कागज की नावः लेखनी जून जुलाई 2015

कागद की नैया

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छपक छपक गंदले पानी

कागद की यह नैया

ले डूबेगी पूरा जंगल

बरसाती सब ताल तलैया

आँखों में तैरे बचपन

रूठे मचले नुनखुरा

मुठ्ठी से जो रेत-सा फिसला

कागज की ये कश्ती हमारी

मौजों पर फिर बह चली

किनारों के तुम पर

अब चर्चे न करना

मन की तरंगों का सवाल है

डूबकर ही उबरेगी यह

उबरकर इसे किधर जाना  !

-शैल अग्रवाल

 

 

 

कागद की नाव

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नदिया में बाढ़ मेरी कागद की नाव

नोटो की गड्डी पे सोई भले दुनिया

खुश दो निवालों से हुई मेरी मुनियां

शहरों की धाक धमक में मेरा गाँव

नदिया में बाढ़ मेरी कागद की नाव

कलियों को रौंदता भँवरा भुजपाश में

बादल से  धुँआ उठा छाया आकाश में

पंछी बेखबर को है उड़ने का चाव

नदिया में बाढ़ मेरी कागद की नाव

भूखे को पेटू भी क्यों आधी दे दे

तेरा मेरा मच गई तू तू मै मै

दाता के दानो पर होय कांव कांव

नदिया में बाढ़ मेरी कागद की नाव

महलों में जीवन की जलती रहे ज्योत

बिन दवा के गरीब की होवे  ना मौत

सौदे का भाव नहीं,  दिलों  में यह भाव

नदिया में बाढ़ मेरी कागद की नाव

अवनी मासूम को आ रहे हैं चक्कर

सूरज और चन्दा में हो गई टक्कर

अंगारे बरसे तब पीपल की छांव

नदिया मे बाढ़ मेरी कागद की नाव

हरिहर झा

 

 

 

प्रेंम में यह भी

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प्रेंम में यह भी

एक कौतुक ही तो था

उछाल खाती लहरें

और कागज की नाव

बहा दी जाती  हवा संग

जाने किस उम्मीद में

लहरों पे किनारे से…

आसान था, रोमांचक था

वो बहना, छूटना और

लौट आना फिर फिर के

सहज था सब

जैसे आती जाती सांस

जैसे जिन्दा थे वे

बहना ही खुशी थी तब

मिलने बिछुड़ने का अहसास

बस डूब जाना लहरों बीच

अचानक फिर एकदिन

पार जाने की ख्वाइश में

रुख नया लिया पुरवाई ने

सुलझी ना सिमटी

डूबी ना किनारे लगी

बहती गई दूर तक

हो नजरों से ओझल

बीच भंवर जा के बिखरी

कागज की  नाव …

-शैल अग्रवाल

 

 

 

खेल ही तो था…

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एक खेल ही तो था

वह भी बचपन का

जब कागज की नाव बहाते थे

हम बरसाती पोखर नालों में

जिसकी नाव जीतती

उसी की बात मानी जाती

खेल तो वही आज भी

बस नावों की जगह

दौड़ते अब खुद हम …

-शैल अग्रवाल

 

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