उपन्यास अंशः अलविदा बी.एच. यूः इला प्रसाद/ लेखनी-जुलाई-अगस्त 16

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अलविदा बी एच यू !

“शुचि दी प्रेमपत्र जला रही हैं।”

यह शुचि का ही वाक्य था जो वह हर जा रही लड़की को कागज जलाते देख कर कहा करती थी, अब वही कारीडोर से गुजरती लड़कियाँ उसे कह रही हैं। वह खड़ी है कोने में सीमेंट के कूड़ेदान के पास… आती जाती लड़कियों की ठिठोली का जवाब सम्मिलित हँसी से देती….. ढेर सारी तो चिट्ठियाँ ही थीं, बाकी कागजों में….. इतने सारे जन्मदिन की बधाई वाले कार्ड, दोस्तों की शादी के कार्ड, नये साल की बधाई, गेट वेल सून…कान्ग्रेच्यूलेशन्स…..! माँ- बाबू जी की कुछ खास चिट्ठियाँ उसने अब भी बचा लीं हैं। बाकी वे पत्र जिनमें दोस्तों ने अपने पते लिखे थे। जया चित्तरंजन में स्कूल टीचर है अब। सविता बम्बई में – फ़्रेंच बैंक में। निवेदिता कलकत्ते में। स्नेहा दी नालंदा में कालेज में पढ़ाती हैं। सावित्री जमशेद्पुर की थी। मनीषा दी कोयम्बटूर में, दिव्या दी- बडौदा।. युनिवर्सिटी में पढ़ाती हैं।. रसायन शास्त्र विभाग की सुनीति दी – हमेशा जर्नल उनके नाम पर वहाँ की लाइब्रेरी से निकलवा लेती थी, अब शादी के बाद दिल्ली में हैं, युनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर। सबके पत्र आते रहे.. अब सब जला रही है। उस सबके साथ ही जल रहा है एक पूरा अतीत…. या कि मन में बस रहा है अन्दर….

पिछले कई दिनों से वह सामान पैक कर रही है। एक छोटी-मोटी गॄहस्थी हो गई थी हास्टल में। दरवाजे का परदा हास्टल में काम करने वाली बाई शान्ति मांग ले गई है। पुरानी चादरें भी उसे ही दे दीं। उसने हमेशा शुचि के कपड़े धोये, जब- जब शुचि बीमार पड़ी और कभी पैसे नहीं लिये। बर्तन भी छोड़ जायेगी। मानसी के काम आयेंगे। बस वो प्लेट जो जन्मदिन पर जया ने दी थी, रख लेगी और वह चाकू जो कभी सविता ने दिया था। शुचि रच- रच कर खाना बनाती थी, जब त्योहार में हास्टल में रही। राजमा, कोफ़्ते… पनीर पायस। यह सब हास्टल में ही किया। उसे पता भी नहीं था कि वह इतना अच्छा खाना भी बना सकती है। सविता ने तभी चाकू दिया था – “आपके लिये गिफ़्ट। प्याज इससे काटिये, रोइये और मुझे याद कीजिये। ऐसे तो आप याद करने से रहीं।” फ़िर एक ठहाका। बहुत याद आती है उसकी भी…
कुछ सलवार-कमीजें दोस्तों को दे दीं। बहुत कपड़े हैं उसके पास। गोदौलिया से खरीद- खरीद कर कितना तो इकट्ठा कर लिया था। अभी जाने से पहले माँ- बाबू जी के लिये कपड़े खरीदे है। बहन- भाई के लिये भी। वह कमाती है तो इतना तो करेगी ही। फ़िर पी एच डी सबमिट हो गई , उसकी खुशी भी है। कुछ राँची के दोस्तों के लिये उपहार हैं। इतने सालों में कभी मिल नहीं पाई। फ़ोन पर बातें की हैं। अब मिलेगी तो कुछ तो देगी। दिखायेगी अपना फ़ोटॊ वाला अलबम – पाँच सालों में कितनी दोस्तियाँ हुईं, सबके फ़ोटॊ हैं। हास्टल, विभाग, कैम्पस, लाइब्रेरी, मैत्री जलपान गृह, मैत्री कुंज , बिड़ला मन्दिर, संग्रहालय …. बी एच यू गेट के फ़ोटॊ संजना ने दिये हैं। विभाग में अशोक जी के साथ अन्तिम दिन तस्वीरें निकलवाई थीं। बहुत सहायता की उन्होंने। मारल बूस्ट अप किया। वह तो रोती फ़िरती थी। सबको लगता था अब शुचि डूब गई। न इसके एक्स्पेरिमेंट होंगे, न पी एच डी। उसी शुचि ने इतना अच्छा काम किया। इतना अच्छा सेमिनार दिया कि प्रो. कुन्द्रा की बोलती बन्द हो गई। प्रो. रैणा सिर उठा कर घूमते रहे….प्रो. सिंह खुश हुये…।
किताबें सब ले जानी हैं। जन्मदिन के उपहार में मिली किताबें भी हैं। होल्डाल में आ जायेंगी। बाकी के लिये एक अतिरिक्त बैग खरीदना होगा।

अब सिर्फ़ एक बार और आना है। वाइवा के लिये। थीसिस जमा हो गई। वाइवा में कुछ छह महीने, साल भर तो लगेगा… महीने- दो महीने बाद लौटेगी। कुछ महीने रूकना होगा। थीसिस पता नहीं किसके पास जायेगी। एक परीक्षक विदेश का होता है नियमत:। समय तो लगेगा ही। थीसिस तो अभी भेजी भी नहीं गई होगी। लौटेगी तो सेन्ट्रल आफ़िस के चक्कर लगायेगी। एक पेपर और लिखना है। हास्टल में किसी लड़की की गेस्ट बन कर रहना होगा। पता नहीं कौन सा रूम मैडम अलाट करें। इतनी स्वतंत्रता थोड़े हॊ होगी! सुन्दरतम समय बीत गया….
सारनाथ ,रामनगर दो- दो बार घूम चुकी। गोदौलिया के चक्कर लगा लिये। मन्दिरों में माथा नवा लिया।गंगा के घाटों की दूरियाँ नाप लीं। दोस्तों के कमरों में बैठ लिया। पार्टी कर ली।तस्वीरें खिंचवा लीं। कल नीना बैनर्जी को मिल आई। प्रो. उपाध्याय को भी। मिठाई के डब्बे के साथ। प्रो.झा को मिलना ही था , उन्होंने ही प्रो. सिह को कहा था कि शुचि को अपनी यूनिट में काम करने दें। राजनीति विभाग के प्रो. झा पिता के मित्र थे। शुचि के वे अनुष्ठान भी पूरे हो गये। अंतरराष्टीय जर्नल में पेपर स्वीकृत हैं। तारीफ़ पाई। फ़ेलोशिप भी। हास्टल में नेतागिरी की। इतना स्नेह पाया, लुटाया। अब क्या बचा? कुछ नहीं…….
जैसे- जैसे जाने का समय करीब आ रहा है, एक वैराग्य सा छाता जा रहा है शुचि के मन पर। सारे खास दोस्त पहले ही निकल गये थे। बस रह गयी थीं- मानसी, वंदना और उनके माध्यम से बने दोस्त- सीमा, ज्योति, ऋचा, शुभा, संगीता वगैरह…. एक प्यारी स्मृति के रूप में केमिस्ट्री प्रथम वर्ष में अभी अभी आई विनी रहेगी… कुछ पुरानी साथिने ज्योति कुंज की … उसकी तरह पी एच डी समेटती हुई….
अंगरेजी की वह कविता थी न … याद नहीं आ रही ठीक से लेकिन भावार्थ कुछ यूँ था
मुझे यह शहर अच्छा नहीं लगता
मुझे यहाँ के लोग अच्छे नहीं लगते
यहाँ अब कुछ भी नहीं है मेरे लिये
क्योंकि अब तुम, मेरे दोस्त, यहाँ नहीं रहते……

बी एच यू अपने आप में एक शहर था। दोस्तों का शहर। शुचि का अपना। बाहें खोले भेंटने को तैयार.. इतना सीखा … इतना पाया यहाँ… झोली भर गई……दोस्त-शहर विदा। अलविदा बी एच यू!