कहानी समकालीनः बीजः शैल अग्रवाल/ लेखनी-जनवरी/फरवरी 16

बीज़
सूरज डूबने वाला था ।

आकाश के जादूगर ने काली चादर निकाल ली थी और जल्दी-जल्दी सब समेटने को व्यग्र था ।

क्षितिज तक पहुँच कर भी  यह सूरज  डूबने पर  ही क्यों मजबूर है और इसका हर दिन अंधेरे के साथ एक घोर  संघर्ष के बाद ही क्यों शुरु हो पाता है?  क्या कोई आसान और मनचाहा रास्ता नहीं जीने का, इस दुनिया में रहने-बसने का… उलझन ही थी, नव्या के मन की भी और जिज्ञासु वैज्ञानिक सोच की भी। चटपट के इस युग में बनाने और संवारने की, या यूँ लड़ते रहने की फुर्सत ही किसके पास है? शकल- सूरत, बच्चे …  जब हर चीज ही  मनमाफिक चुनी और खरीदी जा सकती है, तो संघर्ष किस बात का?

‘स्वाद और संतोष का’- मन के अदृश्य कोने से अस्फुट एक आवाज उठी, ‘अंततः इसी में तो अस्मिता और उपलब्धि, सबकुछ डूब जाता है।‘

नव्या अंतस् के दार्शनिक से प्रायः चमत्कृत भी होती और उस पर खीजती भी। बड़े-से-बड़े सुख-दुख को कितनी आसानी से नकार जाता है यह। माना कि कुछ चीजें अभी भी हम चुन नहीं सकते जैसे कि पैदा होने और मरने की जगह या वक्त आदि, पर जैसे-जैसे विज्ञान आगे बढ़ रहा है वह दिन भी तो दूर नहीं, जब यह भी संभव हो, शायद!

ईमानदारी से सोचा जाए तो जितना ही धरती और आसपास के गृह, उपगृहों के बारे में ज्ञान बढ़ रहा है उतना ही इसकी विराटता का अहसास और इस अबूझ के प्रति भय भी तो। अपनी लघुता और क्षण-भंगुरता को जीतने की ही तो खोज है यह मानवता और संस्कृति की दौड़…नित नई ज्ञान-विज्ञान की बातें। चलने को तो जिन्दगी हजारों वर्ष ऐसे ही चल सकती है और खतम होने को कल ही कोई बड़ा गृह-उपगृह टकरा जाए तो बस एक ही बड़े धमाके के साथ सब खतम। या फिर शायद एक और ‘बिग बैंग‘ और एक और नयी शुरुआत । बस, हम ही नहीं होंगे। कम-से-कम ‘हम ‘ के जिस रूप को जानते हैं, उस रूप में तो नहीं ही।

नव्या हंसे बिना न रह सकी अपनी ही सोच पर।

…पर क्या रूप, पसंद यह सब भी पलपल बदलते नहीं रहते? कल की ही  सी तो बात है जब मम्मी के साथ शादी के वक्त बड़े चाव से पचास-पचास हजार की साड़ियां खरीदी थीं और आज औक्सफौम  में दे आई है उन्हें, यहाँ अमेरिका शोध पर आने के ठीक पहले। जरूरत ही नहीं अब उसे। दस बारह पौंड की ये पौलिएस्टर की पैंटें ही बढ़िया हैं अब तो। पहनो और वाशिंग मशीन में डाल दो। न ड्राइक्लीनिंग की जरूरत न घंटों की उलट-पुलट और देखभाल की। वक्त की जरूरतों पर खरा उतरे , वक्त के साथ साथ चले वही बचेगा और इसके लिए समझ और समझौते दोनों को ही आधुनिकतम् रखना जरूरी है। फिर चुनौतियों से हारे नहीं, जीते, वही तो आधुनिक है।

सामने अपनी ही रक्तिम और स्वर्णिम आभा में डूबा सूरज युद्ध भूमि में शहीद होते सैनानी-सा  दिख रहा था ; मानो युद्धभूमि में लड़ता वीर नायक हो। नायक तो सही, पर थका-हारा और अब रोया,तब रोया क्यों? नव्या ने ब्रेक पर पैर मारा । रेगिस्तान में सुकुमार पौधे को लहलहाते देख सुखद आश्चर्य हुआ था, कुचलकर आगे नहीं बढ़ पाई थी वह।

‘ मौसम बदल रहा है शायद रेगिस्तान तराइयों में पलट जाएँ और तराईयाँ …. ‘ यही तो हकीकत थी, एक ऐसी हकीकत जिसे आज  भी  स्वीकार नहीं पाई नव्या।

हारना शब्द उसके शब्दकोश में नहीं था।  बदलना और थामना चाहती थी वह सृष्टि और इसकी परिवर्तनशील प्रकृति को। अनकहे नियमों को। चुनौतियाँ संघर्ष नहीं, परिणाम और उपलब्धियाँ बनकर ही आई हैं उसके जीवन में…कुछ कर गुजरने की चाह बनकर साथ रही हैं । यही वजह है शायद कि आज नव्या शाह जीव विज्ञान के क्षेत्र में यूरोप, अमेरिका और भारत में ही नहीं, विश्व भर का जाना-माना नाम है। पृथ्वी पर जो भी बचाने लायक है, अवश्य बचाएगी वह। एक ईमानदार कोशिश तो करेगी ही। कितनी भी बूढ़ी हो चुकी हो यह पृथ्वी कोई तो रास्ता होगा इसे फिरसे हरा-भरा करने का। उसके अपने जीवन में नहीं तो अगली एक दो पीढ़ी में तो यह संभव होना ही चाहिए। बस यही एक धुन..एक सपना था अब तो उसका।

जब भी मौसम या प्रकृति में बदलाव आया है पूर्व सूचना इन्ही साधारण सी घास पूस और कीड़े-मकोड़ों ने ही तो दी है। कितनी अजीब बात है; हवा पानी और प्रकृति जिसे रोज ही खाते-पीते, ओढ़ते-बिछाते हैं, परिचित होकर भी  इससे कभी पूर्णतः परिचित नहीं हो पाते हम। सहज तो ठीक, वरना इसके कोप के आगे कौन टिक पाया है। इन रहस्यों की तह तक पहुँचने के लिए ही तो यूँ जगहृ-जगह भटक रही है नव्या…जंगल और रेगिस्तानों तक में।

पूरी रात नवादा के बीहड़ रेगिस्तान में दौड़ते-दौड़ते ही निकाल दी  है नव्या ने । गुर्राता-हांफता कार का थका इंजन तक आराम करने की विनती करने लगा  है अब तो । कार का कम्पस फेल होते ही कोई दिशा ज्ञान  नहीं बचा उसके पास।  कैसे और कहाँ रुक सकती थी वह इस वीराने में! अनजाने और अँधेरे उस विस्तार में जो भी राहत और रौशनी मिल पा रही थी, दादा जी के साथ बचपन से जाने-समझे झिलमिल तारों के समूह से ही तो मिल पा रही थी। वही सात सखी का झूमका और तीन तारों का पलटा… रातभर उसे न सिर्फ सही वक्त बता रहे थे,  अपितु यह भी निर्देश दे रहे थे कि उत्तर-दक्षिण किधर को है, और किधर को पूरब व  पश्चिम , किधर को मुड़कर देर-सबेर ही सही, वह अपने गन्तव्य तक वह पहुँच सकती है। किस्मत ही तो है कि एक बार फिर से अटक गई है वह यहाँ वरना इन अनजाने और अप्रत्याशित विलंबो को तो जरूरत ही नहीं थी।

नव्या के पास कुछ नहीं था सिवाय एक अनुमान, एक सिद्धांत के। आने वाले खतरे या बदलाव को इंगित कर रही एक नयी तरह की वनस्पति के; जिसे लैब में अभी जांच तक नहीं पाई थी वह, पर जिसकी संरचना और रंग दोनों बेहद ही फर्क नजर आ रहे थे और बारबार ध्यान खींच रहे थे उसका।

अपनी इस अथक और जिद्दी खोज से थकी या हारी नहीं थी वह अभी। तपते रेगिस्तान में भी इक्की-दुक्की नयी तरह की वह हरियाली ढाढस दे रही थी उसे, विश्वास दिला रही थी कि सवालों का, इन अबूझ रहस्यों का जबाव उसे इसी रेगिस्तान से ही मिलेगा। इससे ज्यादा विषम परिस्थितियाँ और इससे अधिक जीवटता और भला कहाँ अध्ययन करने को मिल सकती है?

फिर, एक बार लत् लग जाए, तो  झुटकारा  पाना भी तो इतना आसान नहीं। कैसे विलग करे कोई खुद कोः मन से, मस्तिष्क से, सपने डूबी आँखों से।  टूटें, तो भी  किरकें, और  अगर ना टूटने दो तो  आजीवन छलें और भटकाएँ , दुःख दर्द बांटे बगैर  .. एक अदृश्य भ्रम  और छलावा बने… आकाश पर सजे तारों से, दूर-दूर  छिटके-ठिठके, रिझाते-लुभाते, पास दिखते  जरूर, पर  पास नहीं । परिचित, पर अपने नहीं।

कहते हैं हर तारा एक सूरज होता है ; बस, हमारे सौर मंडल से दूर,  बहुत दूर। ..  तो क्या आँख का तारा भी। पिछले चन्द दिनों के अपने इस एकाकी सफर में .यह बात नव्या  भलीभांति जान गई थी कि आँख के तारों के साथ भी रहना और पालना आसान तो नहीं। आँखों में ही सूरज को बिठा लो, तो जलन सहने की आदत तो डालनी ही पड़ती है …तन से भी और मन से भी।

नव्या ने आदत डाल ली थी।

वैसे भी, सूरज, चांद,  तारों से भरे आसमान के अलावा कुछ  और था भी तो नहीं वहाँ,  देखने, सोचने या मन बहलाने को। मन बहलाना…सोच मात्र से ही  नव्या हंस पड़ी …काश, जिन्दगी इतना वक्त  देती कभी उसे।

वैसे तो परिपक्व उमर और सच्चे झूठे सैकड़ों अनुभव कम नहीं होते, सच और सपनों का फ़रक समझाने के लिए…शर्त बस इतनी है कि कोई समझना चाहे ! पापा कहा करते थे- आदमी जैसे वातावरण में रहता है, जैसे लोगों से मिलता-जुलता है, वैसी ही सोच बन जाती है।एक छोटे बच्चों को पढ़ाने वाला मास्टर उम्रभर बच्चा ही बना रह जाता है। कोई वास्ता  जो नहीं पड़ता बडों की दुनिया से। क्या जाने वह बड़ों की दुनिया के बारे में। तो क्या नव्या का मन  केमिकल ट्यूब्स और किताबों जैसा नीरस और सपाट हो चुका है…वह भी तो चौबीसों घंटे इन्ही के साथ जगी और सोई है? शायद,हाँ।..इन्ही सी बेजान और संवेदनहीन ही तो होती जा रही है वह भी। घर-बार की तो छोड़ो, पति कहाँ हैं, बेटा कहाँ है, कैसा है, यह तक तो होश नहीं रहता अक्सर उसे। पिछले अठारह घंटों में कोई बात नहीं हुई है किसी से। कार के रेडिओ के अलावा कोई दूसरी आवाज नहीं सुनी है उसने। घर से चलते वक्त ऐसा तो नहीं सोचा था, फिर मोबाइल भी तो सिगनल नहीं पकड़ रहा है। अचानक मन भर आया।

कहाँ उलझ गई वह भी… क्या हैं यह मन और क्या है इसका बहलना? क्या .यह सब बस भटकने और भटकाने वाली ही बातें नहीं?..क्या यह शरीर मात्र एक यंत्र ही नहीं? और यह मन इसकी रगों में दौड़ता एक रसायनिक आंदोलन। रसायनिक आंदोलन? …समझ में नहीं आ रहा था नव्या को कि अपनी इस बेतुकी सोच और तर्क-वितर्क का एक भी सिरा। वह एक वैज्ञानिक थी, बिना प्रमाण के कुछ भी मान लेना आदत में नहीं था, फिर भी उस पल जाने किस भावावेश में  वह सबकुछ मान लेना चाहती थी, परियाँ और ईश्वर तक को भी।  …

सामने भोर की ठंडी रोशनी में रेत के कण चांदी से चमक रहे थे, मानो रेत का समंदर हो। हां, समंदर भी सही ही शब्द है …रहस्यमय और विशाल। समंदर की तरह रेगिस्तान में भी तो भांति-भांति के जीव-जन्तुओं का घर बनता चला जाता है। उमर गुजारी जा सकती है इसे पढ़ते और समझते। उड़ती छिपकली और मेढकों ने शुरू शुरू में जिज्ञासा जरूर बढ़ाई थी पर अब तो बारबार बस उन्हें ही देखते-देखते ऊब-सी हो रही थी नव्या को।

कुछ ही देर में ठंडी हवा ने गरमाना शुरु कर दिया था।

रात की कालिमा को चीरती किरणें  अब सीधी  आँखों पर पड़ रही थीं और तीखे कांच-सी चुभ  रही थी। नींद से बोझिल आँखों को  बारबार पोंछती नव्या ने साफ साफ देखना चाहा, पर  अगले पल ही सामने से उमड़ती हजारों टिड्डों की काली आँधी ने सब घटाघोप कर दिया। अभी वह हिम्मत नहीं हारी थी, हाँ एक बात जरूर चोरी-चोरी मन और   मस्तिष्क में कीड़े-सी घुसी  धैर्य के साथ-साथ अब उसके संकल्प तक को कुतरे जा रही थी। ‘ बहुत हो चुका। बस, अब और नहीं। कैसे भी एक बार  इस बीहड़ से निकले,  तो निश्चय ही  कुछ महीने बस आराम करेगी !’ पक्का मन तक बना लिया था अब तो उसने ।

आदतन डायरी और कंपस बाहर निकाले और  जगह का उत्तरांश और दक्षिणांश सही-सही ढूँढने  लगी वह।  फिर   तुरंत याद आते ही कि कंपस तो कबका फेल हो चुका है, बेबसी पर हंसते हुए,  पैरों के पास ही सबकुछ वैसे ही वापस भी  रख दिया  उसने…। अब खिड़कियों के साथ कार का  इन्जन तक बन्द करके वह इस नयी आपदा के टलने का इन्तजार करने लगी । कोई और रास्ता भी तो नहीं था उसके पास, विशेषतः अब,जब कि रेडिओ तक औन करने की हिम्मत नहीं बची थी । कहीं बैटरी न बैठ  जाए… फालतू खतरा  मोल नहीं ले सकती थी वह। पूरी उर्जा बचानी होगी। … अगला गैस स्टेशन पता नहीं  कहाँ और कितनी दूरी पर मिले, मिले भी या न मिले। भगवान से प्रार्थना कर रही थी अब तो वह कि कैसे भी जल्दी ही इस रेगिस्तान से छुटकारा  दिलाएँ और वापस सभ्यता में , आदमियों के बीच, किसी शहर तक पहुँचा दे, बस। आभास नहीं था  कि वह इस रेगिस्तान में कहां और पास के किसी भी शहर से कितनी दूरी पर है? चारो तरफ अंधेरा इतना बढ़ चुका था कि नंगी आंखों से देख पाना, दिशा या जगह का सही अनुमान लगा पाना संभव ही नहीं था। टिड्डियों के उड़ते जत्थे ने पूरा-का-पूरा सूरज ही निगल डाला था और निढाल  नव्या व्यग्र,  उस रेत के विस्तार मे बड़ी हिम्मत के साथ, सैकड़ों  उमड़ते कीड़ों के भयावह दृष्य से अकेली  ही जूझ रही थी अब ।  आराम तो दूर, थकने तक का वक्त नहीं था अब तो उसके पास। सिर झटककर, पीछे छूटे जीवन में तुरंत ही वापस पहुँचने की  उस व्यग्र ललक को चुपचाप चाभी के गुच्छे  सा ही  सहेज कर वापस पर्स में रख लिया था  उसने ।

जैसे जैसे देर हो रही थी , वक्त एक असह्य व्यग्रता के साथ बेशकीमती होता जा रहा था।

वैसे भी,  क्या हैं ये सपने…एक याद, एक महत्वाकाक्षा, एक अप्राप्य लक्ष्य या फिर काला जादू? …छूटी-टूटी असंभव सी ख्वाइशों का कंटीला झाड़! ह़ृदय, मस्तिष्क, सभी का तो हाथ रहता है इसके जुटाव…इस संरचना में; फिर आँखों को ही क्यों दोषी माना जाता है? क्या ये मात्र एक गलियारा ही नहीं , जहाँ बेमतलब टहलते, बसते और भटकते रहते हैं हम ! फिर ये ही क्यों झरती-बहती रहती हैं अपनी ज़िद में, बिन सावन के मेघों सी; मौके-बेमौके, हर पल ही।

नम आँखों को सदा ही बड़ी चतुराई से छुपा ले जाने वाली  नव्या अपना सूनापन बांटने को बेचैन हो चली थी और आसपास क्या दूर-दूर तक कोई नहीं था ।   … क्यों न वह एक बार जोर-जोर से फूटफूटकर रो ही ले…यहाँ तो किसी लाज शरम की, आँसू पोंछने तक की, जरूरत नहीं । कोई आवाज तो पड़ेगी कानों में- उसने रोना चाहा परन्तु गले से आवाज नहीं निकली। भयभीत नहीं थी, सच्चाई तो यह थी, कि जोर-जोर-से रोना आता ही नहीं था धीर-गम्भीर नव्या को।

शायद थकान और रेगिस्तान के निर्जन अकेलेपन का ही असर था कि अपनी ही बेतुकी सोच में डूबी और थकी  नव्या ने छोड़ दिया खुद को औऱ अपनी आँखों को भी मनमानी करने के लिए। भीग जाने दिया  चेहरे की सारी निढाल थकी मांसपेशियों के साथ, गर्दन, कपड़े और मन को भी। ढाढस मिल रही थी उसे  तपते रेगिस्तान में बहती आंसुओं की इस अनियंत्रित ठंडी लड़ी से ।

कहते हैं सपने आँखों में रहते हैं।.. पर आँखों में इतनी सामर्थ कहाँ जो इन बड़े-बड़े सपनों को समा और संजो ले ! कम ही सपनों में सच का चोला पहनकर सामने  आ पाने की सामर्थ होती है।  ये आँखें सपने देखती और पालती जरूर हैं, पर अधिकांश की किस्मत में अनाथ भटकना ही तो लिखा होता है। या  तो आँसुओं के साथ  टूट और झर जाते हैं ये, या नियंत्रण न रखो,  तो पूरा अस्तित्व ही निगल लेते हैं । गुलाम बना लेते हैं अच्छे खासे स्वस्थ व्यक्ति को भी, कभी महत्वाकांक्षा बने, तो कभी राग-लगाव बने। काया में रचे-बसे रोग-से हो जाते हैं। नव्या का भी  एक ऐसा  ही सपना है, जो अब  उसके जीवन को,  जीवन की हर  दिनचर्या तक को निगल चुका है। अपनों से ही नहीं, खुद तक से  विलग कर दिया है इसने उसे। देश-विदेश, न जाने कहां-कहां भटका रहा है ख्याति प्राप्त जीव वैज्ञानिक  नव्या शाह को उसका जिद्दी और असाध्य सपना-विनाश के कगार पर खड़ी इस धरती को कैसे बचा सकते हैं हम…यदि धरती नहीं तो कम-से-कम बचाने लायक तत्वों को कैसे बचाया जा सकता है…तत्व शब्द उतना ही उलझा हुआ था जितनी कि नव्या की सोच…वैज्ञानिक थी माना पर ईश्वर नहीं जो नोहा की नाव बनाकर सब मनमाना भर ले, कहीं अक्षुण्ण टापू पर सहेज ले  ।

याद नहीं आ रहा था कि यह सपने देखने का क्रम कब और कहां-से शुरू हुआ था  उसके जीवन में; वहाँ से  शायद जब पापा ने पांच साल की  लाडली को गोदी में लेकर कहा था, जीवन में कुछ ऐसा सार्थक और अनूठा करना बेटी कि हर आदमी देखे और कहे कि देखो यह नव्या के पापा जा रहे हैं… मात्र धीरज शाह की बेटी नव्या नहीं।  बोलो बेटी, मुझे अपनी पहचान दोगी ना…मेरे सपनों का सहारा बनोगी ना?और तब बहुत प्यार से दोनों बाहें पापा के गले में डाल कर धीरे-से हमेशा की तरह मुस्कुरा भर दी थी  नव्या। ऐसी ही थी नव्या बचपन से ही- कहने और समझने का, दोनों ही काम बेहद किफायत के साथ एक मुस्कुराहट के साथ ही पूरा करने वाली।  उस दिन भी चुपचाप पापा की बात मानती, मुस्कुराती वहीं बैठी रह गई थी वह। पापा जानते और समझते थे बेटी के मन को भी और उसकी काबलियत को भी। इसी लिए तो क्या करना है , कैसे करना है कोई निर्देश नहीं देते थे उसे । जानते थे कि हर उमड़ती नदी को खुद ही अपनी राह तराशनी होती है।

वह दिन है कि आज का दिन है …तीस-बत्तीस साल बाद भी पापा के उसी ‘कुछ’ को ढूँढती ही तो भटक रही है नव्या। पापा को अपनी पहचान दिलाने की कोशिश में,  आइना तक देखना भूल चुकी है उनकी लाडली।

आँधी गुजर चुकी थी और आसमान साफ हो चुका था। कार वापस  स्टार्ट कर ली नव्या ने। रास्ता नहीं भूली थी वह, बस रेगिस्तान के रहस्यों ने भरमा लिया था उसे और गुत्थियाँ सुलझने के बजाय और भी उलझती ही जा रही थीं।…कार सड़क पर भाग रही थी और नव्या अपने विचारों के साथ।

धावा तो बहुत जोर से बोला था पर कुछ ही पलों में वह भयावह आँधी सर्रर् से जैसे आई थी , निकल भी गयी।

एकबार फिर तेज चमकती धूप से आकाश भर गया। कुछ दूरी पर हरियाली भी दिखी। जरूर कोई बस्ती होगी पास ही में। अचानक नव्या का दिल किशोरियों सा बल्लियों उछलने लगा। लगता है कि अब मंजिल दूर नहीं…मन किया तालियां बजाए, जोर-जोर से कहकहे लगाए। परन्तु तुरंत ही खुद को संयत करके गाड़ी की स्टीयरिंग वापस संभाल ली उसने। कार के बन्द शीशों से भी जबरन घुस आया और साथ-साथ चलता वह चमकता गुलाबी धूप का टुकड़ा अब उसे राहत दे रहा था…देश, गांव और घर की याद दिला रहा था। सुबह की गुनगुनी गुलाबी धूप जब रेगिस्तान की रात भर की ठंडी रेत पर पड़ती है तो रेगिस्तान हीरे सा चमकने लग जाता है  । और यही आंखों को सेंकती-सी किरणें बारह बजते-बजते प्रचंड होकर माथे तक को चटकाने लग जाती हैं……ग्यारह, साढ़े ग्यारह बजे तक तो उसे इस रेगिस्तान से बाहर निकल ही जाना होगा। उसने एक्सिलेटर पर पैर का जोर थोड़ा और बढ़ा दिया। गुनगुनी उस धूप में नव्या का पोर-पोर तक अलसा रहा था। जगे रहने के लिए जरूरी था कि वह खुद से ही बात करती रहे…गाती गुनगुनाती रहे।

धूप ने अब नींद से थकी आँखों के साथ साथ बोझिल मस्तिष्क को भी तिरकाना शुरू कर दिया था –  बहुत हो चुकी बदलते मौसम और बदलती सूरज की किरणों के बारे में जानकारी हासिल करने की यह दौड़…अब वह और किसी नए तथ्य और अनुसंधान पर काम नहीं करेगी… यूँ भटक-भटक कर जीवन बरवाद नहीं करेगी। कम-से-कम कुछ दिन तो जरूर ही बस आराम करेगी। पहले तो भारत जाकर अपनी पसंदीदा जगह कुलू-मनाली में हफ्ता बिताएगी…दीन-दुनिया और सारे कामों से दूर। आरून और प्रखर के साथ जी भरकर घूमेगी। कितनी पागल है वह …लोग विदेश; अमेरिका, आस्ट्रेलिया, और यूरोप घूमने  के सपने संजोते हैं और वह यहां पहुंचकर भी भारत लौटने को बेताब है। नव्या  को खुद पर, अपनी सोच पर हंसी आ गयी….चलो थोड़ा अमेरिका घूमकर ही वापस लौट लेगी पर एक बात तो निश्चित है, कि धूप पर तो फिलहाल और कोई अनुसंधान नहीं ही करना है उसे… कोई तथ्य जुटाने की हिम्मत नहीं बची है उसमें। सभी जानते हैं कि अल्ट्रा वायलेट रेज बढ़ रही हैं बढ़ते तापमान के साथ चमड़ी का कैंसर बढ़ेगा दुनिया में। फिर नया क्या ढूँढ लिया उसने ? या तो आदमी की नसल ही मिट जाएगी  पृथ्वी से धीरे धीरे या फिर कैक्टस की तरह मोटी चमड़ी वाले आदमी पैदा होंगे; कंटीले, विषाक्त और जीवट….कहीं भी, किसी भी परिस्थिति में जीने और जूझने का हुनर जानने वाले। कैक्टस-सा आदमी हंसी आ गई नव्या को अपनी सोच पर….अभी कौनसा कैक्टस से कम कटीला है आदमी का स्वभाव, जो कैक्टस से कंटीले और जीवट आदमी की कल्पना किए जा रही है वह !

कार एक निश्चित रफ्तार पर क्रूज कर रही थी। सूनी आँखें में खुद ही आ अटकी एक और याद  कार की रफ्तार से भी अधिक तेजी-से एकबार फिर ले उड़ी उसे।

कहानी अच्छी थी, बचपन में बहल भी जाती थी  नव्या,  मां जब दूर के तारे दिखाकर कहती -देख, वे तारे नहीं बड़े-बूढ़ों की आँखें हैं जो वहां,  स्वर्ग के पार से,  प्यार से टोहती हैं हमें। अपना आशीर्वाद और प्यार देती रहती हैं। तब, एक रहस्य …एक झूठमूट का सहारा-सा लगती थीं  मां की वे बातें , पर आज ऐसा नहीं। सच कहा जाए तो न तो हिम्मत ही बची थी और ना ही बचपन का वह विश्वास ही, जो  आज भी उन असंख्य तारों को एकबार फिर से कार की खिड़की से  घंटो बेमतलब ही निहारे … ढूँढे  कि कौन-सी वे आँखें हैं, जो उसकी अपनी मां की हो सकती हैं..घंटों क्या,  चन्द मिनटों को भी नहीं ।  इस उम्र में तो बन्द आँखों से ही देखना ज्यादा आसान और आरामदेह लगता है, विशेशतः तब, जब इतनी थकान हो जितनी कि नव्या को उस वक्त महसूस हो रही थी।  उन टिमटिमाते तारों में दादा जी को ढूँढना तो उसने उसी दिन से छोड़ दिया था, जब जिस तारे को दादा समझकर वह घंटों बातें किया करती थी, वही तारा उसकी आँखों के आगे  ही टूटकर  झट-से विलीन भी हो गया था…बिना बताए कि कहाँ जा रहा है, या फिर अब दोबारा तारा बनकर उग भी पाएगा या नहीं। क्यों याद आ रही  हैं ये सारी निरर्थक बातें उसे…वह भी इस रेगिस्तान में? कैसा सहारा चाहिए उसे?  सैंतीस वर्षीय नव्या शाह को तो बचपन से ही किसी सहारे की कभी जरूरत ही नहीं रही । ..

कौन लौटता है दुनिया से जाकर….लौटना तो दूर, पता तक नहीं मिल पाता किसी का  –बेहद भारी मन से नव्या ने कार की रफ्तार और तेज कर दी।  हाँ, एक बात तो है इन तारों के बारे में जिसे झुठलाना आसान नहीं-  कोई और साथ दे या न दे, इस चांद, सूरज और तारों भरे आसमान ने लगातार साथ दिया है। इस रेगिस्तान में भी। जरूरत पड़ने पर अकेला नहीं छोड़ दिया है उसे। एक तारा थक-हारकर टूट जाए तो दूसरा तुरंत ही झिलमिलाने लग जाता है  अपनी सारी जगर-मगर और सजधज लिए मुस्कुराते चंदा के साथ। और सूरज डूबते ही वादा कर देता है कि अगले दिन आँखें खोलने से पहले ही मैं निकल आऊंगा।  निराश मत होना।

शहर हो या वीराना, दिन हो या अंधेरी से अंधेरी रात, बेधड़क साथ  ही तो चलता है यह आसमान। यह बात दूसरी है कि इस आसमानी ढक्कन से भी कभी-कभी बड़ी ऊब होती है नव्या को। फिर यह ऊब ही तो ले डूबेगी हमें…यह ऊब ही तो भटका रही है वरना क्या जरूरत थी इस तरह से भटकने की, इस शोध कार्य में फंसने की। औरों की तरह वह भी तो घर में आराम से रह ही सकती थी, सारे सुख भोगती… आरुन के साथ खेलती। आरून की याद आते ही एक क्षीण मुस्कान कौंध गई नव्या की नम आँखों में। … क्या पता सच में होंते ही हों बड़े साथ इन तारों के रूप में…कौन जानता है, हों ही कहीं अम्मा भी उसके आस-पास ही, इन्ही तारों के बीच झुपी, प्यार से उसे देखती-दुलरातीं, आशीष देतीं ! एक पढ़ी-लिखी सुलझी वैज्ञानिक की ऐसी सोच? आश्चर्य हो रहा था  नव्या को खुद पर, बचकानी  इस मनःस्थिति पर।

तभी, वह जाने कहाँ से आया और सरपट गाड़ी के आगे से हवा की ही रफ्तार से यह जा, वह जा, गुजर गया। ‘ ए मरना है तो कहीं और जाकर मरो । मेरी गाड़ी के आगे नहीं। पर यह यहाँ ऐसे आया कहाँ से , दूर-दूरतक घर बस्ती की तो छोड़ो अभी तो कोई सड़क तक नहीं दिखी उसे।‘

नव्या हैरान थी।

इसके पहले कि कोई दुर्घटना हो उसने कसकर ब्रेक पर पैर मारा और अधरुकी गाड़ी से ही कूदकर अपरिचित की मदद के लिए दौड़ पड़ी । हत्प्रद करता सामने बस निर्जन रेत का विस्तार था। आस पास कोई अजनबी तो क्या चिड़िया का बच्चा तक नहीं दिखा उसे। नव्या हर दिशा में दस बीस कदम दौड़ी भी कि शायद वह दिख जाए । नव्या को अच्छा लगा था तीन दिन बाद अपने अलावा किसी और को देखना। वह तो उस पैदल चलते आदमी को शहर तक लिफ्ट देने की योजना भी बना चुकी थी मन ही मन, पर अब वहाँ कोई नहीं था, उससे बात करने, साथ चलने को ।

पता नहीं मरुधर निगल गया या आसमान खा गया। हाँ, पैरों से चार कदम की दूरी पर वही बनस्पति जरूर लहलहा रही थी। नव्या ने एक टहनी काटी और साथ वापस कार में रख ली। बैठते ही कार धूप के एक सुनहरे गुबार से भर गई । हाँ, गुबार ही सही शब्द है उस धूप के आवेग के लिए।

धूप का वह गुलाबी-सुनहरा टुकड़ा मनमोहक और संक्रामक था रुप और राहत दोनों में ही। अचानक ही उसे हवा संग आता एक दिव्य संगीत सुनाई देने लगा मानो तारे गा रहे हों, जैसा कि बचपन में होता था जब वह बहुत खुश होती थी। नव्या अब खुद को बेहद हल्का महसूस कर रही थी। इतना हल्का कि रेत के एक कण-सी  गुबार में गोल-गोल खुद भी तो घूम रही थी वह अब।

खुश ही नहीं, बेहद खुश थी नव्या। सारी उदासी, सारी थकान मिट चुकी थी उसकी।

कार वापस स्टार्ट करने के लिए हाथ बढ़ाया तो खुद अपनी ही बांहों के टहनियों जैसे हलके पन ने चौंका दिया उसे। खुद को महसूस करना चाहा तो बस हवा-सी एक रेशमी सरसराहट ही थी ।

‘-तो ऐसे बचाती है सृष्टि खुद को-उसी की तरह मनमाफिक कटिंग ले-लेकर।’

प्याज के छिलके से सभी  रहस्य खुद ही अनावृत हो रहे थे। जिस गुत्थी को सुलझाने के लिए पिछले 15 साल से वह भटक रही थी वह अब जाकर खुली , जब उसके पास बताने और बचाने को हाथ और जुबां तक नहीं  रहे ।

कुछ भी तो वश में नहीं।

अंदर ही अंदर उठती आह सी एक ठंडी  सिहरन थी बस । आकाश अभी भी वैसे ही तारों से भरा झिलमिला रहा था। कुछ नहीं बदला था। बस, नव्या ही हो कर भी, अब नहीं थी।

अंदर से उठती हवा की तरंगों पर अगले दिन के अखबारों की हेडलाइन जरूर गूंज रही थीं उसके चारो तरफ – साफ-साफ और स्पष्ट।

‘दुनिया भर से रहस्यमय तरीके से गायब होते सैकड़ों नागरिकों की तालिका में नया नाम अब जीव वैज्ञानिक ‘नव्या शाह’ का भी जुड़ गया है। वह जीव वनस्पति और उसका पृथ्वी व हमसे रिश्ते पर अनुसंधान कर रही थीं। क्या अनादि और निरंतर इस प्रकृति का वाकई में  मानव से बहुत ही नजदीकी संबंध है,  उसके सृजन , और विनाश से संबंध है!- नजदीकी सूत्रों के अनुसार वे एक उल्लेखनीय खोज के बेहद करीब थीं।

सेना अभी भी जीप और हेलिकाप्टर के जत्थों के साथ उन्हें ढूँढ रही है। उनकी खाली रेंजरोवर के मिलने के बावजूद भी हम उम्मीद  नहीं छोड़ सकते जब तक कि उनके मानवीय अवशेष न मिल जाएँ। पांच साल पहले वैज्ञानिक राबर्ट दिक्रुजा भी अपनी असिस्टैंट के साथ ऐसे ही गायब हुए थे। ब्राजील के जंगल में और हिमालय पर्वत पर भी कुछ अन्य व्यक्तिओं की ऐसे ही गायब होने की खबरें मिली हैं। हो सकता है जंगली जानवरों के शिकार बने हों सब। …पर कुछ तो अवशेष या निशान मिलने ही चाहिएँ। रहस्य दिनप्रतिदिन गहराता जा रहा है।‘
नव्या जानती थी कि बस अटकलें ही लगेगीं। रहस्य शायद ही कोई जान पाए। चयन में ही तो सृष्टि की अनश्वरता का रहस्य छुपा है। प्रकृति स्वयं और पुरुष को पुनः पुनः बनाती और बिगाड़ती है, नष्ट नहीं होने देती। ये लगातार के बदलते मौसम पतझर और बसंत, मात्र क्रम नहीं, एक नियोजित चयन प्रकरण ही हैं। कुछ बनेगा तो कुछ बिगड़ेगा भी और बिगड़ा तो वापस बनेगा भी। मुठ्ठी में बन्द करके या रूई के फाहे में समेटकर कुछ भी नहीं रखा जा सकता। काश्, कोई तो समझे  कि अभी तक गायब लोगों के बीच एक अद्भुत कड़ी रही है –सब अपने-अपने क्षेत्र में अद्वितीय, बेहद प्रतिभावान व कर्मठ व्यक्ति थे…प्रकृति द्वारा अगली और बेहतर फसल के लिए बचाए जाने लायक ‘बीज’।…
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