
‘हरि अनंत हरि कथा अनंता। कहहि सुनहि बहु विधि सब संता।’
तुलसी की हरिकथा इतनी बहुआयामी रोचक और प्रभावी है कि इसे संत सदियों से भांति -भांति से कहते और सुनते आए हैं और भारत ही नहीं पूरे विश्व में ही अनगिनत वाचन और मंचन करने वाले हैं इसके। मेरी ही नहीं, जाने कितनों की प्रेऱमा रही हैं गीता और रामायण इसका अनुमान घर-घर में इन दोनों किताबों की उपस्थिति से ही लगाया जा सकता है। राम का चरित, उनका मर्यादित आचरण और सर्वहिताय के भावों से भरा मन आज भी उन्हें भारतीय मानस में प्रेरक आदर्श ही नहीं, ईस्वर मानकर पूजता है। प्रचलित इस लोककथा में जैसे हाथी का वर्णन हो, जिसके हाथ में कान आया उसके लिए सूप बन गई यह और पैर आया तो एक खंबे सी दिखने लगी। भर्तस्ना नहीं. यह विषय की अपरिमितता का उदाहरण है और संत भी यहाँ बड़े-बड़े ज्ञानी-ध्यानी नहीं हमारे आपके-जैसे सरल व्यक्ति ही हैं, जिन्होंने निज मन मुकुर को साफ कर के श्रीराम के चरणों में मन लगाया है, भक्ति की इस कथा से सीखना चाहा है और आजतक सीख रहे हैं। साफ दर्पण में ही तो स्पष्ट छवि दिखती है और परिचय से ही तो भक्ति या विरक्ति आती है। फिर भक्ति तो जनमती ही प्रेम और विश्वास से है और प्रेम ही तो मन को निर्मलता और चरित्र को प्रबलता देता है। उन्होंने आगे कहा कि यह विवेक पर गुरु कृपा से ही आता है-‘श्री गुरु चरण सरोज रज निज मन मुकुर सुधार, वरनहु रघुबर बिमल जस जो दायक फल चार ‘। और राम कथा के प्रमुख चार फल हैं- स्व के साथ-साथ यह किताब हमें परिवार की, रिश्तों के निर्वहन और दायित्व की भी समझ देती है, विविध अपारा इस भव सागर में कमल की भांति कैसे बिना डूबे या निर्लिप्त होकर, सुख-दुख से परे होकर जीना सिखलाती है, और साथ-साथ संगठन की ताकत बतलाती है। बड़ों का सम्मान करना सिखलाती है। ईर्षा और दोष ही हर विकार की जननी है इसका भी प्रमाण हमें रावण के मदान्ध अहम् और कैकयी के त्रिया हट से समझ में आता है। संदर्भ इतने विविध और स्पष्ट हैं इन सभी श्वेत-श्याम चरित्रों के कि बिना कुछ कहे ही बहुत कुछ सिखा देती है रामायण पाठक और श्रोता को।
पर जाकी रही भावना जैसी प्रभु मूरत तिन देखी तैसी- की तर्ज पर कोई भी संदेश व्यक्ति विशेष की अपनी समझ और पात्रता पर ही तो निर्भर है।
तुलसी के राम सज्जन के मित्र और खल के नाशक हैं। वाल्मीक द्वारा लिखित रामायण के बाद तुलसी दास ने राम कथा को एक अभियान की तरह कर्तव्य-बद्ध होकर दुबारा लिखा था। यदि वाल्मीकि के राम आदर्श पुरुष थे तो तुलसी के राम ईश्वर के अवतार- सर्वज्ञ और अलौकिक रूप से समर्थ। मुगलों द्वारा शोषित, भ्रमित समाज को ईश-अवतार की जरूरत थी, जिसकी वह पूजा भी कर सके और जिनकी तरफ उत्कर्ष और आदर्श हेतु देख भी सके। चरित्र से अपने जीवन में मार्ग दर्शन ले सके। यही वजह है कि तुलसी की रामचरित मानस आज भी पवित्र पावनी गंगा-सी जनमानस की आस्था यानी उम्मीदें और अस्थियाँ यानी कि पूर्वजों की सोच व संस्कार दोनों को ही लिए हुए हमारे बीच पावन और पुनीत बह रही है सदियों से।
अतिशयोक्ति नहींं, यदि कहूँ कि भारतीय आदर्श और मूल्यों का प्रभावी वांग्मय है यह किताब। यह बात दूसरी है कि आज के इस भौतिकवादी युग में राम और श्रवण जैसे पुत्र, लक्ष्मण और भरत जैसे भाई, सीता और उर्मिला जैसी पत्नी, हनुमान और सुग्रीव जैसे सेवक और मित्र सभी कुछ एक दुर्लभ स्वप्न जैसा ही तो है।
तुलसी कवि तो थे ही जननायक भी। सुधारना चाहते थे वह भ्रमित और पराधीन भारतीय समाज को। इनके दुख और सांप्रदायिक भेदभाव ने विचलित कर रखा था उन्हें। सच ही तो है कि प्रेम की गलियों से गुजरकर ही रणभूमि तक पहुँचते हैं हम, रणनीति तैयार कर पाते हैं । बात जब अपनों की हो अपनों पर हो तो लड़ना ही पड़ता है। और उनकी इस रणनीति का ही नतीजा है शैव और वैष्णव की आपसी वैमनस्यता को दूर करता हरिहर का रूप। जहाँ हरि और महादेव दोनों ही एक दूसरे की पूजा करते हैं , एक- दूसरे के लिए श्रद्धेय हैं और एक दूसरे की पूजा करते हैं। एक दूसरे के बिना दोनों का ही काम संपूर्ण नहीं हो पाता।
तुलसी के राम सोलहवीं शताब्दी में उस समय अवतरित हुए, जब पुरानी मान्यताएँ और आस्थाएँ टूट रही थीं। चारोतरफ नए शाषकों की नई संस्कृति का नया और बेहद उथल-पुथलकारी माहौल था। पुराना न तो इतना पुराना ही था कि लोग इसे भूल पाते और ना ही नए से जनता इतनी अभ्यस्त ही हुई थी कि खोए का दुख महसूस न करे। हम प्रवासियों सी ही स्थिति रही होगी वह भी। आज इंगलैंड अमेरिका और गल्फ आदि विभिन्न देशों में बसे भारतीयों की तरह ही सोलहवीं शताब्दी भी विलासिता की फिसलन का काल था…जब सब कुछ प्रचुर मात्रा में उपलब्ध था, सिवाय आत्म-संतुष्टि के। भोग की यह संस्कृति कूच घास-सी तेजी-से अपनी जड़ें फैला रही थी और हमारी सिंची-सिंचाई शान्ति, त्याग व परोपकार की सनातन संस्कृति को निगलने को तैयार खड़ी थी। चारो तरफ बिखरी इस अराजकता और निराशा से घबराए तुलसी ने समाज को आशा और एक नई दिशा दी। वे जानते थे कि ऐसी किं-कर्तव्य-विमूढ़ मन:स्थिति में एक आदर्श और प्रेरणा-स्रोत्र की कितनी जरूरत है समाज को। एक नायक चाहिए ही था निराशा की गर्त में डूबी प्रजा को, जो उन्हें सही मार्ग दर्शन दे सके। दुख में संबल दे और साथ ही जिसकी भक्ति भी की जा सके। तुलसी ने समाज को मर्यादा पुरुषोत्तम राम देकर एक नया आत्म-बल, और परिष्कृत सोच देने की कोशिश की। बाहर से आई भौतिकता की संस्कृति के खिलाफ वैदिक जीवन पद्धति का एक सशक्त आदर्श और विकल्प उनके समक्ष रखा। हिन्दुत्व में पुन: गौरव जगाया। भारतीयों को उनके अपने सगुण भगवान दिए। “सबमें राम और सबमें राम” कहकर तुलसी ने राम को सर्वव्यापी बनाया और घर घर मे ला बिठाया। यही नहीं, कहा कि यदि – “ह्रदय राखि कोसलपुर राजा” काम करोगे तो विजय तुम्हारी ही होगी, संदेह व दुविधा की गुंजाइश नहीं । यह संदेश देकर देश के टूटे आत्म विश्वास पर मरहम लगाया तुलसी ने।
ग्रन्थ के आरम्भ में ही सरस्वती और गणेश की वन्दना के बाद तुलसीदास ” भवानी शंकरौ वन्दे श्रद्धा विश्वास रूपिणौ।“ कहकर पार्वती और शिव की वन्दना करते हैं जो कि क्रमश: श्रद्धा और विश्वास के प्रतीक हैं । तुलसी की आँख में विश्वास और श्रद्धा ही ऐसे वे दो गुण हैं जो विचार ही नहीं रिश्तों को भी मजबूत करते हैं। फिर जहाँ विश्वास हो, श्रद्धा खुद ही आ जाती है । इन दोनों से ही चित् स्थिर होकर अंतस् में बसे ईश्वरीय तत्व को देखता है। इनके मिलन से ही सर्व विघ्न विनाशी प्रेम या कल्याण का ‘ ‘श्रीगणेश’ है। पर लोक-धर्म और आध्यात्म को सामने रखकर भी मुख्यत: जीवन का सरस काव्य है रामायण। और यही वजह है कि सबको एक नए रास्ते पर डालते हुए, बिना जाने ही सबके दिलों में और घर-घर में बस गया। जो संसार के फंदे में फंसे थे उन्हें धर्म की तरफ खींचा और जो धर्म के चक्कर में वैराग ले चुके थे, उन्हें सांसारिक कर्तव्यों की याद दिलाई। और इस सारी उथल पुथल के बाद भी तुलसीदास बेहद विनम्र थे, उन्होंने लिखा, ” अर्थ अमित अति आखर थोड़े।”
तुलसी ने रामायण में लोक व्याप्त माया, काम और क्रोध के विनाशकारी प्रभाव की कम भर्तस्ना नहीं की है, फिर भी कबीर की तरह मुँहफट नही हुए तुलसी कभी। और राम के चरित्र-सा यह संयमित वर्णन है, मर्यादित विनय भाव है इस किताब का जो आजतक इसे एक प्रेरक और पठनीय किताब बनाए हुए है। पढ़ते हुए विचलित नहीं करती यह किताब कहीं भी अपितु हर परिस्थिति में शांत और स्थिति-प्रज्ञ रहने का ही संदेश देती है। और ज्ञान की लगन और इज्जत इतनी है कि मरते रावण के पास राम भाई लक्ष्मण को सीखने के लिए भेजते हैं।
इष्ट श्री राम का चरित्र तुलसीदास ने इस ढंग से पेश किया कि जो संदेश देश के आगे रखना चाहते थे, वह स्वयं ही प्रकट हो गया और यही वजह है कि बिना किसी रागद्वेष के गृहस्थ और विद्वान दोनों ने ही इस काव्यग्रंथ को भरपूर सम्मान दिया। भारत ही नहीं दक्षिणी-पूर्वी एशिया तक के करीब करीब सभी देशों में थोड़े बहुत बदलाव के साथ रामायण विभिन्न नामों से प्रचलित है और आज भी जीवित है। प्रभाव इतना कि रामकथा जहाँ भी गयी, वहीं की हवा-पानी में घुल-मिल गयी। रामकथा पर आधारित जितनी मौलिक कृतियों का सृजन हुआ है, संसार के किसी भी अन्य कथा को यह सौभाग्य प्राप्त नहीं। कहीं इसे बौद्ध जातकों के सांचे में ढाला गया, तो कहीं इस्लामीकरण तक हुआ। और राम चरित वहाँ के प्राकृतिक परिवेश, सामाजिक संदर्भ और सांस्कृतिक आदर्शों के अनुरुप ढलता-सँवरता चला गया। परन्तु अनगिनत इन परिवर्तनों के बीच भी न सिर्फ मौलिक कथा जीवित रही, अपितु होमर की ओडेसी या इलियाड व अन्य धर्मग्रन्थों के कुरान और बाइबल के समकक्ष मान्यता प्राप्त की ।
हिन्दुओं में तो राम नाम मुक्ति का ही पर्याय है । दुख या आपदा का वक्त हो या भ्रम का, शक्ति के लिए भारतीय परिवारों में आज भी रामायण ही निकलती है। अखंड पाठ होते हैं इसके। रामनाम के सहारे दुखों के सागर ही नहीं, भवसागर तक को पार कर पाएंगे, ऐसी अटूट जन-धारणा है आज भी। सुनते हैं जब भारतीयों को फिज़ी, मौरिशस और अन्य देशों में बन्धुआ मज़दूर की तरह ले जाया जा रहा था तो वे उस अनजान और असुरक्षित यात्रा पर मात्र रामायण और हनुमान चालीसा के सहारे ही चल पड़े थे। यह अकेली किताबें ही हर विपदा में उनकी गुरु और कवच थी। भारतीय संस्कृति में जो कुछ जानने या बचाने लायक है, उसका सार थी। राम और हनुमान कितने भारतीय परिवार और व्यक्ति विशेश के संबल बने हैं, इसका सही मापदंड मेरी तुच्छ लेखनी के लिए स्वयं उस परम शक्ति के वर्णन जैसा ही दुरूह है। परन्तु इतना अवश्य जानती हूँ कि आज भी जुबाँ-जुबाँ पर राम मौजूद है। जन-जीवन की संजीवनी रामकथा ” सुरधेनु समाना” है और सोच-समझकर अपनाओ तो” दायक अभिमत फल कल्याणा” भी है। आज जब पुराने वस्त्रों-से तारतार परिवार और देश को त्याज्य समझकर, युवा चारो-तरफ मनमाफिक मौसमी उड़ान ले रहे हैं, सनातन मूल्यों में आस्था और विश्वास खो चुके हैं, तो क्या जरूरी नहीं कि ये त्याग और शौर्य की गाथाएँ पुनः पुनः दोहराई जाएँ…ताकि चरित्र दृढ़ हो सकें। कल और आज के खोए आत्मबल और आत्मसम्मान को वापस लाने की कम से कम एक ईमानदार कोशिश तो की ही जानी चाहिए!
राम का न्याय , राम का त्याग, राम की प्रतिबद्धता, राम का शौर्य और समर्थता हर गुण प्रभावित करता है, परन्तु सर्वाधिक आकर्षित करती है राम की परिवार और परिवेश के प्रति समर्पण और जागरुकता की भावना और परहित संरक्षण की अडिग भावना। आज जब अधिकांशत: समाज ” दिस इज माई लाइफ” के मूलमंत्र पर चलता है और” आइ लिव्ड इट माइ वे ” की जीवन शैली पर ही पूर्णतः गौरवान्वित है तो रामकथा निश्चय ही भारत और भारत से दूर बैठे भारत वंशियों के लिए भी प्रेरणा स्रोत्र बन सकती है अगर इसे ठीक से समझ-समझकर पढ़ा जाए।
राम न सिर्फ प्यार और त्याग करना सिखलाते हैं वरन् सामाजिक जिम्मेदारियों का भी अनूठा बोध देते हैं। आज जब बूढ़े माँ बाप को मैले पुरानों कपड़ों की तरह निढाल छोड़कर युवा पीढ़ी बिना किसी ग्लानि या सोच के आगे बढ़ जाती है तो वचनों की रक्षा के लिए बन बन भटकते पुत्र की कल्पना किसी भी पिता के लिए एक दुरूह स्वप्न-सी ही अकल्पनीय है। श्रवण कुमार तो सुपर मैन की तरह पूरे ही काल्पनिक लगते हैं। जन्मभूमि भी अन्य भूमिओं की तरह मात्र मिट्टी का ढेला है जिसे चन्द सिक्कों के लिए कभी भी त्यागा या बेचा जा सकता है, तो क्या जरूरत नहीं कि एकबार फिरसे वे गौरव गाथाएं दोहराई जाएँ जो ” जननी जन्मभूमि स्वर्गातपि गरीयसी” का बोध कराती हैं। जब धोखा और झूठ ही अधिकांश रिश्तों का तानाबाना है और परिवार ताश के पत्ते से ढहते दिख रहे हैं, पलपल तलाक हो रहे हैं, तो इस फिसलन और टूटन को रोकने के लिए क्या एकबार फिर ईमानदारी और प्रतिबद्धता, सामंजस्स्य और त्याग की प्रतिमूर्ति सीता की नारी रूप में समाज को जरूरत है, उर्मिला के त्याग और भक्ति की जरूरत है ।
अक्षर जो अ-क्षर हैं, भगवान से ही सशक्त और शाश्वत हैं, इसलिए खूब सोच-समझकर ही इनका इस्तेमाल करना चाहिए । ” प्राण जाए पर वचन न जाई” कहा तुलसी ने, वह भी तब जब मुगल राजाओं के विलासी दरबारों में सब अपनी ढपली अपनी राग गा रहे थे। तुलसी के रघुवंशी राजा मितभाषी थे। उनके लिए “टॉक वाज नौट चीप।” अविवेकी वचन बन्दी बनाकर रख सकते हैं, साख मिटा देते हैं, दूसरों की आँख में ही नहीं, खुद अपनी में भी। दशरथ-कैकयी प्रसंग गवाह है । सदियाँ जरूर बदल गईं पर मानव स्वभाव व समाज, उसका व्यवहार आज भी वही है। आत्म अवलोकन और सर्वांगणीय सुधार के लिए बहुत कुछ सीखा व जाना जा सकता है रामायण से। जीने की सहज और आदर्श प्रणाली देती है रामायण। असल में वेदों में जिन चरित्र संहिताओं का वर्णन किया गया है वे सभी सकारात्मक और विश्वसनीय गुण तुलसी के राम में हैं। अविस्मरणीय और विश्वसनीय बात यह भी है कि राम हमारे अपने राम तो हैं ही, हमारे हर आदर्श और प्रतिमानो के मानक भी हैं। अलौकिक होकर भी तुलसी के राम का यही मानवीय पक्ष है, जो छूता और बाँधता है । कहानी को रोचक और विश्वसनीय बनाता है। वे भी हमारी तरह ही रिश्तों में बंधे है और रिश्तों की मर्यादा के भीतर ही रहकर जीते हैं। पिता, पुत्र और पति हैं, कई बार कर्तव्य के दुरूह चौराहे पर लाकर खड़ा किया है जीवन ने इन्हें भी। बस हमारी तरह कमजोर या कायर नहीं । टूटे नहीं । ‘सत्यं भूतहितं प्रोक्तम्’। यानी सच और जन कल्याण के लिए ही जन्मे थे राम, जिन्होंने अपार कष्ट तो सहे पर जनहित के आगे निजी स्वार्थ को कोई महत्व नहीं दिया। रामायण के सभी पात्र परोक्ष या अपरोक्ष रूप से लोक मंगलकारी मूल्यों की ही प्रतिष्ठा करते हैं। दैनिक आचार-संहिता से लेकर राजनीति और समाजशास्त्र तक की समझ इसमें. कई आधुनिक समस्याओं का समाधान है।
राजा राम कहते हैं कि ” परहित सरिस धरम नहि भाई, परपीड़ा सम नहिं अधमाई।” वहीं खर और कुटिलों से दूर रहने को सीख भी है रामायण में। हरेक के अन्दर छुपे ईश्वरीय तत्व यानी गुणों को पहचानकर प्रणाम करना सिखलाती है हमें रामायण ।
” सिया राममय सब जगजानी, करहु प्रणाम जोरि जुग पानी।”
फिर कौन अधम, पराया, या नफरत करने योग्य ?
तुलसी ने दिखाया कैसे आजभी स्नेह और सच्चा सेवाभाव निर्बल और नासमझ कपि को भी बजरंग बली बना सकता है और विनय की चमड़ी में न हो तो अहंकार बड़े से बड़े ज्ञानी को भी दसों मुँह से बुलवाता है और अंततः पतन की ओर ही ले जाता है।
मराठी कवियत्री विंदा करंदीकर के शब्दों में कहूं, तो शायद कुछ और विशेष कहने की जरूरत ही नहीं रह जाती;
“क्या सिखलाता है रामायण?
रामचंद्र जी जैसा हो नायक
तो बंदर भी मार सकेगा रावण।”
एक आदर्श राजा, आदर्श पिता थे मर्यादा पुरुषोत्तम राम। उनका चरित्र आज भी अनुकरणीय है और रामराज्य की कल्पना आज भी एक स्वप्न, जिसमें कोई भेदभाव नहीं । क्लेश की तो गुंजाइश ही नहीं, निष्कासन और नवास में भी नहीं।…

शैल अग्रवाल
संपर्क सूत्रः shailagrawal@hotmail.com
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