कविता आज और अभी/ जुलाई-अगस्त 16

।। तू अर्जुन नहीं ।।

bhram

टकटकी बाँधे
क्यों देख रही आँखें
क्षितिज के उस कोने को
जहाँ सूरज-सा लटका
एक सपना
कल फिर आने का
वादा कर
डूबता जाता है
पोंछ इन
डबडबाती आँखों को
एकलव्य,
तू अर्जुन नहीं।

साँझ की फुनगियों पर
बिखरा सोना
और
ऋषि आंगन में
सुरक्षित
मृग-छौना
एकनिष्ठ साधना..
इस कटे अँगूठे का
अभी तो खून तक
सूखना बाकी है!

-शैल अग्रवाल

 

 

 

 

।। एक और सच ।।

bhram

सूर्यवंशी होना ही सब कुछ नहीं
ये कवच और कुंडल तो हमेशा
दान ही हुए हैं या फिर छीने गए हैं
हर शक्ति और गरिमा से
बात बस एक है
जरा शब्दों का फेर है
युद्ध में शस्त्रों की जगह
माँ का आँचल था
और था अनाथ के पास
बिन पिए दूध का कर्ज
लड़ाई धर्म की हो या समाज की
हमेशा अर्जुन ही जीतता है।
यह ढाल और कवच बेकार हैं
मिथ्या है सत्य का तुमुलनाद
और साधना का अमित प्रसाद
कर्ण के परित्यक्त जीवन में तो
एक कठिन एकाकी सफर से
दूसरे खामोश लम्बे सफर तक
हर युग में बस सन्यास है।

– शैल अग्रवाल

 

 

 

 

।। चक्रव्यूह ।।

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जीने की विधाओं से लैस निरीह आदमी
कब तक अभिमन्यु सा झोंका जाएगा
क्योंकि बचाना है उसे आने वाली पीढ़ी को
उतारना है अपंग, अंधे पूर्वजों का कर्ज
खोजना है अपनी ही सांसों का अर्थ
बड़ों से सुनकर, जीवन से पढ़कर
पर आखिरी द्वार पर तो घोर अंधेरा
डुबोता हुआ वही बहरा गूंगा सन्नाटा

-शैल अग्रवाल

 

 

 

 

।। चीरहरण ।।

bhram
रोज होता है
और होता ही रहेगा
जीती रहेगी वो ऐसे ही
मर मर कर नित नित
प्रेम के अनंत आंचल की उम्मीद में
लिपटी संवरी

आत्म-सारथी, सखा
जीने के लिए
एक कृष्ण ही बहुत है
आज भी
द्रौपदी के लिए…
-शैल अग्रवाल
 

 

 

 

।। सूरज फिर बादलों की ओट में ।।
bhram

फिर डूबा है सूरज
बादलो के ओट में
कभी डूबा था,
महाभारत के युद्ध में
कृष्ण की नीति से
अर्जुन के प्रण से
तब!
विजयी हुआ था पार्थ
समर में संग्राम में
और मारा गया था
जयद्रथ।
फिर डूबा है सूरज
बादलों के ओट में,
पर झूठ है कि
इतिहास अपने को दुहरायेगा।
इस बार नहीं मरेगा
जयद्रथ,
अपितु
द्रौपदी को अपहृत किया जायेगा
अभिमन्यु मरेगा
और
हर जयद्रथ
हर मोड पर
पार्थ को हरायेगा।
झूठ है कि इतिहास
अपने को दुहरायेगा।
-रजनीश शुक्ला

 

 

 

 

और चाहिये
bhram

रक्तबीज की भाँति
समाज में धृतराष्ट्रों की भरमार है
‘और चाहिये.. और चहिये’
की आग में जलते हुए
दुर्योधनों की बाढ़ है

डॉ. वंदना मुकेश
 

 

 

 

॥ वृशाली ॥
bhram

॥ वृशाली ॥
मृत्युदेव स्तब्ध हैं
धीरे धीरे रो रहा है इंद्र
सूर्य चुपके से चले गए हैं
किसी बादल की ओट में
युद्ध का सत्रहवां दिन
कर्ण का शव कर रहा है प्रतीक्षा
अंतिम संस्कार की
मतभेद दूर करते हैं श्रीकृष्ण
कुंती और युधिष्ठिर को समझाते हुए
अधिकार देते हैं दुर्योधन को
कर्ण की मुखाग्नि का
आश्चर्य है,
मृत्यु पर्यन्त कर्ण था राधेय
एक अज्ञात कुलशील
जिसे न क्षत्रिय स्वीकार किया गया
और न ब्राह्मण
और अब उनका अंतिम संस्कार होगा
एक क्षत्रिय की तरह
मृत्यु के बाद भी नहीं समाप्त होती जाति
कैसी जटिल व्यवस्था में जी रहे हैं हम
क्या कुछ भी बदला है आज तक?
कुंती आदेश देती हैं
कर्ण की पट रानी वृशाली को
तुम्हें सती होना होगा
कर्ण की देह के साथ
आज अंतिम बार सती होगी वृशाली
वृषकेतु धीरे से उठता है
छोड़ता है माँ का हाथ
और जाकर खड़ा हो जाता है अर्जुन के पीछे
फिर से अकेली हो जाती है वृशाली
पुरुषों के इस नृशंस संसार में
अब उसे जलना ही होगा उस देह के साथ
जिसके साथ उसका
थोड़ा बहुत भोग का ही सम्बंध था
सती होने से पहले
वृशाली को ले जाया जाता है शृंगार कक्ष में
परिचारिकाएं लेपती हैं चंदन का लेप
अतीत के सपनों में खो जाती है वृशाली
एक चलचित्र चलता है आँखों के सामने
विशाल बाहु कर्ण हैं, अंग देश के राजा
कौरवों के मित्र और अर्जुन से बड़े धनुर्धर
उनके कानों के कुंडल बिखेरते हैं सूर्य रश्मियाँ
प्रवेश करती है रत्न जड़ित महल में
धन्य हुई वृशाली
एक राजा को पति पाकर
वृशाली पिंघल रही है कर्ण के बाहुपाश में
कर्ण चूम रहे हैं उसे नख से शिख तक
तैर रही है एक छोटी सी नाव
उद्वेलित समुद्र में
अचानक उसके हाथों को पकड़े हुए
कहते हैं कर्ण—
ओह, द्रौपदी से सुंदर नहीं हैं तुम्हारे हाथ!
वृशाली जम जाती है बर्फ सी
इस तरह से खत्म होती है उसकी सुहागरात
एक उपेक्षित पत्नी
जो जानती है अपने पति की चाह
जीती रहती है किसी साध्वी-सी
पुत्र वृषकेतु के साथ
विवाह तो संतानोत्पत्ति का यज्ञ ही है आज तक
पुरुष जीता है किसी और के साथ
और रहता है किसी और के साथ
तुम छली गई वृशाली
जैसे आज भी छली जाती हैं अनेक नारियाँ
वृशाली पीकर खून का घूँट
आरती उतारती है कई सौतनों की
क्योंकि दुर्भाग्य से वह पटरानी है
कर्ण की गद्दी पर बैठेगा उसका पुत्र
बस यही है पटरानी का अधिकार
क्या माँएं आज भी संतान के स्वार्थ के लिए
नहीं जी लेती हैं
किसी बेरहम घर में अवांछित-सा जीवन?
वृशाली जागती है
ढोल-नगाड़ों की आवाज़ से
वह बैठी है लकड़ियों के ढेर पर
गोद में कर्ण का सिर रखे
वह निस्पंद है, विचार शून्य है
दुर्योधन लगाते हैं आग सूखी लकड़ियों में
वृशाली प्रतीक है उस निष्ठुर समाज के हीनता-बोध का
जहाँ पुरुष रख सकता है अनेक स्त्रियाँ
पर स्त्रियों को अधिकार नहीं
अपने भरोसे अपना जीवन जीने का
कितना कायर और असुरक्षित है हमारा समाज
कितने बदले हैं हम!
धुएं से श्याम हो गए हैं योद्धाओं के शरीर
महाभारत के सत्रहवें दिवस के अवसान पर
सभी लौट रहे हैं अपने अपने तम्बुओं में
जहाँ बैठी मृत्यु
बाँच रही है उनका भाग्य
अग्निदेव काँप रहे हैं एक स्त्री के दर्प से
कितने ही राजा जले हैं उसमें
पर वे कभी हुए नहीं इतने कातर
रोते हुए वृशाली को स्वीकारते हैं
अपनी कन्या की तरह
जो थक हार कर लौट रही है पृथ्वी से
वृशाली आज भी चमकती हैं
चांद बन कर आकाश में
कभी कभी पूर्णिमा के दिन
टपकता है एक आँसू उस की आँख से
जिसे स्त्रियाँ सहेज लेती हैं
अपनी आँखों में!
– राजेश्वर वशिष्ठ