कविता आज और अभीः समंदर कुछ कविताएँ/ लेखनी मई-जून 16

जतिन्दर परवाज़, शिखा वाष्णेय, शील निगम, श्यामल सुमन

boating

ज़रा सी देर में दिलकश नजारा डूब जायेगा
ये सूरज देखना सारे का सारा डूब जायेगा
न जाने फिर भी क्यों साहिल पे तेरा नाम लिखते हैं
हमें मालूम है इक दिन किनारा डूब जायेगा
सफ़ीना हो के हो पत्थर हैं हम अंजाम से वाक़िफ़
तुम्हारा तैर जायेगा हमारा डूब जायेगा
समन्दर के सफ़र में क़िस्मतें पहलु बदलती हैं
अगर तिनके का होगा तो सहारा डूब जायेगा
मिसालें दे रहे थे लोग जिसकी कल तलक हमको
किसे मालूम था वो भी सितारा डूब जायेगा
-जतिन्दर परवाज़
 

 

 

 

boating

आँखों का सागर.

सागर भरा है
तुम्हारी आँखों में जो उफन आता है
रह रह कर और बह जाता है
भिगो कर कोरों को
रह जाती है एक सूखी सी लकीर
आँखों और लबों के बीच
जो कर जाती है
सब अनकहा बयाँ
तुम रोक लिया करो
उन उफनती , नमकीन लहरों को,
न दिया करो बहने
उन्हें कपोलों पे
क्योंकि देख कर वो
सीले कपोल और
डबडबाई आँखे तुम्हारी
भर आता है
मेरी भी आँखों का सागर.
(शिखा वार्ष्णेय)

 

 

 

 

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ओ! सागर!!!

ओ! सागर! तुम इतने खारे क्यों हो?
कहाँ से लाते हो इतना खारापन?
उच्च पर्वतों से निकली,अठखेलियाँ-बल खातीं, इठलातीं मीठी नदियाँ ,
कभी झरनों सी झरझराती, कभी झीलों सी झिलमिलातीं मीठी नदियाँ ,
बाँधों से हरहरातीं, दुनिया की प्यास बुझा,धरती को लहलहातीं नदियाँ,
प्रिय-मिलन को आती अभिसारिका सी,तुम पर सर्वस्व लुटातीं नदियाँ,
फिर भी.… तुम इतने खारे क्यों हो? कहाँ से लाते हो इतना खारापन ?
सारे संसार को अपने नमक के स्वाद से आनंदित कर नमकीन बनाते हो.
इस दुनिया की सारी कड़वाहट अपने में भर कर और संगीन हो जाते हो.
प्रकृति की अनुपम देन से अपने गर्भ में अनंत जीवों की क्षुधा मिटाते हो.
अपनी गरमाहट से तट पर बैठे प्रेमी-जोड़ों को प्रेम का पाठ पढ़ाते हो.
फिर भी.… तुम इतने खारे क्यों हो? कहाँ से लाते हो इतना खारापन ?
ओ! सागर! तुम इतने खारे क्यों हो? कहाँ से लाते हो इतना खारापन?
शोर मचाती उत्ताल-तरंगों के संग आकाश को छूने को मन ललचाता है,
पर विशाल काया के अंदर की हलचल की सुनामी से मन डर जाता है,
तट से क्षितिज तक फैला तुम्हारा असीम साम्राज्य मन को भा जाताहै,
कभी उगते-डूबते सूरज-चन्द्र के रंगों में सतरंगा इन्द्रधनुष समा जाता है,
फिर भी.… तुम इतने खारे क्यों हो? कहाँ से लाते हो इतना खारापन ?
ओ! सागर! तुम इतने खारे क्यों हो? कहाँ से लाते हो इतना खारापन?
-शील निगम

 

 

 

 

boating

सबके आँख समन्दर देखा

भालू देखा बन्दर देखा
यह लोगों के अन्दर देखा

जो दबंग हैं नालायक भी
उसको बना सिकन्दर देखा

सुख सारे शोषण के दम पर
भाषण मस्त कलन्दर देखा

सांसद की नैतिकता में भी
कितना बड़ा भगन्दर देखा

विकसित देश सुमन का ऐसा
सबके आँख समन्दर देखा
-श्यामल सुमन