गीत और गजलः अहमद फराज़ / अप्रैल-मई 2015

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“फ़राज़ अब कोई सौदा कोई जुनूँ भी नहीं
मगर क़रार से दिन कट रहे हों यूँ भी नहीं

लब-ओ-दहन भी मिला गुफ़्तगू का फ़न भी मिला
मगर जो दिल पे गुज़रती है कह सकूँ भी नहीं

मेरी ज़ुबाँ की लुक्नत से बदगुमाँ न हो
जो तू कहे तो तुझे उम्र भर मिलूँ भी नहीं

“फ़राज़” जैसे कोई दिया तुर्बत-ए-हवा चाहे है
तू पास आये तो मुमकिन है मैं रहूँ भी नहीं…

 

 

 

 

 

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उसने कहा सुन
अहद निभाने की ख़ातिर मत आना
अहद निभानेवाले अक्सर मजबूरी या
महजूरी की थकन से लौटा करते हैं
तुम जाओ और दरिया-दरिया प्यास बुझाओ
जिन आँखों में डूबो
जिस दिल में भी उतरो
मेरी तलब आवाज़ न देगी
लेकिन जब मेरी चाहत और मेरी ख़्वाहिश की लौ
इतनी तेज़ और इतनी ऊँची हो जाये
जब दिल रो दे
तब लौट आना…

 

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