प्रेरक संस्मरणः रश्मि खुराना, बलराम अग्रवाल, राधा जनार्दन


एक फूल था……….

कौन प्रूफ पढ़ने में, लाने ले जाने में समय नष्ट करे, इसलिए मैं प्रिंटर के पास बैठ कर ही अपने कहानी-संग्रह को अंतिम रूप दे रही थी।

काफी समय से लटक रहा था किताब छपवाने का यह काम। मेरा बेटा अंकुर अब कंप्यूटर क्लासेज के अतिरिक्त एक टीम बनाकर प्रिंटिंग पब्लिशिंग का काम भी कर रहा था।आर्डर लेना ,कवर डिज़ाइन करना, टाइप करवाना, प्रिंट करना…सभी मित्रो ने अपना अपना काम बाँट रखा था।

“ लाओ न आंटी जी आपकी किताब भी छाप देते हैँ “ बड़े प्यार से उसी टीम में से एक सदस्य वरिंदर कपूर बार बार कहते। मेरा यह रिटायरमेंट का साल था। इससे पहले मैंने लिखा तो बहुत, छपा भी पत्र -पत्रिकाओं में किन्तु किताब छपवाने की योजना अब तक न थी। कारण था मेरा संकोच और भय। कहीं कोई आक्षेप न लगा दे कि अपनी सीट का फायदा उठाते हुए मैंने किसी पब्लिशर से लाभ उठाया।

अब जाकर मैं सोचने लगी थी कि बेटा तो पुस्तक प्रकाशन का कार्य करने लगा है तो सद्यप्रकाशित ही कर लेती हूँ अपना कहानी-संग्रह।

इस तरह “सुरभि “ मेरे पहले कहानी- संग्रह की शुरुआत हुई। कहानियाँ तैयार थीं। मैं छुट्टी वाले दिन फोन करके वरिंदर की प्रेस पर जाती। साथ ही बैठ कर कंप्यूटर पर टाइप करवाती। हाथ के हाथ प्रूफ रीडिंग कर देती. गलतियां ठीक करवा देती। धीमी गति से ही सही पर काम पूरा हो गया था।

उस दिन 17 मार्च 2013 थी. इतवार का दिन. सोचा आज जितना समय हो सके लगा कर बिलकुल फाइनल कर दूँगी किताब। कहानियां,भूमिका, लेखक के दो शब्द सब प्रूफ चेक हो चुके थे।

वरिंदर ने कहा “अब केवल आपका बायोडाटा रह गया है। वो आप घर से भेज देना।आंटी जी आप प्रिंटिंग का आर्डर भी दे दो “

“बस आर्डर दे दिया गया समझो। बायोडाटा मैं आपको मेल कर दूँगी “ सबको धन्यवाद, आशीर्वाद प्यार देकर मैं खड़ी हो गयी। मैं जितनी देर वहाँ बैठती, सब बच्चे, वे नौजवान थे पर मेरे लिए तो बच्चे ही थे, बड़े अच्छे मूड में रहते क्योंकि आंटी उन्हें पकौड़े समोसे मंगवाकर खिलाती रहती।

अचानक वरिंदर ने कहा “अरे आंटी जी, समर्पण का पृष्ठ तो रह ही गया। आपने किया नहीं समर्पण किसी को? “

सच में रह गया था क्योंकि मेरा मन नहीं हो रहा था। समर्पण को लेकर कुछ अनमनी हो रही थी मैं..

“छोड़ो, समर्पण ज़रूरी है क्या? ऐसे ही चलने दो बिना समर्पण के..”शाम हो गयी थी, मैं थक भी बहुत गयी थी, कुछ सोचने की क्षमता भी बाकी न थी। मैं घर वापिस आ गयी।

अचानक वरिंदर ने कहा “अरे आंटी जी, समर्पण का पृष्ठ तो रह ही गया। आपने किया नहीं समर्पण किसी को? “
सच में रह गया था क्योंकि मेरा मन नहीं हो रहा था। समर्पण को लेकर कुछ अनमनी हो रही थी मैं..
“छोड़ो, समर्पण ज़रूरी है क्या? ऐसे ही चलने दो बिना समर्पण के..”शाम हो गयी थी, मैं थक भी बहुत गयी थी, कुछ सोचने की क्षमता भी बाकी न थी। मैं घर वापिस आ गयी।
अगले दिन रूटीन की दिनचर्या शुरू हो गयी थी।
सुबह मैं अपने ऑफिस और अंकुर अपने कंप्यूटर सेंटर।
दफ्तर के काम में किताब की किसे याद रहती।
देर शाम हम घर लौटे।बहू मायके गई हुई थी, इसलिए रात को बेटे के साथ भोजन के बाद मैंने कहा “ बेटा,बहू बच्चे तो गए हुए हैँ, आज हमारे पास ही सो जाओ “
बेटा बहू ऊपर की मंज़िल पर रहते थे।
“मम्मा बहुत थका हुआ हूँ अपने बिस्तर पर ही नींद आएगी “अंकुर ने पैरी–पौना करते हुए कहा।
वह रात तो कहर की रात बन गई। मेरी हमारे जीवन की तो कहानी ही बदल गई।
अंकुर की निद्रा चिर निद्रा बन जाएगी ऐसा दुर्भाग्य तो कभी सोचा न था।रात को पता नहीं कब, क्या, कैसे हुआ -कि सुबह देखा हमारी दुनिया लुट चुकी थी. “अंकुर –अंकुर.. अंकुर नहीं उठा अंकुर। सदा सदा के लिए रूठ वो न जाने किस दुनिया में चला गया था ..।
दोनों बेटियाँ इंग्लैंड से रोती बिलखती पहुंचीं । चोट पर चोट यह कि बहु ने भी अपना बिस्तर बच्चों समेत पीहर लौट जाने के लिए बाँध लिया। बहुत चाहा पर कुछ न कर सके हम। बस खड़े खड़े अपना लुटता चमन देखते रहे ।
बेटियाँ भी बीस दिन रह कर लौट गईं।
आहत तन-मन के साथ फिर अपने दफ्तर आकाशवाणी जाना शुरू किया। अभी सेवानिवृत्ति में चार माह शेष थे। दोनों बेटियाँ परेशान थीं कि पापा मम्मा दुःख में अकेले रह गए। दोनों बेटियों ने विचार बनाया कि माँ की रिटायरमेन्ट तक बारी बारी इंडिया आकर हमारे साथ रहेंगी।मेरे रिटायर होते ही हमें अपने साथ इंग्लैंड ले जाएंगी। उनके पापा तो पहले ही सेवानिवृत थे।
एक महीना अभी भी शेष था. कुछ काम कुछ घर समेट रहे थे तो अचानक किताब की याद आई…मैंने कनु बिटिया को उस अंतिम दिन का किस्सा सुनाया कि कैजे मैं किताब को फाइनल रूप दे रही थी।
“तो मम्मा वो कहानी संग्रह की किताब क्या प्रेस पर ही पड़ी है? वहाँ पड़ी रह जाएगी. और हम तो सब चले जायेंगे इंग्लैंड….उसे प्रिंट तो करवा लो “ कनु की बात अपनी जगह सही थी।पर मुझमें हिम्मत नहीं थी।
यह हिम्मत भी उसी ने की. वो प्रेस पर जाने लगी तो मैंने कहा “उसमें एक पृष्ठ अभी और जोड़ना है कनु ! “समर्पण का “!
समर्पण तैयार हो गया था……
“अपने प्यार के पहले अंकुर को ‘- बेबस माँ ‘
माँ आज भी बेबस है अंकुर.
दुआ करती है माँ तुम जहाँ भी हो खुश रहो!!!

डॉ रश्मि खुराना
लेस्टर, यू.के.

पिताजी ने कहा था

पिताजी शरीर से पूरी तरह रुग्ण हो गये थे। इतने कि चल-फिर भी नहीं सकते थे। गोद में उठाकर उन्हें जहाँ बैठा दिया जाता–बैठे रहते। जहाँ लिटा दिया जाता–लेटे रहते। इधर से उधर और उधर से इधर करने के लिए सतीश कभी उन्हें गोद में उठाता था तो कभी पीठ पर।

“मेरा यह जीवन सफल हुआ पिताजी।” एक दिन वह उनसे बोला।

“किस तरह बेटे।” उन्होंने पूछा।

“आपकी सेवा का मौक़ा पाकर।” वह बोला।

“यानी कि तेरा जीवन सफल होने के लिए मेरा अपाहिज और असहाय बन जाना जरूरी था।” वह सहज परन्तु ढले से स्वर में बोले।

“मेरा यह मतलब नहीं था पिताजी।” उनके इस आकलन पर सतीश ने शर्मिन्दगी के साथ कहा।

पिताजी कुछ देर चुप रहे, फिर बोले, “सफल या असफल जीवन नहीं जीवन-दृष्टि होती है बेटे। यह सब, जो तू कर रहा है, एक रोगी की तीमारदारी से ज़्यादा और कुछ नहीं है। यह सब तो पैसे लेकर अस्पताल की नर्से भी कर ही देती हैं।”

सतीश उनकी बातें सुनता रहा। उसके कहने का मतलब वैसा कुछ नहीं था, जैसा कि पिताजी ने समझा था। लेकिन पिताजी जो कह रहे थे, वह भी बहुत सही बात थी।

“तू कह सकता है कि नर्सों सेवा कर सकती हैं। अपनापन भी जता सकती हैं। लेकिन वे वह सन्तोष नहीं दे सकतीं, जो आदमी को अपने परिवारजनों या मित्रों की सेवा पाकर मिलता है।” पिताजी बात को स्पष्ट करते हुए बोले, “सच न होते हुए भी यह बात सच जैसी लगती है क्योंकि अपने जीवन-स्तर और सोच को हमने इससे ऊपर उठने ही नहीं दिया है।”

पिताजी उसके चेहरे पर नज़रें गड़ाकर यह सब कह रहे थे। सतीश ध्यान से उनका दर्शन सुनता रहा। इससे पहले इतना करीब होकर तो उन्होंने उससे कुछ कहा भी नहीं था।

“तू समझ रहा है न मेरी बात?” उसे गुमसुम देखकर पिताजी ने पूछा।

“जी पिताजी, पूरी तरह।” वह बोला।

“सेवा अलग तरह का धर्म है बेटे और पिछली पीढ़ी के अधूरे छूट गये कामों को आगे बढ़ाते रहना अलग तरह का।” आश्वस्त होकर पिताजी ने कहा, “अगर तूने वाकई मेरी बात समझ ली है तो मेरे बाद उस दूसरे तरह के धर्म को निभाने की कोशिश में लगे रहना।”

इसके बाद कुछ और नहीं बोल पाये थे वो। शायद जरूरत ही न समझी हो।

बलराम अग्रवाल
सम्पर्क : एफ-1703, आर जी रेजीडेंसी, सेक्टर 120, नोएडा-201301 (उत्तर प्रदेश, भारत)
मोबाइल : 8826499115

श्याम- श्वेत

आज नीला को एपेक्स हस्पताल में डॉक्टर से मिलने जाना है। परेशान हो रही है वह। नौकरानी पारो का ऑपरेशन हुआ है। वह डॉक्टर से स्वयं मिलकर बात करना चाहती है। जब पारो का हार्ट अटैक हुआ वह स्वयं पैरों की आयुर्वेदिक चिकित्सा कराने केरल गई हुई थी। बीच में लौटना मुमकिन न था। उसने पारो की इलाज का खर्च उठाया पर डरती है कि इस दरिया दिली का फ़ायदा कोई और बंदा न उठा रहा हो।बहुत अमीर तो नहीं है नीला पर स्नेह, धर्म-बुद्धि, पुण्य, ज़िम्मेदारी आदि कई-कई बातों ने उसे इस खर्च को उठाने का आदेश दे दिया।लेकिन… जब डॉक्टर के नाम का पता चला तो दंग रह गई। डॉक्टर सक्सेना! वही नाम जिससे उसे चिढ़, घबराहट या यों कहिए परहेज़ हो गया था! इसी डॉक्टर के तहत तो उसके पति विश्वनाथ भी थे। डॉक्टर, दिल के दौरे के मरीज़ उसके पति को बचा न पाये थे। सब कुछ अचानक, दस दिनों में ख़त्म हो गया।मधुमेह और दिल का दौरा- जानलेवा कॉम्बिनेशन। डॉक्टर ने जड़ तल्ख़ी से कहा था ,‘ आप क्या समझती हैं मिसेज़ विश्वनाथ, डायबिटीज़ हो, दिल कमजोर हो और किडनी जवाब न दे… हो सकता है क्या? खाने-पीने में तो कम से कम डिसिप्लिन हो, बढ़ती उम्र का भी कोई लिहाज़ नहीं?’
नीला के कानों में उनकी बात गरम लावा की तरह पड़ी थी जब कि डॉक्टर शायद अपनी शुभाकांक्षी चिंता जाहिर कर रहे थे। नीला का चेहरा अपमान से काला पड गया था। कई बार उसने डाक्टर को फ़ोन किया कुछ कहने और पूछने केलिये पर वे मिले नहीं। इसके बाद वह पति की मृत्यु के हादसे से उभरने और हालात से निपटने में व्यस्त हो गई। कचरे की तरह मन में डॉक्टर के प्रति नाराज़गी हर बार जमा होती गई, इतनी कि हस्पताल की तरफ़ से जाने वाली सड़क भी उसने लेनी छोड़ दी। मन मानता ही नहीं था!
उसी डॉक्टर से आज फिर मिलना होगा। मुँह कसैला हो गया। धुआँ छाने लगा। एपॉइंटमेंट ले चुकी थे पर ओपीडी में भीड़ थी, देर हो गई। सोचती रही क्या कहेगी मिलने पर! भीतर घुसी तो डॉक्टर सिर उठाये, मुस्कुराए—- अरे! ये तो कोई युवा, हँसमुख डॉक्टर बैठा है। बोला— वाह, मैम, आपकी पेशेंट तो तारीफ़ के काबिल है, बिलकुल ठीक है , पेसमेकर के बाद। चिंता की कोई बात नहीं। ” नीला ने अचकचाहट छिपाते हुए आगे की एहतियात के सारे सवाल पूछे और बाहर निकलकर नेम प्लेट देखा… डॉक्टर अनमोल सक्सेना! शायद उसी डॉक्टर धीरज सक्सेना के बेटे हों। अच्छा….!
बोझ कम हुआ। क्यों,पता नहीं! विश्लेषण की ज़रूरत नहीं महसूस हुई।
जीवन को विषैला करती नकारात्मक स्मृतियों को हटाने के लिए शायद एक सकारात्मक प्रयास काफ़ी होता है ।

राधा जनार्दन

तिरुवन्तपुरम, केरल, भारत

 

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