कहानी समकालीनः कल-कीः शैल अग्रवाल/ अप्रैल मई 2015

springमानें या न मानें, पर इसी कलयुग की बिल्कुल सच्ची कहानी है यह, क्योंकि मि. सहाय आज भी यहीं, ब्रिटेन के इसी शहर में रहते हैं और बेहद खुश हैं खुद से भी और अपनी सीधी-साधी दिनचर्या से भी। काम करते-करते जब भी कोई बात सिर में गूंजती या खटकती है, तो दीन-दुनिया से बेखबर कोई भी गीत या भजन गुनगुनाने लग जाते हैं और अपने काम में दुगनी रफ्तार, दुगनी लगन से जुट जाते हैं। कल तक जिनके बारे में कोई जानना भी नहीं चाहता था , आज मुख्यतः एशियाई मोहल्ले भर की गर्म और चटपटी खबर भले ही बन गए हों, पर किसी को भी विश्वास नहीं होता कि इस कलियुग में भी ऐसे लोग होते हैं…जो खुद अपने से ज्यादा दूसरों के दर्द से तड़पते हैं…दूसरों की जरूरतों का ध्यान रखते हैं!

कभी बच्चों के साथ मिलकर आसपास के किसी कोने में पड़ी बंजर, ऊबड़-खाबड़ जमीन को सुन्दर, और उनके खेलने और उठने- बैठने लायक बगीचे में तब्दील कर देते हैं, तो कभी आस-पास के बच्चों को जुटाकर अकेले, अनाथ बड़े-बूढ़ों की सहायता करने पास के काउँसिल फ्लैटों में पहुंच जाते हैं । उनकी रोज़ की खाने-पीने की खरीददारी, घर, कपड़ों की सफाई वगैरह करवा आते हैं।

बाबा भोलेनाथ के शहर से हैं वह और उन्ही की तरह अपनी धूनी रमाए, अपनी ही दुनिया में मस्त.रहना जानते हैं।..उन्ही की तरह जरा-सी बात पर खुश, और जरा-सी बात पर बेहद दुखी होना भी स्वभाव में शामिल हो चुका है उनके विशेशकर दूसरों के सुख-दुख से।

अनाथ लावारिशों की तरह परिवार से दूर उन अस्पातालनुमा घरों में बैठे वे बड़े-बूढ़े ही नहीं, अब तो सामने के अनाथालय में पल रहे किशोर –किशोरी तक अक्सर ही आ बैठते हैं उनके पास, कभी समस्या बांटने तो कभी मात्र समय। किताबों का, कहानियों का, बातों का एक अनूठा भंडार जो है उनके पास । घर के दरवाजे बन्द नहीं, ज्यादातर बस लुढ़के ही रहते हैं, रात में भी। जाने कब किसको जरूरत पड़ जाए ! सतर्क प्रहरी की तरह सजग रहते हैं वह। चोर-उचक्कों का डर नहीं उन्हें, एक पुराने टेलिविजन और दो चार बरतन भांडों के अलावा कुछ नहीं है घर में । बहन की शादी की जिम्मेदारी ओढ़ घर से निकले थे और साल भर के अंदर ही भाई के कर्तव्य भार से मुक्त भी हो गए थे। खूब धूमधाम से की थी राधा की शादी विधवा माई ने और फिर समझाने पर वापस यहां लौट भी आए थे वह। विदेश में रहकर माई की, भगवान की, गांव की सबकी बेहतर सेवा कर पाओगे, बचवा। इस गांव में तो चना सत्तू तक के लाले हैं- सरपंच तक ने यही बात समझाई थी उन्हें। घर और मिट्टी से कटने का दुख तो जरूर था परन्तु नियति मान स्वीकार लिया था सब कुछ। खुश थे अब वह अपने इस नए चोले में। मां-बाप का दिया नाम केशव सहाय तो पुराने कपड़ों सा यादों की गठरी में कबका रुल चुका था और 6, बीचक्रौफ्ट रोड पर रह गये थे सिर्फ सबके परिचित और मित्र., सबके काम आनेवाले कृष्णा मंदिर के पुजारी ‘मि.सहाय‘। दुनियादारी और व्यवहारिकता, मानो मीलों दूर रहती थी उनसे। जब इस पराए मुल्क को अपना कह लिया तो सब अपने ही तो थे यहां भी।

हर बात और हरेक की फिक्र को मन से लगाना, फिक्र करते ही जाना मानो आदत-थी उनकी। माई और गांव क्या छूटे, अपने पराये का मानो भेद ही मिट गया था। जाने-अनजाने, सभी अपने थे और अपनों की सेवा करना, ध्यान रखना उनका प्रथम धर्म और कर्तव्य ही नहीं, दीवानगी बन गई थी। टेलिविजन पर देख-देखकर अड़ोस-पड़ोस ही नहीं, देश दुनिया के बारे में, हर समस्या और उलझनों के बारे में बहुत कुछ जान समझ लिया था। …जान चुके थे वे कि जिन्दगी वक्त कम ही देती है।अभी तो बहुत कुछ अधूरा और अनचाहा था, चारो तरफ ।

…पड़ोस की मैरी ने कल रात खाना खाया या नहीं? कहीं भूखी ही तो नहीं सो गयी? और अगर नहीं खाया तो क्यों नहीं खाया, क्या फिर वही पुराना जानलेवा, पेट का दर्द तो नहीं था, जिसके रहते भूखी-प्यासी और अकेली ही रातभर तड़पती रह जाती है ?‘-ऐसी छोटी-मोटी अड़ोस-पड़ोस की बातें निरंतर परेशान करती रहती थी उन्हें। और-तो-और आसपास के जीव-जन्तुओं तक की पूरी फिक्र करते। अड़ौस-पड़ौस के हर अभाव का, खाना-पीना ही नहीं, साफ-सफाई तक का ध्यान रहता उन्हे… ऐसा नहीं था कि बस फिक्र ही करते थे वे…तकलीफ दूर करने की भी उतनी ही फिक्र रहती, जितनी कि उनकी हर छोटी बड़ी जरूरतों की। इसी भागदौड़ और उधेड़बुन में अपनी सारी जरूरतों को अक्सर भूल जाते थे वे। जान पहचान के दोस्त सयाने हंसते, मजाक बनाते, ‘अरे भाई, काजी जी दुबले क्यों, शहर के अन्देशे से। अपना घर तो बसा नहीं, सारी दुनिया कन्धे पर लिए घूमता है, बेवकूफ। …अब एक इसके ही आंसू पोंछने से तो सारी दुनिया के दुख दर्द तो नहीं मिट जाएँगे, जैसे कि एक इसके ही बत्ती बन्द कर देने से, या पानी बरबाद न करने से, कागज और अल्मूनियम के टिन वगैरह संभाल-संभालकर रखने और रिसाइकिल सेन्टर तक पहुँचाने से,  दुनिया भर की पर्यावरण…बदलते और बिगड़ते मौसम की समस्या हल तो नहीं ही हो सकती है ना, पर कौन समझाए इस मूर्ख को? इंगलैंड क्या आ गया पूरा काला अंग्रेज ही बन गया है। इसका बस चले तो हम सबकी भी आदतें, दिनचर्या, सब बदल डाले और दौड़ाए दिन में दस बार उस रिसाइकल सेन्टर तक। घास-फूस खाकर भला क्यों जिन्दा रहें हम, जीभ दी है भगवान ने हमें , तो अब धरती के सारे स्वाद चखकर, सारे सुख भोगकर ही जाएंगे हम। धरती रहे या न रहे…आँख बंद तो क्या फर्क पड़ता है जनाब…फिर कौन है यहां अमर, एक-न-एक दिन तो सब खतम होना ही है।  भगवान ने भी एक अकेला ही नमूना पैदा किया है, यह भी ! समझता ही नहीं , कि अकेला चना भाड़ तो नहीं फोड़ सकता। पिसेगा किसी दिन दुनिया की चक्की में तो खुद ही समझ जाएगा ।‘ एक की बात खतम न होती तबतक दूसरा मजा लेने लग जाता-

‘ क्यों भाई तुमने वह छछूंदर की कहानी तो सुनी ही होगी?’बड़े-बुजुर्ग, सब शामिल हो जाते निन्दा पुराण में । परनिन्दा से बड़ा और कोई सुख भी तो नहीं जिह्वा के लिए। ‘कौन सी कहानी काका?’- आँखें मार-मारकर और कुरेदते, फूस को तीली-सी दिखाते-से।

‘अरे वही छछूंदर की चारो पैर आसमान की तरफ उठा कर सोने वाली कहानी। एक दिन सब जानवरों ने छछूंदर से पूछा, तू हमेशा ऐसे क्यों सोता है, ऐसे तो तू सो भी नहीं पाता होगा। छछूंदर तुरंत बोला -तुम सबकी सुरक्षा के लिए ही तो मैं ऐसे सोता हूँ। अगर कभी आसमान गिरा तो कम-से कम संभाल तो लूँगा।‘

बात खतम होने के पहले ही ठठाकर हंस पड़ते- ‘वाह चाचा खूब मिलवाया गली के छछूंदर से।‘

तरह-तरह से चीभ चटकाते लोग, कंधे उचकाते, हिराकत की नज़र से देखते और आगे बढ़ जाते। रहन-सहन, वेश-भूषा, आचार-विचार कुछ भी तो नहीं था उनकी तरह का उनमें, मानो उनकी दुनिया के थे ही नहीं वह; उनके जैसे वाकई में नहीं थे वह । लोग-बाग वैसे ही चीजों को बरबाद करते, वैसे ही अपने नफे-नुकसान को लिए पृथ्वी को लूटते–खसूटते और वह वैसे ही, उसी निष्ठा से अपने सुधार और संयोजन में लगे रहते। हरेक का दुख-दर्द उनका अपना था। ठठा-ठठाकर हंसते उन लोगों की परवाह किए बगैर, वैसे ही व्यस्त रहते वह अपनी दिनचर्या में। ‘ऐसे तो कभी, ना ही कोई दूसरों के दुख दर्द समझेगा और ना ही आपस में बांटेगा।‘ कोई असर नहीं पड़ता था उन पर किसी की किसी भी बात का। अपना काम वह वैसे ही नियम और किफायत से करते जैसे कि आजीवन करते आए थे। ‘किसी को तो कहीं न कहीं शुरुवात करनी ही पड़ेगी। अगर सभी यूँ सोचकर बैठ गए , तो कभी कुछ होगा ही नहीं।‘ सोचते और एक नए उत्साह और समर्पण से भर उठता सरल मन। ‘ अब यह धरती मैया भी तो अपनी मैया ही हैं…बेटा होने की खातिर इतना फर्ज तो बनता ही है हमारा भी, कि इसका ध्यान रखें। आखिर, इसे भी तो प्यार और परवाह चाहिए, किसी भी थकी-बूढ़ी मां की तरह। फिर माँ से कैसी बेरुखी…माँ अगर प्यार देती है तो गलतियों पर सज़ा का भी तो पूरा अधिकार है ही उसे। कब तक सब्र करे धरती मैया भी आखिर, देती और बस देती ही रहे।….ज्यादा सताया तो कभी न कभी तो इसका ज्वालामुखी फूटेगा ही… प्रकोप प्रलय आएगी ही ! नादान हैं ये लोग, वक्त के साथ धीरे-धीरे खुद ही समझ जाएँगे अपनी गलतियों को। फिर न्यानों के साथ न्याना तो नहीं बना जाता। और तब पछताए क्या, जब चिड़िया चुग गई खेत ! वक्त रहते ही तो हर बात, हर मदद का कोई अर्थ होता है। क्या पता उसे और उस जैसों को देखते-देखते ही इनका भी मन बदल ही जाए..! ‘

हफ्ताह के छह दिन मंदिर के पुजारी की तरह काम करते, उन्हें लगता है कि ठाकुर जी का काम, यह पूजा-पाठ, कोई काम नहीं; कर्तव्य है उनका।  इंगलैंड में बस गये हैं तो क्या हुआ, ब्राह्मण कुल में पैदा  हुए हैं। हां पढ़ने-लिखने की वजह से एक बात जरूर समझ में आ गई थी कि जिस देश -समाज का दिया खाते हैं , उसके लिए भी कुछ उन्हें अवश्य ही करना ही चाहिए और इसीलिए उन्होंने अपना छुट्टी का दिन, यानी कि इतवार का दिन, बड़े-बूढ़ो और जरूरत-मन्द व बीमारों के नाम कर दिया था। आराम करने के बजाय इतवार की सुबह-सुबह ही अपाहिज बुजुर्गों के पास पहुँचना अच्छा लगता था उन्हें। उनकी कृतघ्न एक मुस्कान नई स्फूर्ति और उर्जा भर देती है उनमें। दूसरों के लिए काम करते जाना, खुद उनके लिए भी कम संतोषजनक नहीं । अच्छा लगता है उन्हें जब वे बड़े-बूढ़े अपनत्व से भरी मुस्कान के साथ उनका हाथ पकड़ कर ‘ धन्यवाद, मि. सहाय‘ कहते हैं , या अपनों की तरह आगे बढ़कर गले लगा लेते हैं। वह  दुनिया को नित एक नई आस के साथ तकते रहते, पर कोई फर्क नहीं आया, न उनमें और ना ही दूसरों में। हां, उन सयानों की उपेक्षा और ताने, विचलित करने के बजाय, कर्तव्य-निष्ठा को, उनके संकल्प को और भी दृढ़ जरूर कर जाते। मुस्कुराकर वह वापस अपने काम में लग जाते…काम भी अपना नहीं, दूसरों का। अपने लिए तो वक्त ही नहीं था उनके पास और सबसे बड़ा आश्चर्य तो सबको यह देखकर लगता था कि यह बात अखरती भी नहीं थी उन्हें। कोई याद दिलाता तो दार्शनिकों की तरह वही एक पुराना जवाब रहता उनके पास-हमें उसकी रचना को बदलना नहीं चाहिए। यह तन, यह सोच और समझ, यह जन्म परोपकार के लिए ही तो मिला है हमें।

सामने अनाथालय में पल रहे बच्चे हँसते-मुस्कुराते, बेहद अपनेपन के साथ जब आकर लिपटते तो उन्हें लगता, मानो पूरा परिवार ही वापस मिल गया हो। बच्चे तो यहां तक कहने लगे हैं कि उनकी नम उंगुलियों में जादू है। जिस पेड़ को छूते हैं, वही लहलहाकर फलने-फूलने लग जाता है, बिल्कुल उनकी फूलों-सी झरती मुस्कुराहट की तरह ही। दूसरों के दुख में निशब्द बहते उनके निश्छल आँसू अनाथों की हर तकलीफ, हर उदासी को पल भर में ही धो देते ।

पर आज वे उदास थे, बेहद उदास।..अपनी ही पापी सोच का खोट उन्हें लगातार साले जा रहा था। क्लेयर उनकी शिष्या थी, मित्र थी, और उनके अपने उसी अनाथालय में, उन्ही के संरक्षण में पली बढ़ी थी, आज आंखों के आगे प्रश्न चिन्ह सी खड़ी थी। वे जानते थे वह कि अपनों पर शक करना ठीक नहीं, फिर क्लेयर तो बच्चों-सी निश्छल है। पर करें भी तो क्या करें,  जिसकी सोच और आचरण पर उन्हें नाज था, उसकी कौपी में ये शब्द…ऐसी सोच? क्या क्लेयर की सोच भी अब ऐसे विषयों के इर्द-गिर्द मंडराने लगी है? कमरे में घंटों से अकेले बैठे वह खिड़की के सामने बेमतलब हिलते पेड़ को घूरे जा रहे थे। शायद शाखों का वह झंझावत खुद उनके अपने मन में आ बसा था। क्लेयर की कौपी में लिखा एक-एक शब्द उन्हें विचलित कर रहा था, सूखे पत्तों सा झर-झरके उनकी समझ और विश्वास की जमीं को ढके जा रहा था।

पर ऐसा तो कुछ भी नहीं था उन शब्दो में-

“इट्स रेनिंग, इट्स पोरिंग । माई लव लाइफ इज बोरिंग।“

इसके आगे अगला उबलता वाक्य उनकी शरीफ जिह्वा से बाहर ही नहीं निकल पाया कि किस लव लाइफ की बात कर रही है वह , बस खुद उन्हें ही एक झुलसाती आग में फफोलता रहा..आखिर कमी कहां रही, बच्ची के चरित्र में या परवरिश में… सामने षोडसी क्लेयर सिर झुकाए ख़ड़ी थी और वह तीन चार बार पूछ चुके थे –यह सब क्या है क्लेयर?

समझे भी कैसे बिचारी भले बुरे का भेद, किसी बड़े का, अपने का सिर पर हाथ भी तो नहीं। अगले पल ही उन्होंने खुद को समझाने की कोशिश की।

“ओह यह.. “ उनके हाथ से कौपी लेते हुए क्लेयर ने देखा , “यह डौली पार्टन का एक मशहूर गीत है मि.सहाय, जिसके सुर मैने खुद पियानो पर निकाले हैं और अब मैं मि. रे, अपने संगीत शिक्षक को सुनाने वाली हूँ ।“

अपनी क्या गलती है और स्थिति की क्या गंभीरता है, कुछ-कुछ समझते हुए भी क्लेयर ने सफाई देने की कोशिश नहीं की- “ मैं मानती हूँ गीत के बोल कोई खास नहीं,पर…“

गुस्से की तहतक जाने की कोशिस करती क्लेयर की निर्दोष आंखें उन्हें अपलक देख रही थीं और सवाल के आरोप को पकड़ती 17 वर्षीय क्लेयर के चेहरे पर शर्म और ग्लानि के कई-कई रंग आ और जा रहे थे। यह बौयफ्रैन्ड वगैरह के खतरों से तो वह खुद ही दूर रहा करती थी।

शक करने या दुख देने का इरादा या स्वभाव नहीं था उनका भी, सो बात तुरंत ही आई-गई भी हो गई।

“ ठीक है तुम जाओ, अब।“ अटपटी-सी एक हड़बड़ी में विदा कर दिया उन्होंने क्लेयर को उसी वक्त। क्लेयर भी सर छुकाए जैसे आई थी वैसे ही वापस लौट गई। बिना कुछ कहे, बिना कुछ पूछे।

पर केशव सहाय बिना बात पर शक करने के लिए झुब्द थे। उनकी सोच इस दिशा में कैसे भटकी-इस बात को लेकर शर्मिंदा थे। कौपी देखते समय, बेमतलब ही उनकी आँखें डौली पार्टन के गीत के उन बोलों पर जा अटकी थीं और उनकी शंका ने स्थानीय अन्य बच्चों की तरह क्लेयर के चरित्र को भी शक के संदिग्ध घेरे में खड़ा किया था। अब स्थिति साफ होने पर झेंप चुके थे वे अपनी सोच और व्यवहार पर। पापी मन को धिक्कार रहे थे बारबार। क्लेयर जो सीता और राधा जैसी मासूम सूरत वाली थी, जिसकी आँखों में ज्ञान और कला की भूख थी, उसके पास वक्त ही कब रहता होगा बेहूदी इन बातों और क्रीडाओं के लिए?

माना सोलह-सत्रह वर्ष की क्लेयर के जीवन के पिछले पूरे सोलह साल अनाथालाय और फौस्टर होम में ही गुजरे थे , कभी इस घर तो कभी उस घर में, परन्तु पिछले पाँच साल से वह सामने के सेंट पौल अनाथालय में ही पल बढ़ रही थी और वक्त-बेवक्त उसकी मदद करते-करते अबतक वह उसके केयर-टेकर, दोस्त, गाइड, सभी कुछ बन चुके थे। यही नहीं कि वह अपनी हर समस्या का समाधान ही मि. सहाय से पूछती थी, हंसी मजाक से लेकर होम वर्क तक सब, अक्सर ही मि.सहाय के कमरे में बैठकर ही पूरा किया करती थी …अटक जाने पर थोड़ा –बहुत पढ़ा भी दिया करते थे वह उसे। उन्हें भी स्वभावतः कोई आपत्ति नहीं थी, यदि उनकी वजह से एक अनाथ बच्ची को परिवार मिल जाए, तो अच्छा ही तो है।

दोनों की ही सोच इतनी सचेत और जागरूक थी कि लगता ही नहीं था कि उम्र के वे 10-12 साल वाकई में थे भी उनके बीच।…वैसे भी, कल्पना की दुनिया में आदर्शों का कवच पहनकर जीने वाले केशव पीटर पैन की तरह बढ़ नहीं रहे थे और अनाथालय की कठोर दुनिया में पलती-बढ़ती क्लेयर बहुत जल्दी ही बड़ी होती जा रही थी।

अभी वह सुबह-सुबह के उस वाकये से उबर भी नहीं पाए थे कि क्लेयर फिर से वापस आ गई थी, पैर के अंगूठे से कालीन पर लकीरें सी खींचती। उस वक्त तो बस यही सोच पाए थे वे कि जरूर ही भूली कौपी लेने आई होगी और अपनी लापरवाही के लिए शर्मिंदा है। उन्हें भी बेबात ही  इतना कठोर नहीं होना चाहिए बच्चों पर।

पर क्लेयर तो जाने किन मुश्किल भावों को कहने के लिए शब्द ढूँढ रही थी , मानो उसे आज मि. सहाय से कोई खास बात करनी थी, बात भी ऐसी वैसी नहीं, बेहद जरूरी या फिर कोई बेहद निजी बात, जो तुरंत ही निर्णय मांगती थी। बात जिसकी मि. सहाय ने कल्पना तक नहीं की थी। बात जिसने अनायास ही उनके जीवन को एक नया लक्ष दे दिया था…संपूर्ण कर दिया था।

सुबह के दस-साढ़े दस बजे का वक्त था वह। वह मन्दिर से लौटे ही थे कि सामने एकबार फिर कुछ बदहवास और कुछ परेशान हाँफती-सी क्लेयर खड़ी थी। कमरे में पड़ी अकेली कुरसी पर बैठने का इशारा कर, खुद चौके से पानी का गिलास लेने चले गये थे वे ..मन ही मन सोचते और परेशान होते, कि इस वक्त दुबारा यह यहाँ पर कैसे ? कहीं मन ज्यादा तो नहीं दुखा दिया था उन्होंने?

‘ रोज की तरह कोई किताब या कौपी भी हाथ में नहीं लेकर आई है और ना ही इसने कुछ समझना या पूछना चाहा है ? आँखों की उदासी तो यह बता रही है कि कहीं किसी गहरी उलझन में डूबी हुई है उनकी समझदार शिष्या? क्या किसी बच्चे की मदद करना चाहती है और पैसे नहीं हैं इसके पास या फिर एक और बीमार की मदद करने का मन बना लिया है इसने?  या फिर जिस खरगोश को परसों लेकर आई थी पास के खेत से, उसके घाव अभी तक ठीक नहीं हुए हैं, शायद अभी जाकर खरगोश के घाव देखने होंगे… आखिर, क्या मदद चाहिए इसे?  क्या वह अलजबरा की गुत्थी नहीं सुलझ पा रही जिसे आज ही पूरा करना जरूरी है, ऐसी क्या ज़रूरी बात है जो तुरंत ही ध्यान चाहती है? ‘

परेशान थे अब मि.सहाय और सोच के घोड़े उन्हें हर संभव दिशा की सैर करा रहे थे । ‘ बिना किसी गम्भीर समस्या के मदद मांगने की आदत तो नहीं क्लेयर की, फिर आज यह यूँ दोबारा उनके दरवाजे पर दस्तक क्यों? ‘

वह जानते थे कि सुबह से रात तक अपनी ही दुनिया में रहनी वाली क्लेयर भी उन्ही की तरह स्वावलंबी और खुशमिजाज है…अपनी मदद ज्यादातर खुद ही कर लेती है और हर परिस्थिति में खुश रहना भी जानती है। गलत काम करना तो दूर, गलत सोच तक उसके पास नहीं फटक सकती। पर वह यह भी अच्छी तरह से जानते थे कि हरदम दूसरों की ही मदद करने वाली क्लेयर को भी तो कभी-कभी मदद की जरूर पड़ ही सकती है और वह बेझिझक मदद मांग भी लिया करती थी उनसे। इतना अपना समझने लगी थी वह उन्हें।

वैसे भी. मां-बाप, भाई-बहन सब कुछ वही तो थे उसके। आज भी याद है वह दिन जब पहली बार मंदिर से लौटते वक्त अनाथ और उदास, नन्ही लड़की पर आँख पड़ी थी उनकी। चार पांच अन्य लड़कों के साथ खेलने की कोशिश करती क्लेयर गिर पड़ी थी और छिले घुटनों से खून पोंछती, अकेली ही बैठी अपने घाव पोंछती चुपचुप रो रही थी। तब जाने कैसे उमड़ती करुणा के अधीन उन्होंने घाव साफ किये थे, दवा लगाई थी और टॉफी भी दी थी रोती बच्ची को। नर्सिंग होम और फौस्टर पैरेंट्स के चक्कर काटती, गुमसुम-सी उस लड़की को जो हाल ही में उस अनाथालय में आकर रहने लगी थी , बहुत प्यार करने लगे थे वह और बहुत जल्दी ही अच्छी तरह से घुलमिल भी गयी थी वह उनसे ही नहीं, सबसे। बाहरवालों से न तो ऐसे सहज और आत्मीय व्यवहार की आदत थी उसे और ना ही किसी ने घावों को इतनी आत्मीयता से साफ ही किया था कभी, या एक आम और साधारण बच्ची तक समझा था कभी उसे।

बच्चे तो बच्चे जानवरों तक के पास छठी ज्ञानेन्द्रिय रहती है , जो प्यार और नफरत पहचानती है, खतरा या सुरक्षा का आभास देती है। यही वजह रही होगी कि अगले दिन ही सकुचाती–ठिठकती, फिर आ खड़ी हुई थी वह दरवाजे पर, अपना वही रिसता और खून टपकता घाव लेकर। देखा तो प्लास्टर निकल चुका था और तुरंत ही वापस मरहम पट्टी भी कर दी थी उन्होंने। उन्हें खुद बड़ी जल्दी ही आत्मीय सी लगने लगी थी वह, गांव में छूटी पड़ोसियों की छोटी बच्ची की तरह, जो अपनी ही नहीं, अपनी गुड़िया की समस्याएँ लेकर भी आ जाया करती थी उनके पास ।

उनके पास सबके लिए वक्त ही वक्त था। बच्चे एक दिन न आते तो वह खिड़की पर बैठे इन्तजार करते रह जाते। अमर्तबान में रखी टौफी और लौलीपाप को निकाल-निकालकर गिनकर देखते कि सभी बच्चों के लिए पूरी हैं भी या नहीं। कुल मिलाकर सात बच्चे थे अनाथालय में और उन्ही अभागों के लिए समर्पित हो चुका था उनका पूरा जीवन। धीरे-धीरे बच्चे भी उन्हें अपना मानने लगे थे…बच्चे  जिनका जीवन बेहद अवहेलित और उपेक्षित रहा था और जिनका सारा दुख कई कई सामाजिक दुर्व्यवहार से ही जन्मा था., जिस वजह से उनका व्यवहार आक्रोश या फिर गहन चुप्पी में परिवर्तित हो जाया करता था, अब हंसने और खेलने लगे थे। उन्हे भी अब कोई अपना, आत्मीय और हमदर्द मिल चुका था… बच्चे, जिनमें से किसीके मां बाप एक्सीडेन्ट में चल बसे थे तो, किसी का कोई था ही नहीं कभी अपना कहने या समझने को। मानो मि.सहाय में सबने अब मित्र और अभिवावक, सभी कुछ पा लिया था।

धीरे-धीरे हर बच्चे की एक सार्थक पहचान बनने लगी स्कूल और अड़ोस-पड़ोस में। अब तो क्लेयर ही नहीं उसके नाम की कहानी भी सबको पता थी। क्लेयर वह नर्स थी जिसने अनाथालय के रजिस्टर में नवजात शिशु को दाखिल किया था और वाट्सन वह आदमी था जिसे पब्लिक टौयलेट के कौरिडोर के एक धूल भरे कोने में बच्ची मिली थी और बस उन्ही दोनों के नामों को जोड़कर ऱख दिया गया गया था उसका नाम क्लेयर वाट्सन।

वह नवजात बच्ची जो जाने कितने घंटों से भूखी-प्यासी, ठंडे कौरीडोर में अकेली और बेसुध पड़ी रही होगी , आज एक अच्छा-खासा नाम ही नहीं, एक अच्छे-खासे और जहीन व्यक्तित्व की मालकिन थी, जो दिनरात और भी निखरता ही चला गया था। अनाथालय हो या विध्यालय, खुली गुनगुनी धूप-सी, हर तरफ क्लेयर वाट्सन की ही मांग रहती, ठंडे और आँधी-अंधड़ के इस देश में। स्कूल की हेडगर्ल ही नहीं, बास्केटबॉल की चैम्पियन भी बन चुकी थी वह।

हां, तो उसदिन जब क्लेयर आकर यूँ ही चुपचाप बैठ गयी, तो उन्होंने सोचा भी नहीं था कि यह एक छोटी-सी घटना कहां से कहां ले उड़ेगी उन्हें।

केशव ने देखा कि उसके हाथ में एक पुराना हल्के हरे रंग का छोटा-सा स्वेटर था जिसे वह हाथ में पकड़े निष्पलक घूरे जा रही थी। स्वेटर नहीं मानो एक किताब हो, जहाँ से वह अपनी बात कहने के लिए कोई-न-कोई सही शब्द ढूँढ ही लेगी। हरदम मुस्कुराती रहने वाली क्लेयर को इतना मूक और उदास कभी नहीं देखा था केशव ने। न चाहते हुए भी, मन अनजानी आशंका में धड़कने लगा-आखिर किस मुसीबत में है यह?

हाथ में पकड़ा वह स्वेटर इतना छोटा था कि शायद गुड़िया का हो और देखने से लग रहा था कि खुद उसने ही बुना था, परन्तु स्वैटर पर लगे धब्बे और उसकी खामोशी कुछ सवाल जरूर उठा रहे थे।

“ मिस्टर सहाय ….मिस्टर सहाय …”.क्लेयर आदत के विपरीत शब्द ढूंढ रही थी आज अपनी बात कहने को।

“ हां! हां ! बेझिझक कहो क्लेयर क्या मदद कर सकता हूँ मैं तुम्हारी?” आगे बढ़कर उसका हाथ धीरे-से थपथपाते हुए बेहद घबराई हुई क्लेयर को ढाढस देनी चाही थी, उन्होने ।

नरगिस के फूल सी उदास, सहमी और दुहरी बैठी क्लेयर बेहद नाजुक लग रही थी उस उलझन भरे पल में …इतनी नाजुक कि अगर सहारा नहीं दिया तो अपने ही बोझ से दुहरी होती, टूटकर वहीं बिखर जाएगी, उनकी आँखों के आगे ही उसी एक पल में। केशव सहाय का मन किया कि उठकर सीने में छुपा लें नन्ही कांपती बच्ची को। प्यार से बाल थपथपाते हुए फिर से पूछा -“ हाँ, हां, बताओ क्लेयर, क्या परेशानी है? क्या कर सकता हूँ मैं तुम्हारे लिए “ आखिर, मां बाप दोनों वही तो थे उन अभागे बच्चों के।

“आप को मेरे साथ पार्क तक चलना होगा। अभी, तुरंत ही।“-बड़ी मुश्किल से जैसे-तैसे बस इतना ही कह पायी थी क्लेयर।

पाँच मिनट पहले ही उतारे कोट के बटन बन्द करते हुए, उन्होंने प्रश्न वाचक दृष्टि से देखा जरूर, पर पूछा कुछ भी नहीं।

‘चलो’, बस इतना ही कहकर दोनों कार में चुपचाप जा बैठे थे। उसके आग्रह में एक बेचैन और घबराई हुई बदहवासी…एक जल्दबाजी, परेशान करने वाला आग्रह था।

‘अभी-अभी तो रौजर को लेकर पार्क से लौटी है। हो सकता है थोड़ी देर सबेर हो गई हो… सात की जगह नौ बज गए हों लौटते-लौटते। आज इतवार भी तो है, लेट गई होगी या फिर —कई-कई दुश्चिन्ताओं से कलेजा मुंह तक आने लगा था ‘…कहीं किसी ने इसके साथ बदतमीजी तो नहीं की है पार्क में? लड़की बड़ी हो रही है। एक फीमेल स्टाफ का पूरे टाइम होना जरूरी हो चला है अब इस अनाथालय में।‘

सोच आगाह कर रही थी उन्हें। लड़कों की तो हर समस्या सुलझा लेते हैं वह, पर इस उम्र की लड़कियो की भी तो कई ऐसी समस्याएं हो सकती हैं जो शायद वे उनसे कह तक न पाएँ !’

पूरे रास्ते ही तरह –तरह के ख्याल और दुशिचिन्ताएँ आती-जाती रहीं और आश्चर्य तो यह था कि सदा चहकती रहने वाली क्लेयर भी खामोश ही रही पूरे रास्ते । रास्ते भर दोनों ने एक बात न की।

अंततः लम्बी खामोशी को तोड़ा सूखी पत्तियों पर बेहद लम्बी स्क्रीच के साथ रुकती कार ने।

‘हाँ, हाँ। यहीं पर ।‘

‘बस यहीं पर, प्लीज़ रोकिए।‘

करीब करीब दौड़ती-सी क्लेयर आधी रुकी कार से ही उतर ली। वह खुद भी, जल्दी-जल्दी जैसे-तैसे कार लौक करके पीछे-पीछे दौड़ पड़े।

सामने दस कदम की दूरी पर खिलते सुर्ख क्रिसेन्थामम की क्यारी में क्लेयर का किशमिशी रंग का कोट एक गठ्ठर-सा गुचुड-मुचुड़ बेहद लापराही के साथ पड़ा दिखा उन्हें। यह वही  मंहगा गरम कोट था जिसे अभी बस महीने पहले ही केशव सहाय ने ही खरीदा था क्लेयर के लिए। कोट नया था और यहाँ इस हालत में, कुछ समझ में नहीं आया उन्हें।…नए कपड़ों की क्या कीमत होती है , यह वे अनाथ बच्चे, अन्य बच्चों की अपेक्षा ज्यादा अच्छी तरह से जानते थे। हमदर्द जरूर थे, परन्तु फिजूल खर्ची कतई पसंद नहीं थी उन्हें, यह भी भलीभांति जानते थे वे बच्चे।

‘यह सब क्या है, क्लेयर?’

उठी आंखें प्रश्नवाचक मुद्रा में  क्लेयर के चेहरे पर गड़ गईं। इसके पहले कि क्लेयर जवाब दे गठ्ठर में हलचल हुई और एक बेहद कमजोर और धीमी, रुक-रुककर घुटी-सी नवजात शिशु के रोने की आवाज साफ-साफ सुनाई देने लगी उन्हें।

‘अरे,बच्चा… यहां और इस हालत में, तुम्हें कहां मिला था? तुरंत ही अस्पताल ले जाना होगा,  चिकित्सा के लिए। बुरी तरह से ठंड से जकड़ी लगती है आवाज ! ‘

लपककर नवजात शिशु को गोदी में उठा लिया था उन्होंने।

‘ हां, मिस्टर सहाय यही तो मैं भी कह रही हूं और अभी जब सुबह मैं रौजर को लेकर आई थी तब भी यह यहीं पर ऐसे ही पड़ा हुआ था…बेहद आपदकालीन स्थिति में। खून में सना और बेहद ठंडा। इतना ठंडा कि… ‘ अपनी आधी बात को अधूरा ही छोड़कर क्लेयर ने रुंधा गला साफ किया ‘ और तब तो इतनी ठंड में इसके पास इस पतले सूती कंबल के अलावा कुछ और ओढ़ने तक को नहीं था। बिल्कुल ही नहीं हिल रहा था यह और कोई आवाज भी नहीं कर रहा था। रौजर ही सूँघते-सूँघते पहुँच गया था इसके पास। मैने तो अँधेरे में देखा भी नहीं था इसे। हाँ, रौजर को इसे बौल की तरह खदेड़ते देखकर मैं डर गई थी। मैने तो समझा था कि कोई बच्चा अपनी गुड़िया भूल गया है। परन्तु पास जाकर देखा तो गुड़िया नहीं, जीता-जागता बच्चा था, और वह भी बेहद नाजुक हालत में। मदद की सख्त जरूरत है इसे। मि. सहाय, इसकी हिफाजत को लेकर मैं बहुत डर गई थी । पता नहीं जिन्दा भी है या नहीं। आपको याद है न अभी हाल ही में एक हफ्ते के लिए हमें जो गुड़िया मिली थी…बिल्कुल वैसा ही तो लग रहा था यह भी। छूते ही पता चला सांस तो चल रही थी और जिन्दा भी था। पहले तो मैने सोचा कि इसे उठाकर आपके पास सीधे घर ही ले चलूं, पर फिर बहुत बीमार लगा मुझे यह। पता नहीं रास्ते में ठीक से मैं ले भी जा पाती या नहीं…कहीं गिरा देती तो, या फिर भागने में इसे ठंड ही लग जाती और यह और भी ज्यादा बीमार हो जाता।  … पता नहीं ठीक रह भी पाता या नहीं? इसीलिए तो झटपट मैं इसे अपने ऊनी कोट में लपेटकर आपके पास मदद मांगने  के लिए  दौड़ गई। परन्तु रास्ते भर मुझे डर लगता रहा था, लौटने पर सब कुछ ठीक मिलेगा भी या नहीं? पर अब आप आ गए हैं, अब ठीक हो जाएगा यह…हैं न मिस्टर सहाय ? आप तो सभी बच्चों को ठीक कर देते हो।‘

केशव को लगा कि अब रोई तब रोई क्लेयर जो याचक बनी खड़ी थी उनके आगे, उसके लिए कुछ और उनके बस में हो न हो, पर इस बच्चे को तो ठीक करना ही पड़ेगा उन्हे। मदद के लिए उन्होंने खुद कई-कई बार बाबा भोलेनाथ को याद कर डाला। नवजात और परित्यक्त इस बच्चे की नैया तो अब वही पार लगा सकते हैं, उन जैसे साधारण इन्सान के बस में तो कुछ भी नहीं। अस्पताल जाते-जाते वह खुद कई-कई सवालों के अभेद जंगल में फंस चुके थे। कौन है यह अभागा, कैसे जीवन की लड़ाई लड़ और जीत पाएगा, बिना मां-बाप के? अनाथालय में तो इतने छोटे बच्चे को रख पाने तक की व्यवस्था नहीं।

अस्पताल पहुँचते ही प्रश्नों की झड़ी थी चारो-तरफ। लग रहा था वे दोनों मदद करते जिम्मेदार नागरिक नहीं, स्वयं अपराधी थे और शक के दायरे में खड़े थे। नर्स के पूछे जा रहे सवाल कभी-कभी तो बेहद अटपटे थे- पार्क में उन्हें ही इस हालत में कैसे मिला यह बच्चा…  क्या कोई और आस-पास नहीं था उस वक्त…कोई परिस्थिति का साक्षी…क्या कपड़े पहने हुए थे बच्चे ने…वे खुद एक-दूसरे को कबसे जानते हैं…क्या रिश्ता है आपस में उनका, वगैरह-वगैरह।….

कुछ देर की गहरी चुप्पी के बाद जब क्लेयर ने बोलना शुरु किया तो प्याज की परतों से नए-नए रहस्य खुलने लगे केशव सहाय की बन्द आँखों के आगे। कपड़ों के नाम पर घटनाओं का एक स्पष्ट चलचित्र-सा विवरण था क्लेयर की जुबां पर।

‘स्वैटर जिसे पहने हुए बच्चा मुझे मिला, असल में मैने ही अपनी गुड़िया के लिए बुना था। उस गुड़िया के लिए जो हमें स्कूल से मिली थी, बच्चे की तरह देखभाल करने को लिए। जिसकी हमें दस दिन तक देखभाल करनी थी एक बच्चे की तरह ही। हर दो घंटे पर गुड़िया रोती थी , नैपी गीली करती थी और दूध मांगती थी, जीते-जागते बच्चे की तरह-ही। कई लड़कियों को उसका बक्त-बेवक्त रोना और दूध मांगना बेहद अखरता भी था, परन्तु आदत तो डालनी ही थी और परिणामों को समझना भी जरूरी था। यह सब इसलिए जरूरी था कि हम जान सके कि असली बच्चा कितनी बड़ी जिम्मेदारी है। कितना धैर्य और मेहनत मांगते हैं ये बच्चे। यह उम्र हमारी पढ़ने–लिखने की है, बच्चे पैदा करने की नहीं। लड़कों से दोस्ती बढ़ाते समय, किसी भी प्रकार की यौन क्रिया में संलग्न होने से पहले कितना सचेत होने की जरूरत है… क्रियाओं के परिणाम और उनसे जुड़ी जिम्मेदारियों को समझने की जरूरत है। फिर भी अगर हम यही चाहते हैं, या संभलते नहीं तो यौन वृत्तियों में सक्रिय रहने का परिणाम क्या होगा…जीवन क्या होगा, यह जानना भी तो जरूरी हो ही जाता है न हमारे लिए।

पर, जो इस खेल में शामिल नहीं होते , जिनके बौयफ्रैंड नहीं होते, उन्हें ग्रैनी या ओल्ड हैगिस कहकर हिराकत की नज़र से भी तो नहीं देखा जाना चाहिए। ‘

क्लेयर उन बच्चों की हमउम्र होकर भी, कहीं ज्यादा समझदार और सहनशील लग रही थी उन्हें उस वक्त। अस्पताल के अन्य कर्मचारियों के साथ-साथ केशव भी उसकी एक-एक बात बहुत ध्यान से सुन और समझ रहे थे।

‘मम्मी-पापा का यह खेल तो आसान है। परन्तु अनचाहे गर्भ को रोकने की समझ हममें होनी ही चाहिए। विशेषतः अब जब हमारी कक्षा के अधिकांशतः बच्चे यौन क्रियाओं में सक्रिय हो चुके हैं। हर लड़की तो बदसूरत होने के ताने को बर्दाश्त नहीं कर पाती और बिना बौयफ्रैन्ड के नहीं रह सकती, आप सब भलीभांति जानते ही हैं, ये बातें।‘

केशव आश्चर्य में डूबे क्लेयर के गालों पर आते जाते रंगों को देख रहे थे। क्लेयर जिसे आज तक वह मात्र एक बच्ची समझते थे, और इस तरह की बातों और विवरणों से बचाकर रखना चाहते थे, एक जिम्मेदार नागरिक और युवती की तरह सब कुछ साफ-साफ बतला व समझा रही थी। यौन विषयों की सही और पूरी-पूरी जानकारी थी उसे।

‘जाने किसकी अज्ञानता और लापरवाही का नतीजा है, यह? पर शायद भगवान यही चाहता था कि मैं ही इस अनाथ का सहारा बनूं। मैं, जो खुद एक अनाथ हूँ और इस त्रासदी को भलीभांति जानती व समझती भी हूँ, तभी तो यह बच्चा मुझे ही मिला। और इसी स्वैटर में मिला…स्वैटर जो खुद मैंने कभी अपने इन्ही हाथों से बुना था…। क्या यह कम इंगित नहीं? विधि का एक सुयोजित इत्तफ़ाक और संकेत नहीं ?

बच्चे तक यह स्वैटर कैसे पहुँचा मुझे नहीं मालूम। शायद वह गुड़िया ही यह स्वैटर पहने रह गई हो और इसकी माँ के पास उस समय वही गुड़िया रही हो।‘

क्लेयर की आँखें आंसुओं से भरी हुई थीं। एकबार फिर उसकी सारी चिंता और सोच बच्चे की सुरक्षा और भूख प्यास पर केन्द्रित हो चुकी थी।

‘एक गुड़िया को तो हम हर दो घंटे पर बेहद मनोयोग से दूध की बोतल दे रहे थे, पर यह बच्चा जो जाने कब से भूखा और कमजोर है उसके बारे में किसी ने अभीतक सोचा ही नहीं। क्या अप इन सवालों की भूल-भुलैया में न भटककर इस बच्चे की तरफ ध्यान देना ज्यादा जरूरी नहीं समझते ?‘

क्लेयर अब हाथ जोड़कर बिनती करने लगी थी।

एक सहृदय नर्स आगे बढ़कर आई और बच्चे को साफ करके नए कपड़े पहना लाई। उसने क्लेयर से पूछा- चूंकि वह इस बच्चे को लेकर आई थी, क्या पहली दूध की बोतल वह बच्चे को अपने हाथों से देना चाहेगी..एक मीठी याद या विदा की तरह। तबतक वह विवरण भरकर गोद लेने के कागज तैयार कर लेगी। कोई न कोई सहृदय वैवाहिक दंपत्ति अवश्य ही इसे ले जाएगा-ऐसा नर्स को पूर्ण विश्वास था। नवजात बच्चे को गोद लेने के लिए उनके पास कई आवेदन-पत्र पहले से ही मौजूद थे।

विदा- शब्द क्लेयर को अन्दर तक चीर गया, फिर भी उसने यंत्रवत् बच्चे को दूध पिलाया। उसके सिर में विचारों का झंझावत् था। स्वैटर ने उस बच्चे के साथ उसका एक बेहद नजदीकी का रिश्ता जोड़ दिया था। क्लेयर जो एक बेहद होनहार क्षात्रा थी और विश्व हेल्थ औरगनाइजेशन में काम करना चाहती थी। निर्णायक समिति की सदस्य बनकर गरीब और अनाथों की सहायता करना चाहती थी, उसके लिए यूँ बच्चे की जिम्मेदारी लेना, पढ़ाई छोड़ देना सही भी तो नहीं महसूस हो रहा था। वैसे भी वर्तमान परिस्थितियों में तो बच्चा उसे मिल ही नहीं सकता था। न तो उसके पास बच्चे के रख-रखाव के लिए आमदनी का ही कोई जरिया था और ना ही सिर पर एक सुरक्षित छत ही थी। चुपचाप बच्चे को वापस नर्स को सौंपकर क्लेयर केशव के साथ वापस लौट आई। केशव, जो क्लेयर के चेहरे पर एक सदाबहार मुस्कान देखने के आदी थे, अब मुस्कान की जगह बेमौसम की बरसात और उदास आती-जाती धूप-छाँव को देखकर खुद बेहद विचलित और उदास हो चले थे। पर क्या कर सकते था वह, परिस्थिति ही इतनी जटिल थी। दोनों चुपचाप गुमसुम-गुमसुम अपने-अपने कमरों में चले गए।

अगली सुबह छह बजे ही क्लेयर फिर दरवाजे पर खड़ी थी। कतई आश्चर्य नहीं हुआ केशव को। जाने क्यों रात भर केशव सहाय को इसी की आशंका ही नहीं, प्रतीक्षा भी थी-

‘आओ क्लेयर अंदर आओ।‘

क्लेयर बिना कुछ कहे अंदर आकर एकबार फिर ठीक सामने उसी कुरसी पर बैठ गई..वहीं उसी जगह, जहां कल सुबह बैठी थी, वैसे ही हाथ की आपस में उलझी उंगलियों को घूरते हुए। केशव चौके में गये और दो कप चाय बना लाए। प्याले मेज पर रखे रहे। क्लेयर अब सीधी उनकी आँखों में देख रही थी। मानो बात कहने के साथ-साथ उनकी हर प्रतिक्रिया जानना और समझना भी बेहद जरूरी था उसके लिए।

केशव सहाय के लिए यह एक कड़ी परीक्षा का समय था।

‘आपको मैं कैसी लगती हूँ, मि. सहाय? ‘

केशव की समझ में नहीं आया कि वह क्या जबाव दें इस अप्रत्याशित और उलझे व अटपटे सवाल का, असहाय और निरीह, गुत्थी सुलझाने के प्रयास में मूक देखते रह गए वह।

‘ खैर छोड़िए, इन बातों को। त्याग और समर्पण की जिन्दगी जितनी कठिन डगर है, उतने ही कठिन निर्णय भी मांगती है। मि. सहाय, मैं सीधे-सीधे अपने प्रश्न पर आती हूँ, क्या आप मुझसे शादी करना चाहेंगे? मैं एक अच्छी गृहिणी बनूँगी। आपके आदर्शों पर चलूँगी। मेरे लिए इस आग्रह का सबसे बड़ा तर्क और कारण यह है कि कम-से-कम एक और बच्चा अनाथ होने की तकलीफ और जिल्लत से बच जाएगा।‘

केशव उसकी बात से सहमत थे, पर इतनी छोटी , समझदार और सुन्दर-सी लड़की उन जैसे बड़ी उम्र के और गंभीर, अधबूढ़े व्यक्ति के साथ क्या सुखी भी रह पाएगी…क्या यह त्याग उसके लिए जरूरी  और सही भी है? 60 और सत्तर की उमर में फर्क भले ही न हो, पर 17 और सत्ताइस का फर्क बड़ा है। क्या यह एक वजह पर्याप्त है दो व्यक्तिओं को तन और मन से बाँधकर एक छत के नीचे रखने के लिए? ईंट-पत्थरों की एक बेजान इमारत को जीता-जागता आरामदेह घर बनाने के लिए? चिंताओं के भंवर में डूबे केशव सहाय को समझकर भी क्लेयर की बात समझ में नहीं आ पा रही थी और परेशान कर रही थी। वैसे भी, जहाँ तक क्लेयर की बात थी, इस नजर से तो कभी उन्होंने देखा ही नहीं था उसे।

क्लेयर जैसी सुन्दर और समझदार पत्नी तो किसी भाग्यशाली को ही मिलेगी पर क्या मात्र परोपकार के लिए उस जैसे पति का वरण करना खुद क्लेयर के हित में होगा। आज भी उनकी सोच खुद के बारे में नहीं, क्लेयर के बारे में ही सोचकर ज्यादा मजबूर थी। और तब जबाव के रूप में उन्होंने साफ-साफ क्लेयर से सबकुछ पूछ लिया, परन्तु क्लेयर की तो यही और बस यही एक जिद थी।

‘ यंत्रवत् चलते इस जीवन का कोई उद्देश्य तो होता ही होगा, और होना भी चाहिए। हमारे जीवन का शायद यही उद्देश्य हो, मि. सहाय ! फिर यह उम्र क्या है…दिन रातों की एक लगातार की गिनती ही तो है? असली सामंजस्य और मिलाप तो विचार और उद्देश्यों का ही होता है, और होना भी चाहिए। और वह हमारे बीच है, बहुत अच्छा है। यह बात तो आप भी बहुत अच्छी तरह से जानते हैं, और मैं भी। ‘

क्लेयर अपना फैसला ले चुकी थी और केशव अवाक् थे… पूर्णतः अभिभूत थे, उसकी सोच और चरित्र की दृढ़ता, दोनों से ही। उनका सिर नतमस्तक था उसके त्याग के आगे।

अगले दिन ही शादी की अर्जी दे दी गई और महीने बाद ही करण सहाय अस्पताल में नहीं, अपने माँ-बाप क्लेयर सहाय और केशव सहाय के साथ, खुद अपने घर में सुरक्षित और सानन्द किलकारियां ले रहा था। यही नहीं, अब तो दादी का लाड़ भी बढ़कर-चढ़कर मिलता है उसे। मन-ही-मन खुश होती दादी ठाकुर जी की सुबह-शाम दिया-बाती करती है और ठाकुर जी को जी भर-भरकर धन्यवाद भी देना नहीं भूलती, आखिर कितने होंगे जिनका इतना सुन्दर और समझदार परिवार है। बेटे ने देर से ही सही, पर बहुरिया बहुत सुन्दर और समझदार चुनी थी। बेटी जैसा लाड़ करती है और ध्यान रखती है उनका। और सुन्दर भी इतनी कि नजर पड़ते ही मैली हो। उनके तो पूरे गांव में इसकी पैर के धूल जैसी भी सुन्दर एक छोरी नहीं थी। बुढ़िया का मन पोते को गोदी में लेते ही खुशियों के सातवें आसमान पर जा बैठता। आंख नाक बाप पर और ढुड्डी दादा पर नजर आती दिखती दादी को।

केशव और क्लेयर भी खुश थे। मित्र दम्पत्ति कम ही देखने को मिलते हैं। अब तो खुद केशव की आँखों से बहती आंसुओं की सुखधारा भी सबको साफ-साफ दिखाई देने लगी है। जब वह अपना प्रिय भजन मन्दिर में दर्शकों के आगे विह्वल होकर गाते हैं-‘ सबसे ऊंची प्रेम सगाई‘ तो एक गहरी और सच्ची अनुभूति का अहसास होता है श्रोताओं को। हाँ , कुछ जिह्वाओं ने  उलटी-सीधी बातें करके उन्हें दंश और तकलीफ देनी अवश्य चाही है। ‘ जरूर ही पहले से ही टांका भिड़ा होगा-‘ ‘ निश्चय ही इन्ही दोनों का बच्चा है, यह।’ ’ पाखंडी है पंडित स्साला।’ ‘अच्छी कहानी गढ़ ली है।’ ‘ पर हम यह पाप अपने बीच नहीं पलने देंगे।’

अपनी बदहवासी में वे यह भी भूल जाते कि यहां जिस समाज में वे रह रहे हैं, वहांपर यह पाप नहीं सराहनीय है । त्याग और सहृदयता का प्रतीक है। उनके परिवार पर तो किसी बात का कोई असर ही नहीं था, मानो।हरामजादा,दुष्ट, कमीना ..शब्द अभी भी आसपास हवा में तैर रहे थे पर छू नहीं रहे थे, क्योंकि खुश थे वह, बेहद खुश… बेवफाई, नाइंसाफी…या शक और बगावत दूर तक नहीं थे मिज़ाज़ और आचरण में। जैसा मिल जाए, खा लेना और जैसे रखे वह, रह लेना…सीधे सरल-से इन्सान थे वह… पेचीदा आवाजों की कर्कश ध्वनियों के लिए बचपन से ही बहरे ।

‘कलयुग है घोर कलयुग। कुल की नाक कटा दी इसने। जाने कहां-कहां की गंदगी घर में बटोरता जा रहा है…अच्छे बुरे का ज्ञान ही नहीं। ना ही लाज ना शरम।’

जितने मुंह उतनी बातें थीं। सच्चाई तो यह थी कि अच्छे-बुरे की परिभाषा उनकी अपनी अंतरात्मा थी। एक बार वहाँ से आदेश आया तो कर्तव्य से डिगते नहीं थे वह।दरवाजे ही नहीं कान तक बंद कर लिए हैं निरर्थक आवाजों के लिए उन्होंने, जो चुप होने का नाम ही नहीं लेतीं। जोर-जोर से फुसफुसाती हैं- ‘ कहीं तो कुछ दाल में काला जरूर है, वरना लोग जब अपने अलावा किसी और के बारे में, मदद करना तो दूर, सोच तक नहीं पाते, कोई क्यों यूँ भला पराया पाप अपनी छाती से बेमतलब ही लगाएगा !’
अनर्गल हवा में तैरती सभी बातों को पूर्णतः अनसुना करते हुए, निजी जीवन में सबकुछ पुनः वैसे ही चलने लगा, जैसे कि पहले चल रहा था- सुखद, सही और सुचारु। क्लेयर अभी भी सिक्स फौर्म की ही छात्रा थी और आगे की पढ़ाई की तैयारी में लगी हुई थी और केशव, बाहर से आती, ’बगुला भगत’, और ’छुपा रुस्तम’ जैसी जहरीली और अनर्गल  संज्ञाओं के बेमलब तानों को अनसुना करते, करण की देखभाल और घर के काम में ही नहीं, पढ़ाई में भी क्लेयर की पूरी मदद कर रहे थे । कलकी अवतार की कहानी उन्होंने पढ़ी ही नहीं, समझी भी है। इस कलि यानी मशीनी भागदौड़ के स्वार्थी र्युग में जो थम पाए, थम कर, अपने तुरंत के फायदे और स्वार्थ से निकलकर  आज की ही नहीं, कल की भी सोच पाए, सबका हितैषी हो वही तर गया , समझो,उसे ही कलकी भगवान मिल गये, जानते थे वह।

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