बाल कहानी -खूबसूरत, बाल कविता- सुबह-शैल अग्रवाल


खूबसूरत
‘कितनी खूबसूरत है यह दुनिया!’ बगिया के रंग-बिरंगे और महकते फूलों को देखते ही पवन सनसनाया। परन्तु उसकी सनसन करती आवाज चुपचाप ही बह गई। किसी ने सुनी ही नहीं। क्योंकि सामने बहता नीला सागर बहुत नाराज़ था बगल में खड़े ऊँचे-ऊँचे पर्वतों से – ‘तुम हमेशा ऊपर-ऊपर ही क्यों उठते चले जाते हो, किसी और का जरा भी ध्यान नहीं तुम्हें। देखो, मेरी तह में कितनी उथल-पुथल मचा रखी है तुमने?
पर ऊपर-ऊपर उठते पर्वत भी तो नाराज़ ही थे, अपने ऊपर उडते नटखट बादलों से, सागर की बात पर ध्यान कैसे दे पाते – ‘तुम रोज-रोज ही क्यों आ बरसते हो मेरे ऊपर, देखते नहीं, मेरे पत्थर लुढ़कने लग जाते हैं, सारी मिट्टी बह जाती है?’
और उड़ते बादल भी तो नाराज़ ही थे झूमते सनसन करते पवन से, जिसे बादलों की जरा भी खबर ही नहीं थी, ‘तुम हमें इतना रोज-रोज दौड़ाते-भगाते क्यों रहते हो, दौड़ते-दौड़ते ही हम तो रीते हो जाते हैं?’
अब तक तो पर पवन भी नाराज़ हो चुका था खुद ईश्वर से, जिसने उसे और इस पूरी खूबसूरत दुनिया को बनाया था – ‘एक बात बताओ, तुम मुझे एक जगह पर कभी ठहरने क्यों नहीं देते? किसी की बात ठीक से सुन और समझ ही नहीं पाता मैं?

कितनी खूबसूरत है यह दुनिया, और मै हरी-भरी बगिया तक में मन-माफिक ठहर नहीं सकता?’

ईश्वर जो अभी तक उन्हें देख और सुन रहा था, नाराज तो नहीं पर हत्प्रभ अवश्य ङो गया- ‘कितने मन से रची थी मैंने यह दुनिया इन सभी की खुशहाली और जीने के लिए और इसीलिए तो सभी को एक-दूसरे पर आश्रित भी कर दिया था, ताकि सब एक-दूसरे के सहारे और मिलजुल कर रहें? परन्तु दूसरे की तरफ तो इनकी दृष्टि ही नहीं जाती! जाती भी है तो बस शिकायत में ही। आखिर कहाँ गलती हो गई मुझसे इनकी संरचना में, क्यों इन्हें सदा मैं और मेरी ही फ़िक्र लगी रहती है?’
उसने देखा सभी एक-दूसरे से रूठे, अपनी-अपनी मनमानी कर रहे थे।

अगले पल ही ईश्वर हँस पड़ा अपने बच्चों की नादानी पर।

तुरंत सभी को गोदी में समेटा और बोला- ‘ शांत मेरे बच्चों, शांत। तुम सभी की अपनी-अपनी योग्यता हैं और उसी हिसाब और ज़िम्मेदारी से अपने-अपने काम भी दिए हैं मैंने।
एक दूसरे के सहारे ही चलती है दुनिया और तभी खूबसूरत भी रह पाती है।
फल-फूल रही है।

जरा सोचो, अगर पर्वत यूँ ऊपर न उठते तो सागर पाताल में न धँस जाते अपने ही जल भंडार के एकत्रित और असह्य भार से। बादल पानी न बरसाते तो पर्वत तुम इतने ऊँचे होते चले जाते कि खड़ा रहना तक मुश्किल हो जाता, पूरे ही लुढ़क जाते कभी भी अपना संतुलन खोकर। और बादल अगर पवन तुम्हें सैर न कराता तो तुम सागर तक कैसे पहुँचते, जल-क्रीडा कैसे कर पाते अपना रीता अस्तित्व वापस भरने को। और पवन अगर तुम बस अपनी बगिया में ही रमे रह जाते तो सारी यह दुनिया जी तक नहीं पाती। तुम ही तो इस संसार की प्राण वायु। उन कीट-पतंगों की भी जिनके सहारे सुंदर बगिया फलती-फूलती है।

पूरा खुश तो कोई नहीं कभी। सभी को असंतोष है, क्योंकि सबको दूसरे की ज़िन्दगी से ईर्षा है। पर सभी को एक-दूसरे की जरूरत हैं। फिर कहूँगा, यह दुनिया चलती ही है एक दूसरे के सहारे और सहयोग से। क्योंकि एक ही व्यक्ति सब कुछ नहीं कर सकता। फिर कहूँगा मैं कि सभी की अपनी योग्यता हैं और उसी हिसाब से अपने-अपने काम भी।

शांत थे अब सभी। खुश थे अब सभी । और उनके साथ-साथ उनका ईश्वर भी।

सागर की लहरें फिर वैसे ही वापस खुश-खुश अठखेलियाँ कर रही थीं अब और पर्वतों की धूप में चमकती चोटियाँ भी वैसे ही पर्यटकों का मन लुभा रही थीं। बादल भी खूब रिमझिम-रिमझिम बरस कर चारों तरफ़ हरियाली फैला रहे थे। और पवन के तो मानो पंख ही लग गए थे। कभी मन्थर तो कभी तेज़ गति से इधर-उधर दौड़ रहा था।

ईश्वर भी अब तो बहुत खुश था उन्हें देख-देखकर क्योंकि पशु-पक्षी, कीट-पतंगे, सभी प्राणी खुश-खुश अपना-अपना काम करते, अपना-अपना जीवन जीते चहक रहे थे -‘ कितनी खूबसूरत है हमारी दुनिया !’

-शैल अग्रवाल

सुबह

ढूँढते फिर रहे चंदा तारे
उड़ चली बादलों की टोली
कहाँ खो गई सुबह हमारी
ले गई क्या सांझ सुन्दरी
ओढ़े कर रात की चुनरी

सूरज भी जाने कहाँ पर खोया
आकाश बेचारा जी भरकर रोया
चिड़िया रानी जाओ ढूंढकर लाओ
तुम जाकर इसका पता लगाओ

डरते हैं हम सभी अंधेरे से
गुमसुम हैं फिक्र के मारे बेचारे
रात-रात भर हमें नींद ना आती
बढता घटता देखा जब हमने चंदा

फुनगी-फुनगी सुन फुदकी चिड़िया
चूँ चूँ करती उड़ी और लौट भी आई
मलयित सुरभीत सुबह उजेरी
पूरी ही जब चोंच में ले आई

आकाश की गोदी लाकर उसे बिठाया
किरणों से फिर रगड़ नहलाया
आकाश हँसा उसे तब गोदी में पाकर
खेला बिटिया के संग जी भरकर

खुश थे सभी बच्चे भी जागे अब सारे
खेलें खेल नए गावें नित-नित नए तराने ।

-शैल अग्रवाल

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