कहानी समकालीनः मुझे माफ कर दो अम्माः पद्मा मिश्रा/ लेखनी-मार्च-अप्रैल 16

_54433303_two_thinks_464वार्ड का खालीपन न जाने क्यों आज एक अव्यक्त से सूनेपन का आभास दे रहा था,केबिन के पास वाले बेड नं 10 का कोना रह रह कर मन में टीस भर रहा था,– पहले न जाने कितने मरीज आये और गये पर नर्स राजम्मा का मन आज से पहले इतना आकुल व्याकुल कभी न था। नर्सिंग के पेशे में इतने वर्षों से कार्य करते हुए कभी कर्तव्य पालन में शिथिलता आई हो -उसे याद नहीं, पर जीवन की लम्बी यात्रा में पारिवारिक उलझनों, टूटते बिखरते रिश्ते की कड़वाहट शायद उम्र के साथ साथ उसके व्यवहार व् व्यक्तित्व में भी झलकने लगी थी। ह्रदय में प्रवाहित होती संवेदना और सहानुभूति का अजस्र स्रोत सूख चला था, तभी तो उसकी कर्तव्यपरायनशीलता में हुई जरा सी चूक ने उसके पेशे को ही दागदार बना दिया था।
हास्पिटल के इस महिला वार्ड में काम करते हुए दस वर्ष कब गुजर गए पता ही न चला था , वह एक लोकप्रिय, सेवाभावी नर्स बनने का सपना लेकर यहाँ आई थी। मदर टेरेसा, सिस्टर निवेदिता, फलोरेंस नाइंटीगेल जैसे बड़े बड़े नाम आदर्श थे उसके सामने। मानवता की सेवा, दया, करुणा, त्याग, सहनशीलता के सारे पथ रोम रोम में समाहित थे। मरीजों के बीच
जब वह हाथों में सिरिंज लिए या स्लाइन की बोतलें थामे सधे कदमों से चलकर वार्ड में आती तो सभी एक प्रिंसेज की तरह उसका स्वागत करतीं थीं । मरीज आते और ठीक होकर चले जाते , कुछ को अंतिम विदा दे आँखें भर आतीं, पर तुरंत सजग भी हो जातीं – -फिर एकनया दिन और नया मरीज। तरह तरह की बीमारियां उनके ईलाज के लम्बे लम्बे उलझनों भरे दिन, पर आज से पहले राजम्मा ने किसी खास अहसास का अनुभव नहीं किया था। …वार्ड का वह खाली कोना उसे आज भी धिक्कारता है।
शायद वह मनहूस दिन उसकी यादों का एक अमित हिस्सा बन गया है, ठीक उस घाव वाले अंग की तरह जिसे काट कर भी ठीक होने की कोई सम्भावना शेष न हो। डॉ प्रसाद का वह विषादपूर्ण स्वर अभी भी उसके कानों से टकराता है,–”सिस्टर राजम्मा ,मुझे आपसे ऐसी उम्मीद नहीं थी,”
सोचते हुए उसकी आँखें भींगने लगी थीं।
बेड नं दस की सत्तर वर्षीया श्यामा कभी उसे सिस्टर न कहकर ‘बिटिया’ ही पुकारती थी और राजम्मा उन्हें कभी प्यार से ‘अम्माँ ‘तो कभी ग्रेनी कहकर बुलाती थी। हास्पिटल के नियमानुसार हर मरीज के साथ एक सेविका रखी जा सकती थी –श्यामा के साथ उसकी अठारह वर्षीया पोती गुड़िया रहती थी । उसकी देखभाल करते -बाल बनाते , सूप पिलाते या कपड़े बदलते समय वह जितने प्यार से उनका लाड-दुलार करती -एक माँ की तरह कि सभी उसे पहचानने लगे थे। उछलती, कूदती इस कोने वाले मरीज से लेकर दुसरे छोर पर लेटी दस वर्षीया रजनी तक सभी दादी-पोती के प्यार से परिचित हो चले थे। बगल में ही नर्सों का केबिन होने के कारण राजम्मा और अन्य नर्सें भी उनके इस लगाव को देख कर प्यार से मुस्करा उठती थीं…

उस दिन श्यामा की तबियत कुछ ज्यादा ही ख़राब थी। बुखार 104 डिग्री तक बढ़ गया था और सांस में दिक्क्त की वजह से आक्सीजन लगाना पड़ा था। थोड़ी देर में दवा से बुखार उतरने लगा था, पर सांस लेने में कुछ कठिनाई थी। उस दिन राजम्मा रात की ड्यूटी पर थी। स्टाफ रूम से कॉफी पीकर जब वह वार्ड में आई तो ड्यूटी का चार्ज सौंपते समय नर्स शिखा ने बताया था कि श्यामा का विशेष ध्यान रखना , बुखार कभी भी बढ़ सकता है,–ब्रेन हैमरेज का भी खतरा
है, क्योंकि ब्लड – प्रेशर काफी बढ़ा हुआ है। ”
मशीन जैसे यंत्रचालित सी सारी नर्सें साथ साथ चलती हुई कार्यभार लेने की मानो औपचारिकता निभा रही थीं –राजम्मा ने भी शायद उसे रुटीन का ही एक हिस्सा माना था, और वह केबिन में जाकर बैठ गई,- -किसे कब और क्या दवा देनी है, इसे नोट करते और तत्संबंधी दवा निकाल कर क्रमवार ट्रे में सजाने में व्यस्त राजम्मा श्यामा का विशेष ख्याल रखने वाली बात भूल गई। उस दिन वार्ड में कई सीरियस मरीज भी थे अतः पूरा स्टाफ आज काफी व्यस्त था …

दिन भर ओ पी डी की भाग-दौड़ में व्यस्त रह कर -शाम को सब्जियां खरीदना, बेटे को स्कूल से लाना, टेलीफोन-बिजली के बिल जमा करवाने जैसे न जाने कितने कामों को निपटाते निपटाते राजम्मा की ड्यूटी का समय भी हो चला था,- उसने जल्दी जल्दी खाना बनाकर बेटे को खिलाया और खुद भी खाकर हास्पिटल चली आई थी। एक पल भी आराम नहीं किया था, इसलिए बहुत थक गई थी। शरीर थकान से शिथिल हो रहा था -इच्छा नहीं थी कि वार्ड का एक चक्कर ही लगा ले,-शायद अन्य नर्सों की तरह उस पर भी स्वार्थ हावी हो रहा था। थकानग्रस्त शरीर इन कमजोर पलों में उसे कर्तव्य-विमुख भी कर रहा था,-यह सोचने की भी मानो उसे फुरसत नहीं थी। वह दवा की ट्रे लेकर सबको दवा देती हुई जब बेड नं 10 पर पहुंची तो श्यामा जाग रही थी,उसे देखते ही उसके होठों पर मुस्कान दौड़ गई थी।
ईशारे से श्यामा ने पूछा–”कैसी हो ?”राजम्मा ने सिर हिलाया और आगे बढ़ गई। अपने दर्द व् पीड़ाके बीच भी श्यामा ने मुस्कराकर राजम्मा का स्वागत किया था। वह कुछ कहना या बताना चाहती थी -पर क्या ? यह बात राजम्मा न जान सकी, क्योंकि उसने तो आँखें उठाकर ठीक से उन्हें देखा भी न था,शायद …”
24 नं को स्लाइन की सात बोतलें चढ़ानी हैं , बेडनं 20 को कंबल व २१ नं को बेड -पैन दिलवाना है ,’ये सारे कम यंत्रचालित सी रटती हुई राजम्मा एक पेशेवर नर्स नजर आ रही थी। ऊसके मन की संवेदना की जगह पता नहीं कहाँ से एक रूखेपन और कड़ुवाहट ने ले ली थी।
वह केबिन में लौटी –दूसरी नर्सों ने कॉफी बनाई थी। वह भी उस बैठक में शामिल हो गई थी। सभी बातों में
मशगूल थीं। रात के दस बज रहे थे । अचानक कहीं से कराहने की आवाज आई ।
एक बार ,दो बार , फिर आवाज शांत हो गई थी। सभी ने सोचा कि शायद वह मरीज सो गई होगी, केबिन कि अधिकांश नर्सें वार्ड नं ए के इमरजेंसी वार्ड में चली गई थीं और बी वार्ड में राजम्मा ड्यूटी पर थी। श्यामा की पोती गुड़िया बार बार केबिन के पास आती और लौट जाती।
राजम्मा ने भी उसे आते देखा था, पर पूछा कुछ नहीं । गुड़िया फिर कॅबिन के पास आई और पुकारा –”सिस्टर!”…
”क्या है ?” इस बार राजम्मा ने जवाब दिया,
”आज दादी के सिर में बहुत दर्द हो रहा है,-बार बार उलटी की शिकायत कर रही थी, पर शाम तक ठीक हो गई थी। डाकटर ने दवा भी बदली थी पर तब उसकी जरूरत नहीं पड़ी थी । ड्यूटी नर्स ने कहाथा कि रात में सिस्टर से मांग कर दवा दे देना, में दवा लेने आई हूँ। ”

राजम्मा व्यस्त थी, अतः बेमन से जवाब दिया –”जब कोई तकलीफ नहीं है, तो क्या परेशानी है ?-सो रही हैं न ? सोने दो,-सुबह दवा दे देंगे। ” राजम्मा आज स्वार्थी हो चली थी। दिन भर की थकान ने उसे तोड़ दिया था और अब वह भी एक
झपकी लेना चाहती थी अतः उसने गुड़िया को टाल दिया था।
बस …यही एक पल था, जिसने राजम्मा के सम्मानित दस वर्षों की सेवा पर एक प्रश्नचिह्न लगा दिया था। श्यामा को
दवा नहीं दी जा सकी थी।

रात गहरा रही थी, दो बज रहे थे ,पूरे वार्ड में सन्नाटा छाया हुआ था। एक क्षीण सी आवाज आई –”गुड़िया !” कोई जवाब नहीं -,”गुड़िया,जरा पानी पिला दे बेटा । ”
फिर भी कोई नहीं बोला। आवाज की छटपटाहट बढ़ती जा रही थी,-”पानी”, पानी’, बिटिया!, सो रही है क्या ?,पानी पिला दे
बेटा’, शायद यह पुकार राजम्मा के लिए थी। व्याकुल बैचैन हो श्यामा ही पुकार रही थी। उनकी पोती गुड़िया या तो वार्ड के किसी कोने में जाकर सो गई थी, या घर चली गई थी। कहीं नजर नहीं आयी।
…श्यामा बार बार पानी मांगती रही,पर टेबिल पर सिर झुका कर सोती हुई राजम्मा ने भी नहीं सुना –बगल के बेड वाली सहायिका जाग रही थी। उसके मरीज को भी ऑक्सीजन लगा हुआ था। उसने राजम्मा को आवाज लगाई –”सिस्टर ,श्यामा को पानी पिलाना है। ”
”तो पिला दो,’ राजम्मा ने एक क्षण के लिए आँखें खोलीं – ”पर सिस्टर मैं कैसे पिलाऊँ -आक्सीजन मास्क लगा है,कैसे हटाऊँ ,मैं तो उन्हें उठा भी नहीं सकती ।”
‘देखो उनकी पोती यहीं कहीं होगी, अभी आ जायेगी,” वह फिर सो गई। कर्तव्य-भावना पर स्वार्थ हावी हो गया था या विधाता ही वाम था जिसने राजम्मा की निष्कलुष सेवा भावना पर एक काला दाग लगा दिया था।
श्यामा की प्यासी पुकार शायद पूरे वार्ड में सभी ने सुनी थी, पर उस क्षण सबकी संवेदना कहीं खो गई थी।

सुबह होते ही पांच बजे के करीब राजम्मा उठी, बगल से रजिस्टर उठाया और सुबह की दवा लेने वालों के नाम पढ़ने लगी,–श्यामा का नाम आते ही सहसा वह चौंकी और लगभग दौड़ती हुई सी उनके बेड पर पहुंची। -श्यामा को जगाना चाहा,-बार बार हिलाया, डुलाया पर वो बोली नहीं । फर्श पर सोती हुई गुड़िया को जगाया –”दादी को पानी दिया था न रात में ? कहाँ थी तुम ?”
”मै तो टॉयलेट गई थी, देर से लौटी ,मेरे आने तक दादी सो चुकी थी, क्या हुआ सिस्टर ?”, उसन रुआंसे स्वर में पूछा । ,”जल्दी से लाईट जलाओ, वह उठ नहीं रही हैं,”
गुड़िया ने तुरंत लाईट जलाई। अब तक दूसरी नर्सें,और आस पास के मरीज भी आ जुटे थे। राजम्मा ने बार बार श्यामा को हिलाया-डुलाया ,पर जवाब नहीं। वह यहाँ कहाँ थी ? उसकी प्यासी आत्मा तो न जाने किस गहरी चिर निद्रा में जा चुकी थी। – – कान से , नाक से, खून की एक पतली लकीर बहती हुई गालों तक आकर सूख चुकी थी। उन्हें ब्रेन हैमरेज हो गया था रात में ही।
राजम्मा चककर खाकर वहीँ बैठ गई ,–”हाय!,,यह क्या हुआ अम्माँ !”
श्यामा की निर्जीव अधखुली आँखें मानो पूछ रही थीं,-”अब जाकर अम्मा की याद आई बिटिया?”
अब तक कई सीनियर डॉकटर भी आ गए थे ,डॉ प्रसाद ने श्यामा का निरीक्षण किया और क्षुब्ध हो बोले –” सॉरी -अब वो नहीं रही।
गुड़िया दादी से लिपट कर दहाड़ें मार कर चीख चीख कर रोती रही -श्यामा के मुख को चादर से ढंकते हुए डॉ प्रसाद ने कहा –”मुझे आपसे ऐसी उम्मीद नहीं थी -सिस्टर राजम्मा ”

राजम्मा तो जैसे विक्षिप्त सी हो चुकी थी,-हताश-निराश बस सोचे जा रही थी—”-श्यामा पानी मांगते मांगते जीवन की लड़ाई हार गई…उसकी आत्मा प्यासी ही रह गई। वह कैसा मनहूस पल था, उसके जीवनमे जब उसकी तुच्छ नींद,व्यक्तिगत तनाव , एवं पेशे से लापरवाही के कारण उसका कोई प्यारा मरीज जान से हाथ धो बैठा था,”–केबिन में चुपचाप बैठी राजम्मा के आंसू रुक नहीं रहे थे,–”मैं तुम्हारी अपराधिनी हूँ अम्माँ !”
उसका मन बारबार उसे धिक्कार रहा था -‘ काश! वो वार्ड का एक चक्कर लगाकर उसकी तबियत के बारे में जानकारी ले लेती, हमेशा की तरह -तो शायद श्यामा की जान बच जाती ,यूँ प्यासी नहीं मरती…’
पुलिस भी आई जो श्यामा के परिजनो ने बुलाई थी, पर डाकटरों ने समझा-बुझाकर सारा मामला सम्भल लिया था। परिजनो को शांत करते हुए डॉ प्रसाद अतयंत विक्षुब्ध नजर आ रहे थे । शाम को विजिट करते समय ही उन्होंने देखा था कि श्यामा की हालत कुछ ठीक नहीं है। ब्लड-प्रेशर बढ़ा हुआ देख उन्होंने दूसरी शक्तिशाली दवा देने के लिए स्टाफ को कहा था,जो राजम्मा की लापरवाही के कारण नहीं दी जा सकी थी।–नर्सिंग प्रशिक्षण के समय मानव-सेवा, विषम परिस्थितियों में भी हार नहीं मानने की शपथ आज झूठी नजर आ रही थी ।
श्यामा के शव को वार्ड से हटा दिया गया -नम आँखों से श्यामा को जाते हुए देख कर राजम्मा अत्यंत भाव-विह्वल हो उठी थी। पीड़ा व् दर्द से ह्रदय कराह उठा था। दस नं बेड का खालीपन उसे कचोट रहा था, नजरें न चाहते हुए भी बार बार उधर ही चली जातीं–चारो तरफ खिलखिलाकर हंसती हुई श्यामा…स्लाइन चढ़ाते समय दर्द की शिकायत करती श्यामा, कभी सूजे हाथों पर कोई दवा लगाने का आग्रह करती श्यामा , फूंक फूंक कर चाय के घूंट भरती हुई न जाने कितनी कहानियां सुनाकर पूरे वार्ड को हंसाती हुई श्यामा नजर आ रही थी।

राजम्मा आज खुद को अपराधी महसूस कर आरोपों के कटघरे में खड़ा पा रही थी। इसके पहले भी कई लापरवाहियां हुई हैं उससे पर अब तक किसी की जान नहीं गई थी। वे सारी गलतियां समय रहते सुधार ली गई थीं। आज न केवल उसकी कर्तव्य भावना कलंकित हुई थी,बल्कि उसकी ममता, संवेदना, सहानुभूति, सेवा, त्याग व समर्पण की भावना भी कलंकित हुई
थी,– वह जानती थी कि हास्पिटल से उसे निलम्बित कर दिया जायेगा,-शायद मुकदमा भी चले, या उसकी वर्षों की कर्तव्य परायणता को देखते हुए उसे माफ़ भी कर दिया जाए -पर वह खुद को कभी माफ़ नहीं कर पायेगी। –”’बिटिया’का
सम्बोधन दे उसे अपनापन देने वाली अम्माँ के प्रति उसने अपराध किया था। अचानक वह फूट फूट कर रो पड़ी –”मुझे माफ़ कर दो अम्मा –मुझे माफ़ कर दो!”…

1 Comment on कहानी समकालीनः मुझे माफ कर दो अम्माः पद्मा मिश्रा/ लेखनी-मार्च-अप्रैल 16

  1. I have no word for this story but feel the own life when this accident happens…….

Leave a Reply

Your email address will not be published.


*