पुस्तक समीक्षाः कविता-संग्रह “ अयोध्या से गुजरात तक “ -भालचंद्र जोशी


शब्दों में जीवन का आव्हानः सुशांत सुप्रिय का कविता-संग्रह “ अयोध्या से गुजरात तक “

मनुष्यता की संगत में कविता लिखने का सलीका समय सिखा देता है। कविता कैसी बनेगी, यह उस संगत की समय-सीमा और अन्तरंगता तय करती है। कविता शब्दों में जीवन का आवाहन है। उस पुकार की लय में, उस प्रार्थना की लय में कविता शब्दों की संगत को आकुल हो जाती है। वह निस्तेज शब्दों में प्राण डालने का काम करने लगती है। सुशांत सुप्रिय के कविता संग्रह ‘अयोध्या से गुजरात तक’ को पढ़ते हुए मुझे कुछ ऐसा ही महसूस हुआ। ये कविताएँ जिस निर्मल मन और सजग विवेक से लिखी गई हैं वह कविता के प्रति भरोसे को मजबूत करता है।
‘एक दिन/मैं अपने घर गया/लेकिन वह मेरे घर जैसा/नहीं लगा/’’ (डरावनी बात, पृष्ठ 10) यह सूचना नहीं कविता में भय है। और यदि सूचना है तो भय की सूचना है। इसमें एक ठण्डे समय की आहट को सुनने का आग्रह और उसकी पहचान को स्पष्ट करने का सजग साहस है। ‘‘यह एक डरावनी बात थी/इससे भी डरावनी बात यह थी कि/मैंने पुकारा उन सबको/उने घर के नाम से/लेकिन कोई अपना वह नाम/नहीं पहचान पाया/’’ (वही, पृष्ठ 11) नामों का, संज्ञाओं को भूल जाना, भय के आतंक में स्मृतियों का बिखराव है। भय स्मृतियों को उठाकर अपरिचय की अनाम नदी में डाल देता है, जहाँ पहचान का डूबने और बह जाने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं है। कविता से इतना सघन रिश्ता जो कविता की पहचान के नष्ट होने की संभावना में सिर्फ चिंतित नहीं है बल्कि उसे बचा लेने का अदृश्य प्रयत्न भी है। कविता की पहचान इस अर्थ में कि रिश्तों की पहचान के बीच ही कविता की पहचान छिपी होती है। रिश्तों और कविता की परस्पर निर्भरता उस खोज का संकल्प भी है जो नष्ट नहीं हुई है, सिर्फ गुम है। उसकी पहचान गुम है। मनुष्यता की यह अभिव्यक्ति घृणा की नहीं, एक ऐसे आक्रोश की है जो विवशता से नहीं पहचान के केन्द्र से आता है। ये रिश्ते उत्तर-आधुनिक समय में गुम हो रहे या नष्ट हो रहे बिम्ब और प्रतीकों की सँभाल के साथ जीवनानुभवों की गति की जड़ता को तोड़ने की साहसी शक्ति है।’’ अस्तित्व की सड़क पर/मंजिल ढूँढते हर यात्री के लिए/मील का गड़ा पत्थर है मेरी कविता/तुम्हारी आत्मा के पूरब में उगे/उम्मीद के सूर्य की/लाली है मेरी कविता/’’ (मेरी कविता, पृष्ठ 140) सूर्य का उजाला पूरब से होता है लेकिन कविता महज पूरब से नहीं आ रही है यहाँ। वह आत्मा के पूरब से आती है। जब कविता का रिश्ता प्रकृति के नियामक तत्वों से इतना सघन हो जाता है तब कविता अपने आशय बिखरने या गुम नहीं होने देती। रिश्तों की इस संश्लिष्टता में भी वह अपने आशय कविता से बाहर नहीं गिरने देती है। कविता में शब्दों और आशय की यह सजग देखभाल कविता की देखभाल है।
ये कविताएँ अजीब-सी द्वन्द्वात्मकता में है। कवि अवसाद में है लेकिन कविता अवसाद में जाने को उद्यत नहीं है। इनमें ऐसे अनुभव हैं जो सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक पदों के बड़े अर्थों की सभ्यता को सामने लाते हैं। यहाँ बदलाव की प्रार्थना में एक किस्म का अवसाद भी है जो बीच में कवि को टोकते और तोड़ने की कोशिशों में हताश करने की कोशिश करते हैं। ‘‘जो खुद को/हमारा अजीज दोस्त/बताते थे/उन्हें हम अक्सर/अपने जीवन से/निकल भागता हुआ/देखते हैं/’’ (हम भी क्या चीज थे, पृष्ठ 12) क्या यह सिर्फ रिश्तों के अप्रत्याशित टूटने का इकलौता दुख है ? इसमें मानवीय रिश्तों के प्रति पैदा हो रहे अविश्वास के प्रति अवसाद और वेदना भी है। एक ऐसा छल जो बड़े और लम्बी अवधि के भरोसे को तोड़कर भाग रहा है। यहाँ कवि भरोसे से पलायन और भरोसे के बीच पलता छल भी है। इनमें प्रश्न नहीं है लेकिन अपने अवसाद में गहरी प्रश्नाकुलता दबी है जो जीवन के गहरे अर्थ-सम्बन्धों को संदिग्ध ही नहीं कर रही है बल्कि अविश्वास के मुकाम पर खड़ी कर रही है।
डर, भय, अविश्वास, इन कविताओं में प्रथम दृष्टया केन्द्रीय स्वर लगता है लेकिन इसी के बीच सुशांत बहुत सावधानी और कविता की अनिवार्यता में उम्मीद और बचाव के निराकरण भी रखते हैं जो गद्यात्मक सुझाव नहीं काव्यात्मक आग्रह की भाँति आते हैं/जैसे, ‘‘लुटेरे इधर से ही गए हैं/यहाँ प्रकृति की सारी खुशबू/लुट गई है/भ्रष्ट लोग इधर से ही गए हैं/यहाँ एक भोर के माथे पर/कालिख लगी हुई है/फरेबी इधर से ही गए हैं/यहाँ कुछ निष्कपट पल/ठग लिए गए हैं/हत्यारे इधर से ही गए हैं/यहाँ कुछ अबोध सपने/मार डाले गए हैं/हाँ, इधर से ही गुजरा है/रोशनी का मुखौटा पहने/एक भयावह अँधेरा/कुछ मरी हुई तितलियाँ/कुछ टूटे हुए पंख/कुछ मुरझाए फूल/कुछ झुलसे बसंत/छटपटा रहे हैं यहीं/लेकिन सबसे डरावनी बात यह है कि/यह जानने के बाद भी/कोई इस रास्ते पर/उनका पीछा नहीं कर रहा/’’ (इधर से ही, पृष्ठ 26, 27) यहाँ तमाम क्रूरता और निर्ममता की मार्मिक सूचनाओं के बीच एक विवश चेतावनी है, पराजित दुख है कि इन सबके प्रतिरोध में, कोई आगे क्यों नहीं आया? किसी ने पहल क्यों नहीं की है ? यानी सूचना के बीच ऐसी मार्मिक प्रश्नाकूलता है जो समय की क्रूर और निर्मम हरकतों के सामने खड़ी होती है। अपने समय के सच से सामना करने के लिए, यदि ये कविताएँ एक गहरे आत्म संघर्ष से गुजरती है तो उससे आगे जाकर उसमें कवि की एक विश्व दृष्टि भी नजर आती है। ‘इक्कीसवीं’ सदी के बच्चे के लिए लोरी ऐसी ही कविता है।
बाजार अपने नित नए रूप-रंग बदलने के उपरांत भी पहचान छिपा नहीं पाता लेकिन उससे बड़ी त्रासदी यह है कि वह अब सर्व-स्वीकृत होता जा रहा है। वह अब कविता में उसे प्रतिकार के पदों का ही इस्तेमाल करने लगा है। बाजार भी शांति, सद्भाव, विश्व मैत्री और मानवाधिकार जैसे पदों का उपयोग करते हुए अपने पक्ष में एक महीन बुनावट में जाल तैयार कर रहा है। वह प्रतिपक्ष में खड़ा होकर पक्षधर लगने लगा है। ऐसे में सुशांत मनुष्यता के रचनात्मक पाठ के लिए जो शब्दों को कविता में इस्तेमाल करते हैं, वे अपने मूल अर्थों को प्रकट करने में सक्षम नजर आते हैं। वे कभी-कभी भय और हताशा-सी लगने वाली भाषा में सचेत करते हैं। ‘‘कई दुख-दर्द/मुझे जी रहे थे/…. कई तारीखों में से/झर रहा था मैं/कई स्मृतियों में/मौजूद था मैं/एक जीवन/मुझ में से होकर/गुजर रहा था/’’ (लेखा-जोखा, पृष्ठ 130) मनुष्य की सबसे बड़ी पूरे समाज और सभ्यता की सबसे बड़ी त्रासदी यही होगी कि वह इतिहास को बनते या होते नहीं देखे बल्कि उस होने में ही ‘झर रहा’ होने को महसूस करे। इतिहास का क्षरण पूरे समय, पूरे कालखण्ड की बड़ी त्रासदी है। व्यक्ति इतिहास में उपस्थित न हो और इतिहास में से भी बीत जाए, गुजर जाए, यह एक डरावना दृश्य है। कोई भी सभ्यता या संस्कृति इतिहास के बीच, इतिहास के साथ अपनी स्वाभाविक सत्ता का विस्तार चाहती है। उसमें जीवन की आश्वस्ति होनी चाहिए।’’ बची हुई हैं अभी/उन सारी जगहों की/ आदिम सुंदरता/उसके हिस्से की रोशनी में/नहाती हुई/’’ (सबसे अच्छा आदमी, पृष्ठ 40) यह बचे हुए की जो पहचान है, यह बड़ी आश्वस्ति है। पहचान की यह निरन्तरता बनी रहनी चाहिए। ऐसी पहचान के हर अवसर के लिए कवि तत्पर है। यह तत्परता भी इस बात की पहचान है कि मनुष्य को, कवि को अपनी रचनात्मकता को किस शक्ति तक ले जाना है और फिर उसकी पहचान स्पष्ट करना है। इसलिए तमाम भय और संदेह के इन कविताओं में रचनात्मक सक्रियता की आकुलता है। वे आज के बदलाव की आहट को ‘कल रात के सपने में’ सुनते हैं। समय की क्रूरता और विसंगतियों को कामगार औरतों के दुख में देखते हैं। सुशांत के पास एक दृष्टि है जिसे वे कविता-विस्तार में भय, दुख, संदेह, हताशा और उम्मीद की ओर ले जाते हैं। इन सबके बीच कविता को हताशा में अकेला नहीं छोड़ते हैं। वे एक आश्वस्ति की पुकार में कहते हैं कि ‘‘वे और होंगे जो/फूलों सा जीवन/जीते होंगे/तुम्हें तो हर बार/भट्टी में तपकर/निकलना है/जागो कि/निर्माण का समय/हो रहा है/’’ (ईंट का गीत, पृष्ठ 48) यह ईंट का गीत मनुष्य की अदम्य जिजीविषा का गीत है। उस उम्मीद और साहस का गीत है जहाँ ‘‘एक दिन मैं/खाद में बदल जाऊँ/और मुझे खेतों में/हरी फसल उगाने के लिए/डाले किसान/’’ (मेरा सपना, पृष्ठ 58) की प्रार्थना का सपना है।
एक दौर या जन कविता में प्रतिकार की भाषा में एक हिंसक शोर और क्रूर आक्रमकता थी। निश्चित रूप से यह शोर और आक्रमकता समय के यथार्थ हिस्सा थे लेकिन कविता में यह प्रतिकृति नहीं इसका निराकृत प्रतिलोक चाहिए था। यह समाज आक्रमकता से नहीं सक्रियता से बनता है। अपेक्षाओं और उम्मीदों के साहस से बनता है। सुशांत अपनी कविताओं में इसी साहस की तलाश भी करते हैं और भय और त्रासदी के बीच उम्मीद के इस साहस को स्थापित भी करते हैं। जीवन में आकर्षण और विकर्षण के बीच वे साहस की कविता रचते हैं। अपनी कविताओं में वे जीवन की गुम हुई जरूरी, मूल्यवान और सार्थक संज्ञाएँ खोज कर लाते हैं और उसे मनुष्यता के पद से जोड़कर उसकी सार्थकता को पुनर्जीवित करते हैं। ‘‘मैं उसे/प्यार से देखता हूँ/और अचानक वह निस्तेज लोहा/मुझे लगने लगता है। किसी खिले सुन्दर फूल-सा/मुलायम और मासूम/’’ (किसान का हल, पृष्ठ 15) । सुशांत , इस मुलायम और मासूम लगने के लिए लोहे के साथ कवि का प्रयास भी जरूरी है । इसलिए इस संसार को खूबसूरत बनाने के लिए प्रकृति की हरकतों में मनुष्य की भागीदारी होनी चाहिए।
सुशांत एक डरे हुए सकपकाए समाज को और अधिक संदिग्ध नहीं करना चाहते बल्कि उसे उस भय से छुटकारा दिलाना चाहते हैं। उन्हें शब्दों और कविता पर भरोसा है कि यह भी हवा-पानी की तरह जरूरी है। ये कविताएँ बनावटी जीवन और उत्तर आधुनिक समय का भयावह दृश्य पैदा करती है तो उसके लिए उम्मीद भी बचाकर रखती है। समाज की विसंगतियों और मनुष्य के खिलाफ होते षड्यंत्रों से आहत उनकी कविता महज एक अकेले कंठ का रुदन नहीं है। वे इस कठिन समय में मनुष्य को उसकी त्रासदियों के साथ अकेला छोड़ देने की विवशता से बाहर आना चाहते हैं। उनकी कविता सर्वहारा का उसके समूचे अस्तित्व के साथ स्वीकार की घोषणा है।
‘‘पाँच सितारा होटल नहीं है मेरी कविता/जहाँ तुम्हारी फटी जेब के लिए/‘प्रवेश निषेध’ लगा हो।’’ कविता की चिंता में अयोध्या से लेकर गुजरात तक शामिल है। पूरी मार्मिकता से।
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अयोध्या से गुजरात तक (कविता संग्रह) : सुशांत सुप्रिय
प्रकाशक : नेशनल पब्लिकेशंस, जयपुर , 2018.