नाटक समकालीनः अग्नि स्नान-संजीव निगम- जुलाई/ अगस्त 16

अग्निस्नान

पात्र : धृतराष्ट्र , गांधारी , कुंती , संजय
दृश्य : 1
[ पर्दा खुलता है। वन का दृश्य। पक्षियों के चहचहाने तथा हवा ,पत्तों आदि की आवाज़। बाँसुरी / किसी ने वाद्य की हल्की सी ध्वनि जो सुबह होने का प्रतीक है। एक छोटी सी शिला बनी हुई है। गांधारी तथा धृतराष्ट्र धीरे धीरे चल कर आ रहे हैं। ]
गांधारी : संभल कर महाराज , सम्भल कर चलें।
धृतराष्ट्र : हाँ , हाँ , [ हाथ से शिला को छूकर ] सम्भवतया , यही वह पत्थर शिला है . हाँ … यही है।
गांधारी [किंचित हँसते हुए ] : तीन वर्ष हो गए आपको , प्रातःकाल में इसी शिला बैठते हुए , तिस पर भी आप प्रत्येक प्रातः इसे ढूंढते हुए संशयग्रस्त रहते हैं।
धृतराष्ट्र : जिसका पूरा जीवन संशयग्रस्त रहा हो , उससे और क्या अपेक्षा रखेंगी आप ?
गांधारी : लगता है मेरे विनोद से महाराज को कष्ट पहुंचा है।
धृतराष्ट्र : छोड़ो इसे। देखो प्रातःकाल की यह बेला कितनी सुहानी है। [ एक पक्षी के चहकने का स्वर ] अहा ….. प्रकृति जब पक्षी के स्वर में ममतामयी पुकार देती है तो यूँ लगता है मानो सारे दुखों पर किसी ने सुख की छाया कर दी हो।
गांधारी : महाराज काव्यप्रेमी हो रहे हैं। [हल्की हँसी ] क्षमा करें स्वामी , मैं पुनः विनोद कर उठी ।
धृतराष्ट्र : यदि राजकुमार शकुनि की बहन विनोद नहीं करेगी तो कौन करेगा ?
गांधारी [ उखड़ा तीखा स्वर ] : आप व्यंग्य कर रहे हैं , कुरुराज !
धृतराष्ट्र [बात बदल कर ] : यह अनुज वधु कुंती कहाँ है ?
गांधारी : जल लाने नदी पर गयी है।
धृतराष्ट्र : धन्य है यह शीलवान नारी। समस्त सुखों का स्वेच्छा से तयाग करके वह हम असहायों की सेवा करते हुए कितना कष्टमय जीवन व्यतीत कर रही है।
गांधारी [तीव्र स्वर ] : वह स्वयं हमारे साथ आई थी , अपनी इच्छा से , किसी ने विवश तो नहीं किया था उसे। [ व्यंग्य ] भला उसे विवश कर भी कौन सकता था ? विजयी पांडवों की माता है वह। कुरुक्षेत्र विजेताओं …..
धृतराष्ट्र [पीड़ा से ] : आह।
गांधारी : क्या हुआ महाराज ?
धृतराष्ट्र : कुछ नहीं गांधारी। इतने वर्ष हो गए किन्तु आज भी कुरुक्षेत्र का नाम एक भयानक शूल बन कर हृदय में गड़ा हुआ है। कल रात भी …..
गांधारी [चौंक कर ] : कल रात ? … क्या हुआ था कल रात ?
धृतराष्ट्र : कल रात भी सम्पूर्ण समय कानों में तलवारों की खनखनाहट , हाथियों का चिंघाड़ना , रथों के पहियों की ध्वनि गूँजती रही , गूँजती रही [ कुछ ध्वनियों का कोलाहल उठता है ] …… और गूँजती रहीं …. आह ..आह और गूँजती रहीं अपने मृत पुत्रों , परिजनों की पुकारें ….. ऐसा लगता था मानो वे स्वर मुझे लक्ष्य करके पूछ रहे हों ….. यह सब क्यों हुआ ? आखिर क्यों हुआ ?
गांधारी : जाने दीजिये महाराज।
धृतराष्ट्र [ बिना ध्यान दिए ] : क्या कहा था संजय ने ? युद्ध के दिनों में पांडवों की निरन्तर विजय के समाचार सुनने पर जब मैं पश्चाताप से व्याकुल था… तब उसने कहा था ….
[ पार्श्व से संजय का स्वर ]
संजय : राजन , अब पछताने से क्या लाभ ? अपनी नेत्रहीनता को ढाल बना कर आप अपने पक्ष के अन्याय पर अपनी मूक सहमति की मोहर लगाते रहे थे। अब आपका शोक करना वैसा ही है जैसे नदी का पानी सूख जाने के बाद बाँध बनाना। जब कुंती पुत्रों को जुए के लिए आमंत्रित किया गया था , तब आपके विवेक ने उसे क्यों नहीं रोका था ? आप राजा थे , कुरु वंश के पालक थे। यदि तब आपने न्याय का पक्ष लिया होता तो आप इस दारुण दुःख से बच गए होते। तब आपने केवल उन्हीं की बात सुनी जो आपको प्रसन्न करने वाली बातें करते थे। महाराज , चाटुकारों से घिरा तीक्ष्ण दृष्टि राजा भी दृष्टिहीन हो जाता है। फिर ….. क्षमा करें महाराज आप तो जन्म से ही ….
गांधारी [तीव्र स्वर ] : ऐसा कहा संजय ने।
धृतराष्ट्र : ठीक ही तो कहा उसने। समस्त विश्व जानता है कि कुरुवंश का अग्र पुरुष , महाराज विचित्रवीर्य का ज्येष्ठ पुत्र धृतराष्ट्र जन्मांध है।
गांधारी : किन्तु उस जन्मांधता के लिए आप दोषी नहीं हैं स्वामी।
धृतराष्ट्र : नेत्रों की अंधता केलिए न सही , किन्तु अंतर्मन की अंधता के लिए तो अवश्य दोषी हूँ। काश महाराज विचित्रवीर्य स्वयं अपनी संतान के जनक होते तो संभवतया धृतराष्ट्र का जन्म ही नहीं होता , और अगर होता भी तो वह नेत्रहीन नहीं होता।
गांधारी : महाराज , आयु के अंतिम पड़ाव पर आकर इन बातों का क्या अर्थ है ? अतीत की गहरी घाटियों में लुढक गए पलों के पत्थरों को ऊपर से देखा तो जा सकता है किन्तु उन्हें कर लाना संभव नहीं है।
धृतराष्ट्र : यह ठीक है गांधारी , किन्तु मैं आज तक एक प्रश्न का उत्तर नहीं खोज पाया हूँ। माता की कुछ पलों की विवशता तो मेरे लिए जीवन भर की विवशता बन गयी पर जिस ऋषि का मैं अंश हूँ उसके गुणों ने मेरे अंदर प्रवेश करके मुझे आलोकित क्यों नहीं किया ?
[ किसी के आने की पग ध्वनि। कुंती का प्रवेश। कमर पर एक जल से भरा मटका है ]
गांधारी : कौन ? कुंती ?
कुंती : प्रणाम। दीदी। प्रणाम ज्येष्ठ श्री।
गांधारी व धृतराष्ट्र : प्रसन्न रहो।
गांधारी : आज जल लाने में बहुत विलम्ब हुआ कुंती।
कुंती : क्या करूँ दीदी। शरीर की ऊर्जा धीरे धीरे नष्ट होती जा रही है।
धृतराष्ट्र : उफ़ ..क्या करूँ मैं ? हर बात में मैं असहाय रह जाता हूँ। यहां दुर्गम जंगल में भी मुझ पुरुष को तुम दोनों महिलाओं को सहारा देने की बजाय तुमसे सहारा लेना पड़ रहा है।
कुंती : आप शोक न करें ज्येष्ठ श्री।
धृतराष्ट्र : जिसके जीवन की एकमात्र पूँजी ही शोक हो , वह भला उससे कैसे बच सकता है ?
[ किसी जानवर के दौड़कर भाग निकलने का स्वर ]
धृतराष्ट्र [ चौंक कर ] : कौन ? कौन है ?
कुंती : कोई नहीं ज्येष्ठ श्री …. हिरण है …. आपका प्रिय श्याम हिरण …जिसे आप प्रतिदिन शाम को अपनी गोद में बिठाते हैं।
गांधारी [हँस कर ] : और आप क्या समझे थे ? कोई चोर आया है ! भला उस बिचारे को क्या मिलेगा हमारी कुटिया से , भरपेट खाना भी न खा पायेगा।
कुंती [गर्व से ] : वैसे भी पुत्र युधिष्ठिर के सुशासन में अपराधियों के लिए कोई स्थान नहीं है।
गांधारी [उपेक्षा से ] : वह तो तुम्हारे ज्येष्ठ श्री के शासन काल में भी नहीं था। इतना कडा प्रशासन चलाता था पुत्र दुर्योधन [ हल्की सिसकी ]
धृतराष्ट्र [ प्यार से ] : गांधारी …. शांत , शांत।
कुंती : मैं तनिक लकड़ियां ले आऊं भीतर जंगल से। आर्य संजय जो लकड़ियां रख गए थे वे समाप्त होने को आईं।
धृतराष्ट्र : तनिक विश्राम कर लो कुंती।
कुंती : नहीं ज्येष्ठ श्री अन्यथा भोजन में विलम्ब हो जाएगा।
[ जाती है ]
धृतराष्ट्र : कितना ध्यान रख रही है यह हमारा। अन्यथा चाहती तो वहाँ हस्तिनापुर में पूर्ण राज वैभव के साथ रह सकती थी।
गांधारी ; आपको स्मरण है आर्यपुत्र , जब कुंती हमारे साथ जंगल की ओर प्रस्थान करने लगी थी तो युधिष्ठिर कितना विचलित हो गया था।
धृतराष्ट्र : हाँ , अच्छी तरह से स्मरण है। व्याकुल होकर कहने लगा था , ” माँ , तुम वन क्यों जा रही हो ? तुम्हारे ही आशीर्वाद से हमें यह राजपाट मिला है। अब तुम्हीं हमें छोड़ कर वन जा रही हो ?” उसका गला भर आया था।
गांधारी : किन्तु उसके इतना आग्रह करने पर भी कुंती अपने निश्चय पर अटल रही थी। कहने लगी , ” मैं बहन गांधारी की सेवा टहल करते हुए तपस्या करुँगी और समय आने पर शरीर का त्याग कर तुम्हारे पिता के पास पहुँच जाऊँगी।
धृतराष्ट्र [प्रसन्न स्वर ] : यही क्यों ? जब मैंने अपने वन प्रस्थान का निर्णय सुनाया था तभी युधिष्ठिर कैसा व्याकुल हो उठा था ! कुछ बोल नहीं पा रहा था। जब बोल तो उनसे कहा था , ” यदि आप वन जाएँगे तो मैं भी आपके साथ ही चलूँगा। आपके वन चले जाने पर , मैं इस राज्य को लेकर कौन सा सुख भोगूंगा ? ” कुछ भी हो पांडवों ने परिवार के अग्रजनों और गुरु जनों की मर्यादा का सदैव ध्यान रखा है।
गांधारी [तड़प कर ] : और क्या मेरे पुत्रों ने नहीं रखा था ? क्या दुर्योधन ने यह जानते हुए भी कि आर्य भीष्म व् द्रोण पांडवों के प्रति कितनी कोमल भावनाएं रखते हैं , उन्हें युद्ध में सेनापति नहीं बनाया था ? कारण तथा आर्य भीष्म के विवाद को देखते हुए , क्या उसने आर्य भीष्म का सम्मान रखने के लिए अपने अभिन्न मित्र तथा अपरिमेय धनुर्धर कर्ण को दस दिवस तक युद्ध भूमि से दूर न रखा था ?
धृतराष्ट्र : यह सब सही है। किन्तु काश उन्होंने तुम्हारे भ्राता शकुनि के प्रति अतिरिक्त सम्मान न व्यक्त किया होता।
गांधारी [ तेज़ स्वर ] : महाराज , कुरु वंश की भूलों के लिए मेरे भ्राता पर आरोप लगाना उचित नहीं है।
धृतराष्ट्र : कुरुवंश की भूल या तुम्हारे यत्र दुर्योधन की ?
गांधारी : क्या दुर्योधन उस समय था जब महाराज शांतनु ने महारानी सत्यवती से विवाह के लोभ में अपने पराक्रमी पुत्र भीष्म को आजीवन ब्रह्मचर्य के शिकंजे में कस दिया था? क्या दुर्योधन उस समय था जब कुरु राजकुमार भीष्म अपने सौतेले भाई विचित्रवीर्य के लिए काशिराज की पुत्रियों का अपहरण कर लाये थे ? और जब ज्येष्ठ भाई के जन्मांध होने के आड़ लेकर उसके अनुज को राज सिंहासन पर बैठा दिया गया था तब …..
धृतराष्ट्र : बस गांधारी बस
गांधारी : बस क्यों महाराज ? यदि कुरुकुल में यह अन्याय न होता तो मेरा पुत्र राजगद्दी से वंचित न होता और तब यह महाभारत भी न होता। मेरे भाई ने अपने भगिनिपुत्र के प्रति हुए अन्याय का समाधान करने की ही चेष्टा की थी।
धृतराष्ट्र : पर इस चेष्टा का अंत ….
गांधारी : शांत …. शांत। ……कुंती के पैरों की आहात सुनाई दे रही है। उसके समक्ष ऐसी बातें न करें।
[ कुंती का प्रवेश। पास में लकड़ी का गट्ठर ]
कुंती : ओह सूर्य कितनी ऊपर चढ़ आया है।
गांधारी : बैठो कुंती , तनिक विश्राम कर लो।
कुंती : नहीं दीदी , अभी रसोई करनी है।
गांधारी [स्नेह से ] :रहने दो , आज कन्द मूल ही खा लेंगें। तुम हमारा इतना ध्यान रखती हो कि हमें लज्जा आने लगती है।
कुंती : ऐसा क्यों कहती हो दीदी ? मेरी सेवा से यदि आपको सुख मिलता है तो मैं ऐसा क्यों न करूँ ? आपके दुखों को कुछ कम करके मेरे ह्रदय का बोझ भी कुछ कम होता है।
धृतराष्ट्र [ थोड़े विनोद के स्वर में ] : अब शरीर में वह सामर्थ्य नहीं रहा वरना मैं यहीं से बैठे बैठे शब्दभेदी बाण से शिकार कर देता। रसोई बनाने की समस्या नहीं रहती।
गांधारी : अब आप तपस्वी हैं महाराज। वह क्षत्रियों वाले भोजन का विचार भी मन में मत लाइए।
कुंती [ विनोद स्वर ] : और दीदी , ज्येष्ठ श्री ने यहां के सब पशु पक्षियों से इतने स्नेह सम्बन्ध बना रखे हैं कि शिकार करते भी तो किसका ?
[ सम्मिलित हंसी ]
धृतराष्ट्र : हमारे हृदयों में दुःख का इतना स्थायी निवास हो गया है कि स्वयं की हँसी पर भी विश्वास नहीं होता है।
गांधारी : चलिए महाराज , भीतर चलें। सूर्य की तीव्रता बढ़ती जा रही है।
धृतराष्ट्र : हाँ , भले ही मुझे दिख न सकता हो किन्तु अनुभव तो होता है न। सूर्य वास्तव में इस समय कुरुक्षेत्र के युद्ध के दिनीं सा चुभ रहा है , जब हर नए दिन का सूर्य एक नए विनाश का सन्देश लेकर आता था। ……चलो हम एक दूसरे को सहारा दें गांधारी।
गांधारी : और हमें सहारा देगी कुंती।
कुंती : आइये दीदी।
[ तीनों का विंग्स की तरफ प्रस्थान ]
दृश्य 2
[ कुटिया का सेट। बाहर कुछ दूर पर कुंती एक स्थान पर बैठी विचार कर रही है। ]
कुंती [अपने आप से ] : मन को कितना शांत रखने की कोशिश कर रही हूँ सुबह से। पर यह है कि नियंत्रण में ही नहीं आ रहा है। सुबह नदी में बहता हुआ लकड़ी का बक्सा देखा और .. और कर्ण की याद आ गयी। ऐसे ही लकड़ी के बक्से में रख कर बहाया था उस नवजात शिशु को। ओह। ..मैं , ममताहीन , निष्ठुर कैसे हो गयी थी ? लोकलाज के डर से मैंने अपने प्रथम पुत्र को गंगा की भेंट चढ़ा दिया था। कर्ण …..,मेरा भाग्यहीन पुत्र अपने ही भाइयों के हाथों मारा गया . उसकी हत्या का दोष किस पर है ? मुझ पर ?……. हाँ ….. मुझ पर ही . अगर मैं युद्ध से पूर्व उसे उसके जन्म की घटना न बताती तो क्या वह युद्ध क्षेत्र में यूँ कमज़ोर पड़ता ? जो योद्धा हथियारों के युद्ध में सहज ही जीत जाता , उसे भावनाओं के युद्ध में उसकी अपनी माता ने हरा दिया . [सिसकी ] कर्ण …. पुत्र …. काश तुम इतने विशाल हृदय न होते ? …. पर …. पर पुत्र तुम यह न समझना कि तुम्हारी माता को तुम पर केवल शोक ही है , उसे तुम पर गर्व भी है . अपनी निष्ठां की रक्षा के लिए जिसने विजयी पक्ष में आने के स्थान पर मृत्यु को श्रेष्ठ समझा ऐसे पुत्र पर भला किस माँ को गर्व नहीं होगा ? वह बक्सा ….. नदी में बहता वह बक्सा …. मैंने लपक कर उसे अपनी ओर खींचा , कहीं किसी और कुंती ने तो किसी कर्ण को नदी की भेंट नहीं चढ़ा दिया ? .. बक्सा खाली था …. मेरे मन ने सुख की सांस ली .
[ संजय का प्रवेश ]
संजय : प्रणाम छोटी भाभी .
कुंती : अरे मन्त्रिवर संजय , आ गए हस्तिनापुर से ! क्या समाचार लाये हैं ?
संजय : वहां पर सब कुशल हैं . आपको प्रणाम भिजवाया है . महाराज युधिष्ठिर आप सबकी कुशलत को लेकर चिंतित थे .
कुंती :अब जीवन की इस विदा बेला में हमारी क्या चिंता करनी ?
संजय : महाराज व् बड़ी भाभी नहीं दिख रहे हैं , कहाँ गए ?
कुंती : संध्या वंदन करने नदी के तट तक गए हैं . संजय मुझे महाराज आज फिर काफी दुखी लगे .
संजय : यह कोई नवीन बात नहीं है, छोटी भाभी . महाभारत के युद्ध की नींव रखते समय महाराज ने अपने लिए भी दुखों की गहरी नींव रख ली थी . कितना समझाया था मैंने तथा विदुर ने . पर महाराज तो पुत्र प्रेम के कोल्हू में बैल की तरह जुते हुए थे .
कुंती : हाँ , यही तो आश्चर्य है कि राज कार्य के लिए मंत्रियों से सलाह करने की अपेक्षा महाराज पूरी तरह से दुर्योधन पर आश्रित हो गए थे . अनुभवी मंत्रियों की जगह भला एक अनुत्तरदायी युवक का अल्हड़पन कैसे ले सकता था ?
संजय : बहु द्रौपदी के भरी सभा में अपमानित होने के बाद जब महाराज दुखी रहने लगे थे तब भी उन्हें कुलवधू के अपमानित होने का इतना दुःख नहीं था जितना कि पांडवों से बैर होने का . मैंने तब भी महाराज से स्पष्ट शब्दों में कहा था , ” महाराज जिसका नाश होना होता है उसकी बुद्धि फिर जाती है . प्रारब्ध को जिसे दण्ड देना होता है उसका विवेक हर लेता है जिससे वह अपने आप विनाश के गड्ढे में गिर जाता है . ”
कुंती [आश्चर्य से] क्या सचमुच तुमने इतने स्पष्ट शब्दों में इन्हें चेताया था ?
संजय : हाँ भाभी सच . मैं तथा विदुर दोनों धर्मसम्मत बातें निर्भीक रूप से कहते थे किन्तु महारज हमारी इन बातों से शीघ्र ऊब जाते थे . चाटुकारिता तथा स्वार्थ , दोनों किसी राजा के लिए विनाश की सीढ़ियाँ हैं . काश कि यह बात महाराज समझ सकते ? भाभी एक बात कहता हूँ …… नेत्रहीन राजा के साथ काम करना उतना कष्टकर नहीं है जितना कि किसी दृष्टिहीन राजा के साथ काम करना .
कुंती : अच्छा संजय , यह तो बताओ कि महाभारत के युद्ध का वर्णन सुनाते हुए तुम सबकुछ यथास्थिति बता देते थे ? उनके पुत्रों की मृत्यु का वर्णन करते हुए तुम्हें घबराहट नहीं होती थी ?
संजय : होती थी . कभी कभी तो इतना संकोच होता था कि जिव्हा रुक जाती थी . पर मेरे न बोलने पर वे किसी बड़े विनाश की कल्पना करके छटपटाने लगते थे .मैं अभिशप्त था अशुभ , पीड़ादायक सत्य बोलने के लिए .
कुंती : ऐसा न कहो संजय .
संजय : कैसे न कहूं ? भूमि पर पड़े घायल दुर्योधन के सिर पर जब भीमसेन ने लात से प्रहार किया था , उसका वर्णन किस दृढ़ कलेजे से मैंने किया होगा आप समझ सकती हैं . [आवेश ] किन्तु भाभी मैं मौन रहा …. हाँ एक जगह… मैं मौन रहा …. मैं इतना साहस नहीं जुटा पाया कि इस पुत्र मोहग्रस्त अंधे राजा को यह बता सकूँ कि तुम्हारे परम प्रबल प्रिय पुत्र के घायल शरीर घायल शरीर को जंगली पशु घेरे खड़े हैं ताकि उसकी मृत्यु होते ही वे उसके शरीर को नोंच नोंच कर खा जाएँ .
कुंती : शांत , संजय , शांत . कहीं महाराज व् दीदी सुन न लें . जो सच तुमने आज तक छिपाया है वह जीवन की अंतिम बेला में उनके ह्रदय में जलती हुई कटार की तरह उतर न जाए ?
संजय : आप उचित कह रही हैं . ….. अरे ये लीजिए सामने से वे लोग भी आ रहे हैं .
[धृतराष्ट्र तथा गांधारी का प्रवेश ]
धृतराष्ट्र : कितना अभ्यास हो गया है इस मार्ग का . एक कदम भी गलत नहीं पड़ता है .
गांधारी : यह जंगल है महाराज , नगर नहीं . बात बात में बदलना इसका स्वभाव नहीं . …. लीजिए आ पहुंचे . ..अपनी कुटिया के पास लगे आम के पेड़ों की सुगंध आ रही है .
संजय : प्रणाम महाराज , प्रणाम बड़ी भाभी।
धृतराष्ट्र : कौन , संजय , कब आये भाई ?
संजय : अभी कुछ समय पूर्व।
धृतराष्ट्र : सुबह चले होंगे वहां से? कुछ खाया पिया ?
कुंती [क्षमा भरे स्वर में ] : अरे यह तो पूछना मैं भूल ही गयी थी !
संजय [हँसते हुए ] : अब इस आयु में खाना क्या और पीना क्या भाभी ? आपको कष्ट न हो इसलिए मैंने मार्ग में कुछ फल खा लिए थे। आप व्यर्थ परेशान न हों।
गांधारी : अब क्या समाचार लाये हो संजय ?
संजय : इस बात सुसमाचार लाया हूँ बड़ी भाभी। हस्तिनापुर नरेश युधिष्ठिर के धर्मराज्य की चर्चा सब दिशाओं में हो रही है। प्रजा सुखी एवं प्रसन्न है।
गांधारी : प्रजा तो महाराज धृतराष्ट्र के शासनकाल में भी सुखी थी. राजकुमार दुर्योधन स्वयं प्रजा के हित का ध्यान रखते थे।
संजय : किन्तु उसी प्रजा को राजकुमार दुर्योधन के कारण ही अकारण युध्द की आग में जलना पड़ा था।
धृतराष्ट्र [ रोष से ] :संजय ! क्या तुम्हारे लिए अप्रिय सत्य को भी निरन्तर बोलना आवश्यक है ?
संजय : क्षमा करें , महाराज। पर महाभारत के महायुद्ध ने इस धरती पर विनाश की जो गहरी काली रेखाएं खींची थी, आज 18 वर्षों के उपरान्त भी उन रेखाओं का प्रभाव फीका नहीं पड़ा है। में आज भी उन खंडित भवनों , विधवा नारियों तथा अनाथ , अपंगों को देख कर आ रहा हूँ जो युद्ध की विभीषिका के अनचाहे शिकार रहे थे …..
कुंती [बीच में ] : …अहा देखिये महाराज शाम होते ही आपका प्रिय श्याम हिरण भी आ गया। पेड़ की ओट से सिर निकाल कर , कैसे टुकुर टुकुर आपको देख रहा है , मानो कोई शरारती बालक अपने पिता की गोद में चढ़ने का मौका तलाश रहा हो।
धृतराष्ट्र : ये भी तो मेरा पुत्र है। …. आ …. आ … आजा [ हिरण गोद में आता है ] ….. आ गया मेरा लाल।
गांधारी [ हंस कर ] : चलो महाराज का मन हल्का हुआ।
संजय : यह सही है भाभी। पशुओं के साथ हमारा निस्वार्थ प्रेम का संबंध होता है , इसलिए इनके साथ मन हल्का हो ही जाता है। … चलिए महाराज आप इस मृग शावक से खेलिए तब तक मैं नदी तट से होकर आता हूँ।
[ संजय का प्रस्थान ]
कुंती : मैं भी तनिक भोजन की व्यवस्था देख लूँ।
[ कुंती का कुटिया के भीतर प्रवेश ]
धृतराष्ट्र : गांधारी , इस मृग शावक की आँखें कैसी हैं ?
गांधारी : मुझे क्या पता महाराज ? मेरी आँखों पर तो पट्टी बंधी है।
धृतराष्ट्र : ओह … हाँ। .. काश तुमने ऐसा वचन न लिया होता तो तुम मुझे बता सकती थीं कि मेरे इस छोटे से पुत्र का रंग कैसा है ? बाल कैसे हैं ? कैसा दिखता है ? [ हिरण से ] ए शैतान …अधिक उछल कूद नहीं करना …. समझा। …. नहीं मानेगा तो उतार दूँगा गोद से … समझा !
गांधारी : कुंती से क्यों नहीं पूछ लेते इसके बारे में। वह तो देख सकती है। इसका पूरा रूप रंग बता देगी।
धृतराष्ट्र : हाँ , बता देंगी। किन्तु अपने पुत्र के विषय में अपनी पत्नी के मुख से सुनना अधिक सुखद लगता। कुंती से पूछना होता तो मैंने कब का पूछ लिया होता।
गांधारी : इस विषय में तो मैं असमर्थ हूँ महाराज। आपसे विवाह के अवसर पर मैंने स्वेच्छा से यह पट्टी आँखों पर बाँध ली थी।
धृतराष्ट्र : कहीं तुमने यह पट्टी इसलिए तो नहीं बाँध ली थी गांधारी कि तुम अपने पति की अंधकारमय आँखों में अपनी आशाओं और आकांक्षाओं को अँधेरे में डूबते न देख सको।
गांधारी : छिः छिः यह क्या कह रहे हैं ,आप महाराज ? मेरे बलिदान को किस रूप में देख रहे हैं ? मैंने पट्टी इसलिए बाँधी थी कि जीवन के जिन रंग बिरंगे दृश्यों को मेरे स्वामी न देख सकें , उन्हें देखने का अधिकार उनकी इस दासी को भी नहीं है।
धृतराष्ट्र : मैं तुम्हारे त्याग को अनदेखा नहीं कर हूँ महारानी। किन्तु कभी कभी मेरे मन में इस बात को लेकर संशय रहता है।
गांधारी : संशय में रहना महाराज का स्वभाव है।
धृतराष्ट्र [ थोड़ा तेज़ स्वर ] : तुम … तुम मेरी अर्धांगिनीं हो , मुझे संशय के भंवरजाल से निकालना तुम्हारा भी दायित्व था।
गांधारी : मैं … मैं … मैं कैसे निकालत ? मैं तो स्वयं किसी सत्य को देखने से वंचित थी।
धृतराष्ट्र : यही कमी रह गयी तुम्हारे वचन में। तुम्हें चाहिए था कि तुम अपनी आँखें खुली रख कर अपने पति की दृष्टि बनतीं। तब हमें दूसरों के बताये अर्ध सत्यों पर निर्भर नहीं रहना पड़ता। हमारे दृष्टिहीन होने की अनुभूति ने हमें दूसरों पर इतना निर्भर कर दिया था कि हम किसी लता की भाँति सहारे के लिए अपने बलवान पुत्र से कस कर लिपट गए थे। उसको होने वाली किसी भी हानि में हमें अपना विनाश दिखाई देने लगता था। यदि तुमने अपनी खुली रखी होतीं तो भरी सभा में द्रौपदी को यूँ अपमानित नहीं होने देतीं। और तब संभवतया ये कुरुक्षेत्र का युद्ध भी न होता।
गांधारी : अब इन सब बातों से क्या लाभ महाराज ? जो होना था वह तो हो चुका। इतिहास के पृष्ठों का लेख मिटा सकना हमारे सामर्थ्य के बाहर की बात है। इस बात की समीक्षा आने वाली पीढ़ी को करने दें कि गांधारी ने गलत किया था या सही ?
धृतराष्ट्र [ गहरी सांस लेकर ] : यही उचित है।
गांधारी : चलिए महाराज , कुंती हमारी प्रतीक्षा करती होगी।
धृतराष्ट्र : हाँ , चलो।
[ दोनों का कुटिया में प्रवेश ]
दृश्य 3
[ संजय , कुंती , धृतराष्ट्र और गांधारी कुटिया के बाहर कुछ दूर बैठे हुए हैं। ]
धृतराष्ट्र : संजय , तनिक सुनो। दूर से कुछ विचित्र ध्वनि सुनाई दे रही है .
[ पशुओं के भागने का स्वर ]
संजय : दूर कुछ पशुओं के झुण्ड भागते दिखाई दे रहे हैं। उन्हीं का शोर है।
गांधारी : पर अचानक ये पशु भागने क्यों लगे हैं ?
संजय : यहां से कुछ पता नहीं चल रहा है। आप कहें तो कुछ आगे जाकर पता करूँ ?
धृतराष्ट्र : नहीं कोई आवश्यकता नहीं है।
[ शोर कुछ अधिक होकर समीप आता हुआ। ]
गांधारी [घबराकर ] : अब क्या हुआ ? क्या पशुओं में भी महाभारत होने लगा है ?
संजय : पशु अधिक तेज़ी से भागने लगे हैं। अरे .. वह दूर धुआँ कैसा उठ रहा है ?
कुंती : कहाँ संजय ?
संजय : वह .. वहां उन पेड़ों के पीछे।
कुंती : मुझे तो वह आग सी लग रही है।
संजय : हाँ , आग ही है। यह जंगल की आग है। कितनी तीव्रता से फ़ैल रही है। इसीलिए ये पशु अपनी जान बचा कर भाग रहे हैं।
गांधारी : संकट के समय अपनी जान बचाने का अधिकार सभी को है।
धृतराष्ट्र : संजय , कहीं यह आग इसी दिशा में तो नहीं है ?
संजय : आपक संदेह उचित है महाराज। यह आग हमारी दिशा में ही फैलती आ रही है। [ शीघ्रता से ] चलिए महाराज , उठिए। हमें शीघ्र किसी सुरक्षित स्थान पर पहुँच जाना चाहिए। … उठिए महाराज शीघ्रता कीजिये।
धृतराष्ट्र : नहीं , संजय , तुम लोग जाओ। इस भार स्वरुप जीवन से मुक्ति पाने का श्रेष्ठ अवसर आया है , मैं इस अवसर पर प्रस्थान नहीं करूँगा।
संजय : किन्तु महाराज ?
धृतराष्ट्र : नहीं संजय …. आज मुझे कोई संशय नहीं है। आज का यह अग्नि स्नान मेरी आत्मा को पवित्र कर देगा। इस अग्नि में अपने प्राणों की आहुति दे कर अपने सभी दुखों , सभी त्रुटियों का परिष्कार करूँगा। आओ , अग्निदेव , शीघ्र आकर अपने हवन कुंड में मेरी आहुति स्वीकार करो।
गांधारी : मैं भी आपका अनुसरण करुँगी महाराज।
कुंती : आप दोनों का मार्ग ही , मैं भी ग्रहण करुँगी। बहुत दिन हो गए महाराज पाण्डु की सेवा में जाने की प्रतीक्षा करते हुए।
संजय : अगर आप सबकी यही इच्छा है तो मैं अपने आपको आप लोगों के निर्णय के साथ जोड़ता हूँ। मैं भी इसी अग्नि में देह त्याग करूँगा।
धृतराष्ट्र : नहीं , यह उचित नहीं है संजय। तुम जाओ यहां से। तुम्हें अपने प्राणों की रक्षा करनी होगी। तुम हमारे संवाददाता हो। हमारे इस नश्वर संसार को छोड़ने का संवाद तुम्हें ही सबको सुनाना होगा।
सनजय : यह नहीं होगा महाराज।
धृतराष्ट्र : तुम्हें जाना ही होगा संजय। यह मेरा आदेश है। मेरा अंतिम आदेश।
संजय [ धीमा स्वर ] जो आज्ञा राजन। विदा महाराज। प्रणाम आप सबको।
गांधारी : जाओ संजय , और जाकर बताना हस्तिनापुरवासियों को कि जीवन भर अपने अन्धकार में रहने वाले तुम्हारे महाराज और महारानी ने अपने अंतिम क्षणों में बाहें पसार कर पूर्ण प्रकाश का स्वागत किया था।
कुंती : शीघ्रता करो संजय , अति शीघ्र। आग बहुत समीप आ गयी है।
संजय : जाता हूँ।
[ आंसुओं के साथ प्रणाम करके जाता है ]
कुंती : महाराज आग बिलकुल समीप आ गयी है।
धृतराष्ट्र : मैं अनुभव कर रहा हूँ। तीक्ष्ण गर्मी ,दहकाए दे रही है।
गांधारी [ खांसते हुए ] : धुंए से दम घुट रहा है।
धृतराष्ट्र [हँसते हुए ] : आग को एकदम समीप आने दो फिर धुआँ नहीं लगेगा।
गांधारी : ये क्या महाराज , मृत्यु के क्षणों में भी विनोद।
धृतराष्ट्र : हँसते , हँसते मृत्यु का आलिंगन करना ही क्षत्रिय का धर्म है।
कुंती : महाराज आग बस हमें छूने ही वाली है।
धृतराष्ट्र : बैठो , पूर्व दिशा की ओर मुँह करके , योग समाधि लगानी है। जलने की पीड़ा को भूलना होगा।
कुंती [ पीड़ित स्वर ] : महाराज अग्नि देह जलाने लगी है।
धृतराष्ट्र : शांत होकर कृष्ण का ध्यान करो। पीड़ाएं शांत होंगी। हे कृष्ण , हे नारायण , हे नाथ
[ पार्श्व से बांसुरी का स्वर ]
धृतराष्ट्र , गांधारी , कुंती [समवेत स्वर ] : हमारा प्रणाम स्वीकार करो माधव। तुम्हारी शरण में आ रहे हैं , हमें स्वीकार करो। स्वीकार करो।
[ बांसुरी का स्वर ऊंचा होता है। साथ साथ पर्दा गिरता है। ]
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