लफ्जों की बरसात- अमित बृज -लेखनी जून/जुलाई 2015

Female head

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धूप ने सब कुछ लूट लिया था उसका, जैसे साहूकार लूटता है अपने कर्जदार को। बेनूर हो गई थी उसकी दुनिया। सूख गए थे बाग़-बगीचे, ताल-तलैया और तन्हाई की पहलू में ख्वाबीदा थी ख्वाइशों की तपती पगडंडी। आज रात जब आसमान में कैद बारिश उतर आई जमीं पर तो खिलखिलाकर हंस पड़ी मुरझाई मिट्टी, बूंदों की सरगोशी से।  अज़हर इनायती का एक शेर पढ़िए और लुत्फ़ उठाइए पहली बारिश का.… होती हैं रोज़ रोज़ कहाँ ऐसी बारिशें आओ कि सर से पाँव तलक भीग जाएँ हम

(2)

न जाने कितनी बार निहारा है उसे। वो आज भी वैसी ही है, कपास के पोहों सी पाक-शफ्फाक। मिजाज नहीं बदला उसका। कभी आहिस्ता-आहिस्ता आती है जैसे झीनी चादर में किसी ने पानी डाल दिया हो और टपक रही हो-टप टप टप। तो कभी तूफान की माफिक बहा ले जाती है गांव-वांव सब और छोड़ जाती है अपने पीछे मुर्दा सन्नाटा। खिड़की की तख़्त पर बैठकर पकौड़े खाते हुए जब देखता हूँ बाहर तो कितना अच्छा लगता है ये बरसात का मौसम। ये मौसम रूमानी जज़्बात का मौसम है, शीरी फ़रहाद का मौसम है। ये मौसम विरहणियों के मौसम है जो गाती रहती हैं बारिश की नग़में। “कुछ मेरी सुनो दिल की, कुछ अपनी सुना जाओ, बरसात का मौसम है, ऐसे में चले आओ”, “सावन आया बादल छाए, आने वाले सब आए हैं बोलो तुम कब आओगे”, और ऐसे न जाने कितने नगमें जिनमें सावन के साथ जुदाई का दर्द सना है। खैर साबिर दत्त के साथ मौसम का लुत्फ़ उठाइये– फिर लाई है बरसात तिरी याद का मौसम गुलशन में नया फूल खिला देख रहा हूँ

(3)

आसमान टूटकर बरस रहा है इन दिनों और बच्चे…कुछ दुबके हैं बिस्तर से और कुछ चिपके हैं कंप्यूटर से। एक हमारा बचपन था। कमबख्त बारिश की ताल पर रूमानी जज्बात यूं थिरकते कि पूरा मोहल्ला कूट डालते। हाथ की थपकी से चलते थे साईकिल की टायर। ना जाने कितनी कागज की कश्तियाँ डूबी हैं इस बारिश में। न जाने कितने कागज के एयरोप्लेन क्रैश हुए हैं इस मौसम में। प्राइमरी स्कूल पर कबड्डी के खेल में लक्खू को इतना पेलते कि अवधी की बजाय हरियाणवी टोन में बोलने लगता- अरे बावड़ी री पूंछ, जांण लेगा के। जब कच्चे पोखर से मछलियां मार लाते और बारिश की टिप-टिप के बीच भूनकर खाते तो पंडिताइन चिल्ला उठती – ई रावणी सेना, सब भरभशत कर देंगे। उजाले जब कैद हो जाते आसमानी समंदर में तो नानी के कहानियों में भीगकर सो जाता अंतर्मन। आज नानी ८० साल की हो गई है। कई कहानियां है कहने को मगर सुनने वाला कोई नहीं है ।  बारिश में भूनकर खाने के लिए कितना कुछ है हमारे पास। तो आप भी ढूंढिए बरसात में कैद उन रंगीन लम्हों को, उस मासूम बचपन को…

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मैं बच्चा था। छोटी सी आशा थी…मासूम सी ख्वाइश। बरसात होता तो जी चाहता कि झूम लूं बारिश की अल्हड़ जवानी के साथ… मदमस्त मोरों के साथ। जी चाहता कि मेंढक पकड़कर दोस्तों की जेब में डाल दूँ। जी चाहता कि पतंगों के पीछे धागे बाँध दूँ। मगर क्या करूँ, तर्पाल की छत से टपकती बूंदों को समेटने में पूरा दिन गुजर जाता और रात इस जद्दोजहद में कि कहीं लिहाफ ना भीग जाय। बामुश्किल मिली थी पिछली ठंडी में।  महरूमियों के धुंध नहीं रहे अब। आज फिर बारिश हो रही है वैसे ही जैसे बचपन में होती थी। लेकिन अब पक्के मकान हैं मेरे पास। इटालियन मार्बल से चमकता छत है। चाहूं तो झूम सकता हूँ बारिश की अल्हड़ जवानी के साथ… बांध सकता हूं पतंगों के पीछे धागे। मगर मैं मासूम नहीं रहा… मैं छोटा नहीं रहा…मैं बच्चा नहीं रहा।  (इब्ने इंशा की नज़्म “एक लड़का” से प्रेरित)

 

 

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