माह विशेषः मन जो यह एक समन्दर -शैल अग्रवाल/ लेखनी मई-जून 16

हाहाकारमन समंदर
मन के समंदर में तैरती
हर नैया को किनारा नहीं मिलता
कुछ डूब भी जाती हैं
अपनी नहीं होती हर वह नाव
किनारे तक जो आए
अक्सर ये लंगर तोड़ जाती हैं
डूबती नैया का खजाना
तो अतीत की अमानत है
मत पुकारना पीछे से इन्हें
मुडकर देख भी लें तो क्या
राही कब रुक पाए हैं
कश्तियाँ समंदर में तैरती हैं
कश्तियों में समंदर समा पाते नहीं
इतिहास की चट्टान पर
किस किस ने अपने नाम लिखे
दौड़ी तो थी हर लहर
पर कितनों ने ये किनारे छुए
इच्छाओं के सीप
बिखरे पड़े हैं समय की रेत पर
और बूढ़ा समंदर रो भी न सका
लहरों के हाहाकार पर…

 

 

 

 

सागर से मन में कब डूबी
मन समंदर

सागर से मन में कब डूबी सूरज सी हर बात
लहर लहर का शोर और रेत रेत की प्यास।

चांद खड़ा खिड़की से बोला बढना घटना जग का भाव
मन बेचारा कैसे बूझे, एक सीमा भी लांघ सके ना पाँव।

तीखे हैं आँखों के सपने, तीखी मन की आस
तीखे सूरज की ज्वाला से जलते धरती आकास।

बूँद बूंद बरसा है अब भटकेगा यह मेघ विपुल
किरन-किरन धरती की आस ओढ़े बैठी इंद्रधनुष।

 

 

 

 

तट पर
मन समंदर
ढूँडता था बचपन कभी
गीली रेत में सीप घोंघे
चिकने चमकीले
सीपि और पत्थर

सहेजता समेटता था
सब समझ वक्त की
एक अनबूझ पाती

आज उसी गीली रेत में
ढूँढ रहा हठी क्यों
एक और बन्द बोतल

लिखा हो जिसपर
इसका ही नाम पता
बहाया हो किसी ने
बस इसी के लिए

और अब
मन के चोर कोने में
लगता जाता है ढेर
बन्द बोतलों का
जो लिखी तो गईं
पर बहीं ना तैरीं
क्योंकि एक भी तो
लहर ऐसी ना उठी
तट को जो छोड़े ..

 

 

 

 

निशब्दमन समंदर

अनायास उठती इस लहर ने
सभी किनारे तोड़ दिए हैं
सारे शब्दों को डुबो दिया है
खुद से जूझती
तुम्ही कहो कैसे अब मैं
खुद को ही खुद में
डूबने से बचा पाऊँगी
क्या तुमने भी सुना था
मेरे आर्त मन का
वह दारुण मौन चीत्कार
मन की इस गीली रेत में
उस शाम तुम्ही तो थे
जो टहल रहे थे
मेरे आसपास
मेरे साथ-साथ।

 

 

 

 

लहरें
मन समंदर
आधी-अधूरी
टूटती बिखरती
ये इच्छाएँ
आगे आगे दौड़ती जातीं
पीछे पीछे सब छोड़
भूलकर तोड़कर
अपना ही अस्तित्व
लेकर वही
झाग फेंकती फुंफकार
क्या लेने दौड़ी थी
यह भी तो इन्हें
अब याद नहीं…

 

 

 

 

मन जो यह मेरा एक समंदर
मन समंदर

लहर लहर हजार हाथ ले
नन्हे-नन्हे पांव चले
बूंद बूंद जिज्ञासु शिशु
जाने क्या-क्या खोया पाया
उत्सुक घूमा जाने कितने तट

मन जो यह मेरा एक समन्दर…

सिर धुनता और भटकता
फेनिल झागों को पीता
रेत पत्थर सीप और मोती
निगलता और उगलता चलता
जीवन खेले खेल की तरह

मन जो यह मेरा एक समन्दर…

बाहर से दिखता शांत
अंदर ही अंदर पर
पथिक बेचैन अकिंचन्
पथ से मांग ओढ़े रंगरूप
समेटे खुदको फिरफिर उठता गिरता
निश्चल निर्मल तो कहीं मलिन

मन जो यह मेरा एक समन्दर…

काली फुसफुसी रेत-धंसा
आलोड़ित,उद्वेलित प्रयत्नरत्
नित नित ही बढ़ता घटता
आकाश बसे चंदा के ज्वार
टिका रहे यूँ ही निशि दिन

मन जो यह मेरा एक समन्दर…

आगे-पीछे कुछ ना जाने
तटतट छूता योगी-सा घूमे
खुद अपनी ही सीमा बांधे
खुद को ना पहचाने पर

मन जो यह मेरा एक समन्दर..