
पांच लघुकथा
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पूर्णिमा शर्मा
सांताक्रुज, मुम्बई
लघुकथा-१
गणना
पंडित रामकिशोर पौ फटने ही उठ, नित्यकर्म से निबट घर में विराजमान लड्डू गोपाल की पूजा की पूजा करते।हड़बड़ी में जो पंडिताइन बना देतीं पेट में डाल काली के मंदिर में पहुंच पूजा-अर्चना करते।सारे दिन भक्तों के लिए पट खोलने बन्द करने से लेकर चढ़ावे चढ़ाने,मंत्र पढ़ने,के साथ साथ भक्तों को पंक्ति में आने की जुहार लगाते,रात्रि में शयन आरती के बाद पट बन्द कर,ताला लगाकर घर आते आते ग्यारह साढ़े ग्यारह बजे जाते।हाथ आते कुछ फल,नारियल,बताशे,मिठाई के अलावा चंद सिक्के और थोड़े रुपये जो साथ रखे सहायक के साथ बंट जाते।किसी तरह घर की गाड़ी चल रही थी लेकिन जवान होती बेटी की शादी की चिंता खाये जा रही थी।घर पहुंचे, हाथ मुँह धोकर भोजन के लिए बैठे ही थे कि
“बिटिया की शादी की तारीख सोची क्या,लड़के वालों का फोन आया था ? ” पंडिताइन ने पति से पूछा !
“हाँ गणना कर ली है,लगते अगहन की पंचमी,बता देना उनको “कह कर पंडित जी बुदबुदाने लगे…
“पंद्रह दिन कनागत के,नौ दिन नवरात्रि के फिर दीपावली पूजन के पांच दिन और देवठान एकादशी तक तो जजमानों से शादी करने लायक दक्षिणा,कपडे-लत्ते ,बर्तन सब जुट ही जायेगा। ……. इस बीच किसी की तेरहवीं हो गयी, तो चांदी ही चांदी है।”
***
लघुकथा-२
बंधन
मनु ने अश्रुपूरित नयनों से खुद के लिखे पत्र को दुबारा पढ़ा और पलंग की साईड-टेबल पर पेपरवेट से दबा कर रख दिया जिससे रवि की कमरे में घुसते ही उस पर नज़र पड़े ।आज दृण संकल्प किया था..”नहीं रहना अब इस घर में जहाँ ना उसे इज़्ज़त मिले और ना प्यार “।बैग में चार जोड़ी कपडे,दवा और दवाई का परचा,अपना चश्मा और कुछ पैसे रखे,ए. टी एम कार्ड था ही।ठीक साढ़े चार बजे निकल लेगी जिस से मुन्ने और सासु माँ को ज्यादा देर अकेले ना रहना पड़े।
घडी पर नज़र डाली तो दो बजे थे,याद आया आज बाई छुट्टी पर है तो खाना तो बना ही लूँ सोच जल्दी खाना बना कैसरोल में डाला अब बस मुन्ने का दूध बना,नेपी बदल उसे बोतल पकड़ा,माँ जी को भरपूर नज़र से देख दहलीज़ से कदम बाहर रखने जा ही रही थी कि कदम चुंबकीय शक्ति से दहलीज़ से जम गए …. मुन्ना चीख कर रो रहा था,शायद पलंग से गिर पड़ा था।
***
लघुकथा-३
बेबी स्टेप्स
कोरोना के कारण चेकअप बराबर टल रहा था।
जब इस माह संक्रमितों की संख्या कम हुई तो डॉक्टर ने कहा कि अब पूरा चेकअप करवा लें। जब पिछले हफ्ते लैब में जांच करवाई थी तो स्ट्रेस टेस्ट में रक्तदाब काफ़ी बढा हुआ निकला जिससे डॉक्टर को हृदय में ब्लॉकेज संदेह हुआ था।
ब्लॉकेज का सुनते ही मेरे तो हाथ पैर फूल गए थे लगा की बस अब तो ऑपरेशन करवाने को कहा ही जायेगा।
मेरे इस डर के पीछे एक वजह थी चाहे तो इसे इत्तेफाक या संयोग का नाम दिया जा सकता है लेकिन परिवार में आज तक जो भी अस्पताल में भर्ती हुआ है तो वापिस उसका ‘शव’ ही आया है कोई भी जीवित नहीं लौटा।
माँ,दीदी,भैया और मेरे पतिदेव भी अस्पताल जाकर जिंदा वापिस लौट कर नहीं आये।
अब अगर हार्ट सर्जरी के लिए मैं गयी तो…मैं भी…? इस प्रश्नवाचक चिन्ह के मन में उभरते ही जाने कितने अधूरे छूटे काम याद आने लगे।
सबसे जरूरी तो बेटे की शादी करवानी अभी रही हुई है।
माँ के बिना कैसे होगी उसकी शादी? चलो!…कोर्ट मैरिज कर भी लेगा लेकिन तब तक अकेला कैसे रहेगा? कोरोना के कारण किसी मित्र का आना-जाना भी बंद है।
पिता की मृत्यु पर कितना टूट गया था… मुस्कुराना जैसे भूल ही गया था और अब माँ का जाना भी…!
एंजियोग्राफी के लिए कैथलैब में अपनी बारी आने का इंतजार करती मैं फिर चिंताओं के चक्रव्यूह में खुद को फंसा महसूस करने लगी।
“अभी तो दोनों बेटों के नाम वसीयत भी नहीं कर सकी हूँ… मेरे बाद मकान और लॉकर को लेकर झगड़े ना हों…हे भगवान! थोड़ा-सा समय और दे देते या कोरोना नहीं होने देते…या फिर यह ब्लॉकेज…कम से क… उफ! मैं क्या करूँ?” विचार श्रृंखला मेरे मनमस्तिष्क पर अपना शिकंजा कसती ही जा रही थी कि…
अपने नाम की पुकार ने वह श्रृंखला टूट गई।
नर्स ने ऑक्सीमीटर लगाया तो रक्तदाब एवं पल्सरेट बढ़ा हुआ दिखा।नर्स ने दवा देकर बाहर बैठने को कहा और शांत रहने की हिदायत दी।
मेरी हालत थोड़ी ठीक होने पर सी टी स्कैन के लिए ले जाया गया लेकिन मशीन के अंदर जाते ही मैंने अपनी सांसो पर नियंत्रण खो दिया। डॉक्टर और नर्स इससे उपजी स्थिति से परेशान हो गए। परेशान! तो मैं खुद भी थी लेकिन असहाय थी।
बाहर मरीजों की लाइन बढ़ती ही जा रही थी।
आखिरकार डॉक्टर ने मुझे दूसरे दिन आने की सलाह दी। तभी बेटे ने अंदर आकर मुस्कुराकर कहा,” मम्मी!…मैं यहीं खड़ा हूँ। आपको कुछ नहीं होगा।अपने ईष्ट देव का ध्यान कीजिये सब ठीक होगा।” बेटे की विश्वास भरी मुस्कुराहट और युक्ति काम कर गयी और उसने मेरे आत्मविश्वास को ठीक वैसे संभाल लिया जैसे मैं संभाल लेती थी उसे बचपन में…!!

पाँच लघुकथा

रेणु गुप्ता
लघुकथा-१
शस्य श्यामला
अबीर न्यूयॉर्क में अपने होटल के बाहर वहाँ के प्रसिद्ध टाइम्स स्क्वैयर घूमने जाने के लिए किसी कैब की तलाश में खड़ा था, तभी उसे सामने से गुज़रती टैक्सी ड्राइव करते एक सरदार जी दिखे। इस पराई धरती पर उस नितांत अजनबी को देख उसका चेहरा खिल उठा और वह बुदबुदाया, “चलो इतने दिनों बाद कोई तो हमवतन मिला, जिससे मैं अपनी भाषा में बातचीत कर पाऊंगा।”
उसने सरदार जी को रोक कर कहा, “सरदार जी! टाइम्स स्क्वैयर चलना है।”
“अपनी ही गड्डी समझो जी! चलो बैठो आराम से!”
गाड़ी में प्रवेश करते ही हवा में तैरती एक सौंधी सी महक उसके नथुनों से टकराई और तभी उसकी नज़रें सामने डैशबोर्ड पर पड़ीं। वह उत्कट उत्सुकता से भर उठा।
वहाँ एक छोटा सा गमला रखा था और उसमें चटक सब्ज़ नन्हे-नन्हे पौधे लहरा रहे थे।
“अरे सरदार जी, ये जंगल में मंगल कैसे कर रखा है आपने? क्या उगा रखा है आपने इस गमले में?”
“किसान का बेटा हूँ जी! यूँ समझो, हरे-भरे खेतों में ही आँखें खोलीं मैंने। आते वक़्त थोड़ी सी अपने देश की मिट्टी किसी तरह छिपा कर ले आया था। उसे ही यहाँ की मिट्टी में मिला कर ये मक्का उगा रखा है जी मैंने। जब भी वतन की याद सताती है, अपनी इस पुरसुकून दुनिया को नज़र भर कर देख लेता हूँ। दिल को बेहद करार मिल जाता है।”
टाइम्स स्क्वैयर आ पहुँचा था। अबीर ने एक बार फिर सरदार जी के उस हरियाले सपने पर निगाह डाली। उसे भी उसमें अपनी शस्य श्यामला भूमि की प्रतिच्छाया दिखी।
उसे देख इस बेगाने मुल्क में न जाने क्यूँ उसका गला भर सा आया।
उसने उस गमले की मिट्टी से तिलक लगाते हुए नम आँखों से सरदारजी से विदा ली।
***
लघुकथा-२
पुरसुकून
मेजर सत्यम जिस फ़ौजी कंपनी के चीफ़ थे, उसके शिविरों पर मुँह अँधेरे अचानक आतंकवादी हमला हुआ।
वह कैंपों के संकरे प्रवेश स्थल के थोड़े पीछे डटे हुए काउंटर अटैक को निर्देशित कर रहे थे। उनके अनेक सहकर्मी देखते-देखते तंबुओं के कॉरीडोर नुमा प्रवेश मार्ग के अगले मोर्चे पर शहीद हो चुके थे।
आतंकवादियों की ओर से धुआँधार गोलीबारी निरंतर जारी थी। तभी उन्होंने देखा, उसी मोर्चे पर उनकी कंपनी के सबसे सीनियर साथी भी आतंकवादियों की गोली छाती पर खा कर गिर पड़े थे। उनकी जगह लेने के लिए सबके चहेते युवा कैप्टेन देवांश वहाँ आने ही वाले थे।
उन का दिल धक से रह गया।
संतानहीन मेजर सत्यम ने कैप्टेन देवांश को सदैव पुत्रवत स्नेह किया था। उसमें उन्हें अपनी अजन्मी संतान की छाया नज़र आती। उस को उस जोखिमपूर्ण मोर्चे की ओर बढ़ते देख उसकी देवकन्या सी साँवली-सलोनी पत्नी का भोला-भाला मुखड़ा उनके मानस चक्षुओं के समक्ष जीवंत हो उठा।
उन्हें लगा मानो वह उनसे कातर गुहार कर रहा हो, “उनकी ज़िंदगी बख्श दें।” तभी उस चेहरे के ऊपर उनकी प्राणों से प्रिय जीवन सहचरी का आँसुओं से भीगा चेहरा आ गया, मानो उनसे सवाल कर रहा हो, “तुम चले जाओगे तो मेरा क्या होगा?”
उस एक निर्णायक पल में वक़्त मानो ठहर सा गया।
अपनी पत्नी का ख़याल सायास परे सरका मेजर ने अपना फ़ैसला ले लिया।
उन्होंने कैप्टेन देवांश को आदेश दिया, “तुम पीछे वाली पोज़ीशन पर चले जाओ, एंट्रेन्स वाली अगली पोज़ीशन पर मैं जा रहा हूँ।”
उसे उस सुरक्षित पिछले ठिकाने पर भेज कर वह उस खतरनाक मोर्चे पर डट गए दुश्मनों का मुक़ाबला करने।
करीब एक घंटे तक वह दहशतगर्दों से बहुत जांबाज़ी से जूझते रहे। तभी न जाने कहाँ से एक गोली उनके सीने पर लगी।
गिरते-गिरते उनकी अपनी जिंदगी कतरा-कतरा उनकी आँखों के सामने तिर आई।
स्वर्गीय माता-पिता के साथ बिताया लाड़-दुलार भरा बचपन, अर्धांगिनी से विवाह और सुखी विवाहित जीवन मानो सिनेमाई रील की भांति अन्तर्मन में चलने लगे।
तभी जीवनसंगिनी का सौम्य-सलोना मुखड़ा उनके जेहन में फ़्रीज़ हो गया।
दिल में एक शूल चुभा, वह उसकी जिंदगी वीरान करने जा रहे हैं लेकिन अगले ही क्षण कैप्टेन देवांश के दुधमुँहे, नन्हे शिशु का विहँसता, किलकारी मारता चेहरा उनकी आँखों के सामने आया।
चेहरे पर एक रूहानी, पुरसुकून मुस्कुराहट लिए वह अपनी अनंत यात्रा पर चल पड़े।
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लघुकथा-३
बदलाव की बयार
नेहल और नक्षत्र का परिणय संस्कार देर रात संपन्न हुआ।
तारों की छाँव में नई दुल्हन अपने सगे-संबंधियों के गले लग अपने मायके का आँगन तज श्वसुर कुल की नई माटी से जुड़ने जा रही थी।
विदाई की घड़ी में सभी की आँखें नम हो आईं ।
पंडित जी ने घोषणा की, “चिरंजीव नक्षत्र के साथ सात फेरों के बाद सौभाग्यवती नेहल आज से मन, वचन, कर्म से उसकी अर्धांगिनी है। सुख, दुख, रोग, शोक, हर हाल में अब वह पति का परछाईं की तरह साथ निभाएगी। उसका घर ही अब नेहल का घर है। मायका अब नेहल बिटिया के लिये पराया हुआ।”
“पंडित जी! क्षमा चाहता हूँ। यहाँ एक संशोधन अपेक्षित है। नक्षत्र बेटे का घर आज से नेहल बेटी का हुआ, यह तो सही है। लेकिन आपने जो कहा, नेहल का मायका उसके लिये आज से पराया हुआ, इससे मैं कतई सहमत नहीं। नेहल का मायका आज भी नेहल के लिये उतना ही अपना है, जितना कल था। वह इस घर की बेटी है और सदैव रहेगी। वह जितनी नक्षत्र बेटे के कुल की लक्ष्मी है, उतनी ही मेरे घर की पुत्री है। जो अधिकार मेरे घर में उसके भाई के हैं, उतने ही हक़ नेहल के भी हैं, न एक रत्ती कम, न एक रत्ती ज्यादा। पंडित जी! नया जमाना है। अब आप यूँ कहिये, नेहल बेटी अपने मायके और श्वसुर कुल, दोनों पक्षों की मान-मर्यादा है, प्रतिष्ठा है।”
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लघुकथा-४
ये मोह-मोह के धागे
मनु और हनु का रो-रो कर बुरा हाल था। उनकी पचहत्तर वर्षीया वृद्धा माँ नीनाजी का एक बड़ा ऑपरेशन हुआ था, जिसमें ऐनेस्थेटिक ड्रग की मात्रा में अधिकता की वजह से उनकी साँस फूलने लगी। उनका ऑक्सीजन लेवल खतरनाक ढंग से कम हो गया।
वह संज्ञाशून्य थीं।
डाक्टरों ने उनकी हालत बेहद गंभीर बताई और बेटों से कह दिया, “अब आप लोगों की दुआएँ ही उनको बचा सकती हैं।”
दोनों बेटे उनका हाथ थामे उनकी उखड़ती साँसों को देख अनहोनी की आशंका से आँसुओं के दरिया में डूबे हुए थे।
नीनाजी की हालत पल-पल बिगड़ती जा रही थी।
बेटे बहू उनसे बात करते, तो अर्धचेतनावस्था में उनकी आवाज़ें उन्हें उनके पास लौट आने को उद्वेलित करतीं। उनका ऑक्सीजन लेवल तनिक बढ़ जाता।
पर दूसरे ही क्षण उनका क्लांत, शिथिल तन अपने आप को बेहोशी की गोद में सौंप देता।
चैतन्यावस्था और मूर्छावस्था की यह रस्साकशी निरंतर चल रही थी।
तभी नीनाजी की लाड़ली इकलौती पोती डॉक्टर जीवा आ पहुँची। उसमें अम्मा की जान थी।
जीवा ने उनके हाथों को थाम उनके कानों में कहा, “अम्मा! मैं आ गई हूँ! आपकी जीवा! आँखें खोलिए। अभी तो आपको मेरी शादी देखनी है। मेरी गृहस्थी संभालनी है। वापिस आइये अम्मा!” उनकी दुलारी की आवाज मानो उनकी बेहोशी की अभेद्य दीवार भेदती उनके सुप्त अन्तर्मन पर आघात कर उठी।
अम्मा अपनी लाड़ली की इस मनुहार को नजरअंदाज़ नहीं कर सकीं।
डॉक्टरों ने बेहद अचंभे से देखा, उनका बेहद कम ऑक्सीजन का स्तर जीवा की आवाज सुनकर आश्चर्यजनक रूप से निरंतर बढ़ने लगा।
जीवा अम्मा का हाथ थामे करीबन एक घंटे तक उनसे सामान्य होने की चिरौरी करती रही। तभी अम्मा की बंद पलकों में हरकत हुई।
वह क्षीण स्वरों में बोल उठीं, “जीवा! मेरी लाड़ो! तू आ गई!”
***
लघुकथा-५
मुझे न्याय चाहिए
शाम के गहराते हुए सुरमई धुंधलके में दम्मो तेज कदमों से अपनी झुग्गी की ओर बढ़ी चली जा रही थी।
आज वह अपने आपे में नहीं थी। अभी-अभी बाज़ार में फ़ुटपाथ पर सब्जियाँ बेचने की एवज़ में एक पुलिस वाला ज़बरदस्ती उससे ढाई हजार रुपये झटक कर ले गया था।
उसका गुस्सा फूट पड़ा, “मरदूद ने मेरे इत्ते रुपये छीन लिये। अरे तेरे बदन में कीड़े पड़ें, सत्यानाश हो तेरा!” अपने बटुए को कस कर पकड़े हुए वह अपनी झुग्गी में घुसी ही थी कि वहाँ अपने पति को देख कर ठिठक कर रह गई।
उसे देख कर उसके मरद ने झपटते हुए उसके हाथ से बटुआ छीनने का प्रयास किया। फिर नशे में अंगारा आँखों के साथ बोला, “अरी, आज तो हफ़्ते की पैंठ में चांदी काटी होगी। चल दे मुझे हज़ार रुपये।”
पहले से त्रस्त दम्मो ने उसे धक्का दे दिया।
वह रौद्र रूप धारण करते हुए चीखी, “अरे नासपीटे! ख़ुद तो हरदम नसे में टुन्न रहता है। मैं बच्चों की खातिर किसी तरह दिन-रात खट कर दो पैसे कमाती हूँ, वो भी तुझे खटकते हैं। जो करना है कर ले। मैं अभी थाने जाकर तेरी और उस मुए पुलिस वाले की शिकायत करती हूँ। बाहर वो सत्यानासी पुलिस वाला! और घर में तू! कहीं चैन नहीं! कहाँ जाऊँ मैं?”
आँखों में भर आए आँसुओं को सप्रयास पीते हुए वह पास के थाने की ओर चल दी।
वहाँ पहुँच कर वह दारोगा से बोली, “दारोगा जी! मैं गरीब सब्जी बेचन वाली हूँ। वो आज आपके पुलिसवाले ने मुझसे बेबात ढाई हज़ार झटक लिए। इंसाफ़ करो हुज़ूर!”
उसे देख कर दारोगा जी चिल्लाये, “अरे ये कैसे यहाँ घुस आई? बाहर निकालो इसे!”
अगले ही क्षण वह खुद उसका बटुआ छीनते हुए ठठा कर हँसते हुए उससे बोले, “हमारी शिकायत करेगी? हम पुलिस वालों की?”
फिर बटुआ उसके सामने लहराते हुए बोले, “तुझे इंसाफ़ चाहिए? ले यह है तेरा न्याय!”
हक्की-बक्की दम्मो अपनी सारी ताकत लगा कर अवश क्रोध में फुँकारी, “तुझे भी पैसे चाहिए? तुम सबकी शिकायत करूँगी बड़े साहब से। मैं तब तक यहाँ से नहीं हटूँगी, जब तक मुझे न्याय नहीं मिलता।”
वह आलती-पालती मार कर दारोगा जी की मेज़ के सामने जम गई।
अब दारोगा जी और सारे पुलिस वाले इस गरियाती, चिंघाड़ती आफ़त से पिंड छुड़ाने की जुगत सोच रहे हैं।
आधे घंटे में इलाके के ईमानदार एसपी साहब थाने के मुआयने पर आने वाले हैं।

पाँच लघुकथा 
पूनम झा ‘प्रथमा’
जयपुर, राजस्थान
लघुकथा-१
तमाशबीन
दोपहर में खाना खाकर सुनंदा अपनी दिनचर्यानुसार टीवी खोलकर बैठ गई । टीवी पर समाचार वह इसी समय देखती है ।
लेकिन तभी बाहर से बहुत अजीब सी आवाजें आने लगी । वह एकदम से भागकर गई और बाहर खुलने वाली खिड़की से देखने लगी । उसने देखा बाहर करीब चालिस-पचास बंदर ये आवाजें निकाल रहे थे । उसे लगा सब लड़ रहे हैं।
पर ध्यान दिया तो उसने देखा कि दो-तीन बंदर एक छोटे से बंदर के बच्चे को दांतों से काट रहा था। बाकी बंदर सब चारों तरफ से तमाशा देख रहे थे ।
लेकिन कोई भी उस बच्चे को बचाने के लिए नजदीक नहीं गया ।
सुनंदा मोबाइल निकाल कर सिक्यूरिटी वालों को काॅल करने लगी ।
तब-तक उन दो-तीन बंदरों ने उस बच्चे बंदर को अधमरा करके वहां से चला गया।
घर में टीवी पर समाचार आ रहा था कि आपसी रंजिश में कुछ लोगों ने एक महिला को निर्वस्त्र करके पूरे गाँव में घुमाया।
सुनंदा बड़बड़ाई ‘मनुष्य हो या जानवर बचाने कोई आगे नहीं बढ़ता सभी तमाशबीन बने रहते हैं ।’
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लघुकथा-२
छाता
“बारिश बहुत तेज है न ?” कहकर मिस्टर जिंदल तृष्णा के छाते में आते हुए और उसके कंधों को करीब लाकर कहा।
उसे महसूस हुआ कि तृष्णा काफी कमजोर हो गयी है। ’35 साल से साथ हूँ, साथ-साथ मॉर्निंग वाक करने भी आता हूँ, लेकिन आज अचानक वह कमजोर क्यों लग रही है?’
विचारों के उधेड़बुन में वह आगे बढते जा रहा था।
‘हमने अपने कामों के आगे उसे अहमियत ही कहाँ दी। अब जिम्मेदारी और आफिस सबसे छुटकारा मिलने के बाद उसे देखने की फुर्सत मिली शायद।’
“आपको छाते की जरूरत कब पड़ने लगी जिंदल साहब ? मेरे लाख कहने के बावजूद भी आप छाता लेकर कभी नहीं निकलते हैं।”
तृष्णा की आवाज ने मिस्टर जिंदल को बारिश और ठंड की ओर ध्यान कराया।
उसने अपनी पत्नी तृष्णा के कंधे को और करीब खींचते हुए कहा “लेकिन अब तुम्हारे छाते की बहुत जरूरत है मुझे।”
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लघुकथा-३
टिकट
रात के खाने से निवृत्त होकर रमा जब आराम से बैठी तो मोबाइल देखा तो उसमें कई मिस काल थे ।
मिस कॉल अनिल का था ।
रमा ने तुरंत अनिल को फोन लगाया–“हेलो बेटा ! तुमने फोन किया था ?”
अनिल–“हाँ माँ, मैं पूछ रहा था कि दीपावली पर आपलोग मुम्बई आ रहे हैं या नहीं ?”
“तुम लोग ही यहाँ आ जाते तो अच्छा रहता ।”
“माँ! हम क्या कर सकते हैं । बताया तो था कहीं भी रिजर्वेशन नहीं मिल पाया । फ्लाईट की वहां सुविधा है नहीं । मैं भी क्या करूँ ?”
रमा सोचने लगी – हाँ बेटा याद है कहा था कि ‘स्लीपर क्लास में केवल सीट खाली है बहू और बच्चों को परेशानी होगी ।’
फिर मैंने कहा था कि ‘यहाँ से भी तो यही हाल होगा बेटा तो हमलोग भी कैसे आ पाएंगे बोल ?’ तो तुमने कहा कि ‘क्या माँ आप भी ? आप और बाबूजी तो पहले स्लीपर क्लास से ही सफर किया करते थे ?’ मुझे याद है बेटा। सच में तुम्हें काबिल बनाने के लिए हमने तो इधर ध्यान ही नहीं दिया ।
तभी राजेंद्र जी जो टिकट बुक कर रहे थे… उन्होंने कहा–“रमा ! टिकट बुक हो गया ।”
अनिल–“हेलो माँ क्या हुआ ? आप कुछ बोल नहीं रही हैं ?”
रमा–“अरे नहीं, वो तेरे बाबूजी कुछ कह रहे थे , वही सुनने लगी ।”
“अच्छा ।”
“खैर कोई बात नहीं बेटा । तेरे बाबूजी ने दीपावली के दो दिन के बाद सिंगापुर का टिकट बुक कराया है । वहां से वापसी में हमलोग मुम्बई होते हुए आऊंगी ।”
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लघुकथा-५
बड़े घर की बेटी
“शादी के बाद अपने ससुराल में कैसे रहना चाहिए और सबके साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए ये सब भी सिखाया करो रमा अपनी लाडली को।”–शर्मा जी ने पत्नी की तरफ मुखातिब होते हुए कहा ।
तभी बेटी समीक्षा जो ऑफिस जाने के लिए तैयार हो रही थी बोल पड़ी–“सीखना क्या है पापा ? घर में रहने के भी अलग-अलग तरीके होते हैं क्या ?”
“हाँ होते हैं न । ससुराल में लड़कियों को विनम्र होकर रहना चाहिए । कोई कुछ कह भी दे तो हर बात को तूल नहीं देना चाहिए ।”
“ये तो आम बात है पापा । हम ऑफिस में भी ये सब झेलते हैं ।”
“हाँ मेरी बेटी बहुत समझदार है । एक बड़े घर की बेटी को जैसे होना चाहिए बिल्कुल वैसे ही रहेगी ।” शर्मा जी गर्वित स्वर कहा ।
“देखिये जी! मैं अपनी बेटी को बहुत अच्छी शिक्षा दी हूँ । सबके साथ अच्छा व्यवहार ही करेगी । लेकिन उसे मैंने ये भी सिखाया है कि मेरी तरह बड़े घर की बेटी बनकर अन्याय नहीं सहेगी।”रमा एक सांस में बोल गई ।
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