दो लघुकथाएँ: विजय सप्पति, लक्ष्मी यादव/ लेखनी मार्च-अप्रैल 16

बेटी
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आज शर्मा जी के घर में बड़ी रौनक थी, उनकी एकलौती बेटी ममता की शादी जो थी.

बहुत से मेहमानों से घर भरा हुआ था, दरवाजे पर शहनाई बज रही थी, खुशियों का दौर था.

शर्मा जी बड़े व्यस्त थे. फेरे हो रहे थे. बेटी की विदाई के बारे में सोच सोच कर ही शर्मा दम्पति का दिल दुःख जाता था. शर्मा जी की पत्नी की आँखों से आंसू बह रहे थे. शर्मा जी भी थोड़ी थोड़ी देर में आंसू पोंछ लेते थे. फेरे हो गए, सभी दावत में व्यस्त हो गए. शर्मा जी बात बात में अपनी पत्नी से उलझ जाते थे. दोनों में कभी भी एक बात पर एकमत नहीं हो पाता था.

पार्टी में शर्मा जी हर किसी से बस यही कह रहे थे कि आज उनकी बिटिया के जीवन का सबसे अच्छा दिन है, वो एक राजकुमार जैसे इंसान से शादी कर रही है, जो उसे राजकुमारी की ही तरह रखेंगा.

ममता बहुत खुश थी, बस उसके मन में एक ही उदासी थी कि उसे अब ये पीहर का घर छोड़कर जाना होंगा. उसे पता है कि उसके पिता की वो सबसे बड़ी कमजोरी है वो कैसे उसके बिना रह पायेंगे. बस यही सोच उसके मन में चल रही थी. एक और बात थी जो उसे बहुत परेशान कर रही थी, वो थी उसके माता पिता का आपस में बार बार हर दूसरी-तीसरी बात में लड़ना. वो सोच रही थी और फिर उसके मन में एक विचार आया.

दावत करीब ख़त्म होने पर थी. थोड़ी देर में ही विदाई की रस्म थी.

ममता स्टेज पर पहुंची और उसने माइक पर सबको संबोधन करना शूरू किया.

“आप सभी का धन्यवाद कि आप लोग यहाँ आये. मेरे पिताजी और माताजी का आप सभी ध्यान रखना क्योंकि मेरे जाने के बाद वो अकेले ही हो जायेंगे. मैं एक बात कहना चाहती हूँ. मेरे पिता से और सभी लडकियों के पिताओं से. आप हम लड़कियों को बड़े प्यार से पालते है और शादी करते समय यही चाहते है कि हमें पति के रूप में कोई ऐसा इंसान मिले जो हमें राजकुमारी की तरह रखे और एक ऐसी ज़िन्दगी दे, जो परीकथाओ जैसी हो.”

सब शांत हो गए थे. सभी ध्यान से ममता की बाते सुन रहे थे.

ममता ने आगे कहा, “ आप सभी से मैं एक ही बात कहना चाहूंगी कि क्या आपने जिस लड़की से ब्याह किया है, उसे क्या आपने राजकुमारी की तरह रखा, क्या उसे परिकथा जैसा जीवन दिया. उसके साथ लड़ने झगड़ने में जीवन गुजारने के अलावा क्या आपने उसे वो सारी खुशिया दी, जिनकी कल्पना, उनके पिता ने आपके साथ उनकी शादी करवाते वक़्त की थी या जैसे मेरे पिता इस वक़्त मेरे लिए कर रहे है, या दुसरे पिता अपनी बेटियों के लिए करेंगे.”

हाल में सन्नाटा छा गया था. ममता की माँ की आँखे मानो बारिश बरसा रही थी. हाल में मौजूद कई स्त्रियाँ रो रही थी, पुरुष चुप थे. शर्मा जी का सर झुक सा गया था.

ममता ने फिर कहा, “अब भी समय है, मेरे जाने के बाद या आपकी बेटियों की विदाई के बाद आप उस औरत के साथ वही व्यवहार करिए, जो आप अपनी बेटी के साथ उसके पति या ससुराल के द्वारा होते देखना चाहते है. इससे उन औरतो को उनका खोया हुआ मान मिलेंगा, उनके पिता के चेहरों पर ख़ुशी आएँगी और आप सभी को जीने का एक नया सहारा मिलेंगा. बस मेरी इतनी सी बात मान लीजिये, यही मेरी सच्ची विदाई होंगी.”

ये कहकर ममता नीचे आ गयी, उसकी माँ और पिता ने उसे गले से लगा लिया, सारा हाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज गया था.

एक बेटी ने अपना हक अदा कर दिया था.
विजय कुमार सप्पति
फ्लैट नं. 402 , पांचवी मंजिल, प्रमिला रेजिडेंसी
मकान नं. 36-110/402, डिफेंस कौलोनी
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ई मेलःvksappati@gmail.com

 

 

 

 

 

साहब इसकी कुछ वजह है!

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नई दिल्ली के प्लेटफार्म नंबर 14 पर “रांची-राजधानी” आ चुकी थी| नीरव के फ़ोन की घंटी बजी…. प्लेटफार्म टिकट लेने के लिए लाइन में लगे नीरव ने फ़ोन उठाया |फ़ोन पर हुई बात से पता चला की नीरव और उसके दोस्त रूबल को अपने प्रोडक्शन मैनेजर से मिलने ट्रेन के b 1 कोच में जाना है| नीरव और रूबल दोनों प्लेटफार्म टिकट लेकर प्लेटफार्म 14 की ओर बढ़ गये |रेलवे स्टेशन पर प्रायः हर तरह के लोगो की भीड़ होती है |भीड़ में खड़े हर इंसान के चेहरे पर अलग अलग भाव होते हैं| कही ख़ुशी के भाव,कही ग़म ,कही मिलने तो कही बिछड़ने के भाव,और किसी के लिए तो सफ़र ही जीवन है ऐसे भाव उनके चेहरे से झलकते हैं|नीरव और रूबल भीड़ में खड़े लोगों के चेहरे पढ़ते हुए रांची राजधानी के b1 कोच के अंदर पहुच गये| मीटिंग हुई, बातें हुईं और प्रोडक्शन मैनेजर से शूटिंग का कुछ सामान लेकर दोनों स्टेशन से बाहर आ गये| दोनों कई दिनों बाद मिले थे तो अब खाली समय में बाहर चाय की दुकान पर सामान रखकर बाते करने लगे| रूबल “यार बड़ा उदास लग रहा है?क्या पापा की तबियत अभी ठीक नही हुई ?नीरव “क्या बताऊं यार उनकी तबियत पिछले 4 सालो से ठीक होने का नाम ही नही ले रही हैं,कितने डॉक्टरों को दिखाया गया बहुत पैसा लग चुका है लेकिन कोई फ़ायदा नही” इतना कहकर नीरव के चहरे पर उदासी की लकीरें खिच आयीं थी और आँखें डबडबा कर ज़मीन में कहीं खाली होने की जगह तलाशने लगीं |रूबल “तू चिंता मत कर यार ठीक हो जायेंगे और फिर उम्र भी तो हो गयी है थोडा बहुत परेशानी तो अब होगी ही|नीरव “अब इस जनम में तो वो ठीक नही होंगे अब तो मम्मी भी बीमार रहने लगीं हैं समझ में नही आता क्या करूँ, घर के लिए जितना करता हू कम ही पड़ जाता है और मुसीबतें हैं की बढती जाती हैं | कभी कभी सोचता हू कि ये बुढ़ापा ही एक बीमारी है जो इंसान को बीमार और लाचार बना देती है | रूबल “बस यार किसी अच्छे प्रोजेक्ट का काम आने दे फिर सब ठीक हो जायेगा तू टेंशन न ले| नीरव “हाँ …. उसी का इंतज़ार है, देखो ऊपरवाला क्या चाहता है?…….खैर मेरी छोड़, तू बता साले, तेरी शादी का क्या हुआ? गीता के घरवालों से कुछ बात बनीं ? रूबल “कहाँ यार कोई बात नही बनी| उसके घरवाले चाहते हैं कि मै ये मीडिया लाइन छोड़ दूँ और कोई ऐसा जॉब करूँ जिसमे महीने में एक बड़ी रकम घर आये| साला पहले अपने घरवालों को इस लाइन में आने के लिए मनाया और अब गीता के घरवालों के लिए ये फील्ड छोड़ दूँ साला लाइफ झंड हो गयी है समझ में नही आता की क्या करूँ | नीरव “चल छोड़ अभी वो सब मत सोच,…. थोडा स्पेस दे चीज़ों को सब ठीक हो जायेगा और ना हुआ न तो साले दोनों एक साथ ये फिल्म की दुनिया ही छोड़ देंगे, नही बनना फिल्म -डायरेक्टर| जिंदगी का “cut” हुआ पड़ा है और हम साला “एक्शन” के चक्कर में अपनी मरा रहे हैं|
दोनों के गिलास की चाय में आखिरी बूँद भी ख़त्म हो जाती हैं दोनों गिलास रख कर सिगरेट खरीदते हैं नीरव चाय वाले को पैसे देकर उसी की दुकान की टूटी दियासलाई से होठो पर लगी सिगरेट जलाता है|एक कश मारकर रूबल की ओर सिगरेट बढ़ा देता है |रूबल कश अंदर खीचकर, सिकुड़ी आँखों को ढीला करते हुए कश छोड़ता है| दोनों पास रखा हुआ अपना सामान उठाते हैं और आगे बढ़ जाते हैं नीरव “जिंदगी का साथ निभाता चला गया”…. की धुन बज उठती है जिसको रूबल के शब्द आगे बढ़ाते हैं| दोनों सामान के कारण ऑटो से जाने का निश्चय करते हैं | सड़क पर खड़ा कोई ऑटो 200-150 से कम में जाने को तैयार नही होता | नीरव 100 रूपए में ही ऑटो तय करना चाहता है इसलिए वो सड़क पर कुछ दूर पैदल ही चलने लगता है रूबल उसके पीछे खड़े ऑटोवाले को अपनी बातों से मनाने में लगता है पास खड़ा एक ऑटो वाला सारा मांजरा जैसे ही समझ पाता है ,तुरंत ही 100 रूपए में चलने को मान जाता है | नीरव और रूबल ने अपना सामान ऑटो के अन्दर सीट के पीछे की खाली जगह में रखा और माथे पर बह आये पसीने को पोछकर सुकून भरी साँस ली और ऑटो में बैठ गये | 60 की उम्र वाला सेहतमंद ऑटो वाला बहुत धीमी रफ़्तार में ऑटो चला रहा था| दोपहर के वक़्त नीरव और रूबल दोनों को ही अपने गंतव्य तक पहुचने की कोई जल्दी नही थी लेकिन साइकिल की रफ़्तार में चल रहे ऑटो को दोनों बड़ी हैरत से अजीब महसूस कर रहे थे| नीरव ने ऑटो वाले से व्यंग के लहज़े में कहा “दादा आप ऑटो बहुत अच्छा चलाते हैं,कबसे चला रहे हैं ? ऑटोवाले ने मुस्कुराकर जवाब दिया “ साहब हम सन 95 से ऑटो चला रहे हैं” नीरव “ दिल्ली में ही चला रहे हैं तबसे ? ऑटोवाला “हाँ साहब” बात करते हुए ऑटो की स्पीड और कम हो रही थी| रूबल “हमेशा इतनी ही स्पीड में चलाते हैं या बस आज ……| ऑटोवाला हँसते हुए बोला “साहब इसकी कुछ वजह है!”| इतना कहकर ऑटोवाला खामोश हो सड़क पर बहुत ध्यान से देखते हुए ऑटो चलाने लगा | लाल बत्ती पर जब सबने गाड़िया रोकी तो चंद फेरीवाले खिलौने,फल आदि की टोकरियाँ लिए ऑटो के पास आकर अपनी दुकानदारी में लग गये| नीरव ने नारियल बेच रहे फेरीवाले के बहुत मिन्नत के बाद उससे आखिर एक नारियल का बड़ा टुकड़ा 10 रूपए में ख़रीद ही लिया, जिसमे से एक तिहाई हिस्से का पहला रूबल को दिया दूसरा ऑटोवाले को ऑफर किया उसने पहले तो मना किया लेकिन नीरव के दूसरी बार कहने पर ऑटो की गति और धीमी करते हुए नारियल का टुकड़ा हाथ में थाम लिया फिर गति को कुछ रफ़्तार दी| रूबल,नीरव ने अपने नारियल के टुकड़े खत्म किये| नीरव और रूबल का ध्यान बहुत देर बाद इस बात पर गया की ऑटोवाला सड़क की दाई ओर ऑटो सटा के चला रहा है और सामने से आ रही किसी गाड़ी को देख स्पीड और कम कर ले रहा है| रूबल ने ऑटोवाले से खाली सड़क पर दाई ओर बनी पगडंडियों पर गाडी चलाने की ख़ास वजह पूछी तो ऑटोवाला फिर बोला “साहब इसकी कुछ वजह है!
बिहार के रहने वाले नीरव ने जब बातो से समझ लिया की ऑटोवाला भी बिहार से है तो उसके गाँव घर के बारे में बात करने लगा|पूछने पर ऑटोवाले ने बताया कि वो भी बिहार के चंपारण का रहने वाला है | बातों बातों में उसने बताया कि उसका पूरा परिवार गाँव में है वो सन 95 से दिल्ली में ऑटो चलाता है और घर पैसे भेजता है| बड़ा बेटा सेना में था उसकी शहादत के बाद अब घर का खर्च उसकी कमाई से ही चलता है| बात करते करते वो जगह करीब आने वाली थी जहां नीरव और रूबल को सामान जमा करना था|
नीरव रूबल ने ऑटोवाले से जब ऑटो धीमे चलाने की वजह फिर पूछी तो उसने मुस्कुराकर कहा” साहब हमको एक आँख से ठीक से दिखाई नही दे रहा कुछ दिनों से”इनता सुन सामने से आते दो बड़े ट्रक को देखकर तो रूबल और नीरव दोनों के हाथ पैर फूल गये| ऑटोवाले ने फिर दायें ओर ऑटो को घुमा लिया|
दोनों ने ऑटोवाले से आँख डॉक्टर को दिखने को कहा जिसपर कभी वो चश्मा घर भूलने की बात कहता कभी बड़े अस्पताल में डॉक्टर को दिखा रहा है ये कहता कभी चश्मे का नंबर लेना है डॉक्टर से ये कहता| नीरव रूबल का गंतव्य स्थान भी आ गया| ऑटो साइड में करके उसने दोनों को उतार दिया | सामान उतार रहे नीरव और रूबल को ऑटोवाले ने टोका और अपना आई कार्ड दिखाते हुए बोला “साहब हम झूठ नही बोल रहे देखिये हम सन 95 से ऑटो चला रहे हैं ये है हमारा आई कार्ड” नीरव ने कार्ड पर लिखा नाम पढ़ा “सागर पाल सिंह” उम्र 63 वर्ष , कार्ड जारी करने का साल सन 95…| और ऑटोवाला बोले जा रहा था| “साहब कल ही हम चश्मा ले लेंगे और वैसे भी कई दिनों से जब से आँख में दिक्कत है हम ऑटो नही चलते शाम 6 बजे बाद… अगर हमारे ऑटो गलत चलाने से कोई बात हुई हो आपको पहुचने में देर हुई हो तो हमारा पैसा काट लीजिये| नीरव और रूबल के मन में कुछ जम सा गया गला रुंध रहा था| दोनों ने गला खखारकर कार्ड लौटाया और मुस्कुराते हुए उसको 100 रूपए देकर आगे बढ़ गये| ऑटोवाला नई सवारी के इंतज़ार में आँख गड़ाये कान लगाये वहीं ऑटो की सीट पर बैठ फटे कुरते की जेब से बीड़ी निकाल कर जलाने लगा| दूर जा चुके नीरव और रूबल मुड़-मुड़ कर ऑटोवाले को बार बार देख रहे थे…. जैसे जैसे वो दूर जा रहे थे वैसे वैसे उनको अपनी दुःख भरी दास्तान उस ऑटोवाले के दुःख के सामने बौनी होती नज़र आ रही थी| आखिरी बार मुड़ने तक सन 95 का वो ऑटो वाला सवारी बिठाकर ऑटो स्टार्ट कर चुका था और कुछ पलों में दोनों के पास से गुजरते हुए उनको देखकर मुस्कुरा रहा था……

लक्ष्मी यादव
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दिल्ली …
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