथ-साथ अन्याय के अन्त की और अन्यायी के पुनःनिर्माण की नींव भी रखता है।

गांधी जी अनेकता की एकता में विश्वास करते थे। उन्होंने कहा कि मैं सिर्फ भारत की एकता का ही नहीं, विश्व- एकता का सपना देख रहा हूँ। यह वही सपना था जो हजारों साल पहले हमारे ऋषि मुनियों ने ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ के रूप में देखा था। बुद्ध,महाबीर, ईसा और पैगम्बर ने देखा था और विवेकानन्द ने जिसे पिछली शताब्दी में विदेशों में जाकर दोहराया था।

गांधीजी के लिए स्वराज सिर्फ भारत की ही आजादी नहीं, दीन-दुखियों की आजादी थी। भारत के गांवों में बसे निरक्षरों और असहायों की आजादी थी। गांधी जी का मानना था कि जब मन पूरी तरह से निर्मल हो जाता है…स्वार्थ, घृणा और पाप की वहाँ जगह नहीं रहती, तब हमारे विचार दूसरों को छूने लगते हैं। परन्तु बुद्धिमान और व्यवहारिक गांधीजी यह भी जानते थे कि अपनी कोई भी इच्छा दूसरों पर लादी नहीं जा सकती। एक उनके सोचने या चाहने से कुछ नहीं होगा जबतक कि भारत और विश्व के मानस का हृदय परिवर्तन न हो। फिर भी उनका कहना था कि मुझे अपना यह सत्याग्रह तो जारी रखना ही होगा…मानवता को यह तो बताना ही होगा कि यह दुनिया, यह जीवन कितना सुन्दर और बहुमूल्य है…और इसे यूँ नष्ट मत होने दो !

वास्तव में देखा जाए तो गांधी जी ने कुछ भी तो नया या अनूठा नही कहा …बस, वही कहा है जो हमारे धर्म ग्रन्थों में लिखा है या हमारे ऋषि मुनि जानते और कहते आए हैं। महावीर या बुद्ध ने जो कहा है। बस फरक इतना है कि जो कहा या समझा बापू ने उसपर पूरी सच्चाई से विश्वास भी किया। अपने सिद्धान्तों का मनसा, कर्मणा, वाचा, तीनों से पालन किया। और यहीं आकर महान आत्मा साधारण आत्मा से भिन्न हो जाती है । आदमी, आदमी नहीं सन्त या महापुरुष हो जाता है। इतना संयम, इतनी निष्ठा और इतना धैर्य, आम आदमी के बस की बात ही नहीं।
भारत के अपने समय के शीर्षस्थ उद्योगपति घनश्याम दास बिरला ने गांधीजी की मृत्यु पर श्रद्धांजली देते हुए कहा थाः”मानवीय इतिहास में यह अनोखी बात है कि एक अकेला व्यक्ति एक ही समय योद्धा, मसीहा और संत तीनों था और उससे भी अधिक वह विनम्र और मानवीय था।” और शायद यही विनम्रता और मानवीयता थी जिसके बल पर गांधी जी सबके अपने बन पाए और उससे भी बड़ी बात है कि बने रह पाए।
अटूट संयम और विलक्षण आत्मबल … उनके सत्याग्रह का आज पूरा विश्व कायल है ! जन्मदिन, दो अक्टूबर को अब विश्व ने अहिंसा दिवस की तरह मनाने का आवाहन किया है…शायद हिंसा, स्पर्धा और घृणा से जर्जर विश्व, उनके जीवन से, उनके आदर्शों से कुछ सीख ही सके…कुछ पा ही जाए…विनाश के कगार से वापस मानवता की ओर मुड़ ही ले…मिलजुलकर एक कोशिश तो करनी ही होगी!
संत, सिपाही और सेवक का एक ही व्यक्तित्व में ऐसा अनूठा समिश्रण विरले ही हो पाता है और हम भारतीयों के लिए यह अतीव गौरव की बात है कि वो हमारे अपने बापू थे। आईंस्टाइन ने कहा है कि इस शताब्दी के सबसे ताकतवर और विलक्षण व्यक्तित्व थे मोहनदास करमचन्द गांधी… शायद सबसे बुद्धिमान भी।

बुद्ध की दया और क्राइस्ट के सेवा भाव की साक्षात मूर्ति थे ज्योति-पुंज बापू। एक शब्द में यदि उनके प्रति अपने सारे भावों को समेट पाऊँ तो यही कह पाऊँगी कि बापू सच्चे अर्थों में विश्व-बंधु थे, इसीलिए तो सबके अपने और विश्व-वंद्य हो पाए…
जैसे कि कविवर शिवमंगल सिंह सुमन जी ने अपनी इस कविता में उन्हें खूबसूरत भावांजलि दी है
विश्व वंद्य बापू

” तुम पोंछ गये
भयभीत कपोलों के आँसू
दे गए धरा विधुरा को
निर्भय अभयदान।
हिंसा की गहन तमिस्त्रा में,
बुझते दीपक की बाती को
फिर जला गए देकर
अंतस का स्नेहदान।”

शैल अग्रवाल ( साबरमती आश्रम, अहमदाबाद. फरवरी 2019)