कहानी समकालीनः लकीरः महेन्द्र दवेसर/ लेखनी जून जुलाई 2015

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पटाक्षेप! ॰ ॰ ॰ नहीं, नहीं। पटाक्षेप के बाद वाली तालियां नहीं चलेंगी यहां। पड़ा रहने दो यह ख़ामोश पर्दा। यह लंदन के वकीलों की दुकान है — सिल्वरस्टोन सॉलिटर्स। यहां सच्चाई का सिल्वर तो कम ही होता है। शेष सब स्टोन ही स्टोन है। पर्दे की ओट में यहां सच को झूठ और झूठ को सच सिद्ध करने की रिहर्सल हुआ करती है। मजबूरी में कभी-कभार सच को सच और झूठ को झूठ भी सिद्ध करना पड़ जाता है। आम हैं यहां वकीलों की दलीलें, क़ानूनों और उनकी धाराओं, उप-धाराओं और लूपहोलों पर बहसें।

ऐसी ही एक बहस के दौरान वातावरण की बोरियत को काटती, चीरती कॉन्फ़रेंस रूम में भटक आई थी वह अतीव सुंदरी? नाम, एंजेला डेविडसन। उम्र लगभग अठारह-उन्नीस वर्ष! रुक गयी थी सब दलीलें, बहसें। नज़रें उठी की उठी रह गयी थीं। पलकें झुकना भूल गयी थीं। शायद ऐसी ही कोई एंजेला कीट्स के सामने आ गयी होगी जब उसने सौंदर्य को सत्य का पर्याय दे डाला था!

कंपनी में सेक्रेटरी का एक रिक्त स्थान था। एंजेला वहां इंटर्व्यू के लिए आई थी। उसे उपयुक्त मैनेजर तक पहुंचा दिया गया किन्तु पीछे कॉन्फ़रेंस रूम में बैठे प्रत्येक वकील के मन में वह जगा गयी एक प्रचंड कामना कि उसे उसकी पुरानी सेक्रेटरी से छुटकारा मिले और बदले में यह लड़की उसकी सेक्रेटरी नियुक्त हो।

किसी की नहीं चली। पीटर फ़िशर को मिली एंजेला क्योंकि कैंसर की रोगिनी उसकी पिछली सेक्रेटरी निकोला ने कुछ महीनों का अवकाश मांगा था, बेचारी ज़िंदगी से छूट गयी!

पीटर को लगा कि उसकी लॉटरी लग गयी है। कुछ ऐसा ही है कंपनी का पॉलिटिक्स जहां केवल सीनियर वकीलों की तूती बोलती है और वह ठहरा सबसे जूनियर!

एंजेला का पहला दिन तो कंपनी के सभी लोगों — मैनेजरों, वकीलों और स्टाफ़ के साथ परिचय में गुज़र गया। अगले दिन पीटर ने उसे उसके काम, ऑफ़िस की कार्य-प्रणाली और दैनिक परिचर्या के बारे में समझाया। क़ानून को ‘गधा’ कहने वाले पंडित जानते होंगे कि इस मकड़जाल के तार फ़ौलादी होते हैं और क़ानूनदानों के सहकर्मियों को तलवार की धार पर चलना होता है। पुलिस की रिपोर्ट हो या किसी का वसीयतनामा, कोर्ट में पेश किया गया हर काग़ज़ या कोर्ट का हर निर्देश — कुछ भी गुम नहीं होना चाहिये, सभी कुछ ज़रूरी है!

पीटर ने एंजेला को एक लंबा लेक्चर दे डाला और सौंप दी ढेरों ज़िम्मेदारियों की सूची — मुक़द्दमों के लिए तैयार नोट्स का सुरक्षित रख-रखाव, एक दैनिकी में पेशियों का पंजीकरण, पेशियों से पहले नोट्स कंपनी के मनोनीत बैरिस्टर तक पहुंचाना, जजों के निर्णित फ़ैसलों पर अपील की निश्चित अवधि पर नज़र रखना, वग़ैरा वग़ैरा।

“आजके युग में अधिकतर सामग्री कंप्यूटर पर भी चढ़ाई जाती है। फिर भी hard copy का अपने पास रहना नितांतावश्यक है। तुम्हारी यह दैनिकी भी पूरी तरह अप-टु-डेट रहे। कहीं ज़रा सी भी भूल हो गयी तो मुसीबत आ जाएगी।”

लीगल सेक्रेटरी का डिप्लोमा-प्राप्त एंजेला की पहली नौकरी का वह तीसरा दिन था। पिछले दिन का पीटर का वह लम्बा लेक्चर अभी भी उसके मन-मस्तिष्क पर पूरी तरह से हावी था। अभी भी कानों में गुंजारित थीं वे सब चेतावनियां। क्या वह इतना सब कर सकेगी? कुछ ज़्यादा ही नर्वस और असंतुलित थी बेचारी! निर्देश था कि वह काग़ज़ों को सही स्थान पर सुरक्षित रखे किंतु घबराहट इतनी कि एक मोटी-सी फ़ाइल उसके हाथों से छूट गयी। आंधी में पेड़ों से झटके हुए पत्तों की तरह सभी काग़ज़ फ़र्श पर इधर-उधर बिखर गए। वह ज़मीन पर बैठी काग़ज़ समेट रही थी जब पीटर वहां पहुंच गया —                                   

 “तुम अभी नई हो। नहीं जानती कि ये फ़ाइल कितनी ज़रूरी है। अब इन काग़ज़ों को तरतीब से लगाना होगा। इन सबको मेरे ऑफ़िस में ले आओ।”

काग़ज़ तरतीब से लग गए तो पीटर ने हुक्म सुना दिया -“शाम को ऑफ़िस के बाद मुझे मिलना।”

    इस आदेश ने एंजेला की घबराहट और भी बढ़ा दी। शाम को अवश्य डांट पड़ने वाली है। इस नौकरी में साल-भर का तो प्रोबेशनरी पीरियड है। कैसे कटेगा? नौकरी अब गयी, कि तब गयी!

    दफ़तर के बाद वह पीटर के ऑफ़िस में पेश हो गयी। बॉस ने अपनी मेज़ के ठीक सामने जुड़ी कुर्सी की ओर इशारा किया। वह बैठ गयी और बैठते ही बोली -“सॉरी सर, मैं जानती हूं। आज ही काम संभाला और आज ही डांट भी पड़ेगी।”

      फिर बॉस की मेज़ पर कुहनियां टिकाए, सिर झुकाए, वह बरबस फफक उठी -“सर, मैं एक बहुत ग़रीब लड़की हूं। कल आपने कंपनी की ढेरों ज़िम्मेदारियां गिनाई थीं। मुझपर घर की भी बहुत ज़िम्मेदारियां हैं। एक विधवा मां है। एक रिटार्डिड चौदह साल का छोटा भाई भी है। प्यासों को शबनम की तरह हैं वे सरकारी अलाउंस। अभाव ही अभाव हैं। ज़िंदगी है, गुज़र रही है। बस गुज़ारा नहीं होता। मेरी यह नौकरी हम तीनों की लाइफ़-लाइन है ॰ ॰ ॰ एक कच्ची डोरी। साल-भर का प्रोबेशनरी पीरियड तो क्या, लगता है यह डोरी भी जल्दी टूट जाएगी।”

बेहया आंसू एंजेला के कपोलों तक आ गए थे। पीटर अपनी कुर्सी से उठा और उन्हें पोंछ डाला।                            

“पगली! डोरी मेरे हाथ में रहेगी, नहीं टूटने दूंगा। तीन महीनों बाद मुश्किल से मिली हो तुम। वकीलों में सबसे जूनियर हूं ना, सभी समझते हैं सेक्रेटरी के बिना मेरा काम चल सकता है। मैं ही जानता हूं, कैसे सब कुछ अस्त-व्यस्त हो रहा था और तुम हो कि काम पर लगते ही नौकरी छूटने की बात करती हो।”।

नौकरी के तीसरे दिन बॉस की निष्कपट स्पष्टवादिता ॰ ॰ ॰ एंजेला हैरान भी हुई, संतुष्ट भी। पीटर बोलता रहा, वह सुनती रही —

“सेक्रेटरी के बिना बिल्कुल बेसहारा हो गया था। मुझे अपना बॉस नहीं, मित्र समझो। हम एक दूसरे का सहारा बनेंगे। कल जो ज़िम्मेदारियां तुम्हें गिनाई थीं, तुमसे पहले वे सब मेरी ज़िम्मेदारियां हैं। मुझ तक आंच आएगी, तभी कोई चिंगारी तुम्हारी दिशा में उड़ेगी। और यह सब मैं होने नहीं दूंगा। एक ही नाव में सवार हैं दोनों ॰ ॰ ॰ एक ही नाव के खेवट! पार्टनर हैं हम दोनों! ओके?”

एक ही दिन में मातहत से पार्टनर बना दिया था पीटर ने। एंजेला क्या कहती? उसने ‘हां’ में सिर हिला दिया। 

“तो फिर मुस्कुराओ। आजके बाद मैं अपनी सेक्रेटरी की आंखों में आंसू नहीं देखना चाहता ॰ ॰ ॰ और सुनो, तुम्हें चाय पसंद है या कॉफ़ी?”                                            

“कॉफ़ी।”                                                   

“तो फिर दो कप कॉफ़ी हो जाएं।”                                          

उसने ऑफ़िस के कोने में पड़ी एक मेज़ की ओर इशारा किया – “केतली और सब सामान वहां पड़ा है और मिनि-फ़्रिज में दूध।”

 कॉफ़ी की उस एक प्याली में एंजेला के सभी भय, सभी दर्द जैसे घुल गए और वह सोचती रही पीटर कितने भले हैं!

अगले दिन जब वह काम पर आई तो पीटर ने कुछ और अतिरिक्त लेकिन प्रिय ज़िम्मेदारियां उसे सौंप दीं। हर सुबह काम शुरू करने से पहले और बाद दोपहर चार बजे वह ऑफ़िस में उसके साथ कॉफ़ी पिया करेगी। घर में आए अतिथि की तरह हर मुवक्किल को चाय, कॉफ़ी पेश करना भी उसकी ड्यूटी होगी।

हंसी हंसी में पीटर ने एक और बात बता दी। हम जैसे वकील और बैरिस्टर उस टैक्सी-ड्राइवर की तरह हैं जो मुवक्किल मुसाफ़िर के आते ही टैक्सी का मीटर चला देते हैं। मंज़िल का रास्ता न मुसाफ़िर जानता है, न ड्राइवर! हम लाख भटकते रहें, मंज़िल का पता तो केवल न्यायाधीश को होता है। हम मुक़दमा हार भी जाएं, हमारी जेबें भर जाती हैं और ग़रीब मुवक्किल अपनी बेबसी पर रोता रहता है!

एंजेला पूरी तत्परता से काम में जुट गयी। फिर एक दिन पीटर ने बताया कि बीमारी के कारण निकोला अपना काम ठीक से नहीं कर पा रही थी। एक दिन वह एक फ़ाइलिंग कैबिनेट के सामने गिरी हुई पाई गयी। उसे तुरंत हॉस्पिटल पहुंचाया गया। तब ज्ञात हुआ कि बेचारी के दिमाग़ में एक ट्यूमर है।

    एंजेला ने भी देखा कि संभवत: अपनी बीमारी के कारण निकोला ठीक से फ़ाइलिंग नहीं कर पाई थी। बहुत सी फ़ाइलें ग़लत स्थानों पर रखी हुई थीं और कई फ़ाइलों में काग़ज़ अव्यस्थित ढंग से ठूंसे हुए थे। उसने पीटर को स्थिति समझाई।                                                     

“वह बेचारी तो अब नहीं रही। यह सब ठीक करना होगा। ऑफ़िस के बाद ओवरटाइम में।”                                                             

“ऑफ़िस के बाद ॰ ॰ ॰ असुरक्षित, अकेली? सॉरी, यह मुझसे नहीं होगा।”                                              

 “हमेशा तो तुम अकेली नहीं रहोगी। कभी कभी और लोग भी होते हैं ओवरटाइम पर।”                                       

“फिर भी नहीं।”

  ई नई नौकरी और बॉस की अवज्ञा! एंजेला ने सोचा, बहुत ग़लत हो गया। फिर अत्यंत विनम्र शब्दों में उसने सुझाया–                                

“मैं कर लूंगी ओवरटाइम पर क्या ऐसा नहीं हो सकता कि आप भी शाम को बैठ जाया करें? आप अपना काम करते रहें और मैं फ़ाइलिंग ठीक करती रहूं।”

 यह क्या कह दिया एंजेला ने? क्या अब वही होगा, जो होता आया है? एक नौजवान बॉस और अप्सरा लगती, उसकी सेक्रेटरी!  बॉस ने बहाना तराशा —                            

“मैं भी यही सोच रहा था। मेरा काम तो होता रहेगा। ढेर सारी फ़ाइलें हैं, मैं भी साथ लग जाऊं तो काम जल्दी निपट जाएगा।”

     एक शाम! तब ऑफ़िस में और कोई नहीं था। दोनों वकील साहिब की फ़ाइलों वाली तंग कोठरी में थे। एंजेला के बाएं हाथ से दराज़ें खुलती, बंद होती रहीं। पीटर से रहा नहीं गया, बोल उठा-“अब समझा उस दिन तुम्हारे हाथ से फ़ाइल क्यों गिर गयी थी। वह तुम्हारे कमज़ोर बाएं हाथ में थी।”                                                   

“आपने देखा नहीं। मैं लेफ़्ट-हैंडर हूं। लिखती भी बाएं हाथ से हूं। हर काम बाएं हाथ से करती हूं।”

पीटर ने चुटकी भर-“दिल भी बाईं तरफ़ होता है। मतलब, हर काम दिल से करती हो।”                    

फिर ज़रा झिझकती हुई गुस्ताख़ी। हल्की-सी मुस्कान के साथ, दबे स्वर में वह पूछ बैठा -“ब्वॉय फ़्रेंड के साथ भी ख़ूब दिल से प्यार करती होगी तुम?”                         

उधर से भी जवाबी मुस्कान, “उस दिशा में कभी सोचा नहीं। घर की बहुतेरी ज़िम्मेदारियां हैं।”                    

“हाल मेरा भी वही है। क़ानूनी पढ़ाई और परीक्षाओं में लगा रहा। परीक्षाएं पास भी कर लो, आसानी से काम नहीं मिलता।”

यह इशारा था एंजेला को कि हुस्न की नौकरी के लिए वह हाज़िर है।

   अब आगे क्या अटकल लगाइयेगा? फ़ाइलिंग रूम की तंगी। दीवारों के साथ लगीं कैबिनेट्स के बीच की गली ऐसी कि दो व्यक्ति बग़ल में खड़े तो हो सकते हैं, एक साथ गुज़र नहीं सकते। अंग-स्पर्श हो जाना मामूली बात थी। दोनों में से कभी कोई, कभी दोनों एक साथ ‘सॉरी’ कह देते। फिर वह औपचारिकता भी नहीं रही। बात आगे बढ़ती रही। इन प्रश्नों के उत्तर न कभी कालिदास के पास थे, न कीट्स के पास कि क्यों ऐसे में झुरझुरी-सी होने लगती है, धड़कनें तेज़ हो जाती हैं? क्यों अधखुले होंठों से होंठ जुड़ जाते हैं, आंखें मुंद जाती हैं? क्यों प्रेमी के सीने से लगा चेहरा देर तक वहीं जमा रह जाता है?

  यह सब होता रहा और फ़ाइलिंग भी! इस रोमांटिक ओवरटाइम में घर की ज़िम्मेदारियां कहीं दूर पीछे रह गयीं और ये दोनों एक दूसरे के पास और भी पास होते गए। जब तक सेक्रेटरी नहीं मिली थी, पीटर अकेला ही पेशियां भुगतता था। अब वह भी कचहरियों में उसके साथ जाने लगी और संयोगवश तभी से हर केस में जीत भी मिलती गयी। कंपनी में इन दोनों के इश्क़ को लेकर खुसर-फुसर होने लग गयी थी। बात चल निकली कि जज लोग पीटर के साथ एंजेला को देखकर अपना फ़ैसला बदल देते हैं!

    कोर्ट, कचहरियों के बाहर भी ये दोनों रेस्तोरानों में और फिर सप्ताहांत में सिनेमा में एक साथ होते। अपने जन्मदिन की पार्टी में एंजेला ने अपने सहयोगियों के साथ पीटर को भी घर बुलाया। उसे पार्टी शुरू होने से पहले आने को कहा। तब उसने मम्मी से उसका परिचय कराया। जैसिका को लड़का पसंद था पर मां-बेटी की पसंद ही तो काफ़ी नहीं थी। शादी का प्रस्ताव तो पीटर की ओर से आना था।

     गर्मियों के दिन थे। वह शुक्रवार की सुहानी शाम थी। धूप में हलकी सी तपिश थी और एक पब के बाहर लॉन में वे बीयर पी के हटे थे। पीटर ने एक अत्यंत महत्वशाली केस में जीत हासिल की थी। अचानक उसके घुटने फ़र्शी हो गए। उसने एंजेला के दोनों हाथ थाम लिए-“एंजेला, डार्लिंग! मुझसे शादी करोगी?”                                           

एक बार की ‘हां’ काफ़ी थी पर वह चहचहाई- “हां, हां, हां! मैं हमेशा तुम्हारी रहूंगी।”                                    

“कल मेरे साथ चलना, सगाई की अंगूठी ख़रीदेंगे।”                           

“मैं नहीं जाऊँगी। तुम महंगी से महंगी अंगूठी ख़रीदना चाहोगे और मुझे लगेगा कि एक मूल्यवान अंगूठी देकर तुम मुझे ख़रीद रहे हो और मैं बिक रही हूं। पीटर, तुमसे कहा था न कि मैं एक बहुत ग़रीब लड़की हूं। मैं इन महंगी नुमायशी निशानियों पर विश्वास नहीं रखती। क्या धरा है इनमें? सच्चा प्यार दिल में होता है, अंगूठियों, गहनों में नहीं। कोई रबड़ का छल्ला, कोई वॉशर भी पहना दो तो चलेगा।”

शनिवर और इतवार के दिन छुट्टी थी। सोमवार की सुबह, हमेशा की तरह जब एंजेला कॉफ़ी के लिए उसकी केबिन में थी, उसने आदेश दिया- “अपना बायां हाथ आगे करो।”                                        

एंजेला ने अपना हाथ बढ़ाया। अगले ही क्षण पीटर ने उसकी रिंग-फ़िंगर पर रबड़ का छल्ला चढ़ा दिया।           

“यही चाहती थी न तुम?”

एंजेला मुस्कराई। छल्ला उसकी उंगली पर चढ़ा रहा। एंजेला सभी काम बाएं हाथ से करती है। कॉफ़ी के लिए केतली में पानी भर रही थी। छल्ले वाली उसकी उंगली पर फ़ियोना की नज़र पड़ी।                                      

“एंजेला, यह अपनी रिंग-फ़िंगर पर क्या चढ़ा लिया है?”                          

वह क्या जवाब दे? एक खिसियानी-सी मुस्कान के साथ उसने बात बनाई -“कल एक एशियन मेले में गयी थी। वहीं मिला था वह ख़ुदा का बंदा। लंबा केसरिया, ज़ाफ़रानी चोग़ा, लंबी दाढ़ी और केसरिया पगड़ी। अपने झोले में से निकाला उसने यह छल्ला। बंद आंखों से कुछ पढ़ा, छल्ले पर फूंक मारी और कह दिया, ‘बेटी, इसे पहन लो। बुरी नज़र से बची रहोगी और पूरी होंगी सब मुरादें ।’ ”                          

“॰ ॰ ॰ और तुम बेवक़ूफ़ बन गयी। इस छल्ले के कितने पाउंड झाड़े उसने?”                                              

“तांबे का एक सिक्का भी नहीं। वह तो छल्ला देकर ग़ायब हो गया।”        

“आजके दिन भी तुम यह सब मानती हो?”                                 

“मेरे मानने, न मानने से क्या होता है? उसने छल्ला दिया, मैंने पहन लिया।”                                               

“पहना भी अपनी रिंग-फ़िंगर पर ॰ ॰ ॰ उसके साथ सगाई कर ली।”

    एंजेला की ‘शट-अप’ और दोनों की खिलखिलाहट के बाद भी बात ख़त्म नहीं हुई, पूरी कंपनी का लतीफ़ा बन गयी। सभी एंजेला का मज़ाक़ उड़ाने लग गए। क्या एंजेला सचमुच चाहती थी की उसकी सगाई की सूचक बने एक रबड़ की वॉशर? मन ही मन पीटर अपने को बेवक़ूफ़ और अपमानित महसूस करने लगा। उसने एंजेला की बात क्यों मानी? एक पढ़ा-लिखा अक़्लमंद वकील, कैसे बेवक़ूफ़ बन गया?

    बहुत हो ली गपोड़ेबाज़ी। एक शाम पब में निमंत्रित सहयोगियों के सामने पीटर ने घोषित किया कि जल्दी ही उसकी सेक्रेटरी उसकी पत्नी बनने वाली है। उसने एंजेला की उंगली से वह छल्ला खींच निकाला और पहना दी हीरों से जड़ी चमकती, दमकती एक शानदार अंगूठी। अगले ही पल दोनों एक दूसरे की बाहों में थे और देर तक दोनों के होंठ जुड़े रहे। तालियां बजती रहीं।

    पीटर को न जाने क्या सूझी, उसने रबड़ का वह छल्ला हवा में लहराते हुए कहा–                                                           “दोस्तो, कंपनी में एंजेला का यह मन-घड़ंत क़िस्सा प्रचलित है कि किसी साधु, फ़क़ीर ने यह रबड़ का छल्ला उसे भेंट किया था। वह नहीं चाहती थी क़ीमती अंगूठी। बस कह दिया रबड़ का छल्ला ही पहना दो। मज़ाक़ में मैंने भी वही किया।”

उसने एंजेला का अंगूठी वाला हाथ खड़ा कर दिया — “यदि आप सबको मेरा फ़ैसला बेहतर लगा हो, तो एक बार फिर से ज़ोरदार तालियां हो जाएं।”

    फिर से तालियां बजने लगीं। अंगूठी को देखकर उपस्थित लड़कियों की आंखें फटी की फटी रह गयीं।

हमारे हीरो, हीरोइन की सगाई हो गयी तो सपनों को पलना, पनपना ही था। मन ही मन सुनहरी किरणें छनने लगीं, मनोरम तस्वीरें बनने लगीं। छिन्न-भिन्न हो गयीं सभी!

 

7 जुलाई, 2005। उस दिन लंदन की भूमिगत गाड़ियों में और एक बस में बमों के ज़बरदस्त धमाके हुए थे। वहां आग थी, धुआं था, ख़ून था, चीख़ें थीं! मासूमों की कटी-फटी लाशें थीं। आत्मघाती आतंकियों के इलावा बावन लाशें मिलीं। सात सौ घायल हुए थे। घायलों के ख़ून में घुल रहा था लाशों का ख़ून। सौ लोगों को हस्पतालों में भरती करना पड़ा था — कई बेचारे तो आधे-अधूरे पहुंचे थे वहां! जलती गाड़ियों में कितने हाथ, कितनी बाहें, कितनी टांगें पीछे छूट गयी थीं। इंसानों की अपनी पहचान मुश्किल थी। समय ही कहां था कि पहचान होती कि कौनसा अंग किसका है!

कितनों के कितने सपने तबाह हुए थे उस दिन? अख़बारों में नाम छपने लगे – लाशों के, घायलों के। घटना के तीसरे दिन नामों में नाम छपा — एंजेला डेविडसन। मूर्छित थी बेचारी जब चेयरिंग क्रॉस हॉस्पिटल में पहुंचाई गयी। दवाइयों के ज़ोर पर उसकी बेहोशी की अवधि और भी बढ़ा दी गयी थी। धमाके हुए थे वृहस्पतिवार को। शुक्रवार की शाम जब उसे होश आया तो बाईं कोहनी की ठूंठ पर बंधी पट्टी देखकर उसकी चीख़ निकल गयी!

दो दिन एंजेला काम पर नहीं आई। सभी समझे बीमार होगी। फिर शनिवार को सहयोगियों ने अख़बार में उसका नाम पढ़ा तो गुलदस्तों, कार्डों के साथ ऑफ़िस के कई लोग पधारे — फ़ियोना, माइकल, रेचल, प्रीति, टॉम, वग़ैरा।

हस्पताल में उसे मिलने पीटर भी आया। उसने उसके सिर पर हाथ रखा और बेदिली से कह दिया -“सॉरी, वेरी सॉरी! घबराओ नही, एंजेला। तुम जल्दी ठीक हो जाओगी।”

वह समझ गयी थी उसके ‘ठीक’ होने का मतलब क्या था। अंडरग्राउंड ट्रेन में पीछे छूट गयी देह से अलग हुई उसकी बांह तो अब क्या जुड़ेगी!

कुछ दिन एंजेला की मम्मी, जैसिका भी अपनी बेटी को देखने हस्पताल नहीं आ सकी। अपने नीमपागल बेटे, मार्क को वह किसके पास छोड़कर आती? एंजेला बेचारी भी मां को याद करती रही। ऑफ़िस के बहुत से सहकर्मी एंजेला को देखने हस्पताल आते रहे। उनमें पीटर नहीं था। वह उसके बारे में पूछती तो जवाब मिलता कि बिना सेक्रेटरी के काम कर रहा है, बहुत व्यस्त रहता है। यह मन ही मन सोचती, दो चार मिनट के लिए ही आ जाता। वह उसे बाहों में भर लेती ॰ ॰ ॰ बाहों में? उसने अपनी ठूंठ देखी और रो पड़ी!

एक दिन फ़ियोना ने भेद खोला – “भूल जा उस बेवफ़ा को! उसे तेरा दर्द नहीं है। उसे दुख है सगाई में दी गयी अंगूठी का! एक दिन कह रहा था, ‘बहुत दुख है एंजेला का। उसके साथ बहुत बुरा हुआ। जो नुक़सान हुआ वह अलग, सात हज़ार पाउंड की तो अंगूठी थी उसके हाथ में।’ ”

एंजेला अपनी टीस दबा गयी – “वह रबड़ का छल्ला ही ठीक था। पड़ा रहता तो क्या बुरा था! उसका नुक़सान तो न होता!”

    फ़ियोना चली गयी तो भीतर का दर्द उफान में आ गया और वह रोती, सुबकती अपने आप से बातें करने लगी जैसे पीटर उसके सामने बैठा हो -ट्रेन में छूटी मेरी अधकटी बांह और तुम्हारी सात हज़ार पाउंड की वह अंगूठी ॰ ॰ ॰ किसका मोल ज़्यादा है? क्या सोने-चांदी से, पाउंडों पेंसों में दर्द आंका जा सकता है? सरकारें, बीमा कंपनियां और कचहरियां यह नाटक किया करती हैं। मिस्टर पीटर फ़िशर, सॉलिसिटर हो तुम भी। कोर्ट-कचहरियों से तुम्हारा भी वास्ता रहता है। यह मेरी अकेली का दर्द नहीं है। मेरी विधवा मां भी है, एक नासमझ-सा नीमपागल भाई भी है। हम सभी तड़पेंगे। ठीक से मोलतोल करो, हिसाब लगाओ, पांउंडों, पेंसों में इस पीड़ा की क्षतिपूर्ति क्या होनी चाहिये?’

    पीटर तो वहां था नहीं। वह अकेले में बड़बड़ाया करती।

आधी रात का समय था। वॉर्ड के सभी मरीज़ चैन की नींद सो रहे थे जब एंजेला चीख़ उठी —

“पीटर, चीटर! मैंने नहीं मांगी थी वह महंगी अंगूठी। अपनी दौलत की नुमाइश करनी थी तुम्हें और तमाशा खड़ा कर डाला। अपने इस डेढ़ बाज़ू की क़सम! मेरा दायां हाथ अब भी सलामत है। एक दिन इसी से तुम्हारा हसीन चेहरा खरोंचकर तुम्हारे सात हज़ार पाउंड तुम्हारे मुंह पर दे मारूंगी।”                                                      

डॉक्टर, नर्सें, वॉर्ड-ब्वॉय, सभी दौड़े आए -“क्यों, क्या हुआ?”                                          

“बहुत दुख रहा है?”                                                          

“॰ ॰ ॰ और भी तो मरीज़ है यहां? सभी सो रहे हैं।”                              

यह सब प्रश्न और शिकायतें! एंजेला की अपनी शिकायत थी – “मेरे मंगेतर को मेरी कटी हुई बांह का दर्द नहीं। उसकी दी हुई सगाई की अंगूठी सात हज़ार पाउंड की थी। बस उसी की फ़िक्र है उसे।”

इस मानसिक व्यथा का एक ही इलाज था – नींद का इंजेक्शन। सुला दी गयी बेचारी!  

एंजेला का घाव कभी तो भरना था, भर गया। अब सरकारी ख़र्च पर बनावटी बांह लगेगी। उसे विशेषज्ञों के एक संस्थापन में पहुंचा दिया गया जहां उसकी मुलाक़ात वहां के मुख्याधिकारी साठ वर्षीय डॉक्टर ब्रूस स्कॉट से हुई। एंजेला को देखते ही उनके मुंह से निकला-“तुम तो मेरी बेटी एंजेलीना लगती हो।”                                         

“जी नहीं। मैं एंजेलीना नहीं, एंजेला डेविडसन हूं।”                                

“एंजेलीना भी हूबहू तुम जैसी थी। बिल्कुल मिलते जुलते नाम और वैसी ही सूरत।”                                                           

डॉक्टर स्कॉट ने अपने बटुए में से निकाल दिखलाई अपनी बेटी की तस्वीर। सचमुच एंजेलीना उसकी जुड़वां बहन लगती थी। वह पूछ बैठी-“एंजेलीना को क्या हुआ था?”                                                

“वही 11 सितंबर वाली दास्तान! न्यू यॉर्क के ट्रेड सेंटर के आतंकी हवाई हमले में बेचारी की दोनों टांगें कट गयी थीं। सूचना मिलते ही मैं वहां पहुंचा। कृत्रिम अंग-निर्माण और अनुलग्न-विशेषज्ञ, मैं देखता रह गया। कुछ न कर सका। कौन देवता अपनी जान पर खेलकर उसे नीचे उतार लाया, नहीं मालूम! नहीं मालूम कि उसे और क्या रोग हुआ था। सप्ताह भर में हमारी एंजेलीना हमें छोड़ गयी।”

 डॉक्टर स्कॉट ने आंसू पोंछे -“एंजी तो अब आएगी नहीं। किसी दुआ का असर बनकर, किसी स्वप्न-पूर्ति की तरह, उसी का रूप-स्वरूप लेकर तुम आ मिली हो। क्या मैं तुम्हें एंजी के नाम से बुला सकता हूं?”                                                        

“जी, ज़रूर! घर में मेरा भी यही नाम है।”                    

“मैं सब स्टाफ़ से कह दूंगा कि वे तुम्हें मेरी बेटी समझें और मेरी इस नई बिटिया के लिए बढ़िया से बढ़िया काम करें।”

     एंजेला सोचती रह गयी। यह कैसी अजीब दुनिया है? कहां वह पीटर, जिसने ज़िंदगी भर भरपूर प्यार का भरोसा दिया था। ॰ ॰ ॰ यह भी वचन दिया था कि शादी के बाद वह मम्मी और मार्क का पूरा पूरा ध्यान रखेगा। विकलांगिनी हो गयी, तो झंझट समझकर, व्यर्थ का बखेड़ा समझकर छोड़ दिया। इधर यह अजनबी, डॉकटर स्कॉट। कुछ पलों की मुलाक़ात और ऐसा स्नेहल पितृत्व!

    फिर डॉक्टर स्कॉट ने समझानी शुरू कीं सभी तकनीकी बातें — कुछ उसकी समझ में आयीं, कुछ सिर के ऊपर से गुज़र गयीं।

    बनावटी बांह और हाथ की तैयारी में चार-छ: हफ़्ते लगने वाले थे। इस बीच एंजेला अनेकों बार डॉक्टर स्कॉट के घर निमंत्रित हुई। पहली बार जब वह उनके यहां डिनर के लिए गयी तो अपनी प्लेट की दाईं ओर छुरी और बाईं ओर फ़ोर्क (कांटा) देखकर उसकी आंखें भर आईं थीं। डॉक्टर ने ‘सॉरी’ कहकर भूल सुधार किया। कई दिनों तक चुभता रहा वह कांटा!

एंजेला की बाई बांह तैयार होकर आगयी है। विज्ञान और तकनीक के चमत्कार हैं सब!

कार्बन के रेशे बहुत हलके और मज़बूत होते हैं। इन्हीं से निर्मित होते हैं यह बनावटी अंग ताकि बनावटी वितान कमज़ोर ठूंठ का बोझ आसानी से संभाल सकें। कमाल के बने हैं एंजेला की बांह और हाथ और उनके ऊपर का बनावटी खोल जिसका रंग पूरी तरह से उसकी त्वचा से मेल खाता है। खोल के भीतर निहित हैं कई उपकरण — इलेक्ट्रोड, सेंसर, स्विच और न जाने क्या क्या! बनावटी अंगों के प्रयोग का प्रशिक्षण अत्यंतावश्यक होता है। एंजेला को डेढ़ महीना प्रतिदिन घंटों अभ्यास करना पड़ा। तब जाकर बैटरी-संचालित इस बांह और हाथ पर उसका नियंत्रण स्थापित हुआ और वह पूरी तरह से कर्मकुशल हो सकी।

    विदाई की बेला। एंजेला ने संस्थापन के सभी स्टाफ़ का सच्चे मन से धन्यवाद किया। फिर उसी शाम वह डॉक्टर स्कॉट और उनके परिवार को ‘थैंक यू’ कहने उनके घर गयी। वहां पूरी गर्मजोशी से उसका स्वागत हुआ। डिनर पर बैठे तो सबकी तरह उसने छुरी-कांटे का प्रयोग किया। डॉक्टर स्कॉट अत्यंत प्रसन्न थे। गर्वित स्वर में कह गए —                  

“जो भी मुझसे बन पड़ा, मैंने किया। तुम्हारी यह नकली बांह और हाथ बहुत ही बढ़िया बने हैं। यदि पूरी बांह का ब्लाउज़ पहना हो तो कोई मुश्किल से पहचान सकेगा कि तुम्हारी एक बांह और हाथ नकली हैं।”

फिर एक दम बहुत भावुक स्वर में डॉक्टर कह गए – “एंजी बेटा, तुम्हारा काम हो गया है। अब हमें भूल न जाना। बराबर मिलती रहना।”                                          

“मैं बहुत, बहुत ख़ुश जा रही हूं। वर्षों बाद यहां पिता का प्यार मिला है। अपने इस नए परिवार को कैसे भूल सकती हूं?”

    फिर इस ‘बहुत, बहुत ख़ुश’ लड़की की आंखें भीग गयीं -“सचमुच, बहुत शानदार काम करवाया है आपने! इससे बढ़िया क्या हो सकता था? जो भाग्य में बदा था, हो गया। लेकिन ॰ ॰ ॰ अब यह विकलांगिनी कभी दुलहन बन सकेगी? कभी कोई इस नकली बांह के नकली हाथ की नकली उंगली पर रबड़ का छल्ला भी चढ़ाएगा?”

    आख़िर, चलते चलते, सुबकती सिसकती, वह पुकार उठी – “हाथों पर कई लकीरें होती हैं। उनकी बात नहीं करती। अंकल, बस इतना बता दीजिये, मेरे इस बढ़िया हाथ पर तक़दीर की लकीर तो बढ़िया बनवाई है आपने?”

डॉक्टर मुंह से कुछ न बोले। पनीली आंखों ने कह दिया-   “काश!”

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स्वरचित, अप्रकाशितमहेन्द्र दवेसर दीपक                                    

रा पता:  70 Purley Downs Road, South Croydon, Surrey, UK, CR2 ORB. e.mail: mpdwesar@yahoo.co.uk॰ Phone: 00(44) 020 8660 4750

 

 

 

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